ट्राइबल सब प्लान : आदिवासियों के विकास हेतु आवंटित राशि उनके विनाश के लिए ख़र्च कर रही है मोदी सरकार

मूकनायक मीडिया ब्यूरो | सितंबर 05, 2020 | जयपुर-दिल्ली : मोदी सरकार के दावे और उनकी ज़मीनी हक़ीक़त किसी से छुपी नहीं है। उनकी कथनी-करनी में जमीन-आसमान की दूरी से भी बड़ा फर्क है। पर, भोला-भाला आदिवासी समाज नि:सहाय है और कुछ करने की स्थितियों में भी नहीं क्योंकि उनके नेता संसद और विधान सभाओं में मौन हैं। ट्राइबल सब प्लान, एक ऐसा फंड है, जिसका इस्तेमाल खनन प्रभावित आदिवासी क्षेत्रों और आदिवासी समुदायों के लिए किया जाना था, हालांकि आरटीआई से मिले जवाब बताते हैं कि इस राशि को खनन कंपनियों को बांटकर उनके विनाश की ज़मीन तैयार की जा रही है। भारत सरकार द्वारा अपनाई गयी एक योजना है, ट्राइबल सब प्लान। यह एक ऐसा फंड है, जिसका इस्तेमाल खनन प्रभावित आदिवासी क्षेत्रों और आदिवासी समुदायों के लिए किया जाना था। सभी मंत्रालयों को अपने बजट का एक खास हिस्सा ट्राइबल सब प्लान में देना होता है। इस तरह पिछले कुछ सालों में इस फंड में सैकड़ों करोड़ रुपये जमा भी हुए, लेकिन वो पैसा कहाँ खर्च हुआ? एक लाइन में कहें तो आदिवासियों के विकास के लिए आया पैसा उनके विनाश की जमीन तैयार करने में खर्च कर दिया गया। आमतौर पर देश के आदिवासी क्षेत्रों में ही खनन के काम सर्वाधिक होते हैं। चाहे कोयला खनन की बात हो या किसी अन्य खनिज की। भारत सरकार खनन से होने वाली समस्याओं और इसकी वजह से विस्थापित होने वाले आदिवासी समुदाय की सहायता के लिए ट्राइबल सब प्लान नाम से ये योजना बनाई थी। ट्राइबल सब प्लान यानी टीएसपी को अब (योजना आयोग के भंग होने और नीति आयोग के बनने के बाद) शेड्यूल्ड ट्राइब कम्पोनेंट [Schedule Tribe Component] के नाम से जाना जाता है। और अब यह प्लान से अवयव मात्र बन चुका है, एक ऐसा अवयव जो न कहीं दिखता है और न किसी काम में आता है। मूकनायक मीडिया ने आरटीआई के जरिए विभिन्न मंत्रालयों से यह जानने की कोशिश की कि आखिर इस योजना के पैसों का कहाँ और किस तरह से इस्तेमाल किया गया। प्राप्त सूचना से पता चला कि कैसे आदिवासियों के विकास के लिए आवंटित पैसे का इस्तेमाल ‘अन्य कामों’ में किया गया। ये ‘अन्य काम’ भी इस तरह के हैं, जिससे आगे चल कर एक बार फिर से आदिवासियों का विस्थापन ही होगा या उन्हें अन्य समस्याओं से जूझना पड़ेगा। सबसे पहले तो यह जानना जरूरी है कि ट्राइबल सब प्लान का मकसद क्या है? योजना आयोग ने यह स्पष्ट रूप से बताया है कि ट्राइबल सब प्लान के तहत आवंटित पैसे का इस्तेमाल आदिवासियों (अनुसूचित जनजाति) के समग्र विकास के लिए करना है। इस पैसे से ऐसी योजनाएँ बनाई जानी चाहिए, जिनसे आदिवासी समुदाय को सीधे तौर पर फायदा हो। इसके लिए योजना आयोग ने कोयला मंत्रालय के लिए ट्राइबल सब प्लान के तहत बजट का 8.2 फीसदी और खान मंत्रालय के लिए चार फीसदी राशि तय किया था। जाहिर है, दोनों मंत्रालय ने हर वित्तीय वर्ष में इस प्लान के तहत तय राशि जमा भी कराया लेकिन इसका इस्तेमाल कहाँ हुआ? क्या इन पैसों का इस्तेमाल सचमुच आदिवासी समुदायों के विकास के लिए हुआ? 2014-18 के बीच दोनों मंत्रालय ने इस मद में कितना पैसा आवंटित किया, कितना पैसा खर्च किया और किस काम में खर्च किया? आरटीआई से मिले जवाब से जो सच हमारे सामने आता है, वो चौंकाने वाला है। ये जवाब बताते हैं कि कैसे टीएसपी फंड को ऐसे कामों में लगाया गया, जो आदिवासियों के विकास की जगह उल्टे उनके विनाश का कारण बनेंगे। खुद कोयला मंत्रालय और खान मंत्रालय के आकड़े बताते हैं कि ट्राइबल सब प्लान का पैसा उन कामों के लिए इस्तेमाल हो रहा है, जो किसी भी कीमत पर आदिवासी विकास से जुड़े काम नहीं माने जा सकते हैं। इनपुट ‘द वायर’ हिंदी : साभार

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