जदुनाथ सिन्हा राधाकृष्णन विवाद : अपने स्टूडेंट जदुनाथ सिन्हा की थीसिस चोरी के गुनाहगार राधाकृष्णन, श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने आउट ऑफ कोर्ट सेटेलमेंट कराया

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मूकनायक मीडिया ब्यूरो I 5 सितंबर 2022 I जयपुर-कोलकाता : देश के दूसरे राष्ट्रपति और जाने-माने दार्शनिक डॉ सर्वपल्ली राधाकृष्णन को लेकर विवाद उनकी प्रसिद्ध किताब ‘भारतीय दर्शन’ के दूसरे भाग से जुड़ा है सर्वपल्ली राधाकृष्णन के स्टूडेंट जदुनाथ सिन्हा ने अपनी पीएचडी थीसिस जमा की लेकिन राधाकृष्णन ने उसे चुराकर अपने नाम से किताब छपवा ली। जदुनाथ 1929 में कोर्ट पहुँच गये, कोर्ट में राधाकृष्णन की चोरी पकड़ी गयी। श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने आउट ऑफ कोर्ट सेटेलमेंट कराया।

राधाकृष्णन का जन्म 5 सितंबर 1818 में तेलुगू भाषी नियोगी ब्राह्मण परिवार में हुआ, सर्वपल्ली की उपाधि उन्हें उनके पूर्वजों से मिली। उनके पूर्वज आंध्र प्रदेश के नेल्लोर जिले से 15 मील दूर सर्वपल्ली गांव में रहते थे। वहीं जदुनाथ सिन्हा एक प्रतिष्ठित दर्शनशास्त्री और लेखक थे। उनका जन्म 24 अक्टूबर 1892 को पश्चिम बंगाल के कुरुमग्राम में हुआ था। उन्होंने दर्शनशास्त्र से बीए और एमए की डिग्री प्राप्त की थी। उनके बेटे प्रोफ़ेसर अजीत कुमार सिन्हा (रिटायर्ड) के मुताबिक़ जदुनाथ के शिक्षक उनकी काफ़ी प्रशंसा करते थे।

कलकत्ता विश्वविद्यालय से ग्रेजुएशन करते समय उन्हें फ़िलिप सैम्युल स्मिथ पुरस्कार और क्लिंट मेमोरियल पुरस्कार भी मिले थे। वे कलकत्ता के रिपोन कॉलेज में सहायक प्रोफ़ेसर के पद पर नियुक्त हुए। तब तक उन्होंने एमए की डिग्री नहीं ली थी। आगे चल कर उन्होंने पीएचडी के लिए अपनी थीसिस ‘इंडियन साइकोलॉजी ऑफ़ परसेप्शन’ विश्वविद्यालय में जमा करायी थी। उसी के लिए 1922 में उन्हें प्रेमचंद रायचंद छात्रवृत्ति दी गयी थी।

सर्वपल्ली राधाकृष्णन को दर्शन के क्षेत्र में प्रसिद्धि 1923 में प्रकाशित उनकी पुस्तक ‘भारतीय दर्शन’ से मिली। इसी किताब पर साहित्यिक चोरी का इल्जाम भी लगा। उस वक्त राधाकृष्णन कलकत्ता विश्वविद्यालय में प्रोफेसर थे। शोध-छात्र जदुनाथ सिन्हा ने उनके ऊपर साहित्यिक चोरी का आरोप लगाया। मामला यह था कि जदुनाथ सिन्हा ने पीएचडी डिग्री के लिए ‘भारतीय दर्शन’ नामक अपने शोध को 1921 में तीन परीक्षकों क्रमशः डॉ. राधाकृष्णन, डॉ. ब्रजेंद्रनाथ सील व डॉ. बी एन सील के समक्ष प्रस्तुत किया। वे अपनी पीएचडी डिग्री की प्रतीक्षा करने लगे। जदुनाथ सिन्हा ने बारी-बारी से तीनों परीक्षकों से संपर्क कर डिग्री रिवार्ड किये जाने पर विलंब होने की वजह जाननी चाही।

डॉ. ब्रजेंद्रनाथ सील व डॉ. बी एन सील ने कहा कि धैर्य रखो राधाकृष्णन  उसके परीक्षण में व्यस्त हैं। तुम्हारा शोध वृहद् है। दो भागों में तकरीबन 2000 पृष्ठों का होने की वजह से समय लग रहा है। इसी बीच डॉ. राधाकृष्णन ने आनन-फानन में लंदन से इस पीएचडी को पुस्तक के रूप में अपने नाम से प्रकाशित करा लिया और पुस्तक छपते ही जदुनाथ सिन्हा को पीएचडी की डिग्री भी उपलब्ध करा दी। पुस्तक जैसे ही बाजार में आयी, जदुनाथ सिन्हा को साँप सूंघ गया और वह अपने को ठगा महसूस करने लगे। राधाकृष्णन की किताब उनकी पीएचडी की हूबहू कॉपी थी।

जदुनाथ सिन्हा भी हार मानने वालों में नहीं थे। न्यायालय का दरवाज़ा खटखटाकर राधाकृष्णन कृष्ण पर 20000 रूपए का दावा ठोक दिया। इसके बदले में  राधाकृष्णन ने भी जदुनाथ पर एक लाख का मानहानि का दावा कर दिया। डॉ. ब्रजेन्द्रनाथ सील राधाकृष्णन की ताकत और प्रभाव से परिचित थे। वे उनके खिलाफ खड़े होने का साहस नहीं जुटा पाये। परंतु जैसे ही जदुनाथ सिन्हा ने डॉ. बी एन सील के यहां 1921 में प्रस्तुत की गयी अपने शोध की प्राप्ति रसीद न्यायालय में प्रस्तुत किया। सच्चाई सामने आ जायेगी यह सोच कर राधाकृष्णन घबड़ा गये। विश्वविद्यालय के कुलपति डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने दोनों लोगों के बीच मध्यस्थता किया और न्यायालय से बाहर समझौता कराया। राधाकृष्णन ने जदुनाथ सिन्हा को 10000 रूपए देकर समझौता किया ।

राधाकृष्णन ने 1921 में जब मैसूर से आकर कलकत्ता विश्वविद्यालय में कार्यभार संभाला तभी से उनके ज्ञान व प्रतिभा पर उंगलियाँ उठने लगी थी। उनकी प्रतिगामी सोच छात्रों को पसंद नहीं आती थी। अंग्रेजी और बांग्ला भाषाओं पर इनकी ढीली पकड़ के चलते उन्हें छात्र – छात्राओं के बीच शर्मिंदा होना पड़ता था। जिस व्यक्ति की सबसे प्रसिद्ध किताब पर ही साहित्यिक चोरी का आरोप लगा हो और यह आरोप साबित भी हुआ हो, उस व्यक्ति के नाम पर शिक्षक दिवस मनाने का औचित्य क्या है? जहां तक उनकी दार्शनिकता का प्रश्न है, डॉ. आंबेडकर ने अपनी किताब जाति के विनाश में राधाकृष्णन के दार्शनिक तर्कों के औचित्य पर गंभीर प्रश्न उठाया है।

1920 के दशक में कोलकाता (जो तब कलकत्ता था) में ‘मॉडर्न रिव्यू’ नामक एक मासिक पत्रिका प्रकाशित होती थी। जनवरी 1929 के उसके प्रकाशन में जदुनाथ सिन्हा नाम के एक छात्र ने सनसनीख़ेज़ दावा किया। उन्होंने लिखा कि सर्वपल्ली राधाकृष्णन ने ‘साहित्यिक चोरी’ करते हुए उनकी थीसिस के प्रमुख हिस्से अपने बताकर प्रकाशित करवा लिये। उन्होंने आरोप लगाया कि राधाकृष्णन की किताब ‘भारतीय दर्शन – 2’ में उनकी थीसिस का इस्तेमाल किया गया है। फिर फ़रवरी, मार्च और अप्रैल के संस्करण में जदुनाथ ने अपने दावे के समर्थन में कई साक्ष्य पेश किये जिससे यह विवाद ज़्यादा बढ़ गया।

जदुनाथ सिन्हा का दावा

जदुनाथ ने अपनी बाक़ी की थीसिस 1925 तक जमा कराई थीं। जिन प्रोफ़सरों ने उनकी थीसिस देखीं उनमें डॉ राधाकृष्णन के अलावा दो अन्य प्रोफ़ेसर (बीएन सील और कृष्णचंद्र भट्टाचार्य) शामिल थे। अपनी थीसिस के लिए जदुनाथ को विश्वविद्यालय ने माउंट मेडल से सम्मानित किया था। लेकिन जदुनाथ की ये थीसिस पास होने में दो साल की देरी हुई थी। उससे पहले ही प्रोफ़ेसर राधाकृष्णन की किताब ‘भारतीय दर्शन’ नाम से प्रकाशित करवा ली थी।

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