वैज्ञानिक दृष्टिकोण – 3 : पाखंड-अंधविश्वास में लोगों को धर्मभीरु व निठल्ला बनाने की निपुणता है

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मूकनायक मीडिया ब्यूरो | 12 अगस्त 2020 | जयपुर : भारतीय संविधान ने हम भारतीयों को ‘रीति-रिवाज, परम्परा और अपने-अपने धर्म को बनाये रखने की स्वतंत्रता दे रखी है।’ किंतु रीति-रिवाज, परम्परा और धर्म के नाम पर अंधविश्वास को बढ़ावा देना समाज और देश के लिए हानिकारक होता है। इसलिए हम भारतीयों का भारत का नागरिक होने के नाते अंधविश्वास को समाज से निकाल फैंकना हमारा मूल कर्तव्य है। किंतु यह अंधविश्वास क्या होता है ? यह समाज में अपनी जगह कैसे बना लेता है ? कहा भी जाता है कि ‘देखकर सीखें, न कि देखा-सीखी करें।’ मैं एक छोटा-सा उद्धरण आपके समक्ष रखना चाहूँगा जो समाज और संशाधनों की एक बानगी भर है – ‘घटना जर्मनी के एक रेस्टोरेंट की है। एक टेबिल पर कुछ भारतीय बैठे थे दूसरी टेबल पर कुछ जर्मन बुजुर्ग औरतें बैठी थीं। वेटर आकर उन सबकी प्लेट में कुछ बराबर-बराबर बांट देता था। उनमें से कोई भी प्लेट में कुछ छोड़ नहीं रही थी। भारतीय उस सबका इंतज़ार करने लगे जो उन्होंने जर्मनी में पहले से रह रहे भारतीय ने मंगवाया था। उस स्थानीय सहयोगी ने बहुत कुछ मंगा लिया था। भूख भी लग रही थी। उन सबने जल्दी-जल्दी खाया, जितना खा सके। बचा-खुचा प्लेटों में छोड़कर उठ गये। यह बचा-खुचा मंगाये गये का एक तिहाई तो होगा ही। प्लेटों में बहुत कुछ छोड़ने के कारण उन्हें किसी ने हमें पीछे से आवाज़ दी। वें बूढ़ी औरतें रेस्तरां के मालिक को कुछ कह रही थीं। आवाज़ मालिक की थी। औरतें उससे शिकायत कर रही थीं कि भारतीयों ने प्लेटों में काफी कुछ छोड़ दिया है। उनमें से एक साथी ने उन्हें कहा उनका इससे क्या लेना देना कि हमने कितना खाया, कितना छोड़ा। औरतें नाराज़ थीं। उनमें से एक ने मोबाइल से किसी को फोन से कुछ कहा। थोड़ी देर में एक वर्दीधारी पुलिस वाला आ पहुंचा। मामला जानकर उसने पचास यूरो का दंड लगा दिया। स्थानीय भारतीय सहयोगी ने चुपचाप दंड भर दिया और अफसर से माफी मांगी। अफसर ने उनसे बड़े कठोर शब्दों में कहा, “वही मंगवाइए जो आप खा सकते हैं। पैसा भले ही आपका है, संसाधन समाज के हैं। दुनिया में अनेक लोग संसाधनों के अभाव में जी रहे हैं। संसाधनों के अपव्यय का आपको कोई अधिकार नहीं है।” जहाँ देखकर सीखने का मतलब अपनी समझ विकसित करने के लिए अवलोकन करना है। वहीं देखा-सीखी करने का मतलब आकर्षित होकर, बिना आवश्यकता के या लालच में आकर आवश्यक परिणाम प्राप्त करने के लिए बिना सोचे समझे दूसरों के कार्यों का दोहराव करना है। फलस्वरूप देखकर सीखना एक सर्वोत्तम वैज्ञानिक दृष्टिकोण है। जबकि देखा-सीखी करना अंधविश्वास और पाखंड की पहचान है। क्योंकि भिन्न-भिन्न परिस्थितियों (देश-काल) के रहते, एक समान प्रभाव के पीछे एक ही कारण हो यह जरुरी नहीं है। इसलिए लोगों को देखकर सीखने की आवश्यकता है न कि देखा-सीखी करने की आवश्यकता है। एक उदाहरण के तौर पर अधिक भोजन लेने से भी पेट में दर्द होता है। खाली पेट में भी दर्द होता है। ख़राब भोजन लेने से भी पेट में दर्द होता है। और कमर कसी होने पर भोजन लेने से भी पेट में दर्द होता है। अब आप स्वयं सोचें, किसी और की पेट दर्द की दवा यदि आप खाएंगे, तो क्या आपका पेट दर्द मिट जाएगा ? संभव है, यदि दोनों के पेट दर्द का कारण एक ही हो। अन्यथा स्थिति और अधिक बिगड़ सकती है। अंधविश्वास में लोगों को धर्मभीरु व निठल्ला बनाने की निपुणता है। उस अंधकार के समान है जो वैज्ञानिक दृष्टिकोण रूपी प्रकाश की उपस्थिति में अपना अस्तित्व खो देता है। अंधविश्वास और अंधकार का अपना कोई अस्तित्व नहीं होता है। किंतु वैज्ञानिक दृष्टिकोण और प्रकाश की अनुपस्थिति में अंधविश्वास और अंधकार दोनों व्यक्ति, समाज और देश में अपना नकारात्मक प्रभाव दर्शाते हैं। अंधविश्वास और पाखंड न सिर्फ विकास के कार्य करने में बाधा उत्पन्न करता है बल्कि वह मनुष्य को मानसिक और शारीरिक रूप से कमजोर बनाता है। हमारी सोचने-समझने की क्षमता को नष्ट करता है और सहजता के प्रति हमें कट्टर बनाता है। अंधविश्वास उस नशे के समान है जिसके बुरे प्रभाव को सभी जानते हैं। किंतु उसकी लत लग जाने के बाद उसके बारे में बात करना या उबरने का प्रयास करना भी लोगों को चिड़चिड़ा बना देता है। फलस्वरूप लोग अपने कार्यों के प्रति कट्टर होने लगते हैं और वह पाखंड बन जाता है। यह भी पढ़ें : वैज्ञानिक दृष्टिकोण और भारत का भविष्य : प्रोफ़ेसर राम लखन अधिकतर देखने को मिलता है कि “पढ़े-लिखे और तकनीकी ज्ञान रखने वाले लोग भी अंधविश्वासी और पाखंडी होते हैं ?” लोगों का प्रश्न होता है कि ऐसा कैसे संभव है ? वास्तव में विज्ञान का मतलब वैज्ञानिक दृष्टिकोण नहीं होता है और न ही तकनीकी ज्ञान का वैज्ञानिक दृष्टिकोण से कोई संबंध होता है। वैज्ञानिक दृष्टिकोण का कार्यक्षेत्र विज्ञान के कार्यक्षेत्र से बहुत व्यापक होता है। इसलिए विज्ञान और तकनीकी ज्ञान रखने वाला व्यक्ति भी अंधविश्वासी होता है, पाखंडी भी हो सकता है। उसमें वैज्ञानिक दृष्टिकोण की कमी होती है। फिर भले ही वह कितनी भी पुस्तकें क्यों न पढ़ ले। मोबाइल, कंप्यूटर और वाई-फाई जैसी सुविधाओं का क्यों न उपयोग करता हो। किंतु ऐसे लोग समाज और देश की उन्नति में बाधा उत्पन्न करते हैं। अंधविश्वासी होते हैं। इसलिए विज्ञान से अधिक वैज्ञानिक दृष्टिकोण को बढ़ावा देने की बात की जाती है। तुम्हारे गले में पड़ी तुलसी की माला तुम्हे सूदखोरों के चंगुल से कभी नहीं बचा पायेगी। तुम कितने ही राम के गीत गाते रहो भूमिपतियों से तुम्हे कभी कोई राहत नहीं मिलने वाली है। तुम कितनी ही तीर्थ यात्राएँ कर लो तुम्हे जीवन यापन के लिए कहीं से कोई पेमेंट नहीं मिलने वाला है। अंधविश्वास का सीधा सा अर्थ है बिना जांचे-परखे स्वीकारना और उस पर विश्वास करना। यदि आप रीति-रिवाज, परम्परा, संस्कृति और धर्म के नाम पर ऐसे कार्य करते हैं जिनको करने का कारण आपको नहीं पता है तो ऐसे कार्य अंधविश्वास की श्रेणी में आते हैं। कारण जानते हुए भी यदि वे कार्य आवश्यक परिणाम नहीं देते हैं फिर भी उन कार्यों को करते रहना, अंधविश्वास है। इस आधार पर अंधविश्वास दो प्रकार के होते हैं। पहला वह अंधविश्वास जो विकास के कार्य में बाधा उत्पन्न करता है। और दूसरा वह अंधविश्वास जो दूसरों के कार्यों में बाधा उत्पन्न करने की चेष्टा करता है। अर्थात् यदि आप दूसरों के रीति-रिवाज, परंपराओं, संस्कृति और धार्मिक कार्यों को अंधविश्वास कहकर बाधा पहुँचाने की चेष्टा करते हैं और उन कार्यों को करने या उनको अंधविश्वास कहने का कारण आपको नहीं पता है ? तो आप स्वयं अंधविश्वासी है क्योंकि बिना सोचे समझे दूसरों का समर्थन करना भी अंधविश्वास कहलाता है, वैसे इसका आधुनिक स्वरूप अंधभक्ति है। चूंकि समाज के बहुसंख्य लोग जीवन में ढेर सारी निरर्थक बातें; रहस्यवाद, तथा पाखण्ड और अन्धविस्वासों में आस्था रखते हैं,जिसके ही अवसर का फायदा कुछ धुर्त, चालाक, समाज विरोधी और स्वार्थी लोग उठाने में सफल हो जाते हैं। अतः मैं आपको सलाह देता हूँ कि जो कुछ भी थोड़ी बहुत राजनीतिक शक्ति आप लोगों के हाथों में आई है। उसका आप भरपूर फायदा उठाइये। भले ही आप अच्छाई के पक्ष में क्यों न हों ! किंतु आने वाला समय आपके इस अंधविश्वास के कारण समाज के लिए घातक होता है। इसी कारण के चलते बहुत सी परम्पराएँ अंधविश्वास की श्रेणी में आने लगी हैं। पहला वाला अंधविश्वास वर्तमान की बुराई कहलाता है। जबकि दूसरा वाला अंधविश्वास भविष्य की बुराई के लिए साधन बनता है। यदि आप लोग अपने दुःख-दर्दों की तरफ कतई ध्यान नहीं देते हो तो आप लोगों के दुःखों का निवारण कभी नहीं होने वाला है। अक्सर ऐसा लगता है कि वह दासता जिसके विरुद्ध हम लंबे समय से संघर्ष कर रहे थे कहीं दुबारा न हमको दबा बैठे। तो क्या हम लोगों की यह जागृति केवल अल्प समय के लिए ही थी। आपने जो कुछ खोया है उसे ही दूसरों ने प्राप्त किया है। आपका अपमान ही दूसरे लोगों का सम्मान बन जाता है। आपके सामने अनेक दुःख हैं। आप गरीबी तथा अन्याय से पीड़ित हैं। यह सब इसलिए नहीं कि आपने किसी पूर्वजन्म में कोई अशुभ कार्य किये थे। बल्कि इसलिए हैं कि यहां के कुछ शातिर शक्तिशाली लोगों द्वारा आपके ऊपर आधिपत्य जमाया गया है। और आप लोगों के अधिकार छीन लिये गये हैं। आप लोगों के पास कहीं कोई भूमि नहीं है, क्योंकि उसे दूसरों ने हथिया लिया है। आपके पास कोई उद्योग-धंधे असदी भी नहीं क्योंकि उनपर दूसरों का कब्जा है। आप लोगों के पास पर्याप्त नौकरियां नहीं हैं क्योंकि उन्हें दूसरे चालाक लोगों ने छीन लिया है। इसलिए ऐसे किसी काल्पनिक भाग्य पर भरोसा मत करो, बल्कि अपनी खुद की शक्ति पर भरोसा करों और आगे बढ़ो ! (लेखक : प्रोफ़ेसर राम लखन, सिंडीकेट सदस्य, राजस्थान विश्वविद्यालय, जयपुर) यह भी पढ़ें : ब्राह्मणवाद और आरक्षणवाद – पाखंड फ़ैलाने हेतु बहुजनों के बीच ब्राह्मणों की टुकड़े-टुकड़े गैंग सक्रिय है

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