नजरिया : आरएसएस आदिवासियों को वनवासी क्यों कहती है? आदिवासी हिंदू क्यों नहीं हैं ?

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मूकनायक मीडिया ब्यूरो | 01 सितंबर 2022 | जयपुर-दिल्ली : यह सवाल देश और खुद आदिवासियों तक को लगातार परेशान किए है। इसका समाधानकारक उत्तर मिल नहीं रहा। जानबूझकर और नादानी से भी उलझनें पैदा की जाती हैं। मामला कब तक हल होगा, साफ नहीं है। अंग्रेजी हुकूमत के वक्त 1891 की जनसंख्या गणना में आदिवासियों के लिए कॉलम था ‘फॉरेस्ट ट्राइब।’ 1901 में उसे लिखा गया ‘एनीमिस्ट‘ या प्रकृतिवादी। 1911 में लिखा गया ‘ट्राइबल एनीमिस्ट।’ 1921 में लिखा गया ‘हिल ऐंड फॉरेस्ट ट्राइब।’ 1931 में लिखा गया ‘प्रिमिटिव ट्राइब।’ 1941 में लिखा गया ‘ट्राइब्स।’ आज़ादी के बाद 1951 की मर्दुमशुमारी में आदिवासी आबादी वाला कॉलम हटा दिया गया।

केंद्रीय जनजातीय कार्य मंत्रालय के मुताबिक देश के 30 राज्यों में कुल 705 जनजातियाँ रहती हैं। देश के सभी आदिवासी एकजुट हैं कि 2021 में होने वाली जनगणना से पहले उन्हें सातवें नंबर के कॉलम में अलग धर्म कोड मिलना चाहिए। धर्म कोड विकल्प नहीं होने पर उन्हें हिंदू धर्म चुनने कहा जाता है। आदिवासी रिसर्जेंस के फाउंडर एडिटर और स्वतंत्र शोधकर्ता आकाश पोयाम कहते हैं –

‘ब्रिटिश दौर में हुई जनगणना में आदिवासियों को ‘एनिमिस्ट’ (Animism — जीववाद) की श्रेणी में रखा गया था। आरएसएस एक षड्यंत्र के तहत आदिवासियों को वनवासी कहता है, क्योंकि यदि आरएसएस आदिवासियों को आदिवासी मानने लगा तो उनके छद्म राष्ट्रवाद की पोल खुल जायेगी और इन्हें आदिवासी कहने से उन्हें स्वयं को आर्य और आदिवासियों को अनार्य (मूलवासी) मानने की बाध्यता खड़ी हो जायेगी। यही वजह है कि आरएसएस आदिवासी  मानने को कतई तैयार नहीं हैं।दूसरी वजह से हिंदुओं की आबादी में कुछ प्रतिशत की बढ़ोतरी हो गयी और वोट बैंक में भी। कई आदिवासी भी खुद को हिंदू बताने लगे हैं क्योंकि उनसे 1950 से लगातार यही कहा जाता रहा है कि हिंदू हो, इस वजह से आज की पीढ़ियाँ खुद को हिंदू मानने लगी हैं जबकि उनके रीति रिवाजों का हिंदू धर्म से कोई रिश्ता नाता नहीं है।

आदिवासी अकादेमिक वर्जीनियस खाखा मानते हैं कि जनजातियों को हिंदू नहीं कहा जा सकता। उनका तर्क है जनजातियाँ प्राकृतिक धर्म मानती थी। भले ही उसके कुछ तत्व हिंदू धर्म के तत्वों के सामंजस्य में या समानान्तर भी लगें। उनका कहना है आदिवासियों के कई जनजातीय आचरण और व्यवहार अमेरिका और अफ्रीका की जनजातियों के व्यवहारों से काफी मिलते जुलते हैं।

गोविन्द सदाशिव धुर्वे के विचारों से लाभ उठाते दक्षिणपंथियों ने आदिवासियों को हिंदू धर्म का हिस्सा करार दिया है। खाखा यह आपत्ति भी करते हैं कि गैर-जनजातीय समाजों से तुलना करते हुए आदिवासियों का जातियों के खांचे में ढालकर सामाजिक निर्धारण किया जाता है, वह एक अवैज्ञानिक फाॅर्मूला है।

कई आदिवासी विचारकों ने लगभग एकजुट होकर आदिवासी को हिंदुत्व के छाते के नीचे खड़े करने का विरोध किया है। संविधान सभा में आदिवासी सदस्य जयपाल सिंह मुंडा ने आपत्ति भी की थी। उन्होंने चिढ़कर कहा था कि आदिवासियों को ‘जंगली’ तक कहा जाता है। इसके बरक्स कई लोग उन्हें ‘भूमिपुत्र’ या ‘वनपुत्र’ कहना ज्यादा मुनासिब समझते हैं।

आरएसएस आदिवासियों को वनवासी घोषित करके उनके अस्तितित्व को ही नकारने का प्रयास कर रही है। यह न केवल आदिवासियों बल्कि पूरे देश की विविधता के लिए खतरा है। अतः आदिवासियों को आरएसएस की इस चाल को समझना होगा तथा उनकी अस्मिता को मिटाने के षड्यंत्र को विफल करना होगा।

आरएसएस आदिवासियों को वनवासी क्यों कहती है?
आदि’ यानी प्रारम्भ से। इसलिए ‘आदिवासी’ का मतलब हुआ जो प्रारम्भ से वास करता हो। संघ परिवार को समस्या यहीं है। वह कैसे मान ले कि आदिवासी इस भारत भूमि पर शुरू से रहते आये हैं? मतलब ‘आर्य’ शुरू से यहां नहीं रहते थे? तो सवाल उठेगा कि वह यहां कब से रहने लगे? कहां से आये? बाहर से कहीं आ कर यहां बसे? यानी आदिवासियों को ‘आदिवासी’ कहने से संघ की यह ‘थ्योरी’ ध्वस्त हो जाती है कि आर्य यहां के मूल निवासी थे और ‘वैदिक संस्कृति’ यहां शुरू से थी। और इसलिए ‘हिन्दू राष्ट्र’ की उसकी थ्योरी भी ध्वस्त हो जायेगी क्योंकि इस थ्योरी का आधार ही यही है कि आर्य यहां के मूल निवासी थे, इसलिए यह ‘प्राचीन हिन्दू राष्ट्र’ हैं। इसलिए जिन्हें हम ‘आदिवासी’ कहते हैं, संघ उन्हें ‘वनवासी’ कहता है यानी जो वन में रहता हो। ताकि इस सवाल की गुंजाइश ही न बचे कि शुरू से यहां की धरती पर कौन रहता था। है न गहरे मतलब की बात।

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