नजरिया : जय जोहार पर आग बबूला क्यों है आरएसएस (Viewpoint : Why is RSS furious on Jai Johar)

8 min read

मूकनायक मीडिया ब्यूरो || सितंबर 21, 2020 || जयपुर : भारत की जनगणना 1951 के अनुसार आदिवासियों की संख्या 1,91,11,498 थी जो 2001 की जनगणना में 8,43,26,240 हो गयी। यह देश की जनसंख्या का 8.26 प्रतिशत है। भारत में अनुसूचित जनजातियों से संबंधित कई प्रावधान हैं। मुख्‍यतः इन्‍हें दो भागों में बांटा जा सकता है- सुरक्षा तथा विकास। अनुसूचित जनजातियों की सुरक्षा संबंधी प्रावधान संविधान के अनुच्‍छेद 15(4), 16(4), 19(5), 23, 29, 46, 164, 330, 332, 334, 335 व 338, 339(1), 371(क) (ख) व (ग), पांचवी सूची व छठी सूची में निहित हैं। अनुसूचित जनजातियों के विकास से संबंधित प्रावधान मुख्‍य रूप से अनुच्‍छेद 275(1) प्रथम उपबंध तथा 339 (2) में निहित हैं।

आरएसएस द्वारा आदिवासियों को धर्म के नाम पर सताने और उसकी शोषणकारी नीतियों के कारण देश के तमाम आदिवासी संगठन खुद लंबे समय से अलग धर्म कोड की मांग कर रहे हैं, जिससे आरएसएस की रूह कांप रही है। उसे हिंदुओं की कम होती संख्या की चिंता सता रही है। 1991 की जनगणना में हिंदुओं की संख्या 84% थी, जो 2011 में घटकर 69% हो गई क्योंकि 2001 से 2011 की जनगणना में आदिवासियों ने धर्म के कॉलम में हिंदू की जगह अन्य लिखा था। भारत के सभी राज्यों में अधिसूचित की गयी अनुसूचित जनजातियों की कुल संख्या 705 है। भारत में आदिवासी आदिम-समुदाय और कबीले हैं, जाति नहीं। सुप्रीमकोर्ट ने कई फैसलों में इन्हें ही भारत का मूलनिवासी माना है। किसी भी ऐसे मानव समुदाय को, जिसमें आदिम लक्षण, विशिष्ट संस्कृति, भौगोलिक अलगाव, बड़े पैमाने पर समुदाय के साथ संपर्क में संकोच, पिछड़ापन जैसी विशेषताएँ पायी जाती हैं, जनजाति कहा जाता है। जनजातियाँ में उनका प्रजातीय मिश्रण अधिक नहीं हुआ होता है।

आरएसएस आदिवासियों को ‘वनवासी’ कहकर अपमानित करता आया है और आज भी कर रहा है। बीजेपी की कार्ययोजना इनकी आदिवासियत को नष्ट करना है। इनकी सुरक्षा और विकास के लिए बनाये गये संवैधानिक स्वरूपों का खात्मा करना है क्योंकि आरएसएस-बीजेपी वस्तुत: संविधान के दुश्मन है। 2004 से 2013 के दरमियान सोनिया गाँधीजी की अध्यक्षता में संप्रग सरकार ने दलित-आदिवासियों की व्यापक हितों की रक्षा के लिए अनेक महत्वपूर्ण कानून बनाये थे। मनमोहन सरकार द्वारा एससी-एसटी अत्याचार अधिनियम, उच्च शिक्षण संस्थानों में 200 पॉइंट्स रोस्टर, विश्वविद्यालय / कॉलेजों को इकाई मानकर आरक्षण का लाभ देने, प्रमोशन में आरक्षण जैसे कल्याणकारी व संवेदनशील मामलों को मोदी सरकार ने आरएसएस के इशारे और बदनियत से पहले न्यायालयों में भिजवाया। और फिर भाजपा शासित राज्यों और केंद्रीय स्तर पर कमजोर पैरवी करवायी, झूठे तथ्य न्यायालयों में रखवाये, उनकी सोलिसिटर जनरल से बहुत ही कमजोर पैरवी करवायी और अब एक-एक कर ख़त्म करवा रहे हैं।

इन सब ने दलितों-आदिवासियों और सवर्णों के बीच टकराव पैदा किया है। मोदी-सरकार के ऐसा करने से देश गृहयुद्ध के कगार पर आ खड़ा हुआ है और यही आरएसएस की गंदली मानसिकता है। वह देश में अराजकता फैलाना चाहता है। ऐसी घटनाएँ दरअसल भाजपा नेतृत्व वाले राजग गठबंधन के साढ़े छ: साल के शासन काल के दौरान दलितों और आदिवासियों के बढ़ते असंतोष और भावी आँदोलन की प्रमुख वजहों में से एक है। आरएसएस की तथाकथित राष्ट्र-निर्माण की परियोजना के खिलाफ अब दलित-आदिवासी वर्ग का गुस्सा साफ दिखायी दे रहा है क्योंकि यह राष्ट्र निर्माण परियोजना कभी इतिहास के पुनर्लेखन में, कभी कुछ ऐतिहासिक घटनाओं को अपने खास चश्मे से देखने में, कभी अयोध्या में राम मंदिर के निर्माण में तो कभी गौ-रक्षा, गौमांस पर प्रतिबंध और ‘लव जेहाद’ जैसे मुद्दों में प्रदर्शित हुई है। ये मुद्दे सांस्कृतिक विविधता को ध्वस्त कर हिंदू बहुसंख्यकवाद को बढ़ावा देने वाले हैं। ऐसे में जातियों में जकड़े हिंदू समाज की पुरानी बीमारियाँ सामने आ रही हैं।

ये पुराने रोग अब फिर तेजी से उभर रहे हैं, खास कर जब देश की अर्थव्यवस्था भी धीमी हो रही है और रोजगार के मौके सिमट रहे हैं। किंतु, अब आदिवासी अपनी संस्कृति के प्रति जागरुक बन रहे हैं और आदिवासियों के कई बड़े तबके खुद को हिंदू नहीं मान रहे हैं जो सो फीसदी सच भी है। यही हिंदुओं की संख्या कम हो जाने की एक वजह बन रहा है। यह आदिवासियों खास तौर पर भील, गौंड, मुंडा, उरांव, संथाल, गरासिया, डामोर, सहरिया और मीणाओं आदि के हिंदू की जगह अन्य धर्म लिखवाने के कारण हुआ। आरएसएस आदिवासियों का धर्म हिंदू लिखवाने के लिए जो अभियान चला रहा है, वह गलत है। आदिवासी मूल रूप से प्रकृति पूजक हैं। आरएसएस के लोग एक तरफ परोक्ष रूप से आदिवासी आरक्षण को समाप्त करने पर तुले हुए हैं। वहीं, दूसरी तरफ दवाब डालकर जनगणना-2021 में आदिवासियों से धर्म संबंधी कॉलम में हिंदू लिखवाने का षड्यंत्र कर रहे हैं। पर, आरएसएस की कारगुजारियों के कारण अब आदिवासी कतई भी तैयार नहीं हैं।

आदिवासी अब आरएसएस के मुखौटों को पूर्णतया पहचान चुके हैं कि आरएसएस ने ही आदिवासियों के अस्तित्व को नकराते हुए सुनियोजित रूप से अपने साहित्य में उन्हें ‘वनवासी’ संबोधित किया है। एनआरसी लागू कराने में नाकाम होते देख आरएसएस इसे दूसरे रास्ते से लागू करने में जुट गया है। लेकिन आदिवासी पढ़-लिखकर समझदार हुए हैं और आरएसएस के अभियान को कामयाब नहीं होने देंगे। इसमें तनिक भी संदेह नहीं है कि आदिवासी समाज अपनी अलग पहचान बनाएगा और इसमें आदिवासी कांग्रेस का समर्थन भी चाहते हैं। गौरतलब है कि हाल ही में देश के अनेक हिस्सों में आदिवासी संगठनों ने सीएए के विरोध में आवाज उठाई थी और कागज नहीं दिखाने का ऐलान किया था।

दुर्भाग्य देखिए, आरएसएस को धर्म की चिंता तो सता रही है पर आरएसएस ने अपने स्थापना वर्ष 1925 से आज तक आर्थिक तौर पर आदिवासियों के उत्थान की बात कभी नहीं की। बल्कि, आदिवासियों को संविधान में प्रदत्त अधिकारों और आरक्षण-व्यवस्था का खुलकर विरोध कर रहा है। आरएसएस द्वारा दलित-आदिवासियों के उत्थान के विरुद्ध आठ पहर चौंसठ घड़ी चलाने वाले षड्यंत्रों ने आरक्षण जैसे अफर्मेटिव एक्शन को लगभग समाप्त कर दिया है। देश के अधिकाँश आदिवासी माओवाद और आरएसएस दोनों तरफ से घिरे हुए हैं। आख़िरकार आदिवासी जाएँ तो कहाँ जाएँ, एक तरफ कुआँ है और दूसरी तरफ खाई। माओवादियों ने मासूम आदिवासियों के हाथों में हथियार थमा कर उन्हें हिंसक बना दिया है, वहीं आरएसएस ने उनकी आदि-संस्कृति छीनकर उन्हें पंगु-हिंदू बना दिया है। आरएसएस उनके मानसिक और शारीरिक शोषण में अव्वल है जो आदिवासियों के लिए माओवादियों के थमाये हथियारों से भी ज्यादा घातक हैं। हथियार तो एक ना एक दिन छुट जाएँगे पर आरएसएस के चंगुल से भोले-भाले आदिवासी कैसे बाहर आएँगे?

आदिवासी समाज का बंटवारा करने में कामयाब रहा है आरएसएस। यह एक तथ्य है कि रिजर्व सीटों से भी बड़ी संख्या में भाजपा के भगवा रंग में रंगे आदिवासी विधायक बने हुए हैं और वे बीजेपी की कार्पोरेट परस्त नीतियों के समर्थक हैं। कांग्रेस और आदिवासी समाज का प्रबुद्ध तबका; जल, जंगल, जमीन को बचाने के संघर्ष के साथ आदिवासी समाज को सांस्कृतिक रूप से खोखला बनाने वाले इस संकट के खिलाफ पूरी संवेदनशीलता के साथ खड़ा नहीं होगा तो यह प्रक्रिया और तेज होगी। मध्यप्रदेश में पूर्व मुख्यमंत्री कमलनाथ के आदिवासियों के साथ खड़े होने से उन्हें संबल मिला है क्योंकि आदिवासी हिंदू नहीं हैं, वह लोग प्रकृति की पूजा करते हैं। इसे लेकर संघ और कांग्रेस में टकराव चरम पर है और यदि कांग्रेस इस मुद्दे पर आदिवासियों के साथ खड़ी रही तो देश भर में आदिवासी खुलकर कॉग्रेस के साथ होंगे और आरएसएस-बीजेपी हाथ मलते रह जाएँगे क्योंकि आदिवासी कांग्रेस के अनुगामी है, आदिवासी स्वेच्छा से कांग्रेस का विशुद्ध वोट-बैंक रहे हैं।

आदिवासियों की जिंदगी का अध्ययन करने वाले मूर्धन्य मानवशास्त्री वेरियर एल्विन ने 1951 में लिखी किताब ‘ए फिलोस्फी फॉर नेफा’ आदिवासियों के विकास का दर्शन है। एल्विन लिखते हैं कि हमें आदिवासियों के बारे में आदिवासियों की सोच के मुताबिक सोचना होगा, और यही वादा सदियों से कांग्रेस निभाती आयी है। कांग्रेस के नीति-निर्धारकों ने सदैव माना कि आदिवासी लोग ‘नुमाइश की चीज’ या ‘नमूना’ नहीं है। वे सभी मूलभूत मामलों में ठीक हमारी ही तरह इंसान हैं। हम उनके हिस्सा हैं और वे हमारी विरासत हैं। वे खास हालात में जीते हैं। उनका विकास कुछ खास तर्ज पर हुआ है। उनकी अपनी जीवन दृष्टि है। काम करने का उनका अपना खास अंदाज है, जज्बा है, जज्बात है। बुनियादी इंसानी जरूरतें, ख्वाहिशें, मोहब्बत और डर के भाव- उनके भी हमारे ही जैसे हैं। यानी जब हम आदिवासियों के बारे में सोचें, तो उन्हें अपने जैसा मान कर सोचें। मगर, अपने दिल पर हाथ रख कर क्या आज हम यह कह पाने की हालत में हैं कि हम उन्हें अपना ही हिस्सा मान कर उनके बारे में सोचते रहे/ सोचते हैं? इस किताब की बड़ी खासियत इसकी प्रस्तावना है, जो पूर्व पं. प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने लिखी है। हालांकि, गांधी या नेहरू का नाम सुनते ही कइयों की भृ‍कुटियाँ चढ़ जाती हैं या वे नाक-भौं सिकोड़ने लगते हैं।

मगर, क्या किया जाये, गाँधी-नेहरू-अम्बेडकर अपने विचारों के साथ ऐसे मंदबुद्धियों से टकराने आ ही जाते हैं। गाँधी-नेहरू-अम्बेडकर आदिवासी इलाकों के विकास को नकारते नहीं हैं, बल्कि वे विकास को एक मानवीय रूप देने की बात करते हैं। नेहरू लिखते हैं कि आदिवासी इलाकों में संचार, मेडिकल सुविधाओं, शिक्षा, बेहतर खेती जैसे क्षेत्रों के विकास के बारे में काम किया जाना चाहिए। इनके विकास का दायरा ‘आदिवासियत के पंचशील सिद्धांत’ के दायरे में ही होना चाहिए, जिसके पांच मुख्य तत्व हैं। एक; लोगों को अपनी प्रतिभा और खासियत के आधार पर विकास की राह पर आगे बढ़ना चाहिए। हमें उन पर कुछ भी थोपने से बचना चाहिए। उनकी पारंपरिक कलाओं और संस्कृति को बढ़ावा देने के लिए हर मुमकिन कोशिश करनी चाहिए। दो; जमीन और जंगलों पर आदिवासियों के हकों की इज्जत करनी चाहिए। तीन; प्रशासन और विकास का काम करने के लिए हमें उनके लोगों (आदिवासियों) को ही ट्रेनिंग देने और उनकी एक टीम तैयार करने की कोशिश करनी चाहिए।

जाहिर है, इस काम के लिए शुरुआत में बाहर के कुछ तकनीकी जानकारों की जरूरत पड़ेगी। लेकिन, हमें आदिवासी इलाकों में बहुत ज्यादा बाहरी लोगों को भेजने से बचना चाहिए। चार; हमें इन इलाकों में बहुत ज्यादा शासन-प्रशासन करने से या उन पर ढेर सारी योजनाओं का बोझ लादने से बचना चाहिए। हमें उनकी सामाजिक और सांस्कृतिक संस्थाओं से मुकाबला या होड़ करके काम नहीं करना चाहिए। इसके बरअक्स उनके साथ तालमेल के साथ काम करना चाहिए। पांच; आँकड़ों के जरिये या कितना पैसा खर्च हुआ है, हमें इस आधार पर विकास के नतीजे नहीं तय करने चाहिए। बल्कि इंसान की खासियत का कितना विकास हुआ, नतीजे इससे तय होने चाहिए।

Facebook
Twitter
LinkedIn
WhatsApp

डॉ अंबेडकर की बुलंद आवाज के दस्तावेज : मूकनायक मीडिया पर आपका स्वागत है। दलित, आदिवासी, पिछड़े और महिला के हक़-हकुक तथा सामाजिक न्याय और बहुजन अधिकारों से जुड़ी हर ख़बर पाने के लिए मूकनायक मीडिया के इन सभी links फेसबुक/ Twitter / यूट्यूब चैनलको click करके सब्सक्राइब कीजिए… बाबासाहब डॉ भीमराव अंबेडकर जी के “Payback to Society” के मंत्र के तहत मूकनायक मीडिया को साहसी पत्रकारिता जारी रखने के लिए PhonePay या Paytm 9999750166 पर यथाशक्ति आर्थिक सहयोग दीजिए…
उम्मीद है आप बिरसा अंबेडकर फुले फातिमा मिशन से अवश्य जुड़ेंगे !

बिरसा अंबेडकर फुले फातिमा मिशन के लिए सहयोग के लिए धन्यवाद्

Recent Post

Live Cricket Update

Rashifal

You May Like This