रिसर्च-रिपोर्ट : आसमान से पटके, खजूर पर अटके आदिवासी, घर-बाहर आदिवासी औरतों का शोषण सातवें आसमान पर

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मूकनायक मीडिया ब्यूरो || सितंबर 22, 2020 || जयपुर : आदिवासियों का जीवन-दर्शन, प्रकृति से उनका रिश्ता, स्त्री-पुरुष संबंध, उनकी सामूहिकता, उनके नृत्य-गीत, उनका लोक सब कुछ गैर-आदिवासी समाज से, वृहद हिंदू समाज से भिन्न है। इसके अलावा आरएसएस-बीजेपी पूँजीवादी फैलाव के जरिये विकास के नाम और आधुनिक उद्योग जगत के लिए आदिवासी बहुल इलाकों की खनिज संपदा से उन्हें बेदखल करना चाहते हैं। आरएसएस की गंदली मानसिकता यहाँ के जल, जंगल, जमीन पर काबिज होने के लिए वे बेकरार हैं। इन्हें आदिवासियों से लड़ कर इसे हासिल नहीं किया जा सकता। अंग्रेज यह कोशिश कर हार चुके थे। बाद में उन्होंने मध्यम मार्ग अपनाया। विलकिंसन रूल, विशेष भूमि कानून, रिजर्व फारेस्ट के भीतर भी उनके लिए गुंजाइश छोड़ी। अंग्रेजों द्वारा बनाये गये उन कानूनों को आजाद भारत के संविधान में भी न सिर्फ शामिल किया, बल्कि डॉ अम्बेडकर ने कानून बना कर ग्राम-सभाओं को और मजबूत किया। पाँचवी अनुसूची में उनके लिए विशेष प्रावधान किये। फिर 2012-13 में संप्रग सरकार ने विगत में किये गये प्रावधानों को आधुनिकता प्रदान की और भूमि-अधिग्रहण का सशक्त कानून बनाया। लेकिन 2014 से मोदी सरकार को अब ये बंदिशें नागवार गुजर रही हैं। मोदीजी की कॉर्पोरेट्स के साथ सांठ-गांठ और अड़ानी-अंबानी जैसे मित्रों को लाभ पहुँचाने के लिए पर्यावरण संबंधी कानूनों को कमजोर करने की कोशिशों के बीच आदिवासियों के स्वाभाविक हितैषी राहुल गाँधी आदिवासियों के साथ खड़े हो गये और पीएम मोदी को मुँह की खानी पड़ी। फिर, भूमि अधिग्रहण कानून में तब्दिली लाई गयी, जिस पर भी पीएम को दबे पाँव पीछे हटना पड़ा। फिर, विकास का सब्जबाग दिखाया गया। बावजूद इसके उन्हें हर जगह भारी प्रतिरोध का सामना करना पड़ा। गोड्डा, खूंटी, ईचा, नेतरहाट, मंडल बांध, कलिंगनगर, पोस्को, नियमगिरि, यानी हर जगह आदिवासी समाज उनके दमन का सामना करते हुए उनके मुकाबले खड़ा है और हर एक आदिवासी अपने स्वाभाविक राजनीतिक पहरेदार काँग्रेस की तरफ झाँक रहा है क्योंकि कांग्रेस की नीतियों ने अन्य राजनितिक दलों के बनिस्पत अपेक्षाकृत आदिवासियों को कम नुकसान पहुँचाया है। पर आरएसएस उनसे लड़ने के बजाय उन्हें बरगलाना ज्यादा आसान मान चुका है। ‘सरना-सनातन एक है का नारा देकर’, उपभोक्तावाद की घुट्टी पिला कर और आदिवासी दलालों को सत्ता में थोड़ी सी हिस्सेदारी देकर और यही भाजपा सरकार कर रही है। इस काम में परोक्ष रूप से आरएसएस इसमे कामयाब हो रहा है, जो आदिवासियों में हीनता की नये किस्म की ग्रंथि पैदा कर रही हैं। आरएसएस का आदिवासियों के प्रकृति-धर्म, रहन-सहन को दोयम दर्जे का बताना, दुर्भाग्यपूर्ण है। आरएसएस के हिकारत भरे जुमलों और दकियानूसी दलीलों से आदिवासी आजिज हो चुका है। वस्तुत: आदिवासी समाज में हिंदूकरण की प्रक्रिया उन इलाकों में ज्यादा सफल रही हैं, जहाँ ईसाई मिशनरियाँ प्रभावी हैं। यह आरएसएस की साजिश तो है ही, ईसाई मिशनरियों के खिलाफ एक प्रतिक्रिया भी है। कितने नंगे रूप में यह भेदभाव दृष्टिगत होता है। शिक्षा केंद्रों में बैठे आरएसएस के नुमाइंदे आदिवासी शिक्षकों और छात्रों से भेदभाव करते है। डॉ पायल तड़वी और इस आलेख के लेखक खुद आरएसएस की मानसिकताओं के शिकार हुए हैं। सुस्पष्ट तथ्य है कि आरएसएस की हिंदूवादी दलील अब ज्यादा चलने वाली नहीं है क्योंकि आदिवासी मूर्तिपूजक नहीं हैं, उन्हें अपनी अलग पहचान चाहिए। इसलिए देशभर के आदिवासी सामूहिक रूप से जनगणना-2021 प्रपत्र में अलग आदिवासी-कॉलम जोड़ने की माँग प्रबलता से कर रहे हैं। वर्ष 1951 तक यह कॉलम था, लेकिन बाद में हिंदूवादी ताकतों ने वोट-बैंक की दूषित सोच द्वारा इसे हटा दिया। आदिवासी इसके लिए अदालत में भी लड़ाई रहे हैं क्योंकि आदिवासी-अस्मिता की धुरी है स्व-संस्कृति प्रेम, आत्मनिर्णय और आत्म-सम्मान में विश्वास। आदिवासी-चार अक्षरों का एक छोटा सा शब्द मात्र नहीं है इसके पीछे एक अनवरत परंपरा है, धराड़ी की आराधना की नैसर्गिक सोच है। साथ ही, सामाजिक व्यवहार के रूप में अनेक आदिम-समुदाय, कबीले और किस्मों में बंटा संसार और इस संसार की अपनी समस्याएँ, अपना राजवेश, अपने रीति-रिवाज हैं जो हिंदू धर्म की विभाजकारी और शोषणकारी सोच से कहीं ऊपर उठी है, जो मानव-मानव को समान दृष्टिकोणों से देखती है। सामान्यतः शांत और सरल, लेकिन विद्रोह का नगाड़ा बजते ही पूरा समूह सम्पूर्ण प्रगतिशील शहरियों के लिए एक ऐसी चुनौती है आदिवासी, जिसे सह पाना लगभग असंभव है। एक चिंगारी जो कभी भी ज्वालामुखी बनकर सबको भस्म करने की क्षमता रखती है। आदिवासियों के उपयुक्त संबंधों, रंगबिरंगी पोशाकों, संगीत, नृत्य और संस्कृति के बारे में हमारी अपनी कल्पनाएँ हैं। आरएसएस आदिवासियों को पिछड़ा, असभ्य, गंदा, गैर-आधुनिक और न जाने क्या-क्या मानता है। अंग्रेजी राज ने भारतीय आदिवासियों को दूसरे दर्जें का नागरिक समझा, पर आरएसएस तो अंग्रेजों से भी बहुत आगे निकल गया मानो वह तो आदिवासियों के मुँह से निवाला भी छीनकर, उन्हें फिर से पेशवाई जीवन जीने को मजबूर करना चाहता है। किंतु, आरएसएस की इन करतूतों ने उनके जीवन, संस्कृति और सामाजिक संसार को बाकी दुनिया से अलग-थलग रख कर उसे अध्ययन और कौतूहल का विषय बना दिया हैं। आरएसएस शायद भूल कर रहा है कि गुलामवंश के संस्थापक कुतुबउद्दीन ऐबक को मीणाओं ने 1197 में और भारतीय समाज में अंग्रेजों को पहली चुनौती सन् 1824-30 भीलों और मीणाओं ने दी और बाद में 1846-47 में संथालों ने अंग्रेजों के छक्के छुड़ा दिए, उनकी यह परम्परा लंबी है। आजादी के 72 साल बाद भी भारत के आदिवासी उपेक्षित, शोषित और पीड़ित नजर आते हैं। आदिवासियों की सामाजिक स्थिति इतनी बदतर है कि आदिवासी अपने घरों में छोटी-मोटी ख़ुशी भी मनाना चाहे तो शिवराजसिंह की पुलिस सरेआम उन्हें ना केवल पीटती है बल्कि उनकी बहन-बेटियों को अनाधिकृत रूप से थानों में ले जाकर उनके साथ बलात्कार तक करती है, वे बेचारे लोकतंत्र की दुनिया में छुट-मुट खुशी भी नहीं मना सकते। बीजेपी जैसी राजनीतिक पार्टियाँ और आरएसएस के तंगदिल संघी आदिवासियों के वोट पाने हेतु उत्थान की बात तो करते हैं, लेकिन उस पर अमल नहीं करते। यह 2014 के आम चुनाव में साफ दिख रहा है। मुखौटों और कथनी-करनी में फर्क रखने वाली राजनीतिक पार्टियाँ अगर सचमुच में देश का विकास चाहती हैं और ‘आखिरी व्यक्ति’ तक लाभ पहुँचाने की मंशा रखती हैं तो आदिवासी हित और उनकी समस्याओं को हल करने की बात पहले करनी होगी। 2014-15 में एससी-एसटी के हितों पर पहला कुठाराघात तब हुआ जब आरएसएस-बीजेपी ने षड्यंत्र रचते हुए 13 केंद्रीय विश्वविद्यालयों के कुलपतियों की नियुक्तियों को एमएचआरडी द्वारा संयुक्त विज्ञापन को विश्वविद्यालय स्तर पर जारी करवाकर ताकि एससी-एससी के लोगों को आरक्षण ना देना पड़े जबकि 2009 में मनमोहन सरकार ने इन्हीं पदों को आरक्षण के प्रावधानों से भरा था और एससी-एसटी के लोगों को कुलपतियों में नियुक्ति दी थी। साथ ही, 2014 में से ही यूजीसी और इग्नू में एससी और एसटी समुदाय के छात्रों के लिए हायर एजुकेशन फंड्स में क्रमश: 23 प्रतिशत और 50 प्रतिशत की कमी की गयी है। एससी स्टूडेंट्स को मैट्रिक के बाद मिलनेवाली छात्रवृत्ति के लिए इस साल बजट में 2926 करोड़ रुपये का प्रावधान किया गया है, जबकि उससे पिछले साल में यह रकम 3000 करोड़ रुपये थी। एसटी स्टूडेंट्स के लिए मैट्रिक के बाद मिलनेवाली छात्रवृति के मद में 2018-19 में 1,643 करोड़ रुपये के फंड का प्रावधान था, जो इस साल मात्र 1,613 करोड़ रुपये है। एससी-एसटी के शोधार्थियों के लिए पीएच-डी और इसके बाद के कोर्सेज के लिए फेलोशिप और स्कॉलरशिप में 2014-15 से लगातार गिरावट आयी है। इसके मुताबिक, एससी के लिए यह रकम 602 करोड़ रुपये से घट कर 283 करोड़ रुपये हो गयी, जबकि एसटी स्टूडेंट्स के लिए यह 439 करोड़ रुपये से कम होकर 135 करोड़ रुपये हो गयी। एससी-एसटी विकास में इस्तेमाल होनेवाले फंड्स में गिरावट का ट्रेंड ग्रामीण विकास और एमएसएमई मंत्रालय के अधीन एससी / एसटी के लिए 13 योजनाएँ जिनमें 2017-18 में कुल 543 करोड़ का व्यय किया गया था, उन्हें मनमाने ढंग से बंद कर दिया गया है और इनका आवंटन शून्य हो गया है। ध्यातव्य रहे कि मोदी सरकार ने 2014 के बजट से ही अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजातियों के लिए पढ़ाई-लिखाई के मामले में समानता लाने वाली अन्य स्कीमों की भी उपेक्षा की गयी है। जबकि पूर्ववर्ती मनमोहन सरकार द्वारा इन वर्गों को 11000 करोड़ रूपए की अतिरिक्त धनराशि जो मैट्रिक बाद दी जाने वाली छात्रवृति राशि बकाया थी, को मोदी सरकार ने 2014 में सत्तासीन होते ही ख़त्म कर दिया था। इतना ही नहीं, 2018 -19 के कुल बजटीय व्यय में से केन्द्रीय क्षेत्र के स्कीमों और केंद्र द्वारा प्रायोजित स्कीमों के व्यय लिए 1014450.79 करोड़ रूपए निर्धारित है। इसमें से अनुसूचित जाति के विशेष घटक योजना (स्पेशल कॉम्पोनेन्ट प्लान) के लिए खर्च / कल्याण के लिए आवंटन 16.6% 168398.83 करोड़ रूपए से कम नहीं होना चाहिए थे। लेकिन सिर्फ 56618.50 करोड़ रूपए 5.58% कर दिये गये हैं। केंद्रीय बजट 2019-20 में फिर से मोदी सरकार ने प्रमुख कल्याणकारी योजनाओं को नज़रअंदाज़ किया है। अनुसूचित जनजाति के ट्राइबल सब – प्लान के लिए खर्च / कल्याण के लिए आवंटन 8.6% 87247.77 करोड़ रूपए से कम नहीं होना चाहिए थे। लेकिन सिर्फ 39134.73 करोड़ रूपए (8.6 % से घटाकर 3.86 %) कर दिए गए हैं। दुर्भाग्यवश 16.6% और 8.6% की आवश्यकता के बरक्स एससी स्पेशल कॉम्पोनेन्ट प्लान के लिए खर्च / कल्याण के लिए आवंटन में 111780.33 करोड़ रूपए की कमी और ट्राइबल सब – प्लान के लिए खर्च / कल्याण के लिए आवंटन में 48108.04 करोड़ रूपए की कमी की गयी है। सर्वविदित है कि एससी स्पेशल कॉम्पोनेन्ट प्लान / ट्राइबल सब – प्लान इन वर्गों में सवर्णों के समक्ष लाने एवं उन्हें बुनियादी दुर्दशा से बाहर निकालने में मददगार होते हैं, जिनको मोदीसरकार ने खात्म कर दिया। इतना ही नहीं, कांगेस द्वारा अतीत में किये गए श्रेष्ट जमीनी-कार्यों की तुलना में मोदीजी के अंकगणितीय – सांख्यकीय आँकड़े एससी-एसटी की आँखों में धुल झोंकने के आंकड़ों की कलाबाजी हैं। मोदी सरकार की दलित-आदिवासी विरोधी-नीतियों की वजह से बड़ी तादाद में अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के छात्रों को फीस जमा न करा पाने पर शिक्षा संस्थानों से बाहर होने को मजबूर होना पड़ रहा है। ऊपर जिन मकसदों के बारे में बातें की गई है और स्कीमों को सुनिश्चित करने के लिए आवश्यक एससी स्पेशल कॉम्पोनेन्ट प्लान और ट्राइबल सब–प्लान में पर्याप्त आवंटन के प्रावधानों, जोकि अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति की आबादी–अनुपात से कम नहीं होना चाहिए, में व्यापक कटौती जारी है। जनजातीय लोगो की जमीन को खोने से बचाने और पहले से खोयी हुई जमीन को वापस लाने के उपाय इस बजट में भी नदारद हैं। 2020-बजट के आँकड़ों के विश्लेषण से पता चलता है कि सरकार मनरेगा, आईसीडीएस, मिड-डे-मील, राष्ट्रीय सामाजिक सहायता कार्यक्रम और अनुसूचित जाति तथा अनुसूचित जनजाति के लिए ऐसी कल्याणकारी योजनाओं के प्रति घोर उदासीन बनी हुई है। वस्तुत: नरेंद्र मोदी के 2014 में सत्ता पर काबिज होने साथ ही एससी-एसटी के बुरे दिनों की शुरुआत हो चुकी थी। पिछले कुछ वर्षों में एससी-एसटी की जीवन-रेखा बनी ग्रामीण क्षेत्रों के लिए महात्मा गांधी ग्रामीण रोज़गार गारंटी अधिनियम-2005 के अनुसार मनरेगा के तहत काम की मांग बढ़ी है। उदाहरण के लिए आधिकारिक आँकड़ों के अनुसार 2018-19 के दौरान ग्रामीण भारत के लगभग 9.11 करोड़ लोगों ने मनरेगा के तहत काम के लिए आवेदन किया था, जिनमें एससी-एसटी प्रमुख रूप से शामिल है, जिसमें सरकार लगभग 7.77 करोड़ के लिए अस्थायी काम दे सकी जिसका मतलब है कि लगभग 1.34 करोड़ (15%) लोगों को इस योजना के तहत रोज़गार नहीं मिल सका। इन सबके बावजूद योजना को लागू करने वाले अधिकारियों का तर्क है कि वे फ़ंड की कमी के कारण मांग को पूरा नहीं कर सके। और फिर भी वर्तमान बजट यह नहीं दर्शाता है कि सरकार ने इस पर कोई ध्यान दिया है, जो मोदी-सरकार की एससी-एसटी के प्रति उदासीनता की पराकाष्ठा है। सबसे बड़ी चिंता की बात ये है कि मनरेगा के लिए 2018-19 (संशोधित अनुमान) के दौरान 61,084 करोड़ रुपये आवंटित किए गए थे जबकि 2019-20 (बजट अनुमान) में यह राशि कम होकर 60,000 करोड़ रुपये हो गई है। चौंकाने वाली बात यह है कि अन्य योजनाओं जैसे एकीकृत बाल विकास योजना (एसीडीएस), मिड-डे-मील, राष्ट्रीय सामाजिक सहायता कार्यक्रम और अनुसूचित जाति तथा अनुसूचित जनजातियों के लिए कल्याणकारी योजनाओं के प्रति सरकार की उदासीनता को भी दर्शाता है। अत्यंत दुर्भाग्यपूर्ण यह है कि वर्ष 2001 में शुरू की गई मिड-डे-मील योजना का उद्देश्य देश भर के सरकारी और सरकारी सहायता प्राप्त स्कूलों में पढ़ने वाले बच्चों के लिए पौष्टिक भोजन प्रदान करना है। लेकिन मोदीसरकार ने इस योजना बहुआयामी योजना का भी गला घोंट दिया। कुल ख़र्च में एमडीएम की हिस्सेदारी वित्त वर्ष 2014-15 में 0.63% से घटाकर वित्त वर्ष 2019-20 में 0.39% 11,000 करोड़ रुपये कर दी गई। करोड़ों कुपोषित बच्चों के मुँह से निवाला तक छीन लिया। एससी, एसटी और अन्य सामाजिक समूहों के लिए प्रमुख योजनाएँ और राष्ट्रीय सामाजिक सहायता कार्यक्रम(एनएसएपी) के तहत पेंशन के लिए मनरेगा जैसी प्रमुख योजना में घटाया गया आवंटन चिंता की बात है। इन वर्गों के लोगों के प्रति सरकार की लापरवाही अभी भी बरक़रार है। ऐसे में इनकी स्थिति और भी बदतर हो सकती है। अनुसूचित जनजाति के विकास के लिए इस प्रमुख कार्यक्रम में शिक्षा छात्रवृत्ति, विशेष रूप से कमज़ोर आदिवासी समूहों के विकास, वनबंधु कल्याण योजना, आदिवासी अनुसंधान संस्थानों को सहायता, आदिवासी उप-योजनाओं के लिए विशेष केंद्रीय सहायता और संविधान के अनुच्छेद 275(1) के तहत अनुदान शामिल है। कुल व्यय के मुक़ाबले इन कल्याणकारी योजनाओं का हिस्सा मोदी सरकार में 0.23% से 0.25% के बीच ही रहा है, जो बहुत ही दुर्भाग्यपूर्ण है। मोदी सरकार ने दलित-आदिवासियों के संवैधानिक प्रावधानों और संरक्षण पर भी घोर कुठाराघात किया है। मौजूं सवाल यह है कि आरएसएस के पूर्वज संपूर्ण हिंदू वांगमय में जिन्हें दस्यु, दास, असुर, राक्षस, वा‘नर’ जैसे शब्दों से पुकारा गया, जिनके साथ सतत युद्ध की कहानियाँ ही पौराणिक गाथाओं का मूलाधार हैं, उन्हीं आदिवासियों पर आरएसएस और संपूर्ण संघ परिवार आज इतना मेहरबान क्यों है? जिन्हें हिंदू वर्ण व्यवस्था के निम्न पायदान पर भी उन्होंने जगह नहीं दी, उन्हें संघ परिवार और भाजपा आज हिंदू बताती क्यों घूम रही है? यहाँ यह याद दिलाना जरूरी है कि पूरे भारतीय समाज के लिए, खासकर वृहद गैर-आदिवासी समाज के लिए, आदिवासी दुनिया एक भिन्न दुनिया है। उस पर मुग्ध हुआ जा सकता है, उनके आनंदमय जीवन से रश्क किया जा सकता है, उनकी गरीबी और विपन्नता पर तरस भी खाया जा सकता है, लेकिन उस तरह जिया नहीं जा सकता, क्योंकि वह एकदम भिन्न समाज है। लोकतंत्र में उनके वोट की बहुत अहमियत है वरना आरएसएस-बीजेपी तो उन्हें लील जाना चाहते हैं। पीएम नरेंद्र मोदी ने तो इनसे जीने के सारे अधिकार भी छीन लिये हैं और अर्थव्यवस्था जिस दौर में पहुँचा दी गयी है वहाँ सर्वाधिक खतरा इन्हीं वर्गों को रहेगा, क्योंकि ना इनकी जमीं बची है और ना ही साँस लेने के लिए आसमां ! लेखक : प्रोफ़ेसर राम लखन मीना, सिंडिकेट सदस्य, राजस्थान विश्वविद्यालय, जयपुर

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