ब्राह्मणों की नैतिकता सदैव शक्ति आधारित रही है,न्याय जैसी अवधारणा से उनका दूर-दूर तक वास्ता नहीं

मूकनायक मीडिया ब्यूरो || सितंबर 20, 2020 || जयपुर : प्रथम राष्ट्रपिता महात्मा जोतिबा फुले मानते थे कि ब्राह्मणों की नैतिकता मुख्य रूप से शक्ति पर आधारित रही है। न्याय जैसी अवधारणा से उनका दूर दूर तक का वास्ता नहीं था। इसलिए अंग्रेजों तक को मानना पड़ा कि ब्राह्मणों में न्यायिक चरित्र नहीं होता है और अंग्रेजों ने उन्हें समग्र न्याय-व्यवस्था से बाहर का रास्ता दिखाया था। आरएसएस ना केवल आरक्षण नीति के खिलाफ है, बल्कि वो समाज में फैली वर्ण व्यवस्था का भी पक्षधर है।

vO 300x242 ब्राह्मणों की नैतिकता सदैव शक्ति आधारित रही है,न्याय जैसी अवधारणा से उनका दूर दूर तक वास्ता नहींआरएसएस के दूसरे सरसंघचालक माधव सदाशिव गोलवलकर, जो तीन दशकों तक बतौर आरएसएस प्रमुख रहे, खुलकर आरक्षण का विरोध करते नज़र आये। केवल यही नहीं, अपनी किताब में गोलवलकर ने महिलाओं के समानाधिकार की माँग पर टिप्पणी करते हुए लिखा था कि उच्च पदों पर जाति, धर्म, भाषा के अलावा अब लिंग के आधार पर भी आरक्षण दिया जायेगा। गोलवलकर ने अपनी किताब में लिखा कि आजकल लोग समाज में बनी वर्ण व्यवस्था को जातिवाद से जोड़कर देखते हैं।

सामाजिक व्यवस्था को सामाजिक भेदभाव के रूप में देखा जाने लगा है। साफ़ है कि गोलवलकर वर्ण व्यवस्था के पक्षधर थे और वो हिंदू समाज में समानता लाने के पक्ष में नहीं थे। वर्ण व्यवस्था का पक्षधर होने का कारण ये भी था कि आरएसएस समाज में ऊँची जाति के दबदबे को कायम रहने देना चाहता था। जातिप्रथा केवल हिंदू धर्म में है। इस व्यवस्था में किसी व्यक्ति का सामाजिक दर्जा और उसका पेशा उसके जन्म से निर्धारित होता है। कोई व्यक्ति जिस जाति में जन्म लेता है, उसी में मरता है।

नीची जातियों में जन्में व्यक्तियों के साथ अन्याय और भेदभाव होता है। किसी व्यक्ति की योग्यता या उसकी पसंद का कोई महत्व नहीं है। यही कारण है कि रोहित वैमूला ने सुसाईड नोट में अपने जन्म को ‘‘प्राणघातक दुर्घटना‘‘ बताया था। पुराने समय में दलित की परछाई भी अपवित्र समझी जाती थी। वे सभी अधिकारों से वंचित थे। आरएसएस, यथास्थितिवाद का हामी है जिसमें विशेषाधिकार प्राप्त जातियाँ और पुरूष समाज पर हावी बने रहेंगे। संघ का भारत हमारे देश के स्वाधीनता संग्राम सैनानियों के सपनों के भारत से बहुत भिन्न है।

हिंदुत्व की विचारधारा – जो आरएसएस के रग-रग में समाई हुई है-एक ऐसे समाज का निर्माण करना चाहती है, जिसमें पदक्रम और भेदभाव का बोलबाला हो। अगर आरएसएस को आज दलित मुद्दे पर ध्यान केन्द्रित करना पड़ रहा है तो उसका कारण यह है कि डॉ बी आर अम्बेडकर और अन्यों के अभियान के कारण, दलितों में उनके अधिकारों के प्रति चेतना बढ़ी है और वे सामाजिक और राजनैतिक स्तर पर अपने हकों के लिए लड़ रहे हैं। आरएसएस, हिंदू धर्म और हिंदुओं का प्रतिनिधि होने का दावा करता है।

दलितों के मामले में संघ समरसता की बात करता है, समानता की नहीं। समरसता का मतलब है जो जैसा है वह वैसा ही बना रहे, दलित, दलित और ब्राह्मण, ब्राह्मण। वह चाहता है कि हर जाति की अलग-अलग पहचान बनी रहे और उच्च जातियों के विशेषाधिकार सुरक्षित रहें। उसे दलितों से तब तक समस्या नहीं है जब तक वे अधिकार और समानता नहीं माँगते। ऐसा क्यों है, इसे हम अम्बेडकर के इस निष्कर्ष से समझ सकते हैं कि जाति की असली जड़ें दरअसल धर्म अर्थात हिंदू धर्म में हैं।

अतः अगर वह दलितों को सचमुच गले लगाएगा और समान दर्जा देगा तो उसे यह स्वीकार करना होगा कि इस भेदभाव की जड़ में हिंदू धर्म है। ऐसा करना आरएसएस के लिए आत्मघाती होगा और उसके अस्तित्व पर ही प्रश्नचिन्ह लगा देगा। क्या आरएसएस के समरसता के आंदोलन से दलितों की स्थिति में कोई परिवर्तन आएगा? उत्तर है नहीं। आरएसएस खुलकर जाति व्यवस्था का समर्थन करता आया है। यहाँ तक कि उसने यह दावा भी किया है कि जाति व्यवस्था, भारत के ‘‘गौरवपूर्ण‘‘ अतीत का भाग है।

आरएसएस के सबसे बड़े चिंतक एम एस गोलवलकर ने अपनी पुस्तक ‘‘बंच ऑफ थाट्स‘‘ में बिना किसी लागलपेट के जाति व्यवस्था को औचित्यपूर्ण ठहराया है। ‘‘ऐसे कोई प्रमाण नहीं हैं जिनसे यह जाहिर होता हो कि यह (जाति व्यवस्था) कभी भी हमारे सामाजिक विकास में बाधक बनी हो। वास्तविकता तो यह है कि जाति व्यवस्था ने हमारे समाज की एकता बनाये रखने में मदद की है।” (बंच ऑफ थाट्स, पृष्ठ 108) जैसा कि पहले कहा जा चुका है, आरएसएस, अम्बेडकर पर कब्जा करना चाहता है।

संघ हमेशा से कहता आया है कि अम्बेडकर, देश के विभाजन के पक्ष में थे और द्विराष्ट्र सिंद्धात में विश्वास रखते थे क्योंकि वे मुसलमानों को विश्वसनीय नहीं मानते थे। यह सब आरएसएस का फैलाया मनगढ़ंत झूठ है। भारतीय मुसलमानों पर अविश्वास करना तो दूर अम्बेडकर अपनी पुस्तक ‘‘पाकिस्तान आर द पार्टिशन ऑफ इंडिया‘‘ में लिखते हैं, ‘‘हिंदू समाज के कई निचले वर्गों की आर्थिक, राजनैतिक और सामाजिक आवश्यकताएँ वही हैं जो अधिकांश मुसलमानों की हैं। और इसलिए, ये दलित, मुसलमानों के साथ कहीं अधिक आसानी से सांझा मोर्चा बना सकते हैं। उनके लिए ऊँची जातियों के हिंदुओं से जुड़ना बहुत कठिन होगा क्योंकि ऊँची जातियों ने ही उन्हें सदियों से मानवाधिकारों से वंचित रखा है‘‘।

यह विडंबना ही है कि ‘आर्गनाईजर‘ ने हाल में अम्बेडकर पर केन्द्रित विशेषांक निकाला। सच तो यह है कि अम्बेडकर, समानता और स्वतंत्रता पर आधारित जिस भारत के निर्माण के हामी थे, वह आरएसएस का भारत नहीं है। समानता पर आधारित भारत के निर्माण के लिए ही संविधान में आरक्षण की व्यवस्था की गयी थी। क्या हम यह भूल सकते हैं कि मंडल आयोग की सिफारिशें लागू होने के ठीक बाद, आडवाणी के नेतृत्व में भाजपा ने रामजन्मभूमि आंदोलन शुरू किया जिसका लक्ष्य साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण था?

आरएसएस समर्थकों ने मंडल आयोग के विरोध में रैलियाँ निकालीं और कई स्थानों पर संघ के उकसावे पर विद्यार्थियों ने आत्मदाह का प्रयास किया। शिक्षा के मामले में आरएसएस, हमेशा से इतिहास का पुनर्लेखन करना चाहता है। आरएसएस के इतिहास में उन लोगों के लिए कोई जगह नहीं है जिनके विचार उसके एजेंडे से मेल नहीं खाते। NCRB रिपोर्ट BJP शासित राज्यों में दलितों पर हुए सबसे ज्यादा अत्याचार, 10 साल में बढ़े 66 फीसदी मामले 67 साल पहले 1950 में जब हमने संवैधानिक गणतंत्र को अपनाया था तब सामाजिक, आर्थिक, राजनैतिक, शैक्षणिक और धार्मिक रूप से बहिष्कृत जाति के लोगों को मौलिक और कुछ विशेष अधिकार मिले थे।

मौलिक अधिकारों के अलावा ये विशेष अधिकार संविधान ने उन्हें दिए थे। संविधान की धारा 330, 332 और 244 के मुताबिक़ उन्हें राज्य, देश और स्थानीय निकायों में प्रतिनिधित्व का अधिकार दिया गया। धारा 335 के तहत उन्हें सरकार और सार्वजनिक क्षेत्र की नौकरियों में प्रतिनिधित्व दिया गया। उन्हें शैक्षणिक संस्थानों में दाख़िला लेने में भी छूट दी गयी। हालांकि सामाजिक रूप से प्रताड़ना झेलने के अलावा दलितों को सरकारी संस्थानों में भेदभाव का सामना करना पड़ रहा है। न्यायिक व्यवस्था, नौकरशाही, सरकारी महकमों, उच्च शिक्षण संस्थाओं, उद्योग-धंधों और मीडिया में दलितों की उपस्थित लगभग नहीं के बराबर है।

राजनीतिक दलों में भी दलितों के साथ-साथ भेदभाव होता है और शीर्ष नेतृत्व पर तथा-कथित ऊँची जातियों का दबदबा रहता है। दलितों को अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के तहत रखा जाता है और वो सिर्फ़ आरक्षित सीटों पर सामान्य जाति के वोटरों के रहमो-करम पर ही चुने जाते हैं। जो दलित नेता राजनीति में अपनी ताक़त दिखाने की कोशिश करता है, उसे बाहर का दरवाज़ा दिखा दिया जाता है। वैसे दब्बू दलित नेताओं को तरजीह दी जाती है जो पार्टी के निर्णायक मंडल में नहीं होते हैं।

इन्हें सत्ता में आने के बाद भी राजनीतिक दल अपने मंत्रिमंडल में महत्व नहीं देते हैं। उनके लिए सशक्तिकरण और न्याय से जुड़ा हुआ मंत्रालय एक तरह से तय रहता है। (आप मौजूदा केंद्र सरकार का मंत्रिमंडल भी देख सकते हैं।) हम देख सकते हैं कि कैसे लोकतंत्र का इस्तेमाल दलितों के राजनीतिक संघर्षों को कुचलने के लिए किया जाता है। दलित राजनीतिक पार्टियों को जानबूझ कर दलबदल-विरोधी क़ानून के तहत फँसाया जाता है।

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