स्वाधीनता दिवस विशेष : भारतरत्न ‘डॉ भीमराव अंबेडकर जी’ को समर्पित कविता

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मूकनायक मीडिया ब्यूरो | 15 अगस्त 2020 | जयपुर एक मसीहा ऐसा आया, आकर अल़ख जगायी थी, युगों-युगों से सोई अपनी, सोती कौम जगायी थी ! ज़ुल्मों और अत्याचारों से, जीना बड़ा दुश्वार था, पीठ पर झाड़ू गले हण्डिया, हर जगह तिरस्कार था, जीवन भरा था तिरस्कारों से, ठौर कहीं ना पाई थी …1 पानी तक ना नसीब था, ना मंदिर हमने देंखे थे, अछूत कहकर धिक्कारा जाता, ना कहीं पर अपने लेखे थे, वेद शास्त्र भागवत गीता, सुनने की भी मनाही थी …2 ऊंच-नीच और भेदभाव का, हर तरफ बोलबाला था, साम्राज्य था अंहकारों का, हर साम्राज्य काला था, देखा जाता था घृणा से, ना नज़र कभी मिलायी थी…3 युगों-युगों से बंधे हुए थे, गुलामी की जंजीरों से, पशु से भी बदतर जिंदगी, जीते थे शरीरों से, तोड़ डाली सब जंज़ीरें, जो बंधी हर कलाई थी…4 अपनी कौम की दशा देखकर, मन ग्लानि से भर गया, अपशब्दों से बोला जाना, दिल में घर कर गया, रूह कांपी थी गद्दारों की, जब उसने कलम उठायी थी…5 छुआछूत और अपमानों ने, दिल को बड़ा बेहाल किया, भूख-प्यास और बीमारी का, मन में कभी ना ख्याल किया, सोया रहता था जग सारा, नींद उसे ना आयी थी…6 ज़ोर-ज़ुल्म से लड़ते-लड़ते, अधिकारों को पाया था, सब हैं उस ख़ुदा के बंदे, सबको सम बताया था, अपने कौम के हक़ की खातिर, हक़ की लड़ी लड़ायी थी…7 बदल डाली रीति-नीति, बदल डाला सब विधान, जन-जन का अधिकार दिलाया, लिख डाला ऐसा संविधान, बांटा जिसने वर्ण जाति में, वो मनुस्मृति जलायी थी…8 किया समर्पित सारा जीवन, अपनी कौम पर वार दिया, संघर्ष करना संगठित रहना, शिक्षाओं का सार दिया, सबको सम सम्मान मिले वो, बुद्ध की राह अपनायी थी…9 भीम दीवाना गगन बौद्ध” संभाल अपने अधिकारों को, ज़ुल्म सह चुके अब बहुतेरे, धूल चटा मक्कारों को, चल पड़ो अब संगठित होकर, जो राह भीम ने दिखायी थी साभार : सत्येन्द्र-कुमार (व्हाट्सएप्प)

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