‘भारतरत्न डॉ बीआर अंबेडकर को जानो और खुद को पहचानो’ – प्रोफ़ेसर राम लखन मीना

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मूकनायक मीडिया ब्यूरो || जयपुर : बहुजन (शुद्र) दीन है। उसको ब्राह्मणवादी-व्यवस्थाओं ने सदियों से कह रखा है कि तुम दीन हो। और माजरा देखिए, बहुजनों (शूद्रों) ने भी मान रखा है कि वह दीन है। उसमें वह क्षमता नहीं है जो सवर्णों, ब्राह्मणों और यूरेशियाई जमात में है। कितना दु:खद एक क्षमतावान मानव सिर्फ दूसरों के कहते से ही मान बैठा की वह कमजोर है, कायर है, असहाय है। किंतु, उसने अपने अंदर झाँककर नहीं देखा कि वह उसे दीन-हीन बताने वालों से हर दृष्टि इक्कीस है। जो उसे दीन-हीन बना रहे हैं, वे उसके टुकड़ों (भिक्षावृति, दान-पुण्य और श्रमशक्ति) पर पलने वाले हैं, पराश्रित हैं, निकम्मे हैं और घोर षड्यंत्रकारी हैं। चालबाज हैं, धोखेबाज हैं और किसी भी दृष्टिकोण से मानव कहलाने लायक तक नहीं हैं, अमानवीयता के पुतले हैं। असल में हजारों साल तक भारत में बहुजन समझता था कि वह शुद्र है; क्योंकि हजारों साल तक ब्राहमणों ने समझाया था कि बहुजन, शुद्र हैं। अंबेडकर के पहले, बहुजनों (शुद्रों) के पाँच हजार साल के इतिहास में कीमती आदमी बहुजनों (शुद्रों) में पैदा नहीं हुआ है, ऐसा भी नहीं है कबीर, रैदास जैसे महापुरुष हुए हैं। पर, उनका दायरा संसाधनों की कमी के कारण विकराल रूप धारण नहीं कर पाया। इसका यह मतलब नहीं कि बहुजनों (शुद्रों) में बुद्धि न थी और अंबेडकर पहले पैदा नहीं हो सकता था। पहले पैदा हो सकता था, लेकिन बहुजनों (शुद्रों) ने मान रखा था कि उनमें कभी कोई पैदा हो ही नहीं सकता। वे बहुजन (शुद्र) हैं, उनके पास बुद्धि हो नहीं सकती। यह भी पढ़ें : पेरियार की नजर में भविष्य की दुनिया अंबेडकर भी पैदा न होता, अगर अंग्रेजों ने आकर इस मुल्क के दिमाग में थोड़ा हेर-फेर न कर दिया होता तो अंबेडकर भी पैदा नहीं हो सकता था। हालांकि जब हमको हिंदुस्तान का विधान बनाना पड़ा, कान्सिटटयूशन बनाना पड़ा, तो ब्राहमण बगले झाँकने लगे, उन्हें कुछ नहीं सूझा, और संविधान बनाने के लिए किसी विदेशी को आयातित या हायर करने की जुगत में लग गये क्योंकि संविधान बनाना उनके बस की बात कहाँ थी? फिर बहुजन (शुद्र) अंबेडकर ही काम आया। वे दुनियाभर के सभी बुद्धिमानों से बुद्धिमान आदमी सिद्ध हुए और आज भी हैं। जिन अंग्रेजों के राज का सूरज कभी डूबता नहीं था , उन अंग्रेजों ने स्वीकार किया कि अकेले अंबेडकर में अंग्रेजी-जमात से डेढ़ गुणा अधिक दिलो-दिमाग है। लेकिन अचरज देखिए, दौ सौ साल पहले वह भारत में पैदा नहीं हो सकता था। क्योंकि शूद्रों ने स्वीकार कर लिया था, खुद ही स्वीकार कर लिया था कि उनके पास बुद्धि नहीं है। स्त्रियों ने भी स्वीकार कर रखा है कि वे किसी न किसी सीमा पर हीन हैं। कहते हैं, संन्यास लेने के बाद गौतम बुद्ध ने अनेक क्षेत्रों की यात्रा की। एक बार वे एक गाँव में गये। वहाँ एक स्त्री उनके पास आयी और बोली कि आप तो कोई राजकुमार लगते हैं। क्या मैं जान सकती हूँ कि इस युवावस्था में गेरुआ वस्त्र पहनने का क्या कारण है? बुद्ध ने विनम्रतापूर्वक उत्तर दिया कि तीन प्रश्नों के हल ढूंढने के लिए उन्होंने संन्यास लिया। यह शरीर जो युवा व आकर्षक है, पर जल्दी ही यह वृद्ध होगा, फिर बीमार व अंत में मृत्यु के मुँह में चला जायेगा। मुझे वृद्धावस्था, बीमारी व मृत्यु के कारण का ज्ञान प्राप्त करना है। उनसे प्रभावित होकर उस स्त्री ने उन्हें भोजन के लिए आमंत्रित किया। शीघ्र ही यह बात पूरे गाँव में फैल गयी। गाँववासी बुद्ध के पास आये व आग्रह किया कि वे इस स्त्री के घर भोजन करने न जायें क्योंकि वह चरित्रहीन है। बुद्ध ने गाँव के मुखिया से पूछा- क्या आप भी मानते हैं कि वह स्त्री चरित्रहीन है? मुखिया ने कहा कि मैं शपथ लेकर कहता हूँ कि वह बुरे चरित्र वाली है। आप उसके घर न जायें। बुद्ध ने मुखिया का दायाँ हाथ पकड़ा और उसे ताली बजाने को कहा। मुखिया ने कहा- मैं एक हाथ से ताली नहीं बजा सकता क्योंकि मेरा दूसरा हाथ आपने पकड़ा हुआ है। बुद्ध बोले- इसी प्रकार यह स्वयं चरित्रहीन कैसे हो सकती है जब तक इस गाँव के पुरुष चरित्रहीन न हों। अगर गाँव के सभी पुरुष अच्छे होते तो यह औरत ऐसी न होती इसलिए इसके चरित्र के लिए यहाँ के पुरुष जिम्मेदार हैं। यह सुनकर सभी लज्जित हो गये। ऐसा ही हाल बहुजनों का है उन्होंने एक हाथ से तली बजने की बात को अंगीकार कर लिया है कि वे और उनकी औलादें दीन-हीन और पुरुषार्थ-विहीन हैं। पर, ऐसा कतई नहीं है, उन्हें बस अपने आंतरिक स्वरूप को पहचानना है, उन्हें अपने पुरखों ( के स्वरूप को पहचानना है की वे कौन हैं? उन्हें उनके ऊपर थोपे और षड्यंत्रवश चढ़ाये आवरणों को उतार-फेंकना है। ये भी पढ़ें – मूकनायक : डॉ अंबेडकर-मिशन की बुलंद आवाज का दस्तावेज समय के साथ बहुत कुछ बदलेगा। जैसे-जैसे वंचित तबका प्रबुद्ध होता जायेगा, अपने नायकों, अपने समर्थकों, अपने बुद्धिजीवियों के विरोध और तिरस्‍कार वास्‍तविक कारणों को समझेगा और उन्‍हें सही महत्‍व देगा। वह सुनी-सुनायी बातों और गढ़ी गयी परिभाषाओं पर यकीन नहीं करेगा, खुद पढ़ेगा, आगे बढ़ेगा और तय करेगा। अंबेडकर चाहते थे कि अछूतों (बहुजनों) के अपने उम्मीदवार और अपने निर्वाचन क्षेत्र हों, अन्यथा उनका कहीं भी किसी भी संसद में प्रतिनिधित्व कभी नहीं होगा, भारत में एक बाल्मीकि अछूत है, कौन एक भंगी को वोट देंगे? कौन उसे वोट देने जा रहा है? अंबेडकर बिल्कुल सही थे। देश की तीन चौथाई लोग अछूत है। कोई शारीरिक रूप से, तो कोई मानसिक रूप से, अछूत सब हैं। उनके स्वरूप बदले हुए हैं । स्कूलों में जाने के लिए उन्हें अनुमति नहीं है, अन्य छात्र उनके साथ बैठने के लिए तैयार नहीं है, कोई शिक्षक उन्हें सिखाने के लिए तैयार नहीं है। स्कूल-कॉलेजों में पहुँच जाये तो वहाँ उन्हें कौन स्वीकार-अंगीकार करता है, वहाँ दड़बे बनाये हुए हैं, ताकि उन दड़बों में बाँटी मछलियों का बारी-बारी से शिकार किया जा सके। जो मछली पहले अपनी उपस्थिति दर्ज (अहसास) करवायेगी, उसका शिकार स्वाभाविक रूप से पहले होगा। शेष का अपनी बारी आने पर, शिकार सबका होगा यह तय है, पूर्वनिर्धारित है। सरकार कहती है कि सरकारी स्कूल खुले हैं , लेकिन वास्तविकता में कोई एक अछूत छात्र कक्षा में प्रवेश करता है, तो सभी तीस छात्रों कक्षा छोड़ने को तैयार हैं, उसके साथ मिड-डे मील तक खाने को तैयार नहीं हैं। शिक्षक वर्ग कक्षा छोड़ देता है, तो फिर कैसे इन गरीब लोगों का — जो इस देश का तीन चौथाई भाग हैं – प्रतिनिधित्व किया जा रहा है? इसलिए उन्हें अलग निर्वाचन क्षेत्र दिये जाने चाहिए थे। जहाँ केवल वे खड़े हो सकते हैं और केवल वे मतदान कर सकते हों, पर, कहाँ दिये गये? जिसका खामियाजा आज तक भुगता जा रहा है। यह भी पढ़ें : ‘अबुआ दिशोम रे अबुआ राज’ बिरसा मुंडा का सपना कब पूरा होगा! अंबेडकर पूरी तरह से तार्किक और पूरी तरह से मानवतावादी थे। लेकिन गाँधीजी, अनशन पर चले गये “उन्होंने यहाँ तक कह दिया कि अंबेडकर हिंदू समाज के भीतर एक प्रभाग बनाने की कोशिश कर रहे हैं।” पर गाँधीजी यह कैसे भूल गये कि ऐसे प्रभाग वास्तविकताओं में सदियों से बने हुए थे, और आज भी बने हुए हैं। गाँधीजी की जिद ने हमें पूना-पेक्ट की संतानों के रूप में ऐसे नेता-नेती दे दिये जो उन्हीं के लोगों का खून बेशर्मी से चूस रहे हैं। विभाजन दस हजार साल से अस्तित्व में है। यही कारण है कि गरीब अंबेडकर विभाजन पैदा नहीं कर रहे थे, वह सिर्फ इतना कह रहे थे कि हजारों सालो से देश के तीन चौथाई लोगों पर अत्याचार किया गया है। अब कम से कम उन्हें खुद को आगे लाने के लिए एक मौका दे। कम से कम उन्हें विधानसभाओं में, संसद में उनकी समस्याओं को आवाज दें। लेकिन गाँधीजी ने कहा ” जब तक मैं जिंदा हूँ, मैं इसकी अनुमति नहीं दे सकता, उन्होंने कि वे हिंदू समाज का हिस्सा हैं इसलिए अछूत एक अलग मतदान प्रणाली की माँग नहीं कर सकते हैं, ,” – और गाँधी जी उपवास पर चले गये। यह भी पढ़ें : अछूत समाज की कलियाँ बहुत कम समय में अंकुरित होने लगीं ‘मनोगत’ इक्कीस दिनों के लिए अंबेडकर अनिच्छुक बने रहे, लेकिन हर दिन … पूरे देश का दबाव उन पर आता जा रहा था। और उन्हें ये महसूस हो रहा था कि अगर गाँधीजी ( बूढा आदमी) मर जाता है तो महान रक्तपात शुरू हो जायेगा। अगर गाँधी की मौत हो गयी तो यह स्पष्ट था – कि अंबेडकर को तुरंत मार डाला जायेगा, और लाखों अछूतों को पूरे देश में, हर जगह मारा जायेगा: क्यों कि ये माना जायगा कि ये तुम्हारी वजह से है।” अंबेडकर को सारी गणित को समझाया गया था कि – “ज्यादा समय नहीं है, वह तीन दिन से ज्यादा जीवित नहीं रह सकते, कुछ दिनों में सब बाहर आने वाला है ” – डॉ अंबेडकर झिझक रहे थे। इसमें कतई दो राय नहीं हैं कि डॉ अंबेडकर पूरी तरह से सही थे; गाँधीजी पूरी तरह से गलत थे, जो आज भी सिद्ध हो रहा है। लेकिन क्या करना चाहिए था ? क्या उन्हें जोखिम लेना चाहिए था ? अंबेडकर अपने जीवन के बारे में चिंतित नहीं थे। उन्होंने कहा कि अगर उन्हें मार दिया गया तो कोई बात नहीं – लेकिन वो उन लाखों गरीब लोगों के बारे में चिंतित थे जो ये भी नहीं जानते थे कि आखिर चल क्या रहा है। यह भी पढ़ें : डॉ अंबेडकर का ऐतिहासिक भाषण उनके घरों को जला दिया जायेगा, उनकी महिलाओं के साथ बलात्कार किया जायेगा। उनके बच्चों को बेरहमी से काट दिया जायेगा और वह सब कुछ होगा जो पहले कभी नहीं हुआ था। आखिरकार उन्होंने गाँधीजी की शर्तों को स्वीकार कर लिया । अपने हाथ में नाश्ता लिये हुए अंबेडकर गाँधीजी के पास चले गये उन्होंने कहा कि मैं आपकी शर्तों को स्वीकार करता हूँ। हम एक अलग वोट या अलग उम्मीदवारों के लिए नहीं कहेंगे। इस संतरे का रस स्वीकार करें “और गाँधीजी ने संतरे का रस स्वीकार कर लिया। लेकिन यह संतरे का रस, असल में इस एक गिलास संतरे के रस में लाखों लोगों का खून मिला हुआ था। निश्चित ही डॉ अंबेडकर मैंने आज तक पढ़े हुए सबसे बुद्धिमान लोगों में से एक थे। कई लोगों को लगता है कि “बाबासाहब कमजोर साबित हुए । डॉ अंबेडकर ने कहा था कि आप समझ नहीं रहे हैं, मैं सही था और ये बात मैं जानता था, गाँधी गलत थे, लेकिन उस जिद्दी बूढ़े आदमी के साथ क्या किया जा सकता था ? वे मरने के लिए जा रहे थे, और अगर वे मर गये होते तो मुझे उनकी मौत के लिए जिम्मेदार माना जाता, और अछूतों को बड़ी समस्या का सामना करना पड़ सकता है। गाँधीजी ने हिंदुओं के लिए वह सब कुछ किया जो वे करना चाहते थे। पर, आखिर में क्या हुआ, उन्हीं ब्राह्मण षड्यंत्रकारियों ने उनकी हत्या की ! यह भी पढ़ें : जयपाल सिंह मुंडा (आईएएस) और डॉ भीमराव अंबेडकर ‘कितने पास, कितने दूर’ आप सबको यह समझना पड़ेगा कि जैसे गाँधीजी की हत्या ब्राह्मणवादी ताकतों ने की वैसे ही बाबासाहब डॉ अंबेडकर की हत्या में भी वैसी ही ब्राह्मणवादी ताकतों का हाथ रहा है। ये ब्राह्मणवादी ताकतें ना गाँधी की सगी हैं, ना अंबेडकर की, और ना ही आप हम सबकी । इनके अपने निहितार्थ हैं, जिन्हें आपको (बहुजनों को) जानना होगा, समझना होगा, और नासमझ बहुजनों को समझाना होगा, इतना साफ है धर्म और धार्मिक पाखंड इनके सबसे बड़े अस्त्र हैं। यही हर एक जागरूक बहुजन का दायित्व है, ताकि कोई भी जानवरों से बदतर जिंदगी जीने को मजबूर ना हो ।

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