आरएसएस को जबाव दो : विश्व आदिवासी दिवस का विरोधी आरएसएस और आदिवासियों का उलगुलान, विश्व आदिवासी दिवस पर सार्वजनिक अवकाश की घोषणा

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मूकनायक मीडिया ब्यूरो | 08 अगस्त 2020 | जयपुर-राँची : अभी तो पुरे भारत में राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने विश्व आदिवासी दिवस पर सार्वजनिक अवकाश की घोषणा की है और आरएसएस का दम फूलने लग गया है। अगले साथ से झारखंड में सार्वजानिक अवकाश होगा और फिर धीरे-धीरे सारे देश में, तो आरएसएस को मुँह छुपाने की जगह तक नहीं मिलेगी। पर आरएसएस ने अपने मंसूबे जाहिर करना आरंभ कर दिया है। इसी कड़ी में आरएसएस ने छत्तीसगढ़ के जशपुर सहित देश के विभिन्न भागों में आरएसएस और उसके आनुषांगिक संगठनों तथा सवर्ण हिंदुओं ने विश्व आदिवासी दिवस का विरोध शुरू कर दिया है।

संयुक्त राष्ट्र संघ द्वारा घोषित “विश्व आदिवासी दिवस” को भारतीय जनजाति समाज को तोड़ने का वैश्विक षड्यंत्र बताते हुए अखिल भारतीय जनजातीय सुरक्षा मंच ने विश्व आदिवासी दिवस के आयोजन पर रोक लगाए जाने की माँग की है। इसको लेकर छतीसगढ़ के राज्यपाल के नाम जशपुर कलेक्टर को ज्ञापन भी सौंपा गया है, जिसमें जशपुर में 9 अगस्त को आयोजित हो रहे विश्व आदिवासी दिवस को रोके जाने की माँग की गयी है। वहीं, भारतीय ट्राइबल पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष छोटूभाई वसावा का कहना है कि विश्व आदिवासीदिवस के आते ही RSS वालो की नींद हराम हो गयी है । इसलिए आज वो बोल रहे है हम सब भारतवासी मूलनिवासी है, वसावा कहते हैं कि ठीक आप मूलनिवासी है लेकिन हम इंडिया के आदिवासी थे है और रहेंगे जिन्हें संविधान में ST कहा गया है।

दुर्भावनावश आरएसएस के अखिल भारतीय जनजातीय सुरक्षा मंच का कहना है कि भारत में वनवासी रहते हैं और उन्हें आदिवासी शब्द से ही नफरत है। आरएसएस ने अपने घोषणा-पत्रों और कार्यक्रमों में सदैव ही आदिवासी शब्द की जगह हिकारत भरे वनवासी शब्द को शामिल किया है। आरएसएस और बीजेपी की नाक में नकेल कसने वाले छोटूभाई वसावा का यह भी कहना है कि आरएसएस सालों से मूलनिवासी / मूलवासी का उपयोग करके कुछ छिपाने की कोशिश कर रहा है जैसे विश्व आदिवासी दिवस नजदीक आता है उन्हें और उनके स्लीपर सेल को धक्का लगता है और आदिवासी शब्द कैसे दबाया जाये उसमें लग जाते हैं और प्रशासन को उलटे-सीधे ज्ञापन देने लगते हैं।

ऐसा ही एक ज्ञापन में उल्लेख है कि पत्थरगढ़ी के माध्यम से जनजातीय समाज को तोडना और अपने समुदाय में शामिल करना एक षड्यंत्र है, जिसकी शुरुआत झारखण्ड, उडीसा, छत्तीसगढ़ व मध्यप्रदेश में हो चुकी है। अखिल भारतीय जनजाति सुरक्षा मंच ने 9 अगस्त के विश्व आदिवासी दिवस का विरोध करते हुए बहिष्कार किये जाने की चेतावनी दी है। वहीं हिंदुस्तान की एकता, अखंडता व धार्मिक सहिष्णुता के साथ राष्ट्रवाद की रक्षा के लिए “विश्व आदिवासी दिवस” के आयोजन पर रोक लगाने की माँग की है। वसावा आगे कहते हैं कि हम आदिवासियों को संघी और उनके दलाल बतायेंगे कि आदिवासी की परिभाषा क्या होती है? जिन खुद को खुदका असली इतिहास पता नहीं वो हमे बतायेंगे। हम इंडिया के आदिवासी हैं, थे और रहेंगे।

9 अगस्त को को विश्व आदिवासी दिवस ही मनेगा। RSSसंघ और उनके स्लीपर सेल कुछ भी करले, मनाया तो विश्व आदिवासी दिवस ही जायेगा। जनजातीय सुरक्षा मंच, जशपुर के सचिव लालदेव भगत का कहना है कि भारत में इसे मूल आदिवसी दिवस के रुप में जाना जाता है। ये एक षड्यंत्र है। दरअसल भारत में मूल निवासियों को आदिवासी कहा जाता है। भारत में यह प्रचार किया गया कि विश्व आदिवासी दिवस के नाम से उत्सव मनाया जाये ताकि भारत के जनजातीय समाज के लोगों को शब्दों का भाव आसानी से समझ आ सके। कलेक्टर को दिये गये ज्ञापन में बताया गया है कि इससे उनके अपने ही जनजातीय समाज के बीच संघर्ष की स्थिति निर्मित हो गयी है। सदियों से हमारी मूल पहचान को तार-तार करते आये हैं। पहले हेश टैग नाम परिवर्तन के लिए चलाया था धूर्त लोगों ने। आदिवासी शब्द से घबराहट हो रही है उन्हें। आप सब 9अगस्त को समय निकाल कर विश्व आदिवासी दिवस का समर्थन करें, RT करें जोहार!

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