पूना पेक्ट के संतानें : दलित-आदिवासी राजनीति का भटकाव और दलालीपूर्ण नेतृत्व

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मूकनायक मीडिया ब्यूरो || सितंबर 20, 2020 || जयपुर : यह सर्वविदित है कि जाति व्यवस्था के कारण दलितों के साथ जातिगत भेदभाव और उत्पीड़न किया जाता है। जाति-विधानों का अनुपालन करना हरेक हिंदू का धार्मिक कर्तव्य है। हिंदू धर्म- शास्त्रों में जाति के विधानों का उल्लंघन दंडनीय अपराध है। इसलिए जब कभी भी दलित-आदिवासी जाति के लोग जाति-विधानों को तोड़ने का साहस दिखाते हैं तो हिंदू धर्म के रक्षक उनका उत्पीड़न करते हैं जिसका मुख्य उद्देश्य दलितों को वर्ण-व्यवस्था में अपना जाति स्थान दिखाना और यथास्थिति को बनाये रखना है, जिसे आरएसएस समरसता कहता है। दरअसल दलित-आदिवासी उत्पीडन केवल घटना नहीं बल्कि उत्पीड़न की विचारधारा है जिसे हिंदू धर्म की स्वीकृति है और आरएसएस इसका संरक्षक है। पूरे देश में दलित-आदिवासी उत्पीड़न का लगातार शिकार होते हैं। दलितों को समानता का जो संवैधानिक अधिकार मिला है, दलित-आदिवासी जब भी उस अधिकार का प्रयोग करने की कोशिश करते हैं तो उन पर अत्याचार होता है। दलितों में जैसे जैसे संवैधानिक अधिकारों के प्रति जागरूकता फ़ैल रही है और वे अधिक मात्रा में अपने अधिकारों का प्रयोग करने लगे हैं वैसे वैसे दलित-आदिवासी उत्पीड़न की घटनाएँ भी बढ़ रही हैं। सरकारी आँकड़े भी यही दर्शाते हैं कि देश में दलितों के विरुद्ध हिंसा की घटनाएँ लगातार बढ़ रही हैं। देश के दलितों ने दलित-आदिवासी उत्पीड़न के विरोध का जो तरीका अपनाया है वह बिलकुल नायाब है। इसने हिंदुओं की गाय के नाम पर चल रही राजनीति और गुंडागर्दी को जबरदस्त चुनौती दी है। अब तक गाय के नाम पर मुसलामानों को निशाना बनाया जा रहा था परंतु दलितों का गाय के नाम पर उत्पीड़न हिंदुओं को बहुत महंगा पड़ा है क्योंकि गाय के नाम पर मुसलामानों को दबाया जा सकता है परंतु दलितों को दबाना उतना आसान नहीं है। देश के दलितों का प्रतिरोध यह भी दर्शाता है कि अब दलित-आदिवासी सवर्णों द्वारा उत्पीड़न को खामोश रह कर सहने वाले नहीं हैं बल्कि अब वे इसका सभी प्रकार से प्रतिरोध करने के लिए तैयार हैं। यह परिघटना स्वागत योग्य है। दरअसल दलित-आदिवासी अभी तक ख़ामोशी का शिकार रहे हैं परंतु देश की परिघटना यह दर्शाती है कि अब वे भी प्रतिकार करने की स्थिति में आ गये हैं। देश में युवा-दलितों का प्रतिरोध स्वत: स्फूर्त है। इसमें कोई भी दलित-आदिवासी राजनेता फ्रंट पर नहीं है। हाँ, कुछ दलित-आदिवासी संगठन ज़रूर सक्रिय हैं। इससे से यह भी परिलक्षित होता है कि दलित-आदिवासी अब राजनेताओं पर निर्भर न रह कर स्वयं जनांदोलन में उतरे हैं। जनगणना में अलग धर्म-कोड की माँग इसका ज्वलंत उदाहरण है। इसका मुख्य कारण यह है कि अधिकतर दलित-आदिवासी नेता केवल जाति के नाम पर राजनीति करते आये हैं। उन्होंने दलित-आदिवासी समस्यायों और दलित-आदिवासी मुद्दों को अपनी राजनीति का आधार नहीं बनाया है। अतः अन्याय के प्रतिरोध में दलितों ने लगभग सभी दलित-आदिवासी राजनेताओं को नज़रंदाज़ किया है। डॉ अंबेडकर ने हिंदू जाति व्यवस्था का विश्लेषण करते हुए कहा है कि यह केवल सामाजिक व्यवस्था ही नहीं है बल्कि आर्थिक व्यवस्था भी है। यह कटु और सुस्पष्ट सत्य है कि हिंदू समाज में पेशों का निर्धारण जाति के आधार पर किया गया है और इनमें बहुत कम गतिशीलता है। यह भी सच्चाई है कि गंदे और कम आमद वाले पेशे दलितों, आदिवासियों और पिछड़ों पर थोपे गये हैं। यह भी विचारणीय है कि दलितों ने यह पेशे स्वेच्छा से नहीं अपनाये होंगे बल्कि उन्हें इन पेशों को करने के लिए बाध्य किया गया होगा। इस संबंध में मनुस्मृति में स्पष्ट विधान किये गये हैं। संविधान के लागू होने के 65 वर्ष बाद भी दलितों के पेशों में बहुत अधिक परिवर्तन नहीं आया है। हाँ, आरक्षण के कारण दलितों की राजनीति, सरकारी सेवाएँ और शिक्षा के क्षेत्र में कुछ हिस्सेदारी हुयी है परंतु वह भी बहुत कम और निम्न स्तर की ही है। परिणामस्वरूप दलितों के जीवन स्तर में बहुत थोडा अंतर आया है। इसका लाभ कुछ पढ़े लिखे नौकरी पेशा और राजनीति में सक्रिय दलितों को ही मिला है। इस का अंदाज़ा गाँव में रहने वाले बहुसंख्यक आदिवासियों और दलितों के जीवन स्तर से लगाया जा सकता है। यह भी देखा गया है कि उत्पादन के संसाधनों जैसे ज़मींन, उद्योग और व्यापार आदि में दलितों और आदिवासियों की भागीदारी में कोई इजाफा नहीं हुयी है। कृषि प्रधान देश होने के कारण भारत की अधिकतर आबादी कृषि से जुड़ी हुयी है। दलितों –आदिवासियों की बहुसंख्या कृषि मजदूर हैं परंतु बहुत कम दलितों के पास बहुत थोड़ी ज़मीन है। इस प्रकार गाँव में दलित-आदिवासी भूमिधारी जातियों पर न केवल रोज़गार के लिए बल्कि नैतिक क्रियाकलापों जैसे शौच तथा जानवरों के लिए घास पट्ठा आदि लाने के लिए भी आश्रित हैं। सामाजिक और आर्थिक जनगणना 2011 से यह उभर कर आया है कि देहात क्षेत्र में 42% लोग भूमिहीन हैं और वे केवल शारीरिक श्रम ही कर सकते हैं। जनगणना ने इन दोनों को इन लोगों की बड़ी कमजोरियाँ होना बताया है। इस श्रेणी में अगर दलितों का प्रतिश्त देखा जाये तो यह 70 से 80 प्रतिश्त हो सकता है। इस प्रकार ग्रामीण दलितों की बहुसंख्या आज भी भूमिधारी जातियों पर आश्रित है। इस पराश्रिता के कारण चाहे मजदूरी का सवाल हो या उत्पीड़न का मामला हो दलित-आदिवासी इन के खिलाफ मजबूती से लड़ नहीं पाते हैं क्योंकि सवर्ण जातियों के पास सामाजिक बहिष्कार एक बहुत बड़ा हथियार है। अतः उत्पादन के संसाधनों के पुनर्वितरण के बिना दलितों की पराश्रिता समाप्त करना संभव नहीं है। इसके लिए भूमिसुधार और भूमिहीनों को भूमि वितरण आज भी उतना ही प्रासंगिक है जितना कि सौ वर्ष पहले था। यह अच्छी बात है कि देश आन्दोलन में भी दलितों को 5 एकड़ भूमि देने की माँग उठायी गयी है। दलितों के विकास में दलित-आदिवासी राजनीति की एक प्रभावशाली भूमिका हो सकती थी। शुरू में डॉ अंबेडकर द्वारा स्थापित रिपब्लिकन पार्टी और जयपाल सिंह मुंडा की पार्टियों ने इसे मजबूती के साथ उठाया भी था। इन्हीं पार्टियों ने भूमि वितरण, न्यूनतम मजदूरी, समान वेतन आदि मुद्दों को लेकर 6 दिसंबर 1964 से “जेल भरो” आन्दोलन भी चलाया था जिस में 3 लाख से अधिक दलित-आदिवासी जेल गये थे और तत्कालीन प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री को यह सभी माँगे माननी पड़ी थीं। इसके बाद ही कांग्रेस सरकार ने भूमिहीन दलितों को भूमि आबंटन शुरू किया था। परंतु इन पार्टियों के विघटन के बाद किसी भी दलित-आदिवासी पार्टी ने इन माँगों को नहीं उठाया जिस कारण एक तो भूमि सुधार सही ढंग से लागू नहीं किये गये, दूसरे सीलिंग से जो ज़मीन उपलब्ध भी हुयी थी उस का आबंटन नहीं हुआ। केवल बंगाल और केरल की कम्युनिस्ट सरकारों को छोड़ कर किसी भी अन्य राज्य में न तो भूमि सुधार सही ढंग से लागू हुए और न ही कोई भूमि आबंटन हुआ। इसी का दुष्परिणाम है कि पूरे देश में 10% लोगों के पास 80% भूमि केद्रित है। दलितों में भूमिहीनता का प्रतिश्त बहुत अधिक है जो उनकी कमज़ोर स्थिति का सबसे बड़ा कारण है। इसी लिए भूमि आबंटन दलितों के सशक्तिकरण की सब से बड़ी आवश्यकता है। इसके लिए भूमि आबंटन दलित-आदिवासी राजनीति का प्रमुख मुद्दा होना चाहिए। दलितों की दूसरी सब से बड़ी कमजोरी उनके पास केवल शारीरिक श्रम का ही होना है। उनके पास तकनीकि योग्यता तथा रोज़गार के अवसरों की कमी है। अतः बेरोज़गारी दलितों की सबसे बड़ी समस्या है। इसके लिए ज़रूरी है कि दलितों को शिक्षा और तकनीकि शिक्षा देकर प्रगति के अवसर उपलब्ध कराए जाएँ परंतु किसी भी सरकार ने इस दिशा में कोई कारगर कदम नहीं उठाये हैं। इधर सरकार द्वारा अपनाई गयी निजीकरण और भूमंडलीकरण की नीति ने आरक्षण के माध्यम से सरकारी उपक्रमों में मिलने वाले रोज़गार के अवसरों को भी कम कर दिया है जिस कारण अन्य वर्गों सहित दलितों में भी बेरोज़गारी निरंतर बढ़ रही है। मोदी सरकार द्वारा रोज़गार पैदा करने के वादे बिलकुल झूठे साबित हुए हैं। अतः रोज़गार को मौलिक अधिकार बनाने की माँग और भी अधिक प्रासंगिक हो गयी है। जब तक ऐसा नहीं किया जाता तब तक सरकारें संसाधनों की कमी का रोना रो कर निजी क्षेत्र का पेट भरती रहेंगी। जैसा सर्वविदित है कि ग्रामीण दलितों का बड़ा हिस्सा छोटे किसानों और कृषि मजदूरों के रूप में खेती से जुड़ा हुआ है। इधर सरकारों की किसान विरोधी नीतियों के कारण खेती घाटे का सौदा हो गया है जिस के कारण बड़ी संख्या में किसान आत्महत्याएँ कर रहे हैं और खेती छोड़ रहे हैं। इसके इलावा सभी सरकारें कृषि भूमि अधिग्रहण करके कृषि भूमि क्षेत्र को कम करने में लगी हुयी हैं। नया कृषि विधेयक इसमें आग में घी डालने का कार्य करेगा, किसानों की स्थितियाँ बाद से बदतर होंगी। खेती की दुर्दशा का कुप्रभाव केवल किसान पर ही नहीं पड़ता बल्कि उससे जुड़े कृषि मजदूरों पर भी पड़ता है जिस में अधिकतर दलित-आदिवासी हैं। अतः दलित-आदिवासी कृषि मजदूरों की दशा सुधारने के लिए कृषि में सरकारी निवेश बढ़ाने, किसान को उपज का उचित मूल्य दिलवाने और मजदूरी की दर बढ़ाने की सखत ज़रुरत है। अब तक की दलित-आदिवासी राजनीति केवल दलितों को सम्मान दिलाने और आरक्षण के नारों को लेकर ही चलती रही है। यह अधिकतर अस्मिता की राजनीति है जिस का दलितों के बुनियादी मुद्दों जैसे भूमि सुधार, भूमि आबंटन, गरीबी उन्मूलन, उत्पीड़न और बेरोज़गारी आदि से कुछ लेना देना नहीं है। दरअसल अस्मिता की राजनीति बहुत आसान राजनीति है क्योंकि इसमें किसी मुद्दे के लिए कोई संघर्ष या जनांदोलन करने की ज़रुरत नहीं पड़ती। केवल अस्मिता से जुड़े कुछ नारों से काम चल जाता है। अतः इस बात की ज़रुरत है कि दलित-आदिवासी मुद्दों जैसे भूमि सुधार, भूमि आबंटन, रोज़गार को मौलिक अधिकार बनाने, कृषि का विकास करने आदि को दलित-आदिवासी राजनीति के केंद्र में लाया जाये। इसके साथ ही दलितों को दलित-आदिवासी नेताओं और दलित-आदिवासी राजनीतिक पार्टियों को भी मजबूर करना होगा कि वे अस्मिता की राजनीति छोड़ कर मुद्दों की राजनीति अपनाएँ और अपना राजनीतिक एजंडा घोषित करें। यह भी देखा गया है राजनीति में दलितों की महत्वपूर्ण भूमिका होने के बावजूद भी दलित-आदिवासी मुद्दे गैर दलित-आदिवासी राजनैतिक पार्टियों के एजंडे में भी कोई स्थान नहीं पाते हैं क्योंकि वे भी आरक्षित सीटों पर दलितों को खड़ा करके जाति के नाम पर वोट माँग कर काम चला लेते हैं। अतः यह ज़रूरी है कि दलितों को केवल जाति के नाम पर वोट न देकर दलित-आदिवासी मुद्दों के आधार पर वोट देनी चाहिए और सभी पार्टियों को दलित-आदिवासी मुद्दों को अपने एजंडे में शामिल करने का दबाव बनाना चाहिए। दरअसल दलित-आदिवासी राजनीतिक पार्टियों को डॉ। अंबेडकर द्वारा स्थापित रिपब्लिकन पार्टी ऑफ़ इंडिया के गठन के समय बनाये गये संविधान और एजेंडा से सीखना होगा। यह सही है कि एक तो वर्तमान में रिपब्लिकन पार्टी इतनी खंडित हो चुकी है कि उसका एकीकरण तो संभव दिखाई नहीं देता है। दूसरे बसपा का प्रयोग भी लगभग असफल हो चुका है। इससे भारत में दलित-आदिवासी राजनीति व्यक्तिवाद, जातिवाद, दिशाहीनता, अवसरवादिता, मुद्दाविहीनता और भ्रष्टाचार का शिकार हो गयी है और अब यह अपने पतन के अंतिम चरण में है। ऐसी दशा में हम लोगों को नए दल की स्थापना की दरकार है जो सही अर्थों में एक प्रगतिशील और धर्मनिरपेक्ष दल है तथा समानता, स्वतंत्रता और बंधुत्व के आधार पर सभी लोगों का उत्थान करना चाहता है और सामाजिक न्याय के मुद्दे पर डॉ अंबेडकर की विचारधारा और आदर्शों का ईमानदारी से अनुसरण कर रहा है। जाति-धर्म की राजनीति न करके दलितों, आदिवासियों के लिए सामाजिक न्याय के साथ साथ अल्पसंख्यकों, किसानों, मजदूरों, महिलाओं और समाज के अन्य कमज़ोर वर्गों के मुद्दों की राजनीति का पक्षधर है और समान विचारधारा वाली धर्मनिरपेक्ष और प्रगतिशील पार्टियों के साथ गठबंधन करने के पक्ष में भी है।

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