गुलामगिरी ने कैसे खोली ब्राह्मणवादी धर्म की पोल

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[ब्रह्मा की व्युत्पत्ति, सरस्वती और ईरानी (यूरेशियाई) या आर्य लोगों के संबंध में] जोतीराव और धोंडीराव-संवाद परिच्छेद : एक धोंडीराव : पश्चिमी देशों में अंग्रेज, फ्रेंच आदि दयालु, सभ्य राज्यकर्ताओं ने इकट्ठा हो कर गुलामी प्रथा पर कानूनन रोक लगा दी है। इसका मतलब यह है कि उन्होंने ब्रह्मा के (धर्म) नीति-नियमों को ठुकरा दिया है। क्योंकि मनुसंहिता में लिखा गया है कि ब्रह्मा (विराट पुरुष) ने अपने मुँह से ब्राह्मण वर्ण को पैदा किया है और उसने इन ब्राह्मणों की सेवा (गुलामी) करने की लिए ही अपने पाँव से शूद्रों को पैदा किया है। जोतीराव : अंग्रेज आदि सरकारों ने गुलामी प्रथा पर पाबंदी लगा दी है, इसका मतलब ही यह है कि उन्होंने ब्रह्मा की आज्ञा को ठुकरा दिया है, यही तुम्हारा कहना है न! इस दुनिया में अंग्रेज आदि कई प्रकार के लोग रहते हैं, उनको ब्रह्मा ने अपनी कौन-कौन सी इंद्रियों से पैदा किया है और इस संबंध में मनुसंहिता में क्या-क्या लिखा गया है? धोंडीराव : इसके संबंध में सभी ब्राह्मण, मतलब बुद्धिमान और बुद्धिहीन यह जवाब देते हैं कि अंग्रेज आदि लोगों के अधम, दुराचारी होने की वजह से उन लोगों से बारे में मनुसंहिता में कुछ भी लिखा नहीं गया। जोतीराव : तुम्हारे इस तरह के कहने से यह पता चलता है कि ब्राह्मणों में अधम, नीच, दुष्ट, दुराचारी लोग बिलकुल है ही नहीं? धोडींराव: अनुभव से यह पता चलता है कि अन्य जातियों की तुलना में ब्राह्मणों में सबसे ज्यादा अधम, नीच, दुष्ट और दुराचारी लोग हैं। जोतीराव : फिर यह बताओ के इस तरह के अधम, नीच, दुष्ट, ब्राह्मणों के बारे में मनु की संहिता मे किस प्रकार से लिखा गया है? धोंडीराव : इस बात से यह प्रमाणित होता है कि मनु ने अपनी संहिता में जो व्युत्पत्ति सिद्धांत प्रतिपादित किया है, वह एकदम तथ्यहीन, निराधार है; क्योंकि वह सिद्धांत सभी मानव समाज पर लागू नहीं होता। जोतीराव : इसीलिए अंग्रेज आदि लोगों के जानकारों ने ब्राह्मण ग्रंथकारों की बदमाशी को पहचान कर गुलाम बनाने की प्रथा पर कानूनन पाबंदी लगा दी। यदि यह ब्रह्मा तमाम मानव समाज की व्युत्पत्ति के लिए सही में कारण होता तो उन्होंने गुलामी प्रथा पर पाबंदी ही नहीं लगाई होती। मनु ने चार वर्णों की उत्पत्ति लिखी है। यदि इस व्युत्पत्ति को कुल मिला कर सभी सृष्टि-क्रमों से तुलना करके देखा जाए तो वह तुमको पूरी तरह तथ्यहीन, निराधार ही दिखाई देगी। धोंडीराव : मतलब, यह किस प्रकार से? जोतीराव : ब्राह्मणों का कहना है ब्राह्मण ब्रह्मा के मुख से पैदा हुए लेकिन कुल मिला कर सभी ब्राह्मणों की आदिमाता ब्राह्मणी ब्रह्मा के किस अंग से उत्पन्न हुई, इसके बारे में मनु ने अपनी संहिता में कुछ भी नही लिख रखा है। आखिर ऐसा क्यों? धोंडीराव : क्योंकि वह उन विद्वान ब्राह्मणों के कहने के अनुसार मूर्ख दुराचारी होगी। इसलिए फिलहाल उसे म्लेच्छ [3] या विधर्मियों की पंक्ति में रख दिया जाए। जोतीराव : हम भूदेव हैं, हम सभी वर्णों में श्रेष्ठ हैं, यह हमेशा बड़े गर्व से कहनेवाले इन ब्राह्मणों को जन्म देनेवाली आदिमाता ब्राह्मणी ही है न? फिर तुम उसको म्लेच्छों की पंक्ति में किसलिए रखते हो? उसको वहाँ की शराब और मांस की बदबू कैसे पसंद आएगी? बेटे, तू यह बड़ी गलत बात कर रहा है। यह भी पढ़ें : अछूत समाज की कलियाँ बहुत कम समय में अंकुरित होने लगीं ‘मनोगत’ धोंडीराव : आपने ही कई बार सरेआम सभाओं में, व्याख्यानों में कहा है कि ब्राह्मणों के आदिवंशज जो ऋषि थे, वे श्राद्ध [4] के बहाने गौ की हत्या करके गाय के मांस से कई प्रकार के पदार्थ बनवा करके खाते थे। और अब आप कहते है कि उनकी आदिमाता को बदबू आएगी, इसका मतलब क्या है? आप अंग्रेजी राज के दीर्घजीवी होने की कामना कीजिए, और कुछ दिन के लिए रूक जाइए। तब आपको दिखाई देगा कि आज के अधिकांश मांगलिक [5] भिक्षुक ब्राह्मण इस तरह का प्रयास करेंगे कि रेसिडेंट, गर्वनर आदि अधिकारियों की उन पर ज्यादा-से-ज्यादा मेहरबानी हो, इसलिए ये ब्राह्मण उनकी मेज पर के बचे-खुचे गोश्त के टुकड़े बुटेलर [6]ब्राह्मणों के नाम से अंदर-ही-अंदर फुसफुसाने लगे हैं? मनु महाराज ने आदिब्राह्मणी की व्युत्पत्ति के बारे में कुछ भी नहीं लिखा है। इसलिए इस दोष की सारी जिम्मेदारी उसी के सिर पर डाल दीजिए। उसके बारे में आप मुझे क्यों दोष दे रहे हैं कि मैं गलत-सलत बोल रहा हूँ? छोड़िए इन बातों को, आगे बताइए। जोतीराव : अच्छा, जैसी तुम्हारी इच्छा, वही सच क्यों ना हो। अब ब्राह्मण को पैदा करनेवाले ब्रह्मा का जो मुँह है, वह हर माह मासिक धर्म (माहवार) आने पर तीन-चार दिन के लिए अपवित्र (बहिष्कृत) होता था या लिंगायत[7] नारियों की तरह भस्म लगा कर पवित्र (शुद्ध) हो कर घर के काम-धंधे में लग जाता था, इस बारे में मनु ने कुछ लिखा भी है या नहीं? धोंडीराव : नहीं। किंतु ब्राह्मणों की उत्पत्ति का आदि कारण ब्रम्हा ही है। और उसको लिंगायत नारी का उपदेश कैसे उचित लगा होगा? क्योंकि आज के ब्राह्मण लोग लिंगायतों से इसलिए घृणा करते हैं क्योंकि वे इसमें छुआछूत नहीं मानते। जोतीराव : इससे तुम सोच ही सकते हो कि ब्राह्मण का मुँह, बाँहें, जाँघे और पाँव – इन चार अंगों की योनि, माहवार (रजस्वला) के कारण, उसको कुल मिला कर सोलह दिन के अशुद्ध हो कर दूर-दूर रहना पड़ता होगा। फिर सवाल उठता है कि उसके घर का काम-धंधा कौन करता होगा? क्या मनु महाराज ने अपनी मनुस्मृति में इसके संबंध में कुछ लिखा भी है या नहीं? धोंडीराव : नहीं। जोतीराव : अच्छा। वह गर्भ ब्रह्मा के मुँह में जिस दिन से ठहरा, उस दिन से ले कर नौ महीने बीतने तक किस जगह पर रह कर बढ़ता रहा, इस बारे में मनु ने कुछ कहा भी है या नही? धोंडीराव : नहीं। जोतीराव : अच्छा। फिर जब यह ब्राह्मण बालक पैदा हुआ, उस नवजात शिशु को ब्रह्मा ने अपने स्तन का दूध पिला कर छोटे से बड़ा किया, इस बारे में भी मनु महाराज ने कुछ लिखा है या नहीं? धोंडीराव : नहीं। जोतीराव : सावित्री ब्रह्मा की औरत होने पर भी उसने उस नवजात शिशु के गर्भ का बोझ अपने मुँह में नौ महीने तक सँभाल कर रखने, उसे जन्म देने और उस की देखभाल करने का झमेला अपने माथे पर क्यों ले लिया? यह कितना बड़ा आश्चर्य है! धोंडीराव : उसके (ब्रह्मा के) शेष तीन सिर उस झमेले से दूर थे या नहीं? आपकी राय इस मामले में क्या है? उस रंडीबाज को इस तरह से माँ बनने की इच्छा क्यों पैदा हुई होगी? जोतीराव : अब यदि उसे रंडीबाज कहा जाए तो उसने सरस्वती नाम की अपनी कन्या से ही संभोग (व्यभिचार) किया था। इसीलिए उसका उपनाम बेटीचोद हो गया है। इसी बुरे कर्म के कारण कोई भी व्यक्ति उसका मान-सम्मान (पूजा) नहीं कर रहा है। धोंडीराव : यदि सचमुच में ब्रह्मा को चार मुँह होते तो उसी हिसाब से उसे आठ स्तन, चार नाभियाँ, चार योनियाँ और चार मलद्वार होने चाहिए। किंतु इस बारे में सही जानकारी देनेवाला कोई लिखित प्रमाण नहीं मिल पाया है। फिर, उसी तरह शेषनाग की शैया पर सोनेवाले को, लक्ष्मी नाम की स्त्री होने पर भी, उसने अपनी नाभि से चार मुँहवाले बच्चे को कैसे पैदा किया? इस बारे में यदि सोचा जाए तो उसकी भी स्थिति ब्रह्मा की तरह ही होगी। यह भी पढ़ें : पेरियार की नजर में भविष्य की दुनिया जोतीराव : वास्तव में, हर दृष्टि से सोचने के बाद हम इस निर्णय पर पहुँचते है कि ब्राह्मण लोग समुद्रपार जो इरान नाम का देश है, वहाँ के मूल निवासी है। पहले जमाने में उन्हें ईरानी या आर्य कहा जाता था। इस मत का प्रतिपादन कई अंग्रेजी ग्रंथकारों ने उन्हीं के ग्रंथों के आधार पर किया है। सबसे पहले उन आर्य लोगों ने बड़ी-बड़ी टोलियाँ बना करके देश में आ कर कई बर्बर हमले किए। यहाँ के मूल निवासी राजाओं के प्रदेशों पर बार-बार हमले करके बड़ा आतंक फैलाया। फिर (बटू) वामन के बाद आर्य (ब्राह्मण) लोगों का ब्रह्मा नाम का मुख्य अधिकारी हुआ। उसका स्वभाव बहुत जिद्दी था। उसने अपने काल में यहाँ के हमारे आदिपूर्वजों को अपने बर्बर हमलों में पराजित कर उन्हें अपना गुलाम बनाया। बाद में उसने अपने लोग और इन गुलामों में हमेशा-हमेशा के लिए भेद-भाव बना रहे, इसलिए कई प्रकार के नीति नियम बनवाए, ग्रंथ लिखे। इन सभी घटनाओं की वजह से ब्रह्मा की मृत्यु के बाद आर्य लोगों का मूल नाम अपने-आप लुप्त हो गया और उनका नया नाम पड़ गया ‘ब्राह्मण’। फिर मनु महाराज जैसे (ब्राह्मण) अधिकारी हुए। पहले से बने हुए और अपने बनाए हुए नीति-नियमों का क्षय बाद में कोई न कर पाए, इस डर की वजह से उसने ब्रह्मा के बारे में नई नई तरह की कपोल-कल्पित कल्पनाएँ फैलाई। फिर उसने इस तरह के विचार उन गुलाम लोगों के दिलों-दिमाग में ठूँस-ठूँस कर भर दिए कि ये बातें ईश्वर की इच्छा से हुई हैं। फिर उसने शेषनाग शैया की दूसरी अंधी कथा (पुराण कथा) गढ़ी और समय देख कर, कुछ समय के बाद, उन सभी पाखंडों के ग्रंथशास्त्र बनाए गए। उन ग्रंथों के बारे में शूद्र गुलामों को नारद जैसे धूर्त, चतुर, सदा औरतों में रहनेवाले छ्छोरे के ताली पीट-पीट कर उपदेश करने की वजह से यूँ ही ब्रह्मा का महत्व बढ़ गया। अब हम इस ब्रह्मा के बारे में, शेषनाग शैया करने वाले के बारे में खोज करने लगें तो उससे हमें छदाम का फायदा तो होगा नहीं क्योंकि उसने जान बूझ कर उस बेचारे को सीधा लेटा हुआ देख कर उसकी नाभि से यह चार मुँहवाले बच्चे को पैदा करवाया। मुझे ऐसा लगता है कि पहले से ही औंधाचित हुए गरीब पर ऊपर से पाँव देना, इसमें अब कुछ मजा नहीं है।

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