पृथ्वी की प्राकृतिक संपदा की रखवाली सदियों से आदिवासियों ने ट्रष्टी के रूप में की है : हरिराम मीणा

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मूकनायक मीडिया ब्यूरो | 08 अगस्त 2020 | जयपुर : आदिवासी है तो जंगल है, जंगल है तो जीवन है। हर साल 9 अगस्त को विश्व आदिवासी (मूलवासी) दिवस मनाया जाता है। संयुक्त राष्ट्र संघ द्वारा यह निर्णय सन 1994 में लिया गया। विश्व भर में आदिवासियों की दशा में सुधार के मकसद से वर्ष 1995 से 2004 एवं पुन: 2005 से 2014 तक की अवधि को क्रमश: प्रथम व द्वितीय आदिवासी दशकों के रूप में मनाया गया, किंतु इसके बावजूद आदिवासी उत्थान के आशाजनक परिणाम नहीं निकले। आदिवासियों को सर्वाधिक त्रासदी का सामना उपनिवेश-काल के दौर में करना पड़ा था जो पन्द्रहवीं शताब्दी से शुरू होकर बीसवीं सदी के मध्य पार तक चला। नवसाम्राज्यवाद एवं वैश्वीकरण के इस दौर में मूलवासियों की समस्याओं के और अधिक पेचीदा बनने की संभावनाएँ सामने हैं। वे उच्च तकनीकी, बाजारवाद एवं पूँजी की वर्तमान भूमिका से सर्वथा अपरिचित हैं। इसलिए व ये लोग आधुनिक विकास के हर क्षेत्र में पिछड़े हुआ हैं। आदिवासियों के प्रति सामान्यीकृत दृष्टिकोण विरोधाभाषी रहे हैं। एक पक्ष उनके इतिहास एवं संस्कृति को विश्व धरोहर तथा प्रकृति के साथ बेहतरीन सामंजस्य से आपूरित जीवन शैली एवं संस्कृति के रूप में देखते हैं, वहीं दूसरा दृष्टिकोण मूलवासियों को आदिम, असभ्य, जंगली एवं अविकसित श्रेणी का मानता है। वर्तमान काल में मूलवासियों से संबंधित समस्याएँ विश्व के सामने महत्वपूर्ण स्थान रखती हैं जिनमें नस्लभेद, रोटी-कपड़ा-मकान, शिक्षा-स्वास्थ्य जैसी मूलभूत सुविधाएँ, विस्थापन, संस्कृति का संरक्षण, पहचान का संकट एवं मानवाधिकारों के संरक्षण आदि शामिल हैं। आदिवासियों को लेकर एक उदाहरण देना जरुरी है। ब्रितानी हुकूमत एवं सामंती सत्ता के खिलाफ आदिवासी अंचलों में विद्रोहों का लंबा सिलसिला चला था। उन्हें कुचलने के लिए अंग्रेजों ने ‘क्रिमिनल ट्राइब्स एक्ट’ लागू किया। भारत सन 1947 में आज़ाद हो गया। स्वतंत्र एवं नये भारत के लिए बहुत कुछ सोच-विचार किया गया। नए संविधान के तहत लोकतंत्र एवं विकास की अनेक योजनायें लागू की जाने लगीं। खेद की बात है कि आदिवासियों के खिलाफ लागू क्रिमिनल ट्राइब्स एक्ट को खत्म करने की बात किसी के ध्यान में नहीं आयी। इस काले कानून को सन 1952 में जाकर समाप्त किया और इसके स्थान पर ‘अभ्यस्त अपराधी अधिनियम’ अस्तित्व में लाया गया। क्या यह कहना उचित नहीं होगा कि ‘हिंदुस्तान में आदिवासी समाज को आज़ादी सन 1947 में नहीं मिलकर पाँच वर्ष बाद सन 1952 में मिली!’ देखा जाये तो आदिवासियों के उत्थान के अनेक प्रावधान संविधान से लेकर विभिन्न कानूनों एवं प्रशासनिक आदेशों के माध्यम से किये गए हैं, किंतु इन सबका व्यवहार में क्रियान्वयन ढंग से नहीं हुआ। इन दिनों पूरा विश्व कोरोना जैसी महामारी के संकट से जूझ रहा है, जिसका कोई निदान अभी तक हमारे पास नहीं है। भारत के संदर्भ में यदि इस रोग से प्रभावित इलाकों पर दृष्टि डाली जाए तो पता चलता है कि आदिवासी अंचलों में इस बीमारी का प्रभाव बहुत कम पड़ा है। इन इलाकों में जो भी असर हुआ वह यहाँ के प्रवासी मजदूरों की वापसी की वज़ह से हुआ है। अंडमान व निकोबार द्वीप समूहों, दादरा व नगर हवेली, दमन व दीव तथा लक्षद्वीप जैसे क्षेत्रों के आदिवासियों को यह रोग छू भी नहीं सका है। असम को छोड़कर पूर्वोत्तर के अन्य सात प्रान्तों में अब तक केवल 14 केस सामने आये हैं। असम के 58, त्रिपुरा के 7, मेघालय के 4 और अरुणाचल के 3 केसों की वज़ह बाहर से आने वाले व्यापारी व मज़दूर रहे। झारखंड, छत्तीसगढ़ एवं दक्षिणी राजस्थान के आदिवासियों का बड़ा तबका रोज़गार की तलाश में अन्यत्र जाता रहा है। कोरोना की वज़ह से इन प्रवासियों की वापसी अपने घरों की तरफ हुई। यही कारण इनके संक्रमण का बना। इन प्रवासियों की वापसी से पहले भारत के प्राय: सभी आदिवासी इलाकों में कोरोना का असर नगण्य था। ओड़िशा राज्य के स्वास्थ्य एवं चिकित्सा विभाग की रिपोर्ट के मुताबिक प्रवासी मज़दूरों के अलावा एक भी स्थानीय आदिवासी को कोरोना नहीं हुआ। यह तथ्य भी गौर करने लायक है कि विकास की विभिन्न परियोजनाओं के कारण जिन आदिवासियों का अपनी मूल वन-पर्वतीय धरा से विस्थापन हुआ है अथवा जो प्रवासी मजदूरों की हैसियत से बाहर गए, उनमें से अधिकांश लोग कोरोना की चपेट में आये हैं। इसका कारण यह है कि उनकी जीवन शैली में तब्दीलियाँ हो गयीं और उनकी रोग प्रतिरोधक क्षमता में कमी आई। आदिवासियों के कोरोना से बचे रहने के अन्य कारणों में उनकी छितरी-बिखरी बसावट परंपरागत ‘सोशल डिस्टेंसिंग’ का काम करती है। इस समाज में मूलत: संयुक्त परिवार प्रथा नहीं है। ध्यातव्य है कि घनी आबादी वाले इलाकों में यह महामारी तेज़ी से फैलती गयी है। ऐसे हालात आदिवासी इलाकों में नहीं हैं। आदिवासियों का खान-पान एवं जीवन शैली रोग प्रतिरोधक क्षमता स्वत: ही पैदा करती रही है। बाजारी वस्तुओं का कम से कम उपयोग, शुद्ध हवा, प्राकृतिक जल इस क्षमता में व बढ़ोतरी के लिए सहायक साबित होते हैं। पारिस्थितिकीय संतुलन और पृथ्वी पर जीवन को बचने के लिए जंगल, पर्वत, नदी-नाले, वन्य जीवजंतुओं के संग मनुष्य के मन में सह-अस्तित्व की भावना जरुरी है। इसके लिए आदिवासी समाज से बहुत कुछ सीखा जा सकता है। पूरी धरती की 80फीसद जैव विविधता की रक्षा आदिवासी समाज द्वारा की जा रही है। ध्यान देने की बात है कि पृथ्वी की प्राकृतिक संपदा की रखवाली सदियों से आदिवासी समाज ने ट्रष्टी अथवा कस्टोडियन की हैसियत से की है। आदिवासी है तो जंगल है, जंगल है तो जीवन है और जीवन के बगैर पृथ्वी की कल्पना नहीं की जा सकती!

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