World Indigenous Day : विश्व आदिवासी दिवस ट्विटर पर नेशनल ट्रेंड,देशभर के आदिवासियों ने दिखायी ताकत

मूकनायक मीडिया ब्यूरो | 09 अगस्त 2020 | जयपुर-राँची : देशभर में आज विश्व आदिवासी दिवस (International Indigenous / Tribal Day) मनाया जा रहा है। विश्व आदिवासी दिवस पर संपूर्ण आदिवासियत / जनजाति समाज एवं अन्य लोगों को बधाई! भारत समेत पूरी दुनिया की विविधतापूर्ण जनजातीय संस्कृति मानव समाज की अनूठी विरासत है। आदिवासियों की प्रकृति के साथ समन्वय स्थापित कर जीवन जीने की कला अनुकरणीय है। यह बात दीगर कि 1982 से हर साल 9 अगस्त को ये दिवस मनाया जाता है। 1982 में संयुक्त राष्ट्र संघ (UNO) ने आदिवासियों के भले के लिए एक कार्यदल गठित की थी, जिसकी बैठक 9 अगस्त 1982 को हुई थी। उसी के बाद से संयुक्त राष्ट्र संघ (UNO) ने अपने सदस्य देशों में प्रतिवर्ष 9 अगस्त को ‘विश्व आदिवासी दिवस’ मनाने की घोषणा की। किंतु, भारत में पिछले एक दशक से यह आदिवासियत का अभिन्न अंग बना है। और वर्तमान में तो इसका जादू हर एक आदिवासी के सर चढ़कर बोल रहा है। यूनेस्को ने अपने ट्विटर सन्देश में लिखा है कि इसका असर अब सत्तासीन सरकारों पर दिखने लगा है। यही कारण है कि देश में पहली बार राजस्थान में मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने सार्वजानिक अवकाश की घोषणा की है। उलगुलान बिरसा का सपना था, आदिवासियों के जल जंगल जमीन पर किये जा रहे कब्जा को रोकना, बहु-बेटियों पर हो रहे जुल्म को खत्म करना तथा आदिवासी समाज को तमाम तरह के शोषण और दमन से मुक्त करना। बिरसा मुंडा का उलगुलान सिर्फ बिहार (अब झारखंड) से अंगरेजी साम्राज्यवाद को रोकना नहीं था, बल्कि देश को अंगरेजी हुकूमत से मुक्त करना था। हम देश के मालिक है। जब जब हमारे पूर्वजों द्वारा आबाद इस धरोहर को बाहरी लोगों ने छीनने का प्रयास किया, तब तब यहां विद्रोह हुआ। इस राज्य के जल जंगल जमीन को बचाने के लिए तिलका मांझी, सिदो कान्हू, फूलो झानो, सिंदराय बिंदराय, वीर बिरसा मुंडा, गया मुंडा माकी मुंडा, गोविंद गुरु, नांगली, कालीबाई भील जैसे सैंकड़ों-लाखों वीरों ने अपनी शहादत दी। आदिवासी परंपराओं के अनुरूप झारखण्ड के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने अपने सन्देश में कहा हमारे पूर्वज आदिवासी शहीदों के खून की कीमत है, आज का हमारा सुविधाभोगी जीवन जी रहे हैं। पर हम अपने आने वाली पीढ़ियों को विरासत में क्या देकर जायेंगे, यह विचारणीय तथ्य है । यह भी पढ़ें : आरएसएस को जबाव दो : विश्व आदिवासी दिवस का विरोधी आरएसएस और आदिवासियों का उलगुलान हमारे पूर्वजों की शहीदी विरासत हमें बताती है कि आदिवासी इलाके के जल जंगल जमीन पर कोई भी बाहरी व्यक्ति प्रवेश नहीं कर सकता था। पर आज क्या हो रहा है? इतिहास के आईने में झांकते हुए झारखंड के इतिहास में आदिवासी शहीदों ने जून महीने को झारखंड में अबुआ हातु अबुआ राईज स्थापित करने के उलगुलान की तिथियों को रेखांकित किया है। अपने ही लोगों की गद्दारी के कारण पकड़े जाने के बाद 9 जून 1900 को बिरसा मुंडा की मौत जेल में अंग्रेजों की धीमी जहर से हुई। 30 जून 1856 को संताल परगना के भोगनाडीह में करीब 15 हजार संताल आदिवासी अंगरेजों की गोलियों से भून दिया गया। यह भी पढ़ें : आरएसएस की करतूत : विश्व आदिवासी दिवस से दो दिन पहले बिरसा मुंडा की मूर्ति तोड़ी, NH 33 हाइवे किया जाम बिरसा मुंडा के समय, आज के समय की तरह बुनियादी सुविधाएं नहीं थी। समाज अशिक्षित था। आने जाने की कोई सुविधा नहीं थी। फिर भी बिरसा मुंडा ने महसूस किया कि आदिवासियों को अपना राज चाहिए, अपना समाज, गांव, जंगल, जमीन, नदी पहाड़ सब चाहिए। समस्या जस की तस बनी हुई है, आज भी हजारों गाँव उजाड़े जा रहे हैं। इसी का संज्ञान लेते हुए गाँव कनेक्शन ट्विटर हैंडल ने लिखा है कि झारखंड में कई आदिवासियाँ लुप्त हो रही हैं और केंद्र सरकार बेखबर है। विश्व आदिवासीदिवस के आते ही RSS वालो की नींद हराम हो गयी है । इसलिए आज वो बोल रहे है हम सब भारतवासी मूलनिवासी है, वसावा कहते हैं कि ठीक आप मूलनिवासी है लेकिन हम इंडिया के आदिवासी थे है और रहेंगे जिन्हें संविधान में ST कहा गया है। दुर्भावनावश आरएसएस के अखिल भारतीय जनजातीय सुरक्षा मंच का कहना है कि भारत में वनवासी रहते हैं और उन्हें आदिवासी शब्द से ही नफरत है। आरएसएस ने अपने घोषणा-पत्रों और कार्यक्रमों में सदैव ही आदिवासी शब्द की जगह हिकारत भरे वनवासी शब्द को शामिल किया है। वहीं, भारतीय ट्राइबल पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष छोटूभाई वसावा दिकुओं कोहु ललकारते हुए कहते हैं कि हम तो जंगल के युद्ध हैं, हमें डरना नहीं! राज्यसभा सांसद डॉ किरोड़ी लाल मीणा अपने ट्विटर सन्देश में लिखते हैं कि आदिवासी प्रकृति प्रेमी हैं। वैसे डॉ मीणा हर बार मीणा हाईकोर्ट में आदिवासी दिवस पर बड़े कार्यक्रमों का आयोजन कटे रहे हैं पर अबकी बार उनका स्वास्थ्य ठीक नहीं था

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