भीम संकल्प दिवस : आओ .! बाबासाहब डॉ अंबेडकर का वहीँ संकल्प दोहरायें कि बहुजन समाज में समानता लायेंगे

4 min read

मूकनायक मीडिया ब्यूरो || सितंबर 23, 2020 || जयपुर : 23 सितंबर का हर एक बहुजन के जीवन में विशेष महत्त्व है। आज ही के दिन 103वर्ष पूर्व 23 सितंबर 1917 को बाबा साहेब डॉ अंबेडकर जी ने बडौदा रेलवे स्टेशन के पास पार्क में एक बरगद के पेड़ के नीचे बैठकर मन में एक संकल्प लिया था कि- “आज के बाद मैं भीमराव अंबेडकर अपना सारा जीवन इस सामाजिक भेदभाव को मिटाने तथा अपने समाज को मानवीय अधिकार दिलाने में लगा दूँगा, और यदि मैं ऐसा करने मे असमर्थ रहा तो मैं स्वयं को गोली मार लूँगा और अपने जीवन को समाप्त कर दूँगा।” इस घटना का गवाह बड़ौदा के कमेटी बाग में मौजूद वट वृक्ष है। मूकनायक डॉ अंबेडकर से जुड़ी इस निर्णायक घटना का मूक गवाह है सौ साल पुराना वह वट वृक्ष। यह घटना आज के वक्त में इसलिए महत्वपूर्ण है कि भारतरत्न डॉ अंबेडकर के उस संकल्प को चौतरफा थ्रेट मिल रही है। और सारे-के- सारे बहुजन मूक है, मौन धारण किये हुए हैं । बड़ौदा नरेश श्रीयुत सयाजीराव गायकवाड़ ने एक प्रतिभाशाली, होनहार गरीब नौजवान को छात्रवृति देकर कानून व अर्थशास्त्र के अध्ययन करने हेतु पहले कोलंबिया(अमरीका) और फिर लंदन भेजा था। छात्रवृति के साथ अनुबंध यह था कि विदेश में उच्च शिक्षा प्राप्त करने के बाद वह युवक बड़ौदा रियासत को अपनी दस वर्ष की सेवाएँ देगा। अध्ययन कर उच्च शिक्षा हासिल करने के उपरांत 28 वर्षीय डॉ अंबेडकर करार के मुताबिक अपनी सेवाएँ देने हेतु बड़ौदा नरेश के सम्मुख उपस्थित हुआ बड़ौदा नरेश ने उस युवक को सैनिक सचिव के पद पर तत्काल नियुक्त कर लिया । एक सामान्य सी घटना आग की लपटों की तरह पूरी रियासत में फैल गयी। बस एक ही चर्चा चारों और थी कि बड़ौदा नरेश ने एक अछूत व्यक्ति को सैनिक सचिव बना दिया है। सबसे बड़ी विडंबना यह थी कि इतने उच्च पद पर आसीन अधिकारी को भी उनके मातहत सवर्ण कर्मचारी दूर से फाईल फेंककर देते। चपरासी पीने के लिए पानी भी नहीं देता। यहाँ तक कि बड़ौदा नरेश के उस आदेश की भी अनदेखी कर दी गयी जिसमें यह कहा गया था कि इस उच्च अधिकारी के रहने की उचित व्यवस्था की जावे। दीवान उनकी मदद करने से स्पष्ट ही इंकार कर चुका था। इस उपेक्षा और तिरस्कार के बाद अब उन्हें रहने व खाने की व्यवस्था खुद ही करनी थी । उनके व्यक्तित्व में स्मरण शक्ति की प्रखरता, बुद्धिमत्ता, ईमानदारी, सच्चाई, नियमितता, दृढ़ता, प्रचंड संग्रामी स्वभाव का मणिकांचन मेल था। किसी हिंदू लॉज या धर्मशाला में उन्हें जगह नहीं मिली। आखिरकार वे मजबूरी में एक पारसी धर्मशाला में असली नाम छुपाकर एवं पारसी नाम एदल सोराबजी बताकर दैनिक किराये पर रहने लगे। लोगों ने धर्मशाला में भी उनका पीछा नहीं छोड़ा। उन लोगों ने जातिसूचक शब्दों से अपमानित किया व सामान बाहर फेंक दिया। बहुत निवेदन के बाद युवक अंबेडकर को धर्मशाला खाली करने के लिए आठ घंटे की मोहलत दी गयी। चूंकि उस समय बड़ौदा नरेश मैंसूर जाने की जल्दी में थे, अतः उस युवक को दीवान जी से मिलने की सलाह दी गयी लेकिन दीवान उदासीन बने रहे। विवश होकर डॉ अंबेडकर ने दु:खी मन से बड़ौदा नरेश को अपना त्याग-पत्र सौंप दिया और रेल्वे स्टेशन पहुँचकर बंबई जाने वाली ट्रेन का इंतजार करने लगा । ट्रेन चार-पाँच घंटे विलंब से चल रही थी । अतः वह कमेटी बाग के वट वृक्ष के नीचे एकांत में बैठकर फूट-फूट कर रोया। उनका रूदन सुनने वाला उस वृक्ष के अलावा कोई नहीं था। “लाखों-लाख से योग्य, प्रतिभावान एवं सक्षम होकर भी वह ब्राह्मणवादी व्यवस्था के चलते उपेक्षित था। दोष केवल इतना था कि वह अछूत था। उसने सोचा कि मैं इतना उच्च शिक्षित हूँ, विदेश में पढा हूँ, तब भी मेरे साथ ऐसा व्यवहार हो रहा है तो देश के करोड़ों अछूत लोगों के साथ क्या हो रहा होगा ?” वो तारीख थी 23 सितंबर 1917 थी। जब आँसू थमे तो उस युवक ने कभी विस्मृत ना होने वाला एक विराट संकल्प लिया कि ” अब मैं अपना पूरा जीवन इस देश से छुआछूत निवारण और समानता कायम़ करने के कार्य करने में लगाऊँगा तथा ऐसा न कर पाया तो स्वयं को गोली मार लूँगा ।” यह एक साधारण संकल्प नहीं था बल्कि महान संकल्प था, न तो यह संकल्प साधारण था न ही इसको लेने वाला व्यक्ति खुद साधारण था। बड़ौदा के कमेटी बाग के उस वट वृक्ष के नीचे असाधारण संकल्प लेने वाला व्यक्ति कोई और नहीं बल्कि देश का महान सपूत व महान विभूति बाबासाहब डॉ भीमराव अंबेडकर थे। बाबा साहब के इस संकल्प से उपजे संघर्ष ने भारत के करोड़ों लोगों के जीवन की दिशा बदल दी । कहा जाता है कि दीप राग से ज्योति जल उठती है, व बुझे दीपक में प्रकाश आ जाता है। बाबासाहब का पूरा जीवन दीपरागमय रहा। उन्होंने सनातन, आडम्बरवादी सामाजिक और धार्मिक परंपराओं के विरूद्ध संघर्ष किया व उत्पीड़ित लोगों को जीने का नया रास्ता दिखाया । डॉ बाबासाहब अंबेडकर की अद्वितीय प्रतिभा अनुकरणीय है। वे एक मनीषी, योद्धा, नायक, विद्वान, दार्शनिक, वैज्ञानिक, समाजसेवी एवं धैर्यवान व्यक्तित्व के धनी थे। वे अनन्य कोटि के नेता थे, जिन्होंने अपना समस्त जीवन समग्र भारत की कल्याण कामना में उत्सर्ग कर दिया। खासकर भारत के 80 फीसदी दलित सामाजिक व आर्थिक तौर से अभिशप्त थे, उन्हें अभिशाप से मुक्ति दिलाना ही डॉ आंबेडकर का जीवन संकल्प था। आज उसी सम्यक संकल्प के 103वें वर्ष में हम सब भी मिलकर संकल्प लें कि असमानता व अन्याय का हम समन्वित प्रतिरोध / प्रतिकार करेंगे। आज संकल्प दिवस पर बाबासाहब के विराट संकल्प को सलाम करते हुए महामानव को कोटिशः नमन।

Facebook
Twitter
LinkedIn
WhatsApp

डॉ अंबेडकर की बुलंद आवाज के दस्तावेज : मूकनायक मीडिया पर आपका स्वागत है। दलित, आदिवासी, पिछड़े और महिला के हक़-हकुक तथा सामाजिक न्याय और बहुजन अधिकारों से जुड़ी हर ख़बर पाने के लिए मूकनायक मीडिया के इन सभी links फेसबुक/ Twitter / यूट्यूब चैनलको click करके सब्सक्राइब कीजिए… बाबासाहब डॉ भीमराव अंबेडकर जी के “Payback to Society” के मंत्र के तहत मूकनायक मीडिया को साहसी पत्रकारिता जारी रखने के लिए PhonePay या Paytm 9999750166 पर यथाशक्ति आर्थिक सहयोग दीजिए…
उम्मीद है आप बिरसा अंबेडकर फुले फातिमा मिशन से अवश्य जुड़ेंगे !

बिरसा अंबेडकर फुले फातिमा मिशन के लिए सहयोग के लिए धन्यवाद्

Recent Post

Live Cricket Update

Rashifal

You May Like This