ब्राह्मणवाद और आरक्षणवाद : पाखंड फ़ैलाने हेतु बहुजनों के बीच ब्राह्मणों की टुकड़े-टुकड़े गैंग सक्रिय है

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मूकनायक मीडिया ब्यूरो | 07अगस्त 2020 | जयपुर : भारत में ब्राह्मणवाद दो रूपों में अभिव्याप्त है, एक परंपरागत जन्मजात जातिवादी रूप में, दूसरा आरक्षण की सुख-सुविधाओं से सुसज्जित भौतिकवादी रूप में पनपा नवब्राह्मणवाद जो पुरातनपंथी ब्राह्मणवाद का संरक्षण बना हुआ है और ‘पेबैक टू सोसाइटी’ के वैज्ञानिक-मंत्र को नकार रहा/चुका है। और आरक्षण जैसी वज्ञानिक सोच को विवादित बना रहा है। दोनों ही रूप देश-समाज के लिए नासूर बन चुके हैं, और एक-दूसरे के पूरक बने हुए हैं। ब्राह्मणवाद और आरक्षणवाद दो ध्रुव हैं, एक-दूसरे के कट्टर शत्रु हैं, पाखंड को फ़ैलाने के लिए बहुजनों के बीच टुकड़े-टुकड़े गैंग सक्रियता से अपने काम में लगी है। यह गैंग कहीं गुप-चुप कार्य करती है और कहीं छोटे-मोटे धार्मिक अनुष्ठानों के बहाने प्रत्यक्ष रूप में। ब्राह्मणवाद और आरक्षणवाद कट्टर शत्रु (सरकारी सेवाओं में आने में हित टकराहट) प्रतीत होते हैं और सवर्णवाद, ब्राह्मणवाद के पौषक की भूमिका में दिखलायी पड़ता है। जब आरक्षण के पौषक ब्राह्मणवाद पर हमला करते हैं तो ब्राह्मणवाद अपने खोल में सवर्णवाद को साथ ले आता है और ब्राह्मणवाद की ओवेर्लेपिंग सवर्णवाद करने लगता है और ब्राह्मणवाद कछुए के पैरों की तरह गायब हो जाता है। जैसे ही खतरा कम होता है, ब्राह्मणवाद अपने रंग दिखाने लगता है और सर्वाधिक नुकसान सवर्णवाद को पहुँचाता है क्योंकि ब्राह्मणवाद वस्तुतः स्वभाव से परजीवी (पराश्रित) और भयातुर है। और उसका अस्तित्व शासन-प्रशासन और मंदिरों-मठों परा व पूजा पद्धतियों तक सीमित है। आरक्षण के बाहर की सरकारी नौकरियों में ब्राह्मणों का कब्ज़ा लगभग 70-80 फीसदी है और पूजा पद्धतियों में 100 फीसदी, वहीं वैश्यों का व्यवसाय में 70-80 फीसदी कब्ज़ा है और नौकरियों में 10 फीसदी, शेष क्षत्रियों का। ऐसे आरक्षित-वर्गों की हित-टकराहट किसी से छुपी नहीं है, आरक्षण में 60-70 फीसद पीढ़ी-दर-पीढ़ी फायदा ले रहे हैं। सबकी अपनी- अपनी गोलाबंदियाँ है जो टूटने का नाम ही नहीं लेती है। वस्तुतः ब्राह्मणवाद ज्ञान और तर्क को नकारता है। वह अंधविश्वास और पाखंड को बढ़ाता है, जिसका इस्तेमाल बहुसंख्यक आबादी के शोषण के लिए किया जाता है। बुद्धिवाद इंसान के आगे ब़ढ़ने के मार्ग को प्रशस्त करता है क्योंकि पाखंड और अंधविश्वासों की छटाएँ सदैव अद्भुत महिमामंडित करके धर्म के खोल में लपेट कर परोसी और बिखेरी जाती हैं ताकि सामान्य जन / जनसमूह उन्हें समझ पाने में सक्षम ना हो पाएँ और वह भ्रमित होता रहे। इन साजिशों को समझने / समझाने के लिए सदियों में कोई बिरला व्यक्ति ही जन्मता हैं, पर अनेक बार ऐसे व्यक्ति को भी अवतार बताकर मानवेत्तर बना दिया जाता है, जैसे- महात्मा बुद्ध के साथ ऐसा ही किया गया। सुकरात का कहना था कि ‘सच्चा ज्ञान संभव है बशर्ते उसके लिए भलीभांति प्रयत्न किया जाए; जो बातें हमारी समझ में आती हैं या हमारे सामने आई हैं, उन्हें तत्संबंधी घटनाओं पर हम परखें, इस तरह अनेक परखों के बाद हम एक सच्चाई पर पहुँच सकते हैं। ज्ञान के समान पवित्रतम कोई वस्तु नहीं हैं।’ रूढ़िवादी परम्पराओं पर प्रहार करने के कारण एथेंस के शासक की नजरों में सुकरात खटकने लगे थे। उन्होंने सुकरात को जहर पीने या अपने मत को त्याग कर राज्य छोड़ देने का दंड सुनाया। अपने विचारों से समझौता न करते हुए सुकरात ने खुशी-ख़ुशी जहर का प्याला पीकर अपनी जान दे दी। उसके बाद वैज्ञानिक दृष्टिकोण व बौद्धिकता के सफल प्रवक्ताओं का उदय यूरोप में नवजागरण काल के दौरान हुआ। रोजर बेकन ने अपनी छात्रावस्था में ही वैज्ञानिक दृष्टिकोण की आधारशिला रखी। उन्होंने अरस्तु के सिद्धांतों को प्रयोगों द्वारा जाँच-पड़ताल की वकालत की, जिसके कारण बेकन को आजीवन कारावास की सजा मिली। लेकिन विज्ञान की आधुनिक विधि की खोज फ्रांसिस बेकन ने की कि प्रयोग करना, सामान्य निष्कर्ष निकालना और आगे और प्रयोग करना। रोजर बेकन, ब्रूनों, गैलीलियो के साथ ही धर्मगुरुओं द्वारा वैज्ञानिकों के उत्पीड़न का सिलसिला शुरू हुआ था। जब डार्विन ने विकासवाद का सिद्धांत प्रतिपादित किया था, तब उन्हें भी चर्च के प्रकोप का सामना करना पड़ा था, लेकिन आख़िरकार सत्य की ही विजय हुई और चर्च ने भी विकासवाद के सामने सिर झुका दिया। पर इंडिया में अभी तक यह संभव नहीं हो पाया क्योंकि यहाँ के बहुसंख्यक लोग जिन्हें बहुजन कहा जाता है, इतने साहसी नहीं हैं कि मानवीय मूल्यों के संरक्षण के लिए स्वर बुलंद कर सकें। एक उद्धरण देखिए- डॉ बीआर अंबेडकर के तीन गुरु थे महात्मा बुद्ध, जोतीबा फुले और कबीर। नारायण गुरु और स्वामी पेरियार से भी अम्बेडकर कई बार मिले। तीनों गुरुओं और खुद बाबासाहब अंबेडकर ने पाया हिंदुत्व मानवता और मानवीय संवेनशीलओं से कोसों दूर है फिर ये सब बातें बहुजन क्यों नहीं समझ पाए.? क्या बहुजन भी अपनी मानवीय संवेदनाएं और साहस खो चुके हैं.! ‘दलित-बहुजन पितृसत्ता’ में भी महिलाओं को दूसरे दर्जे का इंसान ही माना जाता है लेकिन ये ब्राह्मणवादी पितृसत्ता के मुकाबले थोड़ी लोकतांत्रिक है। वहीं, ब्राह्मणवादी पितृसत्ता औरतों पर पूरी तरह नियंत्रण करना चाहती है, फिर चाहे ये नियंत्रण उनके विचारों पर हो या शरीर पर। ये धारणाएं बनाने और इन्हें स्थापित करने वाले वो पुरुष थे जो ताक़तवर ब्राह्मण समुदाय से ताल्लुक रखते थे। यहीं से ‘ब्राह्मणवादी पितृसत्ता’ की शुरुआत हुई। ब्राह्मण परिवारों में महिलाओं की स्थिति दलित परिवारों की महिलाओं से बेहतर नहीं कही जा सकती, बल्कि बदतर है। अगर एक दलित महिला पति के हाथों पिटती है तो कम से कम वो चीख-चीखकर लोगों की भीड़ इकट्ठा कर सकती है और सबके सामने रो सकती है, उसे सहारा भी मिल सकता है लेकिन एक ब्राह्मण महिला मार खाने के बाद भी चुपचाप कमरे के अंदर रोती है क्योंकि उसके बाहर जाकर रोने और चीखने से परिवार की तथाकथित इज़्ज़त पर आँच आने का ख़तरा होता है। ऐसे में, पाखण्ड किसी व्यक्ति की वह चारित्रिक विशेषता है जो अपने पास अच्छे गुण, नैतिकता और सिद्धान्तों के होने का दिखावा करता है किंतु वे उसके पास होती नहीं हैं। पाखंड से विवेकहीन लोग दकियानूसी मान्यताओं, जीवन और क्रियाकलापों के आदी हो जाते हैं। दूसरे शब्दों में कहें, तो हम अपने बेतुके और तर्कहीन क्रियाकलापों के अनुभवों से एक प्रकार से सम्मोहित से रहते हैं। इस सम्मोहन को तोड़ पाना अत्यधिक कठिन होता है। हाल ही का एक शोध ‘बेसियन बिलिफ पोलराइजेशन’ यह बताता है कि कैसे दो अलग-अलग विश्वासों को मानने वाले लोग किसी भविष्यगामी खतरे को देखकर अपने-अपने विरोधी मान्यताओं को ही मजबूत करते चले जाते हैं। वस्तुतः ऐसी गतिविधियाँ, जो तर्कसंगत, बौद्धिक छानबीन और मानवीय जरूरतों के अनुरूप नहीं हैं। उन्हें प्रथाओं, परंपराओं, देवताओं, धर्म, जाति और वर्ग, या किसी अन्य के नाम पर नहीं चलाया जाना चाहिए। भारत में पेरियार-काल में चले तर्कवादी आंदोलन के बाद अंधविश्वास की दीवारें तड़की, नारायण गुरु ने उन्हें जरजरा किया और डॉ अम्बेडकर ने अंधविश्वासों की चूलें हिलायी। किंतु, अंधविश्वास और पाखंडों पर आखरी हमला अभी होना शेष है, जिनकी भूमिका बननी शुरू हो गयी हैं। बाबासाहब डॉ बीआर अम्बेडकर जब बचपन मे आकाश की तरफ निहारते थे, तब उनके मन मे कई प्रश्न उठते थे जैसे कि 1) आकाश नीला रंग का क्यों होता है? या 2) आकाश का कोई और रंग का क्यों नहीं होता है? वैसे नीला रंग अकाट्य समानता और असीमता का परिचायक है ऐसे सवाल हर एक व्यक्ति के मन में सदैव आते रहते हैं, पर हर कोई वैज्ञानिक नहीं बन सकता किंतु वैज्ञानिक सोच तो बना सकता है। वैज्ञानिक सोच से हर व्यक्ति के जीवन में बदलाव आता है। अफ़सोस यह है कि प्रगति के इस युग में भी ऐसी कुरुतियाँ मौजूद हैं जो हमें रात-दिन शर्मशार करती रहती हैं। आज भी चुड़ैल, भूत-प्रेत, व इस प्रकार की कहानिया हमारे लोगों को परेशान कर रही है। आज भी बाल विवाह, मृत्यु भोज जैसी कुप्रथाएँ हमारे समाज को खोखला कर रही है। क्या महज किताबी ज्ञान, ज्ञान हो सकता है? क्या कोई रट्टा लगाकर प्रतिभाशाली हो सकता है? यह भी पढ़ें : वैज्ञानिक दृष्टिकोण और भारत का भविष्य : प्रोफ़ेसर राम लखन ऐसा क्यों है कि उच्चतम बौद्धिक प्रतिभा वाले शिक्षित व्यक्ति और वे भी, जो विशेष रूप से विज्ञान में डिग्री धारी हैं, एक पत्थर को देवता मानकर उसके आगे दण्डवत होते हैं? क्यों विज्ञान में महारत हासिल करने वाले विद्वान् भी अपने पापों को धोने के लिए खुद को गंदे पानी से मलते हैं? क्या उनके द्वारा पढ़े गये विज्ञान और गोबर तथा गोमूत्र के मिश्रण से अभिषेक करने के बीच कोई संबंध है? पाखंड षड्यंत्रों की चारदीवारी में सुरक्षा और संरक्षण पता है। पाखंड अर्थात टुकड़े-टुकड़े गैंग। पर, वह टुकड़े-टुकड़े गैंग नहीं जिस पर जेएनयू में तोहमत मढ़ा गया है। इस गैंग-बैंग के लोग तो रोज आपके बीच विराजते हैं और आपको खंड-खंड करने के भांति-भांति के षड्यंत्रों की सृजना करते हैं। आपको विखंडित करते हैं ताकि आप एक न हो सके क्योंकि आपका एकाकार होना उनके लिए चुनौती है, उनके अस्तित्व के लिए खतरा है, उनके ऐशोआराम के लिए जहर है। प्रत्येक विवेकशील प्राणी को अखंडीय बनाना पड़ेगा, यही वैज्ञानिक-सोच का पहला सूत्र है। अखंड का मतलब होता है—जैसा भीतर है वैसा बाहर है। अगर हममें वैज्ञानिक सोच का अभाव है तो एकत्व कैसे होगा? ऐसी गतिविधियाँ, जो तर्कसंगत, बौद्धिक छानबीन और मानवीय जरूरतों के अनुरूप नहीं हैं, उन्हें प्रथाओं, परंपराओं, देवी-देवताओं, धर्म, जाति और वर्ग, या किसी अन्य के नाम पर नहीं चलाया जाना चाहिए। जो ज्ञान रखता है, और प्रकृति से अवगत है, वह दुःख से मुक्त है। जब एक इंजेक्शन लगता है, तो दर्द होता है। पर वह अच्छे स्वास्थ्य के लिए दिया जाता है; लेकिन दर्द के बावजूद, हर कोई उसे इलाज की उम्मीद में बर्दाश्त करता है। वह ज्ञान की प्रकृति है। प्रश्न है कि वैज्ञानिक सोच का विस्तार कैसे करें। वैज्ञानिक सोच का निर्माण स्कूली शिक्षा के स्तर से आसानी से किया जा सकता है। (लेखक : प्रोफ़ेसर राम लखन, सिंडीकेट सदस्य, राजस्थान विश्वविद्यालय, जयपुर)

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