स्मृति-शेष : भारत के लेनिन कहे जाने वाले बाबू जगदेव प्रसाद के परिनिर्वाण दिवस पर विशेष आलेख

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मूकनायक मीडिया ब्यूरो | सितंबर 05, 2020 | जयपुर : भारत के लेनिन कहे जाने वाले जगदेव प्रसाद (फ़रवरी 02, 1922 – सितम्बर 05, 1974) की आज परिनिर्वाण दिवस है, वे एक क्रांतिकारी व्यक्तित्व थे। यह उनका व्यक्तित्व और कृतित्व ही था कि दूसरे राज्यों के आंदोलनरत साथी उनको अपने कार्यक्रमों में बुलाते, उनसे विचार-विमर्श करते और उनसे आवश्यक दिशा-निर्देश प्राप्त करते थे। उनका प्रभाव पूरे उत्तर भारत में सर्वमान्य था। यह उनका क्रांतिकारी विचारों का ही प्रभाव था कि अमेरिकी और रुसी इतिहासकार और पत्रकार उनके साक्षात्कार अपने-अपने देशो में छपा और बताया कि भारत के सवर्ण समुदाय भारत को जैसा दिखाते है और बताते हैं वैसा नहीं है। बाबू जगदेव प्रसाद भारत को सच्चे अर्थो में सर्वहारा की दृष्टि से देखते थे। जबकि उनका आरोप था कि मार्क्सवाद में कोई समस्या नहीं है बल्कि समस्या भारतीय मार्क्सवाद में है जिसकी जड़े सवर्णवाद और ब्राह्मणवाद में है क्योकि, उन्हीं लोगों ने इसपर अपना कब्ज़ा जमा लिया है। भारत लेनिन जगदेव प्रसाद के बढ़ाते प्रभावों को देखते हुए यह सहज ही कहा जा सकता है कि वह दिन दूर नहीं था जब पूरे भारत में उनका प्रभाव होता। शोषित वंचित पिछड़े और बेसहारों की वो प्रमुख आवाज थे। यही कारण है कि शोषक जाति के रूप में भूमिहारों ने उनकी हत्या उस समय कर दी जब वो भाषण दे रहे थे। भारत लेनिन जगदेव प्रसाद भारत के पहले जननायक थे जिनकी हत्या उस समय हुई जब वो भाषण दे रहें थे। भारत में भाषण देते समय दूसरी हत्या चंद्रशेखर उर्भ चंदू की हुई थी। चंद्रशेखर उर्फ चंदू जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय छात्र संघ के अध्यक्ष थे। इनकी हत्या भी उन्हीं ताकतों ने की थी जिसने जगदेव प्रसाद की की थी। यह महज संयोग नहीं है कि दोनों ही एक ही समुदाय से आते हैं। बल्कि सच यह है कि इस समुदाय और समाज ने सामाजिक न्याय के लिए अपनी अनेको कुर्बानियाँ दी है। जगदेव बाबू का व्यक्तित्व बहुत विशाल था, उनके बारे में एक लेख में सब कुछ कहना असंभव है। एक मोटी ग्रंथ लिखना पड़ेगा और हो सकता है वह भी कम पड़ जाये। इसलिए इस लेख में मैं शिक्षा पर उनके विचारों के एक अंश पर विचार कर उसे उद्धृत करना चाहूँगा। शिक्षा पर उनका विचार, सबकी भागीदारी पर था। उनका कहना था शिक्षा पर सबको बराबर का अधिकार है। चाहे वह स्टूडेंट्स के रूप में हो या शिक्षक के रूप में। उनका सपना शिक्षा को सर्वव्यापिकरन और लोकतान्त्रिकीकरण करना था। यह अकारण नहीं था कि जब राष्ट्रमाता सावित्रीबाई फुले स्कूल पढ़ाने जाती थी तब द्विज/ सवर्ण समाज उनपर गोंबर और कीचड़ फेकता था। यह अकारण नहीं है कि जब अंग्रेजो ने शिक्षा का सार्वभौमिक (Universalization of Education) करने की कोशिश की तब द्विज/ सवर्ण समाज उसका विरोंध किया। आधुनिक भारत के निर्माता डा अंबेडकर ने कहा था “भारत एक राष्ट्र नहीं है राष्ट्र बनने की और अग्रसर है”। उनके इस कथन को आज भी सच देखते हुए मुझे ख़ुशी नहीं हुई। बेहतर होता कि उनका यह कथन उनके जीवन काल में ही अप्रासंगिक और झूठा हो जाता। एक स्वतः उठाने वाला स्वाभाविक सवाल है कि सवर्णों की राष्ट्रीयता क्या है? उनकी राष्ट्रीयता को स्वर्ण जातीय वर्चश्व के रूप में समझ सकते हैं। उनकी मनुस्मृति भी यही कहता है। उनके हिंदू शास्त्र और धर्म-शास्त्र भी यही कहते हैं। इन्हीं परिस्थितियों में भारत लेलिन जगदेव प्रसाद कहते हैं “राष्ट्रीयता और देशभक्ति का पहला तकाजा है कि कल का भारत नब्बे प्रतिशत शोषितों का भारत बन जाये। उनकी यह माँग सिर्फ सरकारी नौकरियों तक ही सिमित नहीं था। उनकी माँग थी “सामाजिक न्याय, स्वतंत्रता और निष्पक्ष प्रसाशन के लिए सरकारी, अर्द्ध सरकारी और गैर-सरकारी नौकरियों में कम-से-कम 90 सैकड़ा जगह शोषितों के लिए सुरक्षित कर दी जाये।” जगदेव प्रसाद एक दूरदृष्टा थे – जो वो आज से लगभग 50 साल पहले कह रहे थे, और उस पर अमल कर रहे थे उसे आज के सामाजिक न्याय के ठेकेदार ने आजतक नहीं समझ सका या करना नहीं चाहता। बाबा साहेब डॉ भीमराव अंबेडकर का कहना सही था कि भारत एक राष्ट्र न होकर कई राष्ट्र है। भारत की एक राष्ट्रीयता इसकी दूसरी राष्ट्रीयता को हेय दृष्टि से देखता है, नीची नज़रों से देखता है, उसे दुसरे दर्जे का नागरिक समझता है, या उसे नागरिक ही नहीं समझता है। उसे इन्सान ही मानने को तैयार नहीं है। जगदेव प्रसाद ने उनकी इन्हीं राष्ट्रीयता की चुनौती दी थी। जगदेव प्रसाद भारत के पहले नेता थे जिन्हें सवर्णों/ सामंतों ने भाषण देते समय गोली मार दी थी। लेकिन मौलिक सवाल यह है कि सवर्णवादी वर्चश्व को कैसे चुनौती दिया जाये? समाज के गौतम बुद्धा, राष्ट्रमाता सावित्रीबाई फुले, राष्ट्रमाता ज्योतिबा फुले सभी शिक्षा पर बल देते हैं। बाबा साहेब डॉ भीमराव अंबेडकर ने भी शिक्षा को सामाजिक परिवर्थान को सर्वोपरी माना है। शिक्षा सिर्फ पढ़ने-लिखने की काबिलियत नहीं देता बल्कि वह सोचने-समझने की क्षमता भी बढ़ता है। वह समाज को नए दृष्टि से देखता है। समाज के वास्तविक समस्यायों को समझता है और उसे उसके समाधान भी सुझाता है। आज सिर्फ हमारे समाज ही नहीं बल्कि पूरा पिछड़ा-वंचित-शोषित समाज की ही असली समस्या है कि उनके पास चिंतक की कमी है। और जो है उसे यह समाज अपने पिछड़ेपन की वजह से नहीं पहचान पाटा और इसलिए उसे तवज्जो नहीं देता। इसका मूल कारन एक ही है – शिक्षा से वंचित होना। और वंचित करने वाला इस देश का ब्राह्मण और सवर्ण समाज है। आजादी के लगभग 70 साल के बाद भी हम इस बात की लड़ाई लड़ रहें हैं कि न सिर्फ अपने कौम के लोग बल्कि भारत के समस्त पिछड़े-वंचित-शोषित समाज के लोगों की भागीदारी नहीं है। यह भागीदारी दो स्तरों पर नहीं है। पहला स्टूडेंट्स के रूप में और दूसरा शिक्षक के रूप में। भागीदारी की कमी प्राथमिक से लेकर विश्विद्यालय स्तर तक है। भारत में मई-जून 2016 में बौद्धिक वर्गों के बीच यह चर्चा का विषय रहा कि विश्विद्यालयो के एसोसिएट और प्रोफेसर पदों पर अन्य पिछड़ा वर्ग के लिए प्रतिनिधित्व/आरक्षण नहीं है। यूपीए सरकार भारत में 2006 में अर्जुन सिंह ने उच्च शिक्षा में अन्य पिछड़े वर्गों के स्टूडेंट्स और शिक्षक को क्रमशः एडमिशन और पद पर प्रतिनिधित्व / आरक्षण दिया। जिस चीज को सत्ताधारी जातिवादी नेता आज समझ रहे हैं उसे भारत लेनिन जगदेव प्रसाद आज लगभग 50 वर्ष पहले ही समझ रहें थे। इसी क्रम में यह बताना जरुरी है कि जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय छात्र संघ के अध्यक्ष चंद्रशेखर उर्फ़ चंदू भी शिक्षा के महत्त्व को समझते थे। इसलिए उन्होंने जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में सभी वंचित-शोषित-पिछड़े समाजों के प्रतिनिधत्व के लिए लड़ाई लड़े और प्रशासन को अपनी बात मनवाने पर मजबूर कर दिया। यह चंद्रशेखर उर्फ़ चंदू का ही प्रयास था जिसके कारन आज जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय पूरे दुनिया में अपनी शोध-गुणवत्ता-सामाजिक आन्दोलनों-प्रतिबद्धताओं के लिए जाना जाता है। भारत के दोनों महान हस्ती भारत लेनिन जगदेव प्रसाद और क्रांतिकारी चंद्रशेखर उर्फ़ चंदू कहते थे कि शिक्षा पर जातीय वर्चस्व टूटना चाहिए। समाज को बदलने के लिए शिक्षा और बौद्धिक लोकतंत्र जरुरी है। दोनों ने इसके लिए लड़ाईयाँ लड़ी कुछ हद तक जीत दर्ज किया और अंततः समाज के लिए अपनी सहादत दी। भारत के दोनों सितारों के सहादत को हम इस संकल्प के साथ नमन करें कि हमें उनके सपनों को साकार करना है। दोनों हमारे समाज के लिए गर्व का विषय हैं तो हमारा कर्तव्य है कि उनके द्वारा जलाया गया दीया की किरण समाज में फैलाती ही जाये। हमें इस पर गर्भ होना चाहिए कि हमारे समाज के सभी महान व्यक्तित्वों ने जो कुछ भी किया पूरे समाज के लिए किया। यह हमारी पहचान और प्रेरणा स्रोत दोनों है।

Anil Kumar, PhD, Student of Social Sciences, JNU, Delhi

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