नयी शिक्षा नीति : शिवराज सरकार ने आदिवासी बहुल इलाकों के 12876 सरकारी स्कूल किये बंद

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मूकनायक मीडिया ब्यूरो | 21 अगस्त 2020 | जयपुर-भोपाल : जहाँ तक इस मंत्रालय की बात है तो इसका नाम पहले भी बदला जा चुका है। मूल प्रश्न है कि क्या वर्ष 2020 की शिक्षा नीति से देश की बुनियादी शिक्षा बदल जायेगी। इसमें किये गये दावे क्या वाकई हकीकत के इर्द-गिर्द होंगे और यदि दावे और हकीकत के बीच अंतर दिखायी दे रहा है तो कितना। साथ ही यह प्रश्न भी है कि इस नई नीति में निर्धारित लक्ष्य किस सीमा तक व्यवहारिक हैं। ताजा उदाहरण मध्य-प्रदेश का है जहाँ इस साल अगस्त में राज्य की शिवराज सरकार ने 12,876 सरकारी स्कूलों में ताला लगा दिया। सूत्रों का कहना है कि मध्य-प्रदेश में सरकारी स्कूलों के बंद करने का सिलसिला तो अभी शुरू हुआ ही है। इसका अर्थ यह है कि आने वाले समय में अनेक सरकारी स्कूल बंद कर दिये जायेंगे। इसमें राजधानी भोपाल, इंदौर और जबलपुर के स्कूलों की संख्या तो शामिल है ही, बड़वानी, छिंदवाड़ा और मंडला जैसे आदिवासी बहुल जिलों के स्कूलों की संख्या भी शामिल है। आम धारणा है कि प्राइवेट स्कूलों के बच्चे सरकारी स्कूलों में पढ़ने वाले बच्चों से अधिक होशियार होते हैं। इसके समर्थन में कई लोग बोर्ड परीक्षाओं के नतीजे भी दिखा सकते हैं। लेकिन, आज इस बिंदु पर विचार करने की जरूरत है। पहली बात तो यह है कि प्राइवेट स्कूलों में बच्चों को दाखिला देने के पहले ही चुना जाता है। कई बार उन्हें चुने जाने के लिए कठिन परीक्षा भी आयोजित करायी जाती है। अब कठिन परीक्षाओं को पास करके आने वाले बच्चों को तो प्राइवेट स्कूलों ने पहले ही चुन लिया तो हो सकता है वे अपेक्षाकृत अधिक होशियार हों भी। फिर प्राइवेट स्कूलों में उन अमीर बच्चों को ही लिया जाता है, जिनके परिजनों को यदि लगा कि बच्चे की ट्यूशन भी जरूरी है तो वे सकी ट्यूशन भी लगवा देते हैं। अब यदि इन सारी अतिरिक्त सुविधाओं को हटा लिया जाये तो बहुत संभव हैं कि प्राइवेट स्कूलों के नतीजे भी सरकारी स्कूलों जैसे ही रहें। यहाँ एक बात यह भी महत्त्वपूर्ण है कि स्कूल की गुणवत्ता का मतलब सामान्यत: महँगी बिल्डिंग, अंगेजी माध्यम और पढ़ाई के लिए काम आने वाली चीजों से लगाया जाने लगा है। लेकिन, बहुत कम सरकारी स्कूलों में ऐसी व्यवस्थाएँ मौजूद हैं। इसलिए, संभवत: प्राइवेट स्कूलों से सरकारी स्कूलों के मुकाबले की बातों का कोई मतलब नहीं रह जाता है। दूसरी तरफ, यह भी कहा जाता है कि सरकारी शिक्षक यदि सही ढ़ंग से अपनी डयूटी निभाएँ तो सरकारी स्कूलों को प्राइवेट स्कूलों के मुकाबले सुधारा जा सकता है। सबसे बढ़ा सवाल तो यह है कि शिक्षा और शिक्षकों की दुर्दशा के लिए जिम्मेदार कौन है ? खुले में शौच करती महिलाओं को ऐसा करने से रोकने से लेकर कुत्ते-बिल्लियों की गिनती तक करवायी जाती है। यह कहते हुए यह हकीकत को भुला दिया जाता है कि उनके हिस्से में बच्चों को पढ़ाने के अलावा भी बहुत-सी ‘नेशनल डयूटीज’ हैं। प्राइवेट के शिक्षक चुनाव, जनगणना, पशुओं की गणना या ऐसे ही दूसरे कई कामों में व्यस्त रहते हैं। यह कहने में कैसी झिझक कि एक सरकारी शिक्षक के ऊपर काम का बोझ बढ़ रहा है। वहीं, बुरे नतीजों के पीछे सरकारी शिक्षक और बच्चों के बीच का असंतुलित अनुपात भी जिम्मेदार है। आप सरकारी स्कूलों में बच्चों की भारी संख्या को देखिए, उसके मुकाबले आपको शिक्षकों की संख्या कुछ भी नहीं लगेगी। फिर प्रश्न यह भी है कि एक ऐसा परिवार जो अपने बच्चों की महँगी पढ़ाई का बोझ उठा सकता है, उसके सामने ‘सबकी शिक्षा एक समान’ जैसी बातों का क्या मतलब रह जाता है? उसे तो ऐसी बातें स्कूल चुनने की आजादी को रोकने जैसी लगेगी? ऐसे यक्ष-प्रश्नों का जवाब ढूँढना आसान नहीं है कि अमीर को स्कूल चुनने की आजादी है, गरीब को नहीं। आजादी का अर्थ तो गरीब से गरीब को शिक्षा पाने का हक देता है। मूल प्रश्न यह है कि एक गरीब का बच्चा अपनी गरीबी की वजह से बराबरी और बेहतर शिक्षा से बेदखल क्यों रहे? खास तौर पर प्राथमिक स्कूल से। सीधी बात है कि शिक्षा में कई स्तरों पर असमानताएँ हैं। अब तो प्राथमिक स्कूल की पढ़ाई को मौलिक हक के रुप में अपना लिया गया है। फिर भी मौटे तौर पर कहा जाता है कि देश के सौ में से करीब आधे बच्चे प्राइमरी स्कूल नहीं जाते है। दूसरी तरफ निजीकरण की तीव्र गति के साथ सामाजिक, आर्थिक और राजनैतिक दूरियाँ बढ़ रही हैं। इन परिस्थितियों में अलग-अलग वर्गों के बच्चों के हितों को देखना होगा। यदि ऐसा नहीं हुआ तो प्राइवेट सेक्टर का कारोबार तो फलेगा-फूलेगा, किंतु सामाजिक, आर्थिक और राजनैतिक असमानताएँ दिन-ब-दिन बढ़ती जायेंगी। बात साफ है कि सभी स्कूलों में शिक्षा की गुणवत्ताएँ अलग-अलग हैं। इसी तरह शिक्षक को चुने जाने के लिए भी अलग-अलग स्कूलों में योग्यता के अलग-अलग पैमाने रखे गये हैं। इसके बाद बात आती है कि समाज में जो भेदभाव है, वही तो स्कूल की चारदीवारी में है। जब सभी बच्चे सरकारी स्कूलों में पढ़ेंगे तो उनके बीच की असमानताओं के चलते दिक्कते नहीं आयेंगी हीं। यह बात लोकतंत्र के दृष्टिकोण से फिट नहीं बैठती है। अब तो दुनिया भर की किताबों में समाज और स्कूल की विविधताओं को न केवल स्वीकार किया जा रहा है, उनका सम्मान भी किया जा रहा है।

भारत में प्राइवेट स्कूलों पर ज्यादा भरोसा किया जाने लगा है। इससे प्राइवेट सेक्टर से जुड़े लोगों को मनमाने तरीके से मुनाफा कमाने का मौका मिलता है। दूसरी तरफ कहने को सरकार की कई योजनाएँ हैं। लेकिन, सबके अर्थ अलग-अलग हैं। जैसे कुछ योजनाएँ शिक्षा के लिए तो कुछ महज साक्षरता को बढ़ाने के लिए चल रही हैं। इसकी जगह सरकार को एक ऐसे स्कूल की योजना बनानी चाहिए जो सारे अंतरों का लिहाज किये बगैर सारे बच्चों के लिए खुली हो। अब प्रश्न है कि इस तरह से तो सरकारी स्कूलों में भी असमानताएँ हैं? बिल्कुल, जैसे कि पहले कहा जा चुका है कि केंद्रीय कर्मचारियों के बच्चों के लिए केंद्रीय स्कूल, सैनिकों के बच्चों के लिए सैनिक स्कूल, मेरिट लिस्ट के बच्चों के लिए नवोदय स्कूल। इसलिए, समाज से स्कूल में घुसने वाले उन कारणों को तलाशना होगा, जो ऊँच-नीच की भावना बढ़ाते हैं। यदि समाज में समानता लानी ही है तो सबसे अच्छा तो यही रहेगा कि इसकी शुरूआत शिक्षा और बच्चों से ही की जाये। इसके लिए फिर दोहराना होगा कि सबके लिए एक समान स्कूल की बात करनी होगी। लेकिन, यह बात इतनी सीधी नहीं लगती है। जब पानी से लेकर शिक्षा और स्वास्थ्य तक की चीजों को बाजार में ला दिया गया हो तो यह बात बेतुकी लग सकती है। लेकिन, शिक्षा की जर्जर हालत को देखते हुए तो यह बात बड़े तुक की लगती है। सामाजिक न्याय, समरसता और बदलाव के लिए शिक्षा ही एक रास्ता है, जिससे हर वर्ग के बच्चे को बगैर किसी भेदभाव के एक साथ पढ़ने-बढ़ने का अधिकार सुरक्षित है। इसमें देश भर के सभी बच्चों के लिए एक ऐसी व्यवस्था की वकालत की गयी है, यही वजह है सबके लिए एक समान शिक्षा के अभाव में समाज के ताकतवर लोगों ने सरकारी स्कूलों को ठुकरा दिया है।

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