वैज्ञानिक-दृष्टिकोण : हवन, सिंदूर, नाक-कान छेदन की दकियानूसी सोच त्यागो, गुलामी की बेड़ियाँ तोड़ो

7 min read

मूकनायक मीडिया ब्यूरो || सितंबर 21, 2020 || जयपुर : डॉ अंबेडकर संपूर्ण वांग्मय खंड 8 पृष्ठ 303-304, खंड 7 पृष्ठ 38 में सात फेरों के रहस्य का खुलासा करते हुए डॉ अंबेडकर लिखते हैं कि आर्यों में एक ऐसा वर्ग था जिन्हें देव कहा जाता था, जो पद और पराक्रम में श्रेष्ठ माने जाते थे। ये देव आर्य स्त्रियों के साथ पूर्वस्वादन को अपना आदेशात्मक अधिकार समझने लगे थे। स्त्री का उस समय तक विवाह नहीं हो सकता था जब तक की वह पूर्व स्वादन के अधिकार से मुक्त नहीं कर दी जाती थी। तकनीक भाषा में इसे अवदान कहते हैं। वधु का भाई कहता था कि यह कन्या (उसकी बहन) अग्नि के माध्यम से आर्यमान को अवदान अर्पित करती है। आर्यमन इस पर अपना अधिकार छोड़ दें और वर के अधिकार को बाधित ना करें। इस अवदान के पश्चात अग्नि की प्रदक्षिणा होती है जो सप्तपदी कहलाती है। इसके पश्चात विवाह संबंध वैध और उत्तम माना जाता है। सप्तपदी इस बात का प्रतीक है कि देव (आर्य) ने कन्या पर से अपना पूर्वाधिकार त्याग दिया है और अवदान से संतुष्ट है। यदि देव वर और कन्या को सात पग चलने देते हैं तो यह समझा जाता था कि देवों को मुआवजा स्वीकार है और उसका अधिकार समाप्त हो गया है और कन्या दूसरों की पत्नी बन सकती है। सप्तपदी प्रत्येक विवाह में आवश्यक थी। यह इस बात का द्योतक है कि ऐसी अनैतिकता देवों और आर्यों में किस हद तक मौजूद थी। इसी दकियानूसी सोच के तहत ब्राह्मणों ने नववधू शुद्धिकरण प्रथा बनायी गयी थी जिसमें सन 1819 से पहले किसी अनार्य की शादी होती थी, तो पाखण्डी उसका शुद्धीकरण करने के लिए नववधू को 3-5 दिन अपने पास (सहवास) रखते थे, उसके उपरांत उसको घर भेजते थे, इस प्रथा को अंग्रेजों ने 1819 में बंद करवाया। सिंदूर का त्याग क्यों नहीं? आर्य ब्राह्मणों ने नववधू शुद्धिकरण प्रथा के तहत नववधू के साथ सहवास के बाद माथे पर सिंदूर लगाकर वर पक्ष को सौंपते थे और कम उम्र (विवाह की उम्र अधिकतम दस वर्ष रखी थी) की बालिकाओं के माथे पर विवाह के प्रतीक चिह्न के रूप में सिंदूर को स्थान दिया। इस प्रकार बाल विवाह प्रथा का जन्म हुआ। जिस युवती के माथे पर सिंदूर लगा है वह विवाहिता है तो वह उसे बिल्कुल स्पर्श नहीं करते थे। आज जब भारत स्वतंत्र हो चुका है, ब्राह्मणी सोच का आतंक कम हुआ है, फिर इस सिंदूर प्रथा का क्या औचित्य? हवन का त्याग क्यों नहीं? खाने-पीने की चीजों को जलाना कहाँ का औचित्य है। यह सभी जानते हैं। राष्ट्रपिता फूले ने 1876 में सत्यशोधक समाज की स्थापना की। सत्यशोधक समाज के माध्यम से ज्योतिराव फूले ने ऐसी विवाह पद्धति का निर्माण किया जिसमें कम से कम समय और पैसे में विवाह संपन्न हो क्योंकि उन्हें इस बात का ज्ञान था कि उनका मूलनिवासी बहुजन समाज गरीबी से लाचार है। साक्षी समाज के लोग अग्नि नहीं, ना मंत्र, ना देववाणी की। यहाँ तो आमजन की भाषा में वर-वधू प्रतिज्ञा पत्र पढ़ते हैं। सत्यशोधक समाज की गतिविधियों के बारे में जब ब्राह्मणों को पता चला तो खलबली मच गयी। ब्राह्मणों ने घोषणा कर दी कि सत्यशोधक समाज धर्म और देशद्रोही (जैसे आज आरएसएस देशद्रोह का प्रमाण-पत्र बाँट रहा है) है। ब्राह्मण वर वधु के माँ-बाप को उनके कुल के नाश का भय दिखाने लगे। क्षत्रियों और उनके गुंडों से धमकियाँ दिलवायी और गुंडों ने चेतावनी दी कि यदि वह विवाह सत्यशोधक समाज के नियम के अनुसार हुआ तो उन्हें पूरे गांव से बहिष्कृत कर दिया जायेगा। पूना के ब्राह्मण पुरोहितों ने चंदा इकट्ठा करके मुकदमा कर दिया। न्यायालय ने अपने निर्णय में कहा कि दूसरी जातियों के लोग ब्राह्मण पुरोहितों के बिना विवाह कर सकते हैं। इस कानूनी निर्णय से महाराष्ट्र को नई धार्मिक दृष्टि मिली और धर्म के नाम पर ब्राह्मणों द्वारा की जा रही लूटपाट बंद होने लगी। विवाह वर-वधू को वैवाहिक प्रमाण पत्र द्वारा संपन्न हो, प्रतिज्ञापन के तुरंत बाद वर-वधू एक दूसरे के गले में फूलों की माला डाल सकते हैं। उपस्थित जनसमूह वर-वधू पर फूलों की वर्षा कर अपनि शुभकामनाएँ दे सकते हैं ,और मंगल कामनाओं के साथ बिना किसी ढोंग और कर्मकांड के शादी संपन्न हो सकती है। इन विदेशी आर्यों द्वारा हमारे मूलनिवासी समाज पर कितने अत्याचार किये हैं और कर रहे हैं ये बात जग जाहिर है और हम लोग जानकर भी अंजान बने हैं । जानिए परंपरा और उनका सच आज से 2000- 2500 BC पूर्व में जब हथियार बंद यूरेशियाई आर्य अरबी घोड़ों पर बैठ कर आये और सैंधव लोगों पर हमला किया था। आर्य अपने साथ अपनी औरतों को नहीं लाये थे। यही कारण है कि डीएनए आधारित शोध-2002 (2010) में इस बात की पुष्टि हुई है । बहुजन बिखराव और सैंधव परिक्षेत्र में हुए जलवायुवीय परिवर्तनों के कारण आर्यों की सत्ता स्थापित हो जाने पर भारत के मूलनिवासियों की ओरतों को जबरदस्ती छीन कर उनके हाथ पैर बाँध कर घोड़े पर बैठ कर पीछे घसीटते हुए ले जाते थे। अगर किसी मूलनिवासी अपनी पत्नी, बहन, बेटी को बचाने की कोशिश करता तो उसे मौत के घाट उतार दिया था। और उसके खून को औरत के सिर पर डाल कर यह अहसास दिलाते कि उसको बचाने वाला अब कोई नहीं रहा। औरत अपने बचाव में खून से लथपथ और जख्मी भी हो जाती थी। बाद में, उसके जख्मों को सुखाने के लिए आर्यों द्वारा हल्दी का इस्तेमाल किया जाता था। औरत या लड़की को अपने वशीभूत करने के लिए उस के कान, नाक, में छेद कर देते थे और गले में एक तरह का निशान बाँध देते थे, ताकि कोई ओर आर्य उसे फिर से ना छीन कर ले जाये। साथ ही, नाक कान में छेद से वह भयातुर हो पीड़ा के कारण औरत या लड़की 20- 25 दिनों तक विरोध न कर पाएँ। हर आर्य बलात उठा कर लायी गयी औरत के बदन (शारीर) पर एक निशान बनाता था, जैसे- किसी कबिले वाले का नाक में छेद , किसी का कान में छेद, किसी का गले में विशिष्ट निशान, या हाथों में विशेष कड़ा या हथकड़ी, या पैरों में विशेष कड़ा। कान और नाक छेद से यह पता चलता था कि ये औरत या लड़की पहले से ही किसी आर्य की सम्पति है तथा उस कबिले की अमानत है। धीरे-धीरे ज्यो -ज्यो कबिले बढ़ते गये तो एक ही औरत के ये दो दो तीन तीन निशान के तौर पर करने लगे। कई सालों की अमानवीय ज्यादतियों और अपनी सुख-शांति के लिए मूलनिवासी ये समझने लगे और यदि कोई आर्य घोड़े पर बैठ कर कोई आर्य किसी औरत या लड़की को ले जाता तो भारतीय लोग रजामंदी से शादी करने लगे। ये उस समय का इतिहास है। और आज भी उन घटनाओं को अवैज्ञानिक और दकियानूसी परंपराओं में बदल दिया गया और प्रथा बन गयी, जिसका बहुत से लोगों को मालूम ही नहीं है, बस भेड़चाल जारी है। अमानवीय ज्यादतियों और अत्याचारों के ये प्रतीक आज भी हम बिना किसी तर्क के ढो रहे हैं। अब खून की जगह मांग सिर में सिंदूर, हाथों में हथकड़ियों की जगह चूड़ियाँ और पैरों में बेड़ियों की जगह कड़े, दुल्हन को मेहंदी की रस्म और लाल साड़ी या लाल कपड़ों का पहनना; मतलब खून से लथपथ शरीर का अहसास, दुल्हन को हल्दी से मलना जख्मों को ठीक करने का अहसास। कान और नाक में आभूषण और गले में तथाकथित मंगल-सूत्र का मतलब ये किसी कि अमानत है। यह सब स्त्री को गुलामी की बेड़ियों में जकड़े रखने के प्रतीक हैं। आज पूरी दुनिया में सिर्फ भारत ही ऐसा देश है जहाँ औरतों या लड़कियों के कान-नाक में छेद हाथों में चूड़ियाँ या कड़े , पैरों में कड़े, मांग में सिंदूर, गले मे मंगलसूत्र पहनाया जाता है। उन्हीं आर्यों और नवब्राह्मणवादी मानसिकताओं की संतानों ने इसे नया रूप दे दिया गया है। और बढ़ चढ़ कर बोलते है कि नाक ,कान छेदने से दिमाग विकसित होता है। फिर ऐसा दिमाग सिर्फ लड़कियों में ही क्यों विकसित किया जाता है, लड़कों में क्यों नहीं? यदि ऐसा होता तो सिर्फ भारत की औरतें ही पूरी दुनिया मेंवैज्ञानिक या विज्ञान के क्षेत्र में आगे होती। आज घोड़े पर बैठ कर तोरण मारना उसी आर्य-प्रथा का एक हिस्सा है। और अधिकतर लोग सिर्फ संस्कारों, रस्मों-रिवाजों और परंपराओं के नाम पर अतार्किकता पूर्ण बिना सोचे-समझे ही आगे बढ़ रहे हैं। कभी किसी भारतीय ने औरतों के साथ हो रहे इस परम्पराओं के नाम पर शारीरिक शोषण को दूर नहीं किया गया, क्योंकि मूलनिवासी भारतीयों की इन परम्पराओं के नाम पर इतना मानसिक गुलाम बना दिया गया है कि वो सोच भी नहीं सके। और आज हम इन पाखंडी आर्यों द्वारा बनाये गये व्यर्थ के अतार्किक रीति-रीवाजों को ढो कर इस मनुवादी व्यवस्था को और मजबूत करने का काम कर रहे हैं । तो आओ खुद जागरूक बने और अपने ही दूसरे भाई-बहनों को जगाये और व्यर्थ के रीति -रीवाजों को त्यागें.!

Facebook
Twitter
LinkedIn
WhatsApp

डॉ अंबेडकर की बुलंद आवाज के दस्तावेज : मूकनायक मीडिया पर आपका स्वागत है। दलित, आदिवासी, पिछड़े और महिला के हक़-हकुक तथा सामाजिक न्याय और बहुजन अधिकारों से जुड़ी हर ख़बर पाने के लिए मूकनायक मीडिया के इन सभी links फेसबुक/ Twitter / यूट्यूब चैनलको click करके सब्सक्राइब कीजिए… बाबासाहब डॉ भीमराव अंबेडकर जी के “Payback to Society” के मंत्र के तहत मूकनायक मीडिया को साहसी पत्रकारिता जारी रखने के लिए PhonePay या Paytm 9999750166 पर यथाशक्ति आर्थिक सहयोग दीजिए…
उम्मीद है आप बिरसा अंबेडकर फुले फातिमा मिशन से अवश्य जुड़ेंगे !

बिरसा अंबेडकर फुले फातिमा मिशन के लिए सहयोग के लिए धन्यवाद्

Recent Post

Live Cricket Update

Rashifal

You May Like This