वैज्ञानिक दृष्टिकोण और भारत का भविष्य : प्रोफ़ेसर राम लखन

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मूकनायक मीडिया ब्यूरो : भारतीय संविधान में ‘वैज्ञानिक प्रवृत्ति, मानवता और सवाल एवम् यथानुरूप सुधार की भावना का विकास करना’ हर नागरिक के दायित्वों के रूप में सुस्पष्टता से वर्णित है। लेकिन, देश के प्रतिष्ठित व्यक्ति अपने बयानों और कामों के जरिए इस सिद्धांत का घोर उल्लंघन करते आएँ हैं और आज भी कर रहे हैं। लेकिन हमारे देश और समाज में एक अजीब सा विरोधाभास दिखायी देता है। एक तरफ तो हम विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में होने वाली खोजों का भरपूर लाभ उठा रहे हैं। मगर दूसरी तरफ विडंबना की पराकाष्ठा देखिए कुरीतियों, मिथकों, रूढ़ियों, अंधविश्वासों एवं पाखंडों ने भी हमारे जीवन और समाज में अब भी जगह बनायी हुई हैं। देश की शिक्षित व अशिक्षित दोनों ही वर्गों की बहुसंख्य आबादी निर्मूल एवं रूढ़िगत मान्यताओं की कट्टर समर्थक है। कभी-कभी तो ऐसी प्रतीति होती है कि हमारे वैज्ञानिकों, डॉक्टरों, इंजीनियरों और कानून-विदों की उल्लेखनीय उपलब्धियाँ उन्होंने उनके बौद्धिक-कौशल से नहीं बल्कि उनकी अंगूठियों में धारण किये हुए पत्थर के टुकड़ों और गले में पहने ताबीज-कंडों से पायीं हैं। यह बहुत ही चकित करता है और ऐसा करना न सिर्फ़ विडंबनापूर्ण है बल्कि देश के लिए नुक़सानदेह भी है। ऐसे में, इसलिए प्रत्येक नागरिक का यह कर्तव्य है कि वैज्ञानिक दृष्टिकोण के विकास के लिए प्रयास करें। मैं समझता हूँ विवेकशील हर एक प्राणी वैज्ञानिक-दृष्टिकोण का वाहक हैं, मगर उनमें भी अधिकांश का व्यवहार वैज्ञानिक दृष्टिकोण विरोधी ही होता है। विश्व का सर्वश्रेष्ठ संविधान उक्त विडंबनाओं से आहत है, संविधानविद पशोपेश में हैं कि आखिर चूक कहाँ परा है। जवाब साफ-सुथरा है कि आज भी वैज्ञानिक दृष्टिकोण, तर्कशीलता, धर्मनिरपेक्षता, मानवता और समाजवाद की बजाय अवैज्ञानिकता, अंधश्रद्धा, अंधविश्वास और असहिष्णुता को जो बढ़ावा दिया जा रहा है, वह अत्यंत ही कष्टकारक है। हमारी इन तमाम बुराइयों और कुरीतियों की जड़ में है बिना किसी प्रमाण के किसी भी बात पर यकीन करने की प्रवृत्ति अर्थात् वैज्ञानिक दृष्टिकोण का पूर्णतया अभाव। सचमुच हमारे देश में वैज्ञानिक दृष्टिकोण की इतनी भारी कमी है कि हम भौंचक्के रह जाते हैं। वैज्ञानिक प्रवृत्ति रखना प्रयोगशाला में विज्ञान संबंधी प्रयोग करने जैसा नहीं है। हालांकि, प्रयोगशाला में होने वाले प्रयोग भी बहुत महत्वपूर्ण हैं और इन पर ही ध्यान केंद्रित करने से अच्छा शोध हो सकता है लेकिन विज्ञान और समाज में वैज्ञानिक पद्धति के सार को नहीं समझा जा सकता। विज्ञान-विश्व वैबसाइट पर उपलब्ध सामग्री हमारी आँखे खोलती है, सरकार का दायित्व है कि ऐसे प्रयासों को प्रोत्साहित करें। वेबसाइट के आशीष श्रीवास्तव का कहना है कि वैज्ञानिक दृष्टिकोण वाले व्यक्ति अपनी बात को सिद्ध करने के लिए वैज्ञानिक विधि का सहारा लेते हैं। आप सोच रहे होगें कि इस वैज्ञानिक विधि का उपयोग केवल विज्ञान से संबंधित कार्यों में ही होता होगा, जैसा कि मैंने ऊपर परिभाषित किया है। परंतु ऐसा नहीं है, यह हमारे जीवन के सभी कार्यों पर लागू हो सकती है क्योंकि इसकी उत्पत्ति हम सबकी जिज्ञासा से होती है। इसलिए प्रत्येक व्यक्ति चाहे वह वैज्ञानिक हो अथवा न हो, पढ़ा-लिखा हो या न हो, वैज्ञानिक दृष्टिकोण वाला हो सकता है। दरअसल, वैज्ञानिक दृष्टिकोण दैनिक जीवन की प्रत्येक घटना के बारे में हमारी सामान्य समझ विकसित करती है। इस प्रवृत्ति को जीवन में अपनाकर अंधविश्वासों एवं पूर्वाग्रहों से मुक्ति पायी की जा सकती है। पाखंडों की वाहक भारत की तथाकथित हिंदू आबादी के ही आँकड़े देखें जाये तो इसमें 74.5 प्रतिशत लोग अनुसूचित जाति, जनजाति व पिछड़े वर्ग के हैं। ये सभी लोग सामाजिक, शैक्षणिक व आर्थिक रूप से पिछड़े हुए रहे हैं। इनमें भी अनुसूचित जाति व जनजाति के लगभग 23 प्रतिशत लोगों को तीन हजार वर्ष से भी ज्यादा समय से पूरी तरह शिक्षाविहीन व दीन-हीन बना कर केवल कथित ऊँची जातियों की सेवा के काम में लगा कर रखा था, और कमोवेश आज भी हैं। मगर बाबासाहब के संविधान ने इसी वर्ग को समाज में बराबरी का दर्जा पाने के पुख्ता अधिकार दिये और उन्हें सही मायनों में इंसान माना। वरना ब्राह्मणवादी व्यवस्था के चलते तो शूद्रों का चेहरा देखना भी अशुभ माना जाता था और उनके साथ वार्तालाप तक करने को अक्षम्य कहा जाता था। उन्हें हाथ में कलम रखने की मनाही थी और जल तक दूर से ही पिलाने की कड़ी हिदायतें थी। यहाँ तक कि वर्तमान ओबीसी (वर्णव्यवस्था के शुद्र) लोगों को पवित्रता के नाम पर पहले पुत्र को स्थानीय नदी-नाले में जिन्दा बहा देना की बाध्यता थी। इन्हीं लोगों में शादी-विवाह के बाद नवविवाहिता (दुलहन) ससुराल में आकर पहली तीन से पाँच रातें (सुहागरात) संबंधित गाँव में ब्राह्मण पुरोहित की घर बिताने को मजबूर थीं, पुरोहितों के घरों की महिलाएँ भी इसका विरोध नहीं कर सकती थी। इतना ही नहीं, अमरीकन इतिहासकार कैथरीन मेयो द्वारा लिखित ‘मदर इंडिया’ पुस्तक सबने पढ़ी ही होगी। इंडिया में ब्राह्मणों ने 1860 तक लड़कियों के विवाह की आयु 10 वर्ष को अंग्रेज हुकूमत के काफी विरोध के बावजूद 1891 में 12 वर्ष होने दी थी। पं. मदनमोहन मालवीय के संपादकत्व में छपने वाली ‘चाँद’ पत्रिका में 1925 में छापी सिलेक्ट कमेटी की रिपोर्ट के अनुसार तब तक स्त्री-सहवास की आयु 13वर्ष थी। इस उम्र में बच्चियों के साथ सहवास के एक रोंगटे खड़े कर देने वाले संवाद में कैथरीन मेयो ने ‘मदर इंडिया’ में लिखा है कि ‘ बच्चियों की जांघों की हड्डियाँ खिसक जाती थी, मांस लटक जाता था और कुछ तो अपाहिज हो जाती थीं। 6 से 7 वर्ष की अनेकों नववधू 2-3 दिन बाद मर जाती थी।’ मनुस्मृति में अनेक बार उल्लेख किया गया है कि समाज में स्त्रियों की क्या स्थिति थी। उनकी स्थितियों में थोड़े-बहुत बदलाव आये हैं तो वे संविधान बनाने के बाद आयें हैं। पर स्थिति बहुत बदल गयीं है ऐसा कदापि नहीं है। गाहे-बघाए आरएसएस प्रमुख के बयान इसके साफ उद्धरण हैं। ऐसे दुर्दांत वाकिए नितान्त मूर्खतापूर्ण कार्य है किंतु ऐसी पुरानी गलतियों से हम कुछ सबक तो सीख सकते हैं। अतः बाबासाहब ने जो संविधान लिखा वह पूर्ण रूपेण समाज में क्रान्तिकारी बदलाव का महत्वपूर्ण औजार है। इस औजार के हर हिस्से में समाज को वैज्ञानिकता देने का प्रावधान है। हमें आज यह सोचना है कि एक देश के रूप में हम आगे की तरफ बढ़ रहे हैं या पीछे की ओर जा रहे हैं। हमें चौकन्ना होकर दलित-आदिवासी, पिछड़े और महिलाओं की चिन्ताओं के बारे में भी सोचना होगा। वैसे भी सदियों से महिलाओं की कोई जातीय पहचान नहीं रही है, उनकी केवल एक पहचान रही है उनके ऊपर थोपी गयी विविध रूपी शोषणकारी-प्रविधियाँ। पाखंड और अंधविश्वास के शिकार सर्वाधिक ये ही रहे हैं। नागरिक सिर्फ वोटर नहीं होता है बल्कि वह देश के विकास में योगदान करने वाला पहला प्राणी होता है। हम सोचें और विचार करें। अब सवाल यह है कि आख़िरकार वैज्ञानिक दृष्टिकोण मूलतः है क्या ? यह एक ऐसी मनोवृत्ति या सोच है जिसका मूल आधार किसी भी घटना की पृष्ठभूमि में उपस्थित कार्य-कारण को जानने की प्रवृत्ति है। वैज्ञानिक दृष्टिकोण हमारे अंदर अन्वेषण की प्रवृत्ति विकसित करता है तथा विवेकपूर्ण निर्णय लेने में सहायता करता है। वैज्ञानिक दृष्टिकोण की शर्त है बिना किसी प्रमाण के किसी भी बात पर विश्वास न करना या उपस्थित प्रमाण के अनुसार ही किसी बात पर विश्वास करना। ‘वैज्ञानिक प्रवृति’ की अवधारणा के दो अहम पहलू हैं- 1). जनकल्याण के संपूर्ण विकास में विज्ञान का महत्व और 2). आधुनिक सामाजिक मूल्यों के विकास के लिए सामाजिक प्रक्रिया के तौर पर विज्ञान का अभ्यास। इसमें कतई शंशय नहीं है कि विज्ञान ने समाज के विकास के लिए भरपूर संभावनाओं के दरवाज़े खोल दिये हैं। मानव जाति को मुश्किलों भरी और अंधेरी ज़िंदगी से निकालने में विज्ञान की ज़बरदस्त क्षमता को नकारा नहीं जा सकता है। वहीं, एक वैज्ञानिक सोच युक्त समाज के लिए तकनीक और मशीनरी के विकास के साथ अपनी उत्पादक क्षमताओं को बढ़ाने और स्थिरता बनाये रखने के लिए आधुनिक कानूनों और मूल्यों के साथ चलना जरूरी है। द्वितीय विश्व युद्ध में जब अमेरिका ने जापान के शहरों हिरोशिमा व नागासाकी पर परमाणु बम गिराया तो इसकी विभीषिका से जलते जापान की स्थिति के बारे में 1945 में ब्रिटेन के तत्कालीन प्रधानमंत्री विंस्टन चर्चिल ने अमरीकी राष्ट्रपति को लिखे अपने पत्र में प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए कहा कि ‘‘हम अमेरिका को बहुत बुद्धिमान समझते थे मगर वह नासमझ निकला। बम गिरा कर उसने जापान का विनाश करना चाहा। किसी देश के विनाश के लिए इसकी कतई जरूरत नहीं थी। अगर भारत से चार ब्राह्मण ले जाकर अमेरिका ने जापान में छोड़ (बसा) दिये होते तो उसका विनाश पक्का था।’’ चर्चिल ने अपनी इस प्रतिक्रिया में भारत के पूरे इतिहास की पर्तें खोल कर रख दी थीं और वह राज भी बता दिया था जिसकी वजह से अंग्रेज भारत में दो सौ साल तक राज करने में कामयाब रहे। समाज में ऊंच-नीच, धार्मिक क्लेश व आर्थिक शोषण को जमाये रखने में ब्राह्मणवादी व्यवस्था ने हर दौर में महत्वपूर्ण भूमिका इस प्रकार निभायी कि मानवीय अधिकारों के संघर्ष को टुकड़ों में बांट कर सत्ता की धाक के नीचे वंचित समाज के लोग हमेशा याचक बने रहें किंतु यह विषय बहुत क्लिष्ठ है जिसका ब्यौरा किसी और अवसर पर लिखा जा सकता है।[i] इसलिए वैज्ञानिक प्रवृत्ति की अवधारणा मानवता, समानता, अधिकार और न्याय की आधुनिक अवधारणाओं से जुड़ी हुई है। संविधान (42वां संशोधन) अधिनियम, 1976 की धारा 11 के द्वारा 3 जनवरी 1977 से मौलिक-कर्तव्यों को संविधान में अंत:स्थापित किया गया है। संविधान निर्माताओं को इन कर्तव्यों को संविधान में शामिल करने की आवश्यकता मालूम नहीं पड़ती थी, क्योंकि उनमें भलमनसाहत अधिक थी, वे दिल से साफ थे, उनके मन निर्मल थे। इसलिए मूल कर्तव्यों को संविधान निर्माण के समय शामिल नहीं किया गया था। किंतु जब निर्मंल मनो में मलिनता पनपने लगी या यूँ कहे मलिनता पनपायी जाने लगी तो समता के अधिकार और पंथनिरपेक्ष जैसे लक्ष्यों को साधना मुश्किल होने लगा। तब हम भारतीयों द्वारा इन लक्ष्यों को साधने के लिए मूल कर्तव्यों की आवश्यकता पड़ी। ये मूल कर्तव्य संविधान में वर्णित हमारी आकाँक्षाओं और लक्ष्यों को पूरा करने में हमारी सहायता करते हैं, जिन्हें भारत का नागरिक होने के नाते और मूल अधिकार प्राप्त करने के बदले में हम भारतीयों को ये कार्य अवश्य करने चाहिए। भारतीय संविधान के भाग – “4 क” के अनुच्छेद – “51 क” में वर्णित मूल कर्तव्यों में से एक (51 क का ज) “वैज्ञानिक दृष्टिकोण, मानववाद और ज्ञानार्जन तथा सुधार की भावना का विकास करें” आज के लेख का मुख्य विषय है। भारत का संविधान पूरे देश को एकता के सूत्र में बाँधने वाला ऐसा कारगर दस्तावेज है जिसके चार सौ से ज्यादा पृष्ठों में कहीं एक बार भी किसी धर्म का नाम नहीं आया है जबकि इस देश में सैकड़ों मत-मतान्तरों के लोग रहते हैं। यहाँ तक कि विभिन्न जातियों व उपजातियों में बाँटे भारतीयों की किसी भी जाति का उल्लेख संविधान में नहीं है। सिवाय इसके कि समाज के वंचित व दबे-कुचले लोगों के वर्ग की अनुक्रमांक सूचिका को सामुदायिक पहचान के जरिये इसने स्वीकारा है और उन्हें अनुसूचित जाति व जनजाति का नाम दिया है। उसे भी अवैज्ञानिक सोच के लोगों ने जातियों में तब्दील कर दिया। संविधान के निर्माता डॉ भीमराव अम्बेडकर ने पूरी वैज्ञानिकता के आधार पर भारतीयों में तर्क शक्ति का स्फुरण करने के लिए ही इसमें लिखा था कि ‘सरकारें लोगों में वैज्ञानिक सोच को बढ़ावा देने के लिए कार्यरत रहेंगी।’ इसीलिए उन्होंने ऐसा क्रान्तिकारी कानूनी दस्तावेज भारत के लोगों को दिया और इसमें मानवीयता को ही आधार माना गया। इस रिसर्च पेपर के रूप में, मैं आज एक ऐसा आलेख लिख रहा हूँ जिसमें पाखंड, अंधविश्वास, वैज्ञानिक सोच या दृष्टिकोण और बहुजन नायकों की भूमिका का आलोचनात्मक परिक्षण किया जाएगा। भारतीय संविधान में मौलिक कर्तव्यों (अनुच्छेद 51ए) के अंतर्गत सुस्पष्ट रूप में वर्णित है कि प्रत्येक नागरिक का कर्तव्य होगा कि वह ‘वैज्ञानिक दृष्टिकोण, मानववाद और ज्ञानार्जन तथा सुधार की भावना का विकास करें।’ जवाहरलाल नेहरु ने अपनी पुस्तक ‘भारत एक खोज’ में पहली बार ‘वैज्ञानिक दृष्टिकोण’ जैसे पारिभाषिक पद का प्रयोग किया था। इसके दशकों बाद भी भारत के प्रायः हर वर्ग में अंधविश्वास और पाखंडों से जुड़ी प्रथाएँ चलती चली आ रही हैं। वस्तुतः वैज्ञानिक स्वभाव के साथ, व्यक्ति उनके सामने प्रस्तुत जानकारी पर सवाल उठाने के लिए तर्क का सहारा लेगा क्योंकि तर्कवाद से पैदा हुआ ज्ञान ही असली ज्ञान है। यही तर्कसंगत दृष्टिकोण विकसित करता है। मौलिक चर्चा, प्रस्तुत जानकारी का विश्लेषण, और तर्क सभी वैज्ञानिक स्वभाव का हिस्सा है। और भारत के नागरिक के रूप में, यह हमारा कर्तव्य है कि हम इसे अपने जीवन में शामिल करें। पंडित नेहरू ने विवेकशील प्राणी को वैज्ञानिक स्वभाव युक्त ‘एक आज़ाद आदमी का स्वभाव’ कहा है। जो कुछ भी किया गया है, जो भी घटना और मामला है, हमें पहले यह देखना चाहिए कि वे अनुभव और जाँच के साथ क्यों और किन चीजों से मेल खाते हैं। तभी ज्ञान बढ़ेगा। इसके बजाय, यदि रिवाज, परंपरा और पैतृक प्रथा का पालन किया जाता रहेगा, तो केवल मूर्खता बढ़ेगी, बुद्धि नहीं। वैज्ञानिक स्वभाव की आवश्यकता केवल विज्ञान के लिए ही नहीं, यह सामाजिक बुराई, अंधविश्वास और अमानवीय रीति-रिवाजों को दूर करने के लिए भी आवश्यक है। हमें आजादी मिले 73 साल हो चुके हैं, और अब तो कम से कम हमें वैज्ञानिक सोच को अपने जीवन में शामिल करने की महती जरूरत है। उच्च शिक्षा के लिए फ़ंड घटाने, पंचगव्य जैसे छद्म-वैज्ञानिक कार्यों पर फ़ंड लगाने और सरकार में ज़िम्मेदार पदों पर बैठे लोगों की बयानबाज़ी विज्ञान और वैज्ञानिक प्रवृत्ति पर हमला करने से कम नहीं है। हो सकता है कि ये थोड़े समय के लिए संकुचित हितों का पोषण कर दें लेकिन लंबे समय में इसके दुष्परिणाम भुगतने पड़ते हैं। इसको मैं एक छोटी कहानी के रूप में आपके सामने रखना चाहूँगा। एक ही माता-पिता के दो बच्चों को लेते हैं, एक को इंग्लैंड में पालते हैं और दूसरे को इंडिया में। इंग्लैंड वाला बच्चा वैज्ञानिक दृष्टिकोण से सबकुछ देखेगा, और इंडिया वाला दूसरा बच्चा सब कुछ धार्मिक दृष्टिकोण से सोचेगा। पर, इंग्लैंड वाला जब कभी भी इंडिया में होगा तो उसे भी वही करने के लिए बाध्य किया जाएगा जो इंडिया वाला कर रहा था क्योंकि इंडिया में धर्म ठगी का धंधा है। पर इंग्लैंड वाला बच्चा बार-बार सवाल करेगा क्योंकि वहाँ तर्कपूर्ण सवाल करने की व्यापक आजादी है। पर, इंडिया में ऐसा नहीं है, यहाँ सवाल करने को अराजक माना जाता है। ऐसा क्यों? इसका जवाब आप आगे के पैराग्राफ्स में पायेंगे। विवेक मनुष्य का जीवन-रक्त है। सभी प्राणियों में, केवल मनुष्य के पास विवेक है, जिसकी विवेक की क्षमता जितनी कम होती है, वह अपेक्षाकृत उतना ही अधिक बर्बर (पाखंडी) होता है। वह जो परिपक्वता प्राप्त करता है, स्पष्ट रूप से विवेक के माध्यम से ही प्राप्त करता है।विवेक से सोचने की तीव्र क्षमता आती है। किंतु वर्षों से चली आ रही बर्बरतापूर्ण जीवन-शैली को इंडियंस सब कुछ मान बैठे हैं। मनुष्य-मनुष्यों के बीच किसी भी आधार पर श्रेष्ठता का भाव ब्राह्मणवाद है जो जाति-आधारित भी हो सकता है और भावनात्मक भी। ‘ब्राह्मणवाद’ एक विचारधारा है और इसके विरोध का मतलब ब्राह्मण समुदाय का विरोध नहीं है।ऐसा नहीं है कि ब्राह्मणवादी विचारधारा सिर्फ़ ब्राह्मण समुदाय में मौजूद है।ये दूसरी जातियों और दलितों में है। ब्राह्मणवादी मानसिकता दूसरी जातियों को ये अहसास दिलाती है कि जन्म आधारित तुम्हारे नीचे भी कोई है, तुम उसका उत्पीड़न कर सकते हो। ऐसे में ब्राह्मणवाद शोषणकारी व्यवस्थाओं को बनाये रखने का लाईसेंसहै। वैसे तो वाद शब्द ही अपने आप में घिनोना या हेयतापूर्ण है। पर इंडिया का सर्वाधिक नुकसान या यूँ कहे सर्वनाश सवर्णवाद (मोटे रूप में ब्राह्मण, वैश्य और क्षत्रिय), ब्राह्मणवाद और आरक्षणवाद ने किया है। तीनों एक-दूसरे के शत्रु बने हुए हैं और नुकसान देश का हो रहा है। पर सब के सब मौन है अर्थात सब अपने म्यान के रखवाले बने हैं जो अपनी म्यान में दूसरी तलवार नहीं घुसने देना चाहते हैं। सबका विवेक यहाँ आकर कुंठित हो जाता है। इन तीनों वादों पर व्यापक चर्चा करना इस आलेख का उद्देश्य भी नहीं है, यहाँ पर केवल संदर्भानुकुल चर्चा ही करेंगे और इतना कह सकते हैं कि उक्त तीनों वादों की जड़ जन्म आधारित जातीय-व्यवस्था है, जो वैदिक काल से बनी हुई है। ब्राह्मणवादी व्यवस्थाओं को पुख्ता करने हेतु वैदिक काल के बाद (जब हिंदू धर्म में कट्टरता आई तो) महिलाओं और शूद्रों (तथाकथित नीची जातियों) का दर्जा गिरा दिया गया। महिलाओं और शूद्रों से लगभग एक जैसा बर्ताव किया जाने लगा। उन्हें ‘अछूत’ और कमतर माना जाने लगा, जिनका ज़िक्र मनुस्मृति जैसे प्राचीन धर्मग्रथों में किया गया है। यह साँप की कंचुली की तरह ऐसे समायी हुई है कि पता नहीं कब उतरेगी ? पर इसका उतरना जरूरी ही नहीं बहुत जरूरी है और जितना जल्दी उतर जाये उतना ही देश हित में हैं। (शेष अगले अंक में)

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