गुलामगीरी : जोतीराव गोविंदराव फुले

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‘ब्राह्मणों की सत्ता कायम हुई तब से लगातार जुल्म और शोषण से शिकार’ (भाग-1) मूकनायक ब्यूरो / जयपुर / वैज्ञानिक-दृष्टिकोण : सैकड़ों साल से आज तक शूद्रादि-अतिशूद्र (अछूत) समाज, जब से इस देश में ब्राह्मणों की सत्ता कायम हुई तब से लगातार जुल्म और शोषण से शिकार हैं। ये लोग हर तरह की यातनाओं और कठिनाइयों में अपने दिन गुजार रहे हैं। इसलिए इन लोगों को इन बातों की ओर ध्यान देना चाहिए और गंभीरता से सोचना चाहिए। ये लोग अपने आपको ब्राह्मण-पंडा-पुरोहितों की जुल्म-ज्यादतियों से कैसे मुक्त कर सकते हैं, यही आज हमारे लिए सबसे महत्वपूर्ण सवाल हैं। यही इस ग्रंथ का उद्देश्य है। यह कहा जाता है कि इस देश में ब्राह्मण-पुरोहितों की सत्ता कायम हुए लगभग तीन हजार साल से भी ज्यादा समय बीत गया होगा। वे लोग परदेश से यहाँ आए। उन्होंने इस देश के मूल निवासियों पर बर्बर हमले करके इन लोगों को अपने घर-बार से, जमीन-जायदाद से वंचित करके अपना गुलाम (दास) बना लिया। उन्होंने इनके साथ बड़ी अमावनीयता का रवैया अपनाया था। सैकड़ों साल बीत जाने के बाद भी इन लोगों में बीती घटनाओं की विस्मृतियाँ ताजी होती देख कर कि ब्राह्मणों ने यहाँ के मूल निवासियों को घर-बार, जमीन-जायदाद से बेदखल कर इन्हें अपना गुलाम बनाया है, इस बात के प्रमाणों को ब्राह्मण-पंडा-पुरोहितों ने तहस-नहस कर दिया। दफना कर नष्ट कर दिया। यह भी पढ़ें : अछूत समाज की कलियाँ बहुत कम समय में अंकुरित होने लगीं ‘मनोगत’ उन ब्राह्मणों ने अपना प्रभाव, अपना वर्चस्व इन लोगों के दिलो-दिमाग पर कायम रखने के लिए, ताकि उनकी स्वार्थपूर्ति होती रहे, कई तरह के हथकंडे अपनाए और वे भी इसमें कामयाब भी होते रहे। चूँकि उस समय ये लोग सत्ता की दृष्टि से पहले ही पराधीन हुए थे और बाद में ब्राह्मण-पंडा-पुरोहितों ने उन्हें ज्ञानहीन-बुद्धिहीन बना दिया था, जिसका परिणाम यह हुआ कि ब्राह्मण-पंडा-पुरोहितों के दाँव-पेंच, उनकी जालसाजी इनमें से किसी के भी ध्यान में नहीं आ सकी। ब्राह्मण-पुरोहितों ने इन पर अपना वर्चस्व कायम करने के लिए, इन्हें हमेशा-हमेशा लिए अपना गुलाम बना कर रखने के लिए, केवल अपने निजी हितों को ही मद्देनजर रख कर, एक से अधिक बनावटी ग्रंथों की रचना करके कामयाबी हासिल की। उन नकली ग्रंथों में उन्होंने यह दिखाने की पूरी कोशिश की कि, उन्हें जो विशेष अधिकार प्राप्त हैं, वे सब ईश्वर द्वारा प्रदत्त हैं। इस तरह का झूठा प्रचार उस समय के अनपढ़ लोगों में किया गया और उस समय के शूद्रादि-अतिशूद्रों में मानसिक गुलामी के बीज बोए गए। उन ग्रंथों में यह भी लिखा गया कि शूद्रों को (ब्रह्म द्वारा) पैदा करने का उद्देश्य बस इतना ही था कि शूद्रों को हमेशा-हमेशा के लिए ब्राह्मण-पुरोहितों की सेवा करने में ही लगे रहना चाहिए और ब्राह्मण-पुरोहितों की मर्जी के खिलाफ कुछ भी नहीं करना चाहिए। मतलब, तभी इन्हें ईश्वर प्राप्त होंगे और इनका जीवन सार्थक होगा। लेकिन अब इन ग्रंथों के बारे में कोई मामूली ढंग से भी सोचे कि, यह बात कहाँ तक सही है, क्या वे सचमुच ईश्वर द्वारा प्रदत्त हैं, तो उन्हें इसकी सच्चाई तुरंत समझ में आ जाएगी। लेकिन इस प्रकार के ग्रंथों से सर्वशक्तिमान, सृष्टि का निर्माता जो परमेश्वर है, उसकी समानत्ववादी दृष्टि को बड़ा गौणत्व प्राप्त हो गया है। इस तरह के हमारे जो ब्राह्मण-पंडा-पुरोहित वर्ग के भाई हैं, जिन्हें भाई कहने में भी शर्म आती है, क्योंकि उन्होंने किसी समय शूद्रादि-अतिशूद्रों को पूरी तरह से तबाह कर दिया था और वे ही लोग अब भी धर्म के नाम पर, धर्म की मदद से इनको चूस रहे हैं। एक भाई द्वारा दूसरे भाई पर जुल्म करना, यह भाई का धर्म नहीं है। फिर भी हमें, हम सभी को उत्पन्नकर्ता के रिश्ते से, उन्हें भाई कहना पड़ रहा है। वे भी खुले रूप से यह कहना छोड़ेंगे नहीं, फिर भी उन्हें केवल अपने स्वार्थ का ही ध्यान न रखते हुए न्यायबुद्धि से भी सोचना चाहिए। यदि ऐसा नहीं करेंगे। तो उन ग्रंथों को देख कर-पढ़ कर बुद्धिमान अंग्रेज, फ्रेंच, जर्मन, अमेरिकी और अन्य बुद्धिमान लोग अपना यह मत दिए बिना नहीं रहेंगे कि उन ग्रंथों को (ब्राह्मणों ने) केवल अपने मतलब के लिए लिख रखा है। उन ग्रंथों को में हर तरह से ब्राह्मण-पुरोहितों का महत्व बताया गया है। ब्राह्मण-पुरोहितों का शूद्रादि-अतिशूद्रों के दिलो-दिमाग पर हमेशा-हमेशा के लिए वर्चस्व बना रहे इसलिए उन्हें ईश्वर से भी श्रेष्ठ समझा गया है। यह भी पढ़ें : ‘अबुआ दिशोम रे अबुआ राज’ बिरसा मुंडा का सपना कब पूरा होगा! ऊपर जिनका नाम निर्देश किया गया है, उनमें से कई अंग्रेज लोगों ने इतिहासादि ग्रंथों में कई जगह यह लिख रखा है कि ब्राह्मण-पंडा-पुरोहितों ने अपने निजी स्वार्थ के लिए अन्य लोगों को यानी शूद्रादि-अतिशूद्रों को अपना गुलाम बना लिया है। उन ग्रंथों द्वारा ब्राह्मण-पुरोहितों ने ईश्वर के वैभव को कितनी निम्न स्थिति में ला रखा है, यह सही में बड़ा शोचनीय है। जिस ईश्वर ने शूद्रादि-अतिशूद्रों को और अन्य लोगों को अपने द्वारा निर्मित इस सृष्टि की सभी वस्तुओं को समान रूप से उपभोग करने की पूरी आजादी दी है, उस ईश्वर के नाम पर ब्राह्मण-पंडा-पुरोहितों एकदम झूठ-मूठ ग्रंथों की रचना करके, उन ग्रंथों में सभी के (मानवी) हक को नकारते हुए स्वयं मालिक हो गए। इस बात पर हमारे कुछ ब्राह्मण भाई इस तरह प्रश्न उठा सकते हैं कि यदि ये तमाम ग्रंथ झूठ-मूठ के हैं, तो उन ग्रंथों पर शूद्रादि-अतिशूद्रों के पूर्वजों ने क्यों आस्था रखी थी? और आज इनमें से बहुत सारे लोग क्यों आस्था रखे हुए हैं? इसका जवाब यह है कि आज के इस प्रगति काल में कोई किसी पर जुल्म नहीं कर सकता। मतलब, अपनी बात को लाद नहीं सकता। आज सभी को अपने मन की बात, अपने अनुभव की बात स्पष्ट रूप से लिखने या बोलने की छूट है। कोई धूर्त आदमी किसी बड़े व्यक्ति के नाम से झूठा पत्र लिख कर लाए तो कुछ समय के लिए उस पर भरोसा करना ही पड़ता है। बाद में समय के अनुसार वह झूठ उजागर हो ही जाता है। इसी तरह, शूद्रादि-अतिशूद्रों का, किसी समय ब्राह्मण-पंडा-पुरोहितों के जुल्म और ज्यादतियों के शिकार होने की वजह से, अनपढ़ गँवार बना कर रखने की वजह से, पतन हुआ है। ब्राह्मणों ने अपने स्वार्थ के लिए समर्थ (रामदास) [2] के नाम पर झूठे-पांखडी ग्रंथों की रचना करके शूद्रादि-अतिशूद्रों को गुमराह किया और आज भी इनमें से कई लोगों को ब्राह्मण-पुरोहित लोग गुमराह कर रहे हैं, यह स्पष्ट रूप से उक्त कथन की पुष्टि करता है। यह भी पढ़ें : पेरियार की नजर में भविष्य की दुनिया ब्राह्मण-पंडा-पुरोहित लोग अपना पेट पालने के लिए, अपने पाखंडी ग्रंथों द्वारा, जगह-जगह बार-बार अज्ञानी शूद्रों को उपदेश देते रहे, जिसकी वजह से उनके दिलों-दिमाग में ब्राह्मणों के प्रति पूज्यबुद्धि उत्पन्न होती रही। इन लोगों को उन्होंने (ब्राह्मणों ने) इनके मन में ईश्वर के प्रति जो भावना है, वही भावना अपने को (ब्राह्मणों को) समर्पित करने के लिए मजबूर किया। यह कोई साधारण या मामूली अन्याय नहीं है। इसके लिए उन्हें ईश्वर के जवाब देना होगा। ब्राह्मणों के उपदेशों का प्रभाव अधिकांश अज्ञानी शूद्र लोगों के दिलो-दिमाग पर इस तरह से जड़ जमाए हुए है कि अमेरिका के (काले) गुलामों की तरह जिन दुष्ट लोगों ने हमें गुलाम बना कर रखा है। उनसे लड़ कर मुक्त (आजाद) होने की बजाए जो हमें आजादी दे रहे हैं, उन लोगों के विरुद्ध फिजूल कमर कस कर लड़ने के लिए तैयार हुए हैं। यह भी एक बड़े आश्चर्य की बात है कि हम लोगों पर जो कोई उपकार कर रहे हैं, उनसे कहना कि हम पर उपकार मत करो, फिलहाल हम जिस स्थिति में हैं वही स्थिति ठीक है, यही कह कर हम शांत नहीं होते बल्कि उनसे झगड़ने के लिए भी तैयार रहते हैं, यह गलत है। वास्तव में हमको गुलामी से मुक्त करनेवाले जो लोग हैं, उनको हमें आजाद कराने से कुछ हित होता है, ऐसा भी नहीं है, बल्कि उन्हें अपने ही लोगों में से सैकड़ों लोगों की बलि चढ़ानी पड़ती है। उन्हें बड़ी-बड़ी जोखिमें उठा कर अपनी जान पर भी खतरा झेलना पड़ता है। अब उनका इस तरह से दूसरों के हितों का रक्षण करने के लिए अगुवाई करने का उद्देश्य क्या होना चाहिए, यदि इस संबंध में हमने गहराई से सोचा तो हमारी समझ में आएगा कि हर[i] मनुष्य को आजाद होना चाहिए, यही उसकी बुनियादी जरूरत है। जब व्यक्ति आजाद होता है तब उसे अपने मन के भावों और विचारों को स्पष्ट रूप से दूसरों के सामने प्रकट करने का मौका मिलता है। लेकिन जब से आजादी नहीं होती तब वह वही महत्वपूर्ण विचार, जनहित में होने के बावजूद दूसरों के सामने प्रकट नहीं कर पाता और समय गुजर जाने के बाद वे सभी लुप्त हो जाते हैं। आजाद होने से मनुष्य अपने सभी मानवी अधिकार प्राप्त कर लेता है और असीम आनंद का अनुभव करता है। यह भी पढ़ें : ‘अबुआ दिशोम रे अबुआ राज’ बिरसा मुंडा का सपना कब पूरा होगा! सभी मनुष्यों को मनुष्य होने के जो सामान्य अधिकार, इस सृष्टि के नियंत्रक और सर्वसाक्षी परमेश्वर द्वारा दिए गए हैं, उन तमाम मानवी अधिकारों को ब्राह्मण-पंडा-पुरोहित वर्ग ने दबोच कर रखा है। अब ऐसे लोगों से अपने मानवी अधिकार छीन कर लेने में कोई कसर बाकी नहीं रखनी चाहिए। उनके हक उन्हें मिल जाने से उन अंग्रेजों को खुशी होती है। सभी को आजादी दे कर, उन्हें जुल्मी लोगों के जुल्म से मुक्त करके सुखी बनाना, यही उनका इस तरह से खतरा मोल लेने का उद्देश्य है। वाह! वाह! यह कितना बड़ा जनहित का कार्य है! उनका इतना अच्छा उद्देश्य होने की वजह से ही ईश्वर उन्हें, वे जहाँ गए, वहाँ ज्यादा से ज्यादा कामयाबी देता रहा है। और अब आगे भी उन्हें इस तरह के अच्छे कामों में उनके प्रयास सफल होते रहे, उन्हें कामयाबी मिलती रहे, यही हम भगवान से प्रार्थना करते हैं। दक्षिण अमेरिका और अफ्रीका जैसे पृथ्वी के इन दो बड़े हिस्सो में सैकड़ों साल से अन्य देशों से लोगों को पकड़-पकड़ कर यहाँ उन्हें गुलाम बनाया जाता था। यह दासों को खरीदने-बेचने की प्रथा यूरोप और तमाम प्रगतिशील कहलाने वाले राष्ट्रों के लिए बड़ी लज्जा की बात थी। उस कलंक को दूर करने के लिए अंग्रेज, अमेरिकी आदि उदार लोगों ने बड़ी-बड़ी लड़ाइयाँ लड़ कर अपने नुकसान की बात तो दरकिनार, उन्होंने अपनी जान की परवाह नहीं की और गुलामों की मुक्ति के लिए लड़ते रहे। यह गुलामी प्रथा कई सालों से चली आ रही थी। इस अमानवीय गुलामी प्रथा को समूल नष्ट कर देने के लिए असंख्य गुलामों को उनके परमप्रिय माता-पिता से, भाई-बहनों से, बीवी-बच्चों से, दोस्त-मित्रों से जुदा कर देने की वजह से जो यातनाएँ सहनी पड़ीं, उससे उन्हें मुक्त करने के लिए उन्होंने संघर्ष किया। उन्होंने जो गुलाम एक दूसरे से जुदा कर दिए गए थे, उन्हें एक-दूसरे के साथ मिला दिया। वाह! अमेरिका आदि सदाचारी लोगों ने कितना अच्छा काम किया है! यदि आज उन्हें इन गरीब अनाथ गुलामों की बदतर स्थिति देख कर दया न आयी होती तो ये गरीब बेचारे अपने प्रियजनों से मिलने की इच्छा मन-ही-मन में रख कर मर गए होते। दूसरी बात, उन गुलामों को पकड़ कर लानेवाले दुष्ट लोग उन्हें क्या अच्छी तरह रखते भी या नहीं? नहीं, नहीं! उन गुलामों पर वे लोग जिस प्रकार से जुल्म ढाते थे, उन जुल्मों, की कहानी सुनते ही पत्थरदिल आदमी की आँखे भी रोने लगेंगी। वे लोग उन गुलामों को जानवर समझ कर उनसे हमेशा लात-जूतों से काम लेते थे। वे लोग उन्हें कभी-कभी लहलहाती धूप में हल जुतवा कर उनसे अपनी जमीन जोत-बो लेते थे और इस काम में यदि उन्होंने थोड़ी सी भी आनाकानी की तो उनके बदन पर बैलों की तरह छाँटे से घाव उतार देते थे। इतना होने पर भी क्या वे उनके खान-पान की अच्छी व्यवस्था करते होंगे? इस बारे में तो कहना ही क्या! उन्हें केवल एक समय का खाना मिलता था। दूसरे समय कुछ भी नहीं। उन्हें जो भी खाना मिलता था, वह भी बहुत ही थोड़ा-सा। इसकी वजह से उन्हें हमेशा आधे भूखे पेट ही रहना पड़ता था। लेकिन उनसे छाती चूर-चूर होने तक, मुँह से खून फेंकने तक दिन भर काम करवाया जाता था और रात को उन्हें जानवरों के कोठे में या इस तरह की गंदी जगहों में सोने के लिए छोड़ दिया जाता था, जहाँ थक कर आने के बाद वे गरीब बेचारे उस पथरीली जमीन पर मुर्दों की तरह सो जाते थे। लेकिन आँखों में पर्याप्त नींद कहाँ से होगी? बेचारों को आखिर नींद आएगी भी कहाँ से? इसमें पहली बात तो यह थी के पता नहीं मालिक को किस समय उनकी गरज पड़ जाए और उसका बुलावा आ जाए, इस बात का उनको जबरदस्त डर लगा रहता था। दूसरी बात तो यह थी कि पेट में पर्याप्त मात्रा में भोजन नहीं होने की वजह से जी घबराता था और टाँग लड़खड़ा‌ने लगती थी। तीसरी बात यह थी कइ दिन-भर-बदन पर छाँटे के वार बरसते रहने से सारा बदन लहूलुहान हो जाता और उसकी यातनाएँ इतनी जबर्दस्त होती थीं कि पानी में मछली की तरह रात-भर तड़फड़ाते हुए इस करवट पर होना पड़ता था। चौथी बात यह थी कि अपने लोग पास न होने की वजह से उस बात का दर्द तो और भी भयंकर था। इस तरह बातें मन में आने से यातनाओं के ढेर खड़े हो जाते थे और आँखे रोने लगती थीं। वे बेचारे भगवान से दुआ माँगते थे कि ‘हे भगवान! अब भी तुझको हम पर दया नहीं आती! तू अब हम पर रहम कर। अब हम इन यातनाओं को बर्दाश्त करने के भी काबिल नहीं रहे हैं। अब हमारी जान भी निकल जाए तो अच्छा ही होगा।’ इस तरह की यातनाएँ सहते-सहते, इस तरह से सोचते-सोचते ही सारी रात गुजर जाती थी। उन लोगों को जिस-जिस प्रकार की पीड़ाओं को, यातनाओं को सहना पड़ा, उनको यदि एक-एक करके कहा जाए तो भाषा और साहित्य के शोक-रस के शब्द भी फीके पड़ जाएँगे, इसमें कोई संदेह नहीं। तात्पर्य, अमेरिकी लोगों ने आज सैकड़ों साल से चली आ रही इस गुलामी की अमानवीय परंपरा को समाप्त करके गरीब लोगों को उन चंड लोगों के जुल्म से मुक्त करके उन्हें पूरी तरह से सुख की जिंदगी बख्शी है। इन बातों को जान कर शूद्रादि- अतिशूद्रों को अन्य लोगों की तुलना में बहुत ही ज्यादा खुशी होगी, क्योंकि गुलामी की अवस्था में गुलाम लोगों को, गुलाम जातियों को कितनी यातनाएँ बर्दाश्त करनी पड़ती हैं, इसे स्वयं अनुभव किए बिना अंदाज करना नामुमकिन है। यह भी पढ़े : ‘मुझे गर्व है, मैं जंगली हूँ’- जयपाल सिंह मुंडा : प्रोफ़ेसर राम लखन मीना जो सहता है, वही जानता है, अब उन गुलामों में और इन गुलामों में फर्क इतना ही होगा कि पहले प्रकार के गुलामों को ब्राह्मण-पुरोहितों ने अपने बर्बर हमलों से पराजित करके गुलाम बनाया था और दूसरे प्रकार के गुलामों को दुष्ट लोगों ने एकाएक जुल्म करके गुलाम बनाया था। शेष बातों में उनकी स्थिति समान है। इनकी स्थिति और गुलामों की स्थिति में बहुत फर्क नहीं है। उन्होंने जिस-जिस प्रकार की मुसीबतों को बर्दाश्त किया है; वे सभी मुसीबतें ब्राह्मण-पंडा-पुरोहितों द्वारा ढाए जुल्मों से कम हैं। यदि यह कहा जाए कि उन लोगों से भी ज्यादा ज्यादतियाँ इन शूद्रादि-अतिशूद्रों को बर्दाश्त करनी पड़ी हैं, तो इसमें किसी तरह का संदेह नहीं होना चाहिए। इन लोगों को जो जुल्म सहना पड़ा, उसकी एक-एक दास्तान सुनते ही किसी भी पत्थरदिल आदमी को ही नहीं बल्कि साक्षात पत्थर भी पिघल कर उसमें से पीड़ाओं के आँसुओं की बाढ़ निकल पड़ेगी और उस बाढ़ से धरती पर इतना बहाव होगा कि जिन पूर्वजों ने शूद्रादि-अतिशूद्रों को गुलाम बनाया, उनके आज के वंशज जो ब्राह्मण, पुरोहित भाई हैं उनमें से जो अपने पूर्वजों की तरह पत्थरदिल नहीं, बल्कि जो अपने अंदर के मनुष्यत्व को जाग्रत रख कर सोचते हैं, उन लोगों को यह जरूर महसूस होगा कि यह एक जलप्रलय ही है।

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