वैज्ञानिक-दृष्टिकोण पार्ट-5 : अक्सर अंधविश्वास और पाखंड छद्मविज्ञान का सहारा क्यों लेता है (08 कारण)

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गतांक से आगे… मूकनायक मीडिया ब्यूरो | 22 अगस्त 2020 | जयपुर : अक्सर अंधविश्वास और पाखंड छद्मविज्ञान का सहारा लेता है। ऐसे में सोचना यह होता है कि छद्मविज्ञान क्या करना चाहता है? उसका उद्दश्य क्या है? वह यह दिखाना चाहता है कि प्राचीन भारत में आधुनिक विज्ञान पहले से ही मौजूद था। ऐसा मानना प्राचीन सभ्यता के ज्ञान और आधुनिक विज्ञान, दोनों के साथ ही अन्याय है। इतिहास में किसी दावे की ऐतिहासिकता को प्रमाणित करने के लिए साधनों / विधियों का उपयोग किया जाता है। इन दावों की ऐतिहासिकता और सत्यता की जांच के लिए उन्हें वैज्ञानिक तार्किकता की कसौटी पर भी कसा जाना चाहिए। अब तक, विज्ञान कांग्रेस की बैठकों में छदम विज्ञान के समर्थकों द्वारा किये गये, मानव को हठी की सूंड का प्रत्यारोपण, मछली से मानव (ईश) का जन्म, मेंढक से स्त्री का जन्म, खेत से हल जोतते स्त्री का जन्म, बिना स्तर-पुरुष संसर्ग के मनुष्यों का जन्म, बिना वीर्य (खीर, जड़ी-बूटियों आदि) से मनुष्य का जन्म, टेस्ट-ट्यूब बेबी, पुष्पक विमान और मिसाइल प्रौद्योगिकी इत्यादि सम्बंधी बड़े-बड़े दावे इन परीक्षणों में विफल रहे हैं। क्योंकि सर्वविदित है कि विज्ञान, एक निरंतर परिवर्तनशील और विकासमान ज्ञान प्रणाली है। इसमें ज्ञान का निर्माण तर्कसंगत जांच, प्रयोग द्वारा प्राप्त प्रमाणों और वैज्ञानिक समुदाय में आपसी सहमति के आधार पर होता है। वर्तमान स्थिति अत्यंत चिंताजनक है क्योंकि आज अंधविश्वासों, मिथकों और छद्म वैज्ञानिक तथ्यों में अत्यधिक बढ़ोत्तरी हो रही है। आज जो मिथ्या परम्परागत रीति-रिवाजें हमारी आवश्यकता के अनुकूल नहीं है, उनको भी मात्र परम्परा के नाम पर बढ़ावा दिया जा रहा है। ऐसे रीति-रिवाजों पर पुनः विचार की आवश्यकता है। हमारे देश में अंधविश्वास अन्य देशों की तुलना में कुछ अधिक है, जोकि वैज्ञानिक दृष्टिकोण की अनुपस्थिति को दर्शाता है। इसलिए वैज्ञानिक दृष्टिकोण भारत की तात्कालिक आवश्यकता है। यदि हम अपने दैनिक जीवन में वैज्ञानिक दृष्टिकोण रखेंगे तो हम व्यक्तिगत एवं सामाजिक घटनाओं के तर्कसंगत कारणों को जान सकेंगे जिससे असुरक्षा की भावना और निरर्थक भय से छुटकारा प्राप्त हो सकेगा। आधुनिक युग में जिस प्रकार से जैसे कोई खुद को अंधविश्वासी, नस्लवादी या स्त्री शिक्षा विरोधी कहलाना पसंद नहीं करता, उसी प्रकार से खुद को ‘अवैज्ञानिक’ कहलाना भी पसंद नहीं करता है। यह भी पढ़ें : वैज्ञानिक दृष्टिकोण – 3 : पाखंड-अंधविश्वास में लोगों को धर्मभीरु व निठल्ला बनाने की निपुणता है वह अपनी बात को वैज्ञानिक सिद्ध करने के लिए मूलभूत सच्चाई की नकल उतारनेवाले छल-कपट युक्त छद्म विज्ञान का सहारा लेता है। चूँकि छद्म वैज्ञानिक तथ्य वैज्ञानिक शब्दावाली में होते हैं, इसलिए ये अत्यंत भ्रामक होते हैं। छद्म विज्ञान को पहचानने के कुछ लक्षण या संकेत निम्न हैं : छद्म विज्ञान के आधार पर अपना शोधकार्य करने वाले व्यक्ति अपने निष्कर्षों को किसी मानक पत्रिका में छपवाने की बजाय अन्य जनसंचार माध्यमों से संपर्क करते हैं। पाठकों को ललचाने के लिए उनके शोधपत्रों के शीर्षक सनसनीखेज होते हैं। इसमें मसालेदार और आकर्षक कहानी बनाने के लिए पूर्ववर्ती शोध परिणामों के गलत अर्थ निरुपित किये जाते हैं। अनुसंधान के साक्ष्य, फोटो, नमूने प्रयोगों के निष्कर्ष आदि अस्पष्ट भाषा में दिए जाते हैं। कुछ कम्पनियां और उनके तथाकथित वैज्ञानिक निजी अथवा आर्थिक लाभ हेतु तथ्यों को गलत रूप से प्रस्तुत करते हैं। इसलिए उनके निष्कर्षों पर विश्वास करने की बजाय मूल शोध प्रबंध को पढ़ना चाहिए। वैसे तो छद्म वैज्ञानिक अपने असाधारण दावों को लाखों लोगों के समक्ष अत्यंत निर्भीकता से प्रस्तुत करते हैं, परंतु इसका अर्थ यह नहीं है कि उनका दावा सही है। असाधारण दावों को प्रामाणित करने के लिए असाधारण प्रमाणों की आवश्यकता होती है। छद्म वैज्ञानिक विद्रोही या क्रांतिकारी होते हैं क्योंकि उनका मानना होता है कि वर्तमान व्यवस्था उनके अनुसंधान को दबा रही है। परंतु विद्रोही या क्रांतिकारी विचारों का होना किसी को सही सिद्ध नहीं करता है। छद्म वैज्ञानिक सिद्धांत अनुमान, पौराणिक एवं धार्मिक संदर्भों पर आधारित होते हैं। इसमें उन्हीं परिणामों को चुना जाता है जो अनुसंधान के परिणामों के पक्ष में होते हैं और अन्य परिणामों की उपेक्षा की जाती है। छद्म वैज्ञानिक शोधपत्र के अंत में संदर्भ सूची नहीं होती है आदि। विज्ञान में पहले की कई अवधारणाएं जो वैज्ञानिक रूप से सही मानी जाती थीं, उनकी जगह अब नई अवधारणाओं को मान्यता मिली है। जैसे, पिछले कुछ वर्षों में वैज्ञानिकों ने यह महसूस किया है कि पीढ़ी-दर-पीढ़ी सूचनाओं का हस्तांतरण मात्र डीएनए के माध्यम से नहीं होता है। यह भी पढ़ें : वैज्ञानिक सोच-4 : भारत भवितव्य मजहबों की चिता पर ही संभव है,ना कि मजहबों के मेल पर : राहुल सांकृत्यायन वैज्ञानिक पहले डीएनए को ही पीढ़ी-दर-पीढ़ी सूचना हस्तांतरण का एकमात्र ज़रिया मानते थे। जिस तरह वैज्ञानिक ज्ञान में लगातार नया ज्ञान जुड़ता जा रहा है, क्या उसी तरह हम अपने पवित्र धार्मिक ग्रंथों को अपडेट करने के लिए तैयार हैं? यह तो कुफ्र माना जाएगा! यह भी पढ़ें : वैज्ञानिक दृष्टिकोण और भारत का भविष्य : प्रोफ़ेसर राम लखन जब आधुनिक वैज्ञानिक ज्ञान और धार्मिक ग्रंथों को एक साथ रखने का प्रयास करते हैं तब इस तरह की समस्या सामने आती हैं। इन दो ज्ञान प्रणालियों के बीच मतभेद और भी गहरे है; विज्ञान वैज्ञानिक पद्धति के आधार पर वैज्ञानिक समुदाय द्वारा विकसित मानवीय ज्ञान प्रणाली है, इसलिए यह ज्ञान हमेशा अधूरा रहेगा और इसमें हमेशा नया ज्ञान जुड़ता रहेगा। दूसरी ओर, धार्मिक ग्रंथों का ज्ञान आध्यात्मिक ज्ञान है। माना जाता है कि यह देवताओं से उत्पन्न ज्ञान है। इसलिए वह संपूर्ण, अपरिवर्तनशील और अंतिम है। इसलिए इन दो ज्ञान प्रणालियों के एक साथ मिलने की बात निहित रूप से विरोधाभासी है। प्रसिद्ध भाषावैज्ञानिक तथा वैज्ञानिक दृष्टिकोण के बड़े प्रवक्ता प्रोफ़ेसर राम लखन मीना अपने पिछले लेखों में बताया था कि ‘भारत ने पिछले 85 वर्षों में एक भी विज्ञान नोबेल पुरस्कार जीता है, इसका सबसे बड़ा कारण भारत के वैज्ञानिकों में वैज्ञानिक दृष्टिकोण की अनुपस्थिति है।’ दुर्भाग्य से, वे वैज्ञानिक कम, पुजारी ज्यादा प्रतीत होते हैं। इसके अलावा, ज़रूरत इस बात की है कि हम विज्ञान को सिर्फ तकनीक निर्माण के साधन के रूप में न देखकर जीवन जीने के एक तरीके के रूप में देखना शुरू करें। वैज्ञानिक विधि व्यक्ति को वैज्ञानिक तर्क के आधार पर स्थितियों का विश्लेषण करने के लिए तैयार करती है। विज्ञान का पाठ्यक्रम बनाते वक्त नीति-निर्माताओं और शिक्षाविदों, यहां तक कि खुद वैज्ञानिकों द्वारा इस पहलू को अनदेखा कर दिया गया है। यह भी पढ़ें :ब्राह्मणवाद और आरक्षणवाद – पाखंड फ़ैलाने हेतु बहुजनों के बीच ब्राह्मणों की टुकड़े-टुकड़े गैंग सक्रिय है भारत में ऐसी संस्थाएं हैं जो आम लोगों के बीच वैज्ञानिक दृष्टिकोण और वैज्ञानिक सोच को बढ़ावा देने के लिए काम करती हैं – लेकिन उनके द्वारा इस काम को गंभीरता से नहीं किया जा रहा है। क्योंकि उनके कर्ता-धर्ताओं की सोच उन व्यवस्थाओं से निकली है जो मनुष्योचित सोच को ही ऊँच-नीच और भेदभावपूर्ण मानती हैं, यहाँ तक कि वे इस सोच के आधार पर अपने निर्णय लेते रहे हैं। इसलिए वैज्ञानिक समुदाय को और बेहतर तरीके से शामिल करने के प्रयास किए जाने चाहिए। (लेखक : प्रोफ़ेसर राम लखन, सिंडीकेट सदस्य, राजस्थान विश्वविद्यालय, जयपुर)

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