शिक्षा नीति 2020 : संवैधानिक जीवन-मूल्य और सामाजिक न्याय की भावना का गला-घोट शिक्षा नीति के मायने

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मूकनायक मीडिया ब्यूरो | सितंबर 04, 2020 | जयपुर : नई शिक्षा नीति के जारी होने के बाद आरक्षण के विरोधी कुलांचे मार-मार कर ठहाके लगा रहे हैं क्योंकि उनको इस नीति के माध्यम से आरक्षण के खात्मे और सामाजिक न्याय का गला घोटने के दिवास्वप्न को अंतिम-अंजाम तक ले जाने की संभावना दिख रही है। अक्सर यह कहा जा रहा है की नई शिक्षा नीति को लेकर कोई भी विचार विमर्श करने से पूर्व यह जान लेना आवश्यक है कि यह कोई कानून नहीं है बल्कि नीतिगत दस्तावेज है। किंतु मेरा सबसे बड़ा सवाल यह है कि नीतिगत दस्तावेज में आरक्षण जैसे वैज्ञानिक दृष्टिकोण, कमजोर-वर्गों के उत्थान और सामाजिक न्याय की माननीय पराकाष्ठा की अंतर्भूत भावनाओं को ऐसे नीति-पत्र में नजरअंदाज कैसे किया जा सकता है जो दशकों तक शैक्षिक मार्ग का रास्ता प्रशस्त करेगी। नई शिक्षा नीति का मूल्यांकन केवल इसके दस्तावेजों में प्रस्तुत आदर्शों के आधार पर नहीं किया जा सकता बल्कि सामाजिक न्याय की भावना एवं शिक्षा के अन्य पहलुओं से संबंधित नीतियों में रखे गये लक्ष्यों एवं उनकी वास्तविक प्राप्ति के बीच अंतराल तथा विगत 6वर्षों में मोदी सरकार की प्राथमिकताओं में सुमार निजीकरण, नोटबंदी, गलत जीएसटी एवं गिरती अर्थव्यवस्था का जो हाल हुआ है, उसे दृष्टिपटल में भी रखना जरूरी है। वैसे कहने वाले लोग यह कह रहे हैं कि यह केवल एक नीतिगत दस्तावेज है, किंतु इस नीतिगत दस्तावेज में मोदीसरकार और आरएसएस की मंशा साफ-साफ दिख रही है कि वह किस दिशा में जाना चाहते हैं। क्योंकि किसी भी देश के लिए उसकी शिक्षा नीति का स्थान अन्य नीतियों से बहुत महत्वपूर्ण होता है। और शिक्षा से ही हर एक राष्ट्र के भविष्य की दशा एवं दिशा तय होती है। इसीलिए डॉक्टर बी आर अंबेडकर ने ‘शिक्षा को शेरनी का दूध कहा’ और शिक्षा की अहमियत को सबके सामने रखा। यही कारण है कि देश में नई शिक्षा नीति को लेकर एक व्यापक बहस छिड़ी हुई है। लेकिन नई शिक्षा नीति को लेकर कोई भी विचार-विमर्श करने से पूर्व यह जान लेना आवश्यक होगा कि यह कोई कानून नहीं है बल्कि नीतिगत दस्तावेज है, काफी नहीं है। किंतु शिक्षा-नीति में रखे गये लक्ष्य सिर्फ आदर्श स्थिति है जिन्हें पूरा किया जाना वर्तमान मोदी सरकार एवं आने वाली अन्य सरकारों की राजनीतिक इच्छा-शक्ति, उपलब्ध संसाधनों की स्थिति एवं सामाजिक-उत्थान के सरकारी प्रयासों एवम् सहयोग पर निर्भर करता है। इसका अर्थ यह हुआ कि शिक्षा नीति में रखे गये आदर्शों को शत-प्रतिशत लागू किया जायेगा, यह अनिवार्य नहीं है। बल्कि इस बात पर भी निर्भर करेगा कि आने वाले समय में केंद्र तथा विभिन्न राज्य सरकारें इस नई शिक्षा नीति से प्रेरित होकर किस प्रकार के पाठ्यक्रम तैयार करवाती है, पाठ्यक्रमों के क्रियान्वयन के लिए कैसे और कितने कारगर कदम उठाती है। वस्तुत: एक प्रकार से नई शिक्षा नीति आने वाले वर्षों में भारत की शिक्षा पद्धति के संबंध में नीति-नियंताओं को एक दिशा-निर्देश प्रदान करेगी। यही कारण है कि नई शिक्षा नीति एकदम से आमूलचूल बदलावों की बात नहीं करती बल्कि इसके विभिन्न लक्ष्यों को 2040 तक प्राप्त किये जाने की बात करती है। निश्चित तौर पर नई शिक्षा नीति में उल्लेखित बातें भारत में भविष्य की शिक्षा-व्यवस्था की दिशा और दशा में एक सुनहरी तस्वीर रेखांकित करेगी इसमें कोई दो राय नहीं है। किंतु, इस नीति में और नीति के दस्तावेज में कहीं पर भी सामाजिक न्याय की भावना, प्रतिनिधित्व और आरक्षण जैसे तकनीकी शब्दों का कतई भी इस्तेमाल नहीं किया गया है, जो सरकार की मंशा पर एक बड़ा प्रश्न-चिह्न लगाता है। और ऐसे में नई शिक्षा नीति का मूल्यांकन केवल दस्तावेज के आधार पर नहीं किया जा सकता है बल्कि स्वतंत्रता प्राप्ति के उपरांत अन्य शिक्षा नीतियों में रखे गये लक्ष्य एवं वास्तविक प्राप्तियों के बीच अंतराल और विगत दो दशकों में दो महत्वपूर्ण सरकारों की प्राथमिकताओं एवं प्रदर्शन के तुलनात्मक अध्ययन के द्वारा ही संभव हो सकता है। एक उदाहरण से अपने बात आपके समक्ष रखना चाहूँगा कि यूपीए सरकार ने 2009 में स्थापित 12 केंद्रीय विश्वविद्यालयों के कुलपतियों की नियुक्तियों संवैधानिक आरक्षण प्रदान किया और उसी के अनुरूप आरक्षित-वर्गों के प्रोफेसर्स की नियुक्ति की। किंतु, जब 2014 में यूपीए के स्थान पर एनडीए की सरकार केंद्र में पदासीन हुई और मोदीजी ने प्रधानमंत्री की शपथ लेते ही उक्त विश्वविद्यालयों के कुलपतियों की नियुक्ति में एक भी आरक्षित-वर्ग के प्रोफ़ेसर को कुलपति नहीं बनाने दिया और एक ही झटके में नीतियों में तब्दीली कर दी। सरसरी तौर पर देंखे तो नई शिक्षा नीति में सार्वभौमिकरण की प्रक्रिया पर विशेष बल दिया गया है। इसी के तहत शिक्षा-नीति में 2030 तक स्कूली शिक्षा में 100% सकल नामांकन (जीईआर) के साथ प्राथमिक विद्यालय से माध्यमिक स्तर तक की शिक्षा के सार्वभौमीकरण का लक्ष्य रखा गया है, जिसके लिए स्कूल से दूर रहें रहे दो करोड़ बच्चों को फिर से मुख्यधारा में लाना होगा। साथ ही, उच्च शिक्षा में जीईआर को 2035 तक वर्तमान 26 पॉइंट 3 प्रतिशत से बढ़ाकर 50% तक ले जाना का लक्ष्य है, जिसके लिए उच्च शिक्षा में 3 पॉइंट 5 करोड़ नई सीटें जोड़ी जायेगी और इन सब के लिए केंद्र व राज्य सरकारों द्वारा मिलकर जीडीपी का 6% शिक्षा पर खर्च किये जाने का लक्ष्य रखा है। अगर ऐसा हो पाता है तो बहुत अच्छी बात है। नई शिक्षा नीति में सरकार की मंशा पर जो सबसे बड़ा प्रश्न उठता है, इसमें निजी करण को प्राथमिकता दी गयी है। निश्चित रूप से नई शिक्षा नीति एक नई आशा को जन्म देती है। लेकिन जब इन लक्ष्यों के धरातल पर उतरने की चुनौतियों और संभावनाओं पर विचार किया जाता है तो एक दूसरी ही तस्वीर सामने आती है। गौरतलब है कि पहली शिक्षा नीति के लिए गठित कोठारी आयोग ने भी शिक्षा पर जीडीपी का 6% खर्च किये जाने का लक्ष्य रखा था जिसे 55 वर्षों के उपरांत भी प्राप्त नहीं किया जा सका। हाँ, सूचना के अधिकार कानून 2009 लागू होने के उपरांत शिक्षा के खर्च में अवश्य बढ़ोतरी हुई, इस बढ़ोतरी से नाखुश मोदी सरकार ने आरटीआई कानून के पर ही कतर दिये! इसकी दृष्टि से भी इसकी समीक्षा होनी चाहिए कि भारतीय शिक्षा भारत में लोगों के जीवन स्तर को उठाने का सबसे बड़ा और आधारभूत विषय है जिसमें सामाजिक न्याय की भावनाओं या डॉ बी आर अंबेडकर के अंत्योदय-विकास और गाँधीजी के सबसे पिछड़े और गरीब आदमी का ख्याल रखना बहुत ही जरूरी है। क्योंकि जब प्रतिवर्ष कमजोर वर्गों के लाखों-करोड़ों युवा, बच्चे-बच्चियाँ अपना करियर का सपना देखते हैं और शिक्षा जैसे बड़े क्षेत्र में निजीकरण होता है तो संविधान प्रदत्त आरक्षण एवं सामाजिक न्याय का क्या अर्थ रह जायेगा? एक जीवन-मूल्य के रूप में शिक्षा ने भारत के करोड़ों लोगों को न केवल सामाजिक सुरक्षा और सम्मान प्रदान किया है बल्कि जीवन-उन्नयन के हर एक क्षेत्र में भी उत्कृष्ट प्रतिभाओं को तलाशने में मदद की है, जिन्होंने राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत का गौरव बढ़ाया है। शिक्षा जैसे बुनियाद पहलू के निजीकरण से क्या यह सब उपलब्धियाँ भारतीय समाज एवं राष्ट्र के रूप में भारत को प्राप्त हो पायेंगी। या निजीकरण के माध्यम से सामाजिक न्याय की संकल्पना को समाप्त करने की एक साजिश होगी, यह एक विचारणीय और यक्ष प्रश्न है। एक और अन्य उदहारण से अपनी बात रखूँगा कि नई शिक्षा नीति में पदों की भर्ती संविदात्मक रूपों में होगी। संविदा के पदों पर क्या बिना रोस्टर वेरीफाई किये, आरक्षण देय होगा। सरकार निजी क्षेत्र में आरक्षण देने की हिम्मत करेगी? क्या मोदी सरकार इसके लिए संसद में बिल लायेगी? इन नियुक्तियों में प्रोबेशन एक साल का होगा, जिसे पाँच साल तक बढ़ाया जा सकेगा। अब आप ही बताइये कितने एससी, एसटी, ओबीसी के लोगों का कंफर्मेशन होगा तथा कितने साल में होगा और कंफर्म नहीं होने की स्थिति में जब पाँच साल बाद, उनको सर्विस से हाथ धोना पड़ेगा तो दूसरी बार उन्हें नौकरी कौन देगा। ऐसे में सारी प्रक्रिया चापलूसी की संस्कृति पैदा करेगी, कार्य-श्रेष्ठता की संस्कृति नहीं जो सवर्णों को प्रिय होगी और अवर्णों को अप्रिय! भारतीय संविधान में निहित सामाजिक न्याय के मूल्य एवं समाजवादी लक्ष्य की प्राप्ति के लिए शिक्षा जैसी बुनियादी जरूरतों में निजी करण की संपूर्ण नीति के पुनर्मूल्यांकन की आवश्यकता है। जिस तरह से कोविड-19 संकट को मोदी सरकार ने निजीकरण की प्रक्रिया के टूल के रूप में अपनाया है और अपनी सुप्त-मंशाओं को अंदर ही अंदर पूरा किया है। निजीकरण के पुनर्मूल्यांकन की प्रासंगिकता और आवश्यकता इसलिए भी बढ़ जाती है कि शिक्षा के क्षेत्र में सरकार को ऐसे विकल्पों को तलाशना होगा जिसमें नागरिकों की बुनियादी सुविधाओं की निजीकरण के स्थान पर उनकी दक्षता और प्रभावशीलता को बढ़ाया जा सके। ऐसा असंभव बिल्कुल नहीं है क्योंकि इसके लिए एक दृढ़ राजनीतिक इच्छाशक्ति के साथ शैक्षिक-सुधारों को लागू करने की आवश्यकता है। मोदी सरकार ने शिक्षा जैसे बुनियादी जरूरतों के निजीकरण का सरकार ने एक सुनियोजित प्लान बनाया है। इसके स्थान पर सरकार को संविधान में निहित मूल्यों और आदर्शों की पूर्ति के लिए क्षमता विकास के साथ उत्तरदायित्वों को निभाने का संकल्प दोहराना होगा। लेखक : प्रोफ़ेसर राम लखन मीना, सिंडिकेट सदस्य, राजस्थान विश्वविद्यालय, जयपुर

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