ब्राह्मणवाद और अंबेडकरवाद भारतीय चिंतन परंपरा के दो अलग ध्रुव हैं, इनमें से एक घटेगा तो दूसरा बढ़ेगा

9 min read

‘अंबेडकर की नजर में आरएसएस जिन लोगों का संगठन है, वे मानसिक रूप से बीमार हैं और उनकी बीमारी बाकी लोगों के लिए खतरा है’ मूकनायक मीडिया ब्यूरो || जयपुर : भारत के संविधान की प्रस्तावना कहती है कि- “हम भारत के लोग, भारत को एक संपूर्ण प्रभुत्व सम्पन्न, समाजवादी, धर्मनिरपेक्ष, लोकतंत्रात्मक गणराज्य बनाने के लिए तथा उसके समस्त नागरिकों को: सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक न्याय, विचार, अभिव्यक्ति, विश्वास, धर्म और उपासना की स्वतंत्रता, प्रतिष्ठा और अवसर की समता प्राप्त करने के लिए तथा उन सबमें व्यक्ति की गरिमा और राष्ट्र की एकता और अखण्डता सुनिश्चित करने वाली बंधुता बढ़ाने के लिए, दृढ संकल्प होकर अपनी इस संविधान सभा में आज तारीख 26 नवम्बर 1949 ई0 (मिति मार्ग शीर्ष शुक्ल सप्तमी, सम्वत् दो हजार छह विक्रमी) को एतदद्वारा इस संविधान को अंगीकृत, अधिनियमित और आत्मार्पित करते हैं।” प्रभुत्व सम्पन्न, समाजवादी, धर्मनिरपेक्ष, लोकतंत्रात्मक गणराज्य, सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक न्याय, विचार, अभिव्यक्ति, विश्वास, धर्म और उपासना की स्वतंत्रता, प्रतिष्ठा और अवसर की समता जैसे ये शब्द सिर्फ शब्द नहीं है। इन शब्दों का बहुत व्यापक अर्थ है। इन शब्दों को संविधान में शामिल करने के लिए बहुत संघर्ष हुआ है। संघर्ष की एक तरफ जहाँ इन शब्दों को सविधान में शामिल करने के लिए मजदूर, किसान, महिला, अल्पसंख्यक, दलित, आदिवासी, प्रगतिशील बुद्विजीवी, कलाकार, लेखक खड़े थे वही दूसरी तरफ इनके खिलाफ, सामन्तवादी, राजशाही के समर्थक, फासीवादी, हिंदुत्वादी, जातिवादी खड़े थे। जीत धर्मनिरपेक्ष मेंहनतकश आवाम की हुई क्योंकि इस आवाम ने ही गुलामी की जंजीरे तोड़ने के लिए कुर्बानियाँ दी थी। देश के इस आवाम का आजादी का सपना सिर्फ अंग्रेजो से आजादी ही नहीं था, सामन्तवाद औऱ राजशाही जिनका आधार ही जातीय औऱ धार्मिक शोषण पर टिका था, से भी आजादी का सपना था। उसी सपने औऱ संघर्ष की कुछ झलक संविधान में इन शब्दों में निहित है। लेकिन क्या जमीनी स्तर पर भारत का संविधान काम कर रहा है? क्या देश इतने सालों बाद भी लोकतंत्र, धर्मनिरपेक्ष राज्य बन पाया है? ब्राह्मणवाद और अंबेडकरवाद भारतीय चिंतन परंपरा के दो अलग ध्रुव हैं। इनमें से एक घटेगा, तो दूसरा बढ़ेगा। एक मिटेगा, तो दूसरा बचेगा। अंबेडकर की नजर में आरएसएस जिन लोगों का संगठन है, वे बीमार हैं और उनकी बीमारी बाकी लोगों के लिए खतरा है। क्या संविधान में निहित विचार, अभिव्यक्ति, धर्म की उपासना को लागू कर पाया है? राष्ट्र निर्माता के रूप में बाबासाहब भीम राव अंबेडकर की विधिवत स्थापना का कार्य 26 नवंबर को संविधान दिवस मनाने की राजपत्र में की गई घोषणा के साथ संपन्न हुआ। संविधान दिवस संबंधी भारत सरकार के गजट में सिर्फ एक ही शख्सियत का नाम है और वह नाम स्वाभाविक रूप से बाबासाहब का है। बाबासाहब को अपनाने की बीजेपी और संघ की कोशिशों का भी यह चरम रूप है। लेकिन क्या इस तरह के अगरबत्तीवाद के जरिए बाबासाहब को कोई संगठन आत्मसात कर सकता है? मुझे संदेह है। इस संदेह का कारण मुझे आंबेडकरी विचारों और उनके साहित्य में नजर आता है। इस बात की पुष्टि के लिए मैं बाबासाहब की सिर्फ एक किताब एनिहिलेशन ऑफ कास्ट का संदर्भ ले रहा हूँ। यादरहे कि यह सिर्फ एक किताब है। पूरा आंबेडकरी साहित्य ऐसे लेखन से भरा पड़ा है, जो संघ को लगातार असहज बनाएगा। एनिहिलेशन ऑफ कास्ट पहली बार 1936 में छपी थी। दरअसल यह एक भाषण है, जिसे बाबासाहब ने लाहौर के जात-पात तोड़क मंडल के 1936 के सालाना अधिवेशन के लिए तैयार किया था। लेकिन इस लिखे भाषण को पढ़कर जात-पात तोड़क मंडल ने पहले तो कई आपत्तियाँ जताईं और फिर कार्यक्रम ही रद्द कर दिया। इस भाषण को ही बाद में एनिहिलेशन ऑफ कास्ट नाम से छापा गया। दूसरे संस्करण की भूमिका में बाबासाहब इस किताब का उद्देश्य स्पष्ट करते हुए लिखते हैं कि “अगर मैं हिंदुओं का यह समझा पाया कि वे भारत के बीमार लोग हैं और उनकी बीमारी दूसरे भारतीय लोगों के स्वास्थ्य और उनकी खुशी के लिए खतरा है, तो मैं अपने काम से संतुष्ट हो पाऊँगा। ” जाहिर है कि बाबासाहब के लिए यह किताब एक डॉ और मरीज यानी हिंदुओं के बीच का संवाद है। इसमें ध्यान रखने की बात है कि जो मरीज है, यानी जो भारत का हिंदू है, उसे या तो मालूम ही नहीं है कि वह बीमार है, या फिर वह स्वस्थ होने का नाटक कर रहा है और किसी भी हालत में वह यह मानने को तैयार नहीं है कि वह बीमार है। बाबासाहब की चिंता यह है कि वह बीमार आदमी दूसरे लोगों के लिए खतरा बना हुआ है। संघ उसी बीमार आदमी का प्रतिनिधि संगठन होने का दावा करता है। वैसे यह बीमार आदमी कहीं भी हो सकता है। कांग्रेस से लेकर समाजवादी और वामपंथी कम्युनिस्ट तक उसके कई रूप हो सकते हैं। लेकिन वह जहाँ भी है, बीमार है और बाकियों के लिए दुख का कारण है। बीमार न होने का बहाना करता हुआ हिंदू कहता है कि वह जात-पात नहीं मानता। लेकिन बाबासाहब की नजर में ऐसा कहना नाकाफी है। वे इस सवाल का जवाब ढूंढने की कोशिश करते हैं कि भारत में कभी क्रांति क्यों नहीं हुई। वे बताते हैं कि कोई भी आदमी आर्थिक बराबरी लाने की क्रांति में तब तक शामिल नहीं होगा, जब तक उसे यकीन न हो जाए कि क्रांति के बाद उसके साथ बराबरी का व्यवहार और जाति के आधार पर उसके साथ भेदभाव नहीं होगा। इस भेदभाव के रहते भारत के गरीब कभी एकजुट नहीं हो सकते। वे कहते हैं कि आप चाहें जो भी करें, जिस भी दिशा में आगे बढ़ने की कोशिश करें, जातिवाद का दैत्य आपका रास्ता रोके खड़ा मिलेगा। इस राक्षस को मारे बिना आप राजनीतिक या आर्थिक सुधार नहीं करते। डॉ अंबेडकर की यह पहली दवा है। क्या संघ इस कड़वी दवा को पीने के लिए तैयार है? जातिवाद के खात्मे की दिशा में संघ ने पहला कदम नहीं बढ़ाया है। क्या वह आगे ऐसा करेगा? मुझे संदेह है। डॉ अंबेडकर के मुताबिक जाति ने भारतीयों की आर्थिक क्षमता को कुंद किया है। इससे नस्ल बेहतर होने की बात भी फर्जी सिद्ध हुई है क्योंकि नस्लीय गुणों के लिहाज से भारतीय लोग सी 3 श्रेणी के हैं और 95 प्रतिशत भारतीय लोगों की शारीरिक योग्यता ऐसी नहीं है कि वे ब्रिटिश फौज में भर्ती हो सकें। बाबासाहब आगे लिखते हैं कि हिंदू समाज जैसी कोई चीज है ही नहीं। हिंदू मतलब दरअसल जातियों का जमावड़ा है। इसके बाद वे एक बेहद गंभीर बात बोलते हैं कि एक जाति को दूसरी जाति से जुड़ाव का संबंध तभी महसूस होता है, जब हिंदू-मुसलमान दंगे हों। संघ के मुस्लिम विरोध के सूत्र बाबासाहब की इस बात में छिपे हैं। वह जाति को बनाए रखते हुए हिंदुओं को एकजुट देखना चाहता है, इसलिए हमेंशा मुसलमानों का विरोध करता रहता है। दंगों को छोड़कर बाकी समय में हिंदू अपनी जाति के साथ खाता है और जाति में ही शादी करता है। डॉ अंबेडकर बीमार हिंदू की नब्ज पर हाथ रखकर कहते हैं कि आदर्श हिंदू उस चूहे की तरह है,जो अपने बिल में ही रहता है और दूसरों के संपर्क में आने से इनकार करता हैं। इस किताब में बाबासाहब साफ शब्दों में कहते हैं कि कि हिंदू एक राष्ट्र नहीं हो सकते। क्या संघ के लिए ऐसे अंबेडकर को आत्मसातकर पाना मुमकिन होगा। मुझे संदेह है। वे बताते हैं कि कोई भी आदमी आर्थिक बराबरी लाने की क्रांति में तब तक शामिल नहीं होगा, जब तक उसे यकीन न हो जाए कि क्रांति के बाद उसके साथ बराबरी का व्यवहार और जाति के आधार पर उसके साथ भेदभाव नहीं होगा। बाबासाहब यह भी कहते हैं कि ब्राह्मण अपने अंदर भी जातिवाद पर सख्ती से अमल करते हैं। वे महाराष्ट्र के गोलक ब्राह्मण, देवरूखा ब्राह्मण, चितपावन ब्राह्मण और भी तरह के ब्राह्मणों का जिक्र करते हुए कहते हैं कि उनमें असामाजिक भावना उतनी ही है,जितनी कि ब्राह्मणों और गैर ब्राह्मणों के बीच है। वे मरीज की पड़ताल करके बताते हैं कि जातियाँ एक दूसरे से संघर्षरत समूह हैं, जो सिर्फ अपने लिए और अपने स्वार्थ के लिए जीती हैं। वे यह भी बताते है कि जातियों ने अपने पुराने झगड़े अब तक नहीं भूलाए हैं। गैर ब्राह्मण इस बात को याद रखता है कि किस तरह ब्राह्मणों के पूर्वजों ने शिवाजी का अपमान किया था। आज का कायस्थ यह नहीं भूलता कि आज के ब्राह्मणों के पूर्वजों ने उनके पूर्वजों को किस तरह नीचा दिखाया था। संघ के संगठन शुद्धि का अभियान चला रहे हैं। बाबासाहब का मानना था कि हिंदुओं के लिए यह करना संभव नहीं है। जाति और शुद्धिकरण अभियान साथ साथ नहीं चल सकते। इसका कारण वे यह मानते हैं कि शुद्धि के बाद बाहर से आए व्यक्ति को किस जाति में रखा जाएगा, इसका जवाब किसी हिंदू के पास नहीं है। जाति में होने के लिए जाति में पैदा होना जरूरी है। यह क्लब नहीं है कि कोई भी मेंबर बन जाए। वे स्पष्ट कहते हैं कि धर्म परिवर्तन करके हिंदू बनना संभव नहीं है क्योंकि ऐसे लोगों के लिए हिंदू धर्म में कोई जगह नहीं है। क्या भारत का बीमार यानी हिंदू और कथित रूप से उनका संगठन आरएसएस, बाबासाहब की बात मानकर शुद्धिकरण की बेतुका कोशिशों को रोक देगा? मुझे संदेह है। हिंदू के नाम पर राजीनीति करने वाले संगठन यह कहते नहीं थकते कि हिंदू उदार होते हैं। बाबासाहब इस पाखंड को नहीं मानते। उनकी राय में,मौका मिलने पर वे बेहद अनुदार हो सकते हैं और अगर वे किसी खास मौके पर उदार नजर आते हैं, तो इसकी वजह यह होती है कि या तो वे इतने कमजोर होते हैं कि विरोध नहीं कर सकते या फिर वे विरोध करने की जरूरत महसूस नहीं करते। बाबासाहब इस किताब में गैर हिंदुओं के जातिवाद की भी चर्चा करते हैं, लेकिन इसे वे हिंदुओं के जातिवाद से अलग मानते हैं। वे लिखते हैं कि गैर हिंदुओं के जातिवाद को धार्मिक मान्यता नहीं है। लेकिन हिंदुओं के जातिवाद को धार्मिक मान्यता है। गैर हिंदुओं का जातिवाद एक सामाजिक व्यवहार है, कोई पवित्र विचार नहीं है। उन्होंने जाति को पैदा नहीं किया। अगर हिंदू अपनी जाति को छोड़ने की कोशिश करेगा, तो उनका धर्म उसे ऐसा करने नहीं देगा। वे हिंदुओं से कहते हैं कि इस भ्रम में न रहें कि दूसरे धर्मों में भी जातिवाद है। वे हिंदू श्रेष्ठता के राधाकृष्णन के तर्क को खारिज करते हुए कहते हैं कि हिंदू धर्म बेशक टिका रहा, लेकिन उसका जीवन लगातार हारने की कहानी है। वे कहते हैं कि अगर आप जाति के बुनियाद पर कुछ भी खड़ा करने की कोशिश करेंगे, तो उसमें दरार आना तय है। अपने न दिए गए भाषण के आखिरी हिस्से में बाबासाहब बताते हैं कि हिंदू व्यक्ति जाति को इसलिए नहीं मानता कि वह अमानवीय है या उसका दिमाग खराब है। वह जाति को इसलिए मानता है कि वह बेहद धार्मिक है। जाति को मान कर वे गलती नहीं कर रहे हैं। उनके धर्म ने उन्हें यही सिखाया है। उनका धर्म गलत है, जहाँ से जाति का विचार आता है। इसलिए अगर कोई हिंदू जाति से लड़ना चाहता है तो उसे अपने धार्मिक ग्रंथों से टकराना होगा। बाबासाहब भारत के मरीज को उपचार बताते हैं कि शास्त्रों और वेदों की सत्ता को नष्ट करो। यह कहने का कोई मतलब नहीं है कि शास्त्रों का मतलब वह नहीं है, जो लोग समझ रहे हैं। दरअसल शास्त्रों का वही मतलब है जो लोग समझ रहे हैं और जिस पर वे अमल कर रहे हैं। क्या संघ हिंदू धर्म शास्त्रों और वेदों को नष्ट करने के लिए तैयार है? मुझे शक है। इस भाषण में वे पहली बार बताते हैं कि वे हिंदू बने रहना नहीं चाहते। संघ को बाबासाहब को अपनाने का पाखंड करते हुए, यह सब ध्यान में रखना होगा। क्या राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ बाबासाहब को अपना सकता है? बेशक। लेकिन ऐसा करने के बाद फिर वह राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ नहीं रह जाएगा।

Facebook
Twitter
LinkedIn
WhatsApp

डॉ अंबेडकर की बुलंद आवाज के दस्तावेज : मूकनायक मीडिया पर आपका स्वागत है। दलित, आदिवासी, पिछड़े और महिला के हक़-हकुक तथा सामाजिक न्याय और बहुजन अधिकारों से जुड़ी हर ख़बर पाने के लिए मूकनायक मीडिया के इन सभी links फेसबुक/ Twitter / यूट्यूब चैनलको click करके सब्सक्राइब कीजिए… बाबासाहब डॉ भीमराव अंबेडकर जी के “Payback to Society” के मंत्र के तहत मूकनायक मीडिया को साहसी पत्रकारिता जारी रखने के लिए PhonePay या Paytm 9999750166 पर यथाशक्ति आर्थिक सहयोग दीजिए…
उम्मीद है आप बिरसा अंबेडकर फुले फातिमा मिशन से अवश्य जुड़ेंगे !

बिरसा अंबेडकर फुले फातिमा मिशन के लिए सहयोग के लिए धन्यवाद्

Recent Post

Live Cricket Update

Rashifal

You May Like This