यूपीएससी घोटाला-2 : कब रुकेगा UPSCसाक्षात्कार बोर्ड में आरक्षित वर्गों के छात्रों से होनेवाला भेदभाव

मूकनायक मीडिया ब्यूरो | 08 अगस्त 2020 | जयपुर : सिविल सर्विस में आरक्षित वर्गों के अभ्यर्थियों की संख्या में हो रही गिरावट गंभीर चिंता का विषय है। आरक्षित वर्गों के अभ्यर्थियों के साथ होने वाली भेदभाव की ओर शायद ही कभी किसी ने आवाज उठायी हो। यूपीएससी की मुख्य परीक्षा की कॉपी चेक करने पर भी आरोप लगते रहे हैं। उसके बावजूद आरक्षित वर्गों के अभ्यर्थी मुख्य परीक्षा में वहुत अच्छा स्कोर करते हैं, किंतु साक्षात्कार में उनकी रात-दिन की कठोर मेहनत पर तब पानी फिर जाता है जब उनके बहुत हो कम मार्क्स दिये जाते हैं इसका अंतिम चयन पर काफी फर्क पड़ता है। साक्षात्कार बोर्ड आरक्षित वर्गों के छात्रों के साथ भेदभाव और पक्षपात करते हैं। इसीलिए आरक्षित वर्गों के अभ्यर्थियों के साथ अपमानजनक व्यवहार की शिकायतें मिलती रही हैं। भारत का संविधान भले ही एससी, एसटी और ओबीसी के अभ्यर्थियों के लिए आरक्षण का प्रावधान करता है, लेकिन यह कभी ठीक से लागू नहीं हो पाया । काफ़ी संघर्ष के बाद जब आरक्षण कुछ पदों/संस्थाओं पर लागू हुआ, तो लागू करने वालों ने यह पूरी कोशिश की कि इन केटेगरी के अभ्यर्थियों को इंटरव्यू में कम नम्बर देकर या तो बाहर कर दिया जाए, या फिर उनकी नियुक्ति केटेगरी के लिए आरक्षित सीटों पर ही हो। सरकारी नौकरियों में इंटरव्यू के समय आरक्षित वर्गों (एसटी, एससी, ओबीसी) के कैंडिडेट के साथ भेदभाव का सिलसिला लम्बे समय से चला आ रहा है। अनारक्षित और आरक्षित वर्ग के अभ्यर्थियों का इंटरव्यू अलग-अलग लेने की व्यवस्था विश्वविद्यालयों से लेकर संघ लोकसेवा आयोग और राज्य लोकसेवा आयोगों तक में थी। कई जगहों पर आरटीआई के माध्यम से पता चला कि आरक्षित वर्ग के अभ्यर्थियों को इंटरव्यू में काफ़ी कम नम्बर दिये जा रहे / गये है । जबकि लिखित परीक्षा में उनके नम्बर काफ़ी ज़्यादा थे। यहाँ तक कि सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस एल नागेश्वर राव और जस्टिस हेमंत गुप्ता की बेंच ने 17 सितम्बर 2019 को एक ऐतिहासिक निर्णय सुनाया जिस के इंटरव्यू में आरक्षित वर्ग के अभ्यर्थियों के साथ होने वाला भेदभाव काफ़ी हद तक रुक जाना चाहिए था, पर दुर्भाग्यवश भेदभावपूर्ण बदस्तूर जारी है। मुख्‍य परीक्षा की कॉपियाँ जाँचने के लिए पैनल में जिन लोगों को शामिल किया जाता है, प्राय: उनकी भाषा अंग्रेजी होती है। ऐसे लोग हिंदी में उतने ही सहज हों, ये कोई जरूरी नहीं है। इससे अंक में बड़ा फर्क आ जाता है। कहने को हिंदी की तरफदारी वाजपेयी से लेकर मोदीजी तक सब करते आयें हैं, किंतु ताज्‍जुब की बात है कि UPSC की सिविल सर्विसेज परीक्षा में अब तक हिंदी मीडियम से परीक्षा देकर कोई भी टॉप नहीं कर सका है । 70 वर्षों में हिंदी माध्यम से अब तक सबसे ऊँची रैंक 3 है। इसके पीछे मुख्य वजह यूपीएससी की परीक्षाओं में क्षेत्रीय भाषाओं और हिंदी माध्यम के अभ्यर्थियों के साथ भेदभाव होना भी प्रमुख है। यही करना है कि यूपीएससी की परीक्षा उत्तीर्ण करने वाले हिंदी माध्यम के छात्रों की संख्या साल दर साल कम होती जा रही है। एक तथ्‍य यह भी है कि इंटरव्‍यू बोर्ड के कई सदस्‍यों की भाषा हिंदी नहीं होती। ऐसे में कैंडिडेट की बात समझने के लिए बोर्ड के सदस्‍य दुभाषिये का सहारा लेते हैं। अगर दुभाषिये ने बातों के मतलब में कोई गलती कर दी, तो बड़ा फर्क पैदा हो जाता है। एक रिपोर्ट में कहा गया है कि मसूरी स्थित लाल बहादुर शास्त्री अकादमी में प्रशिक्षण ले रहे 370 अधिकारियों में से मात्र 8 अधिकारी हिंदी माध्यम से आये हैं। साल 2013 में हिंदी मीडियम से यूपीएससी की परीक्षा उत्तीर्ण करने वाले अभ्यर्थियों की संख्या 17 फीसदी थी, जो घटते-घटते साल 2018 में 2.01 फीसदी पर आ गई है। साल 2015 में यह आँकड़ा 4.28 फीसदी, 2016 में 3.45 फीसदी, 2017 में 4.36 फीसदी था। दरअसल, सिविल सर्विस से जुड़ी एक और त्रासदी है सवालों का हिंदी में घटिया अनुवाद,क्योंकि सवाल मूल रूप से अंग्रेजी में सेट किये जाते हैं, फिर हिंदी में इनका अनुवाद किया जाता है। परेशानी की बात ये है कि ऐसे अनुवाद ज्‍यादातर गूगल ट्रांसलेटर जैसे टूल से मशीनी तरीके से किये जाते हैं। ऐसे सवाल भले ही हिंदी में हों, लेकिन इनका मतलब निकालना किसी मेधावी छात्र के लिए भी टेढ़ी खीर होता है।

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