Pakistani Army Epicentre of Global Terrorism UNHRC Poster By Pak Minority

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जेनेवा में संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद (यूएनएचआरसी) के चल रहे 43वें सत्र के दौरान पाकिस्तान के अल्पसंख्यकों ने देश की सेना को ‘वैश्विक आतंकवाद का केंद्र’ बताते हुए बैनर लगा दिया है। यह सत्र 24 फरवरी का शुरू हुआ था और 20 मार्च तक चलेगा।

खबरों के अनुसार, आतंकी संगठनों को पनाह देने और फैलाने में पाकिस्तानी सेना की भूमिका के खिलाफ संयुक्त राष्ट्र कार्यालय के सामने पाकिस्तान के बलोच और पश्तुन समुदाय के कार्यकर्ताओं द्वारा प्रदर्शन करने की भी योजना है। इन प्रदर्शनकारियों की मांग है कि संयुक्त राष्ट्र पाकिस्तान की भर्त्सना करे, इस तरह की गतिविधियों पर तत्काल रोक लगाने और क्षेत्र में ‘कानून का शासन’ स्थापित करने की हिदायत दे।

‘आतंकवाद’ को पनाह देने वाला पाकिस्तान दूसरों को मानवाधिकार पर ज्ञान देना बंद करे: भारत ने UNHRC में कहा

जेनेवा में यह घटना शुक्रवार (28 फरवरी) को भारत द्वारा पाकिस्तान को सलाह दिए जाने के बाद हुई है। भारत ने पाकिस्तानी शासकों को सलाह दी है कि वह अपनी धरती और नियंत्रण वाले क्षेत्रों में आतंकी शिविरों को बंद  करे और आतंकियों को आर्थिक सहायता देना बंद करे। भारत ने यह सलाह पाकिस्तान द्वारा जम्मू-कश्मीर में सकारात्मक विकास के बेपटरी हो जाने का आरोप लगाने के बाद दिया था।

भारत के इस बयान से एक सप्ताह पहले ही आतंकवाद को वित्तीय मदद पर नजर रखने वाली वैश्विक संस्था- फाइनेंशियल एक्शन टास्क फोर्स (एफएटीएफ) ने पेरिस में पाकिस्तान को अपनी ‘ग्रे सूची’ में रखने का फैसला किया और उसे चेतावनी दी कि वह अपने क्षेत्र में आतंक के वित्तपोषण पर लगाम लगाए, ऐसा करनेवालों को दंडित करे। संस्था ने चेतावनी दी कि अगर पाकिस्तान ऐसा करने में विफल रहता है तो संस्था इस देश के खिलाफ कार्रवाई करेगी।

धार्मिक अल्पसंख्यकों को निशाना बनाने और मानवाधिकार उल्लंघन पर घिरा पाकिस्तान, UNHRC ने फटकारा

भारत ने मुस्लिम बहुल पाकिस्तान में अल्पसंख्यकों की दुर्दशा का मुद्दा भी उठाया और कहा कि पाकिस्तानी नेतृत्व को ईश निंदा कानून के तहत अल्पसंख्यकों पर अत्याचार को तुरंत रोकना चाहिए। उसे हिंदुओं, सिखों और इसाइयों के बलपूर्वक धर्मांतरण पर रोक लगाना चाहिए और उन समुदाय की लड़कियों से मुस्लिमों द्वारा जबरन शादी को रोकना चाहिए। साथ ही भारत ने शिआओं, अहमदियों, इस्माइलियों और हजरतों जैसे मुस्लिमों के ही अल्पसंख्यकों का धार्मिक उत्पीड़न रोकने की मांग की थी। 

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