आदिवासी भील राजा डूंगर बरंडा ने बसाया डूंगरपुर भीलों का गढ़, राजपूतों से मिला धोखा, महाराणा प्रताप ने भीलों के सहयोग से मुगलों का वर्षों तक किया सामना

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मूकनायक मीडिया ब्यूरो | 18 मार्च, 2023 | जयपुर- डूंगरपुर : राजस्थान के डूंगरपुर, बांसवाड़ा और उदयपुर का मिला जुला क्षेत्र “वागड़” कहलाता है। राजा डूंगरिया भील से वागड़ और आसपास के दुश्मन थरथर कांपते थे। वागड़ प्रदेश अपने उत्सव प्रेम के लिए जाना जाता है। यहां की मूल बोली “वागड़ी” है। जिस पर गुजराती भाषा का प्रभाव दिखाई देता है। वागड़ प्रदेश की बहुसंख्यक लोग भील आदिवासियों की है। वहा पर कलाल समाज के भी लोग रहते हैं। यह इलाका पहाड़ों से घिरा हुआ है। इन्ही के बीच इन आदिवासियों का घेरा है।

इतिहास
डूंगरपुर की स्थापना 13 वी शताब्दी मे राजा डूँगरिया भील ने की थी। रावल वीर सिंह नेे भील सरदार डुंगरिया को हराया जिनके नाम पर इस जगह का नाम डूंगरपुर पड़ा था। 1818 में ईस्ट इंडिया कंपनी ने इसे अपने अधिकार में ले लिया। यह जगह डूंगरपुर प्रिंसली स्टेट की राजधानी थी। भारतीय इतिहास में भीलो की गौरव पूर्ण इतिहास रहा है। हमेशा देश जाति धर्म तथा स्वाधीनता के रक्षा के लिए अपने प्राणों का बलिदान देने में कभी संकोच नहीं किया।

उनके इस त्याग पर पूर्ण भारत को गर्व है। वीरों की इस भूमि में भील राजाओं के अनेक छोटे-बड़े राज्य रहे हैं, जिन्होंने भारत के स्वाधीनता के लिए संघर्ष किया। इन्हीं राज्यों में डूंगरपुर का एक विशेष स्थान रहा है, जिसमें इतिहास के गौरव राजा डूंगरिया भील का जन्म हुआ था। डूंगरपुर के महान राजा डूंगरिया भील अपने पराक्रम और शौर्य के लिए पूरी दुनिया में एक मिसाल के तौर पर जाने जाते हैं ।

डूंगरिया भील ने देश और धर्म की स्वाधीनता के लिए सब कुछ न्योछावर कर दिया। राजा डूंगरिया भील डूंगरपुर राज्य के महान सम्राट राजा थे। राजा डूंगरिया 13 वी शताब्दी में डूंगरपुर की स्थापना की थी। उन्होंने डूंगरपुर साम्राज्य को बहुत ही मजबूत बना लिया था। वहां के सारे लोग राजा डूंगरिया भील को राजा नहीं बल्कि भगवान के रूप में मानते थे। राजा डूंगरिया भील अपनी प्रजा के दुख सुख में हमेशा उनका साथ देते। राजा डूंगरिया भील ने कहा कि मेरी प्रजा ही मेरा स्वाभिमान है।

डूंगरपुर साम्राज्य के सारे लोग राजा डूंगरिया भील के लिए मरने मिटने के लिए हमेशा तैयार रहते थे। दुश्मन भी डूंगरपुर की तरफ नजर उठाने की भी हिम्मत नहीं करता था राजा डूंगरिया भील के नाम से ही दुश्मन थरथर कांपते थे। डूंगरपुर दुनिया के महान रियासतों के नाम से प्रसिद्ध हुआ। उनकी छतरी डूंगरपुर शहर के पूर्वी भाग में डूंगरिया भील की पहाड़ी पर बनी है। जहां पर वह दुश्मनों से लड़ाई करते हुए पहाड़ी से गिरने से वह शहीद हो गये।

भारतीय इतिहास की बिडंबना और अजीब बात है कि आदिवासियों के राज का कोई दस्‍तावेज़ीकरण नहीं किया गया। डूंगरपुर के स्‍थापना दिवस से एक दिन पहले यहां के आदिवासी राजा का शहादत दिवस यहां के मूलनिवासी मनाते हैं। यह भीलों के साथ हुआ पहला विश्‍वासघात था जिसका विस्‍तार आज के डूंगरपुर में हम देख सकते हैं!

आधुनिक भारत में भील आदिवासियों के संग हुए दूसरे विश्‍वासघात की कहानियाँ पुराणों से भी पुरानी है। ऐसा ही एक जघन्य विश्वासघात साठ के दशक में डूंगरपुर के शाही परिवार महारावल लक्ष्‍मण सिंह डूंगरपुर ने किया। उन्होंने अपने राज्‍य की ज़मीनें बेची। भीलों ने अपने नाते-रिश्‍तेदारों से उधार पैसे लेकर उन लोगों से संपर्क किया जो राजा को जानते थे। कुछ लोगों को ज़मीनों का पट्टा भी मिला। यह पट्टा काग़ज़ पर नहीं था बल्कि कपड़े के एक टुकड़े पर स्‍याही से बिक्री का सबूत बनाया गया था।

अगले कुछ साल तक यहां यथास्थिति बनी रही। जिन्‍हें ज़मीन मिली, वे आदिवासी उसे साफ़ कर के खेती के लायक बना लिए और उपज लेने लगे। अचानक 1977 में राजस्‍थान सरकार ने ज़मीन का सर्वे शुरू किया और भीलों से कहा गया कि यह ज़मीन उनकी नहीं है। राजस्‍थान भूमि सुधार एवं भूस्‍वामी एस्‍टेट अध्धिग्रहण कानून, 1963 के मुताबिक पुराने राजाओं की सारी ज़मीन अब सरकार की थी।

128744905 18 300x169 आदिवासी भील राजा डूंगर बरंडा ने बसाया डूंगरपुर भीलों का गढ़, राजपूतों से मिला धोखा, महाराणा प्रताप ने भीलों के सहयोग से मुगलों का वर्षों तक किया सामना
विश्व गुरु बनाने वाले देश के आदिवासियों के घर

राजा ने यह बात भीलों से ज़मीन देते वक्‍त छुपा ली थी। अधिकतर जमीन 1963 के बाद ही भीलों को बेची गई थी। सर्वे के बाद भी पांचेक साल तक आदिवासी खेती करते रहे लेकिन 1982 से उनके पास सरकारी भूमि पर अतिक्रमण संबंधी नोटिस आना शुरू हो गए। इन भीलों से अतिक्रमण के दंडस्‍वरूप 500 से 5000 रुपए के बीच राशि सरकार ने मांग ली।

एक बार फिर से भीलों को कर्ज लेना पड़ा, अपने गहने बेचने पड़े ताकि दंड चुकाया जा सके। किसी ने इसके खिलाफ आवाज नहीं उठाई। सबको यह लग रहा था कि दंड देने के बाद ज़मीन फिर से उनकी हो जाएगी। बाद के वर्षों में दंड की राशि तो कम होती गई लेकिन 30 से ज्‍यादा वर्षों से से लगातार वसूली जा रही है। भीलों ने अपनी ज़मीन के एवज के तीन दशक के दौरान जितना दंड चुकाया है, वह उनकी ज़मीन की मूल कीमत से भी कहीं ज्‍यादा है।

एक बड़ा संकट इधर बीच यह पैदा हुआ है कि चूंकि चक वाली ज़मीनें सरकारी हैं, तो सरकार ने इन्‍हीं ज़मीनों को खनन के लिए लीज़ पर भी दे दिया है। इसका नतीजा यह हुआ है कि ग्रामीण आबादी के बीचोबीच धड़ल्‍ले से खनन का काम जारी है और भील आदिवासी सिलकोसिस जैसी गंभीर बीमारियों से उसकी कीमत चुका रहे हैं।

कुल मिलाकर स्थिति यह है कि आदिवासी अपनी ही ज़मीन और अपने ही संसाधनों का दंड पचास साल से भर रहे हैं और उनके हाथ में कुछ भी नहीं। पांचवीं अनुसूची के क्षेत्रों में पंचायती राज कानून लागू होने के बाद से आदिवासियों को यह बात समझ में आई कि यह सारे संसाधन उनके अपने हैं और संविधान में दिए अधिकार के तहत वे इन पर दावा कर सकते हैं।

ऐसी जटिल स्थिति न तो झारखण्‍ड में है और न ही छत्‍तीसगढ़ में, फिर भी दक्षिणी राजस्‍थान वहां के मुकाबले राजनीतिक रूप से बहुत शांत है। ग्राम सभा बनाने, गांव गणराज्‍य के पत्‍थर गाड़ने और संविधान के दायरे में खुद को शिक्षित करने का काम यहां लंबे समय से चल रहा है और आज भी जारी है।

08 09 2015 08knj07 c 2 300x201 आदिवासी भील राजा डूंगर बरंडा ने बसाया डूंगरपुर भीलों का गढ़, राजपूतों से मिला धोखा, महाराणा प्रताप ने भीलों के सहयोग से मुगलों का वर्षों तक किया सामना
भीलों के अनेक राज्य कायम थे पर उनकी स्थिति किसी ने नहीं सुधारी

भील जनजाति की परिवार व्यवस्था
भील जनजाति में परिवार प्राचीनकाल से ही पितृसत्तात्मक होते हैं और ये जनजाति आज भी संयुक्त परिवार में रहना पसंद करती हैं। भील जनजाति एक योद्धा जनजाति के रूप में जानी जाती हैं। भील जाति के लोग परंपरागत रूप से बहुत अच्छे तीरंदाज होते हैं।

मेवाड़ राज्य की स्थापना के साथ ही मेवाड़ के महाराणाओं को भील जाति का निरन्तर सहयोग मिलता रहा। महाराणा प्रताप अकबर के विरुद्ध भीलों के सहयोग से निरन्तर संघर्ष कर अकबर को परेशान करते रहें। मेवाड़ के महाराणा इसी जनजाति के सहयोग से मुगलों का वर्षों तक सफलतापूर्वक सामना करते रहें।

प्रताप की सेना में भीलू राणा और कई अन्य योद्धा थे। यही कारण हैं कि भील जाति की सेवाओं के सम्मान स्वरुप मेवाड़ के राज चिह्न में एक और राजपूत तथा दूसरी और भीलू राणा अंकित हैं। मेवाड़ के महाराणा भीलों के अंगूठे के खून से अपना राजतिलक करवाते थे। अंग्रेजी शासन के समय मेवाड़ भील कोर का गठन किया गया जो आज भी विद्यमान हैं।

भीलों के राज्य
राजस्थान में भीलों ने कई राज्यों में शासन किया। दक्षिणी राजस्थान एवं हाड़ौती प्रदेश में भीलों के कई छोटे-छोटे राज्य थे। जिसे आगे बताया जा रहा हैं।

कोटा : कोटा राज्य भील जाति का प्रमुख केंद्र था यहां पर कई वर्षों तक भील जातियों का शासन रहा। कोटा के पास स्थित अकेलगढ़ का पुराना किला तथा आसलपुर की ध्वस्त नगरी पर भीलों का शासन था। यहां के भील सरदारों को कोटियाउपनाम (उपाधि) से जाना जाता था। बूंदी के शासक समरसिंह के पुत्र जैत्रसिंह ने 1274 में कोटिया भील को मार कर हाडा वंश की नींव रखी तथा कोटिया सरदार के नाम पर कोटा राज्य की स्थापना की।

मनोहर थाना : मनोहर थाना (झालावाड़) के आसपास 1675 तक भील जाति के चक्रसेन का राज्य था। कोटा के राजा भीमसिंह ने भील राजा चक्रसेन को हराकर उसके राज्य पर अपना अधिकार कर लिया।

डूंगरपुर : डूंगरपुर में डूंगरिया भील का अधिकार था। वीर विनोद ग्रन्थ (श्यामलदास) के अनुसार चित्तौड के राजा महाप (रतन सिंह का पुत्र) ने डूंगरिया भील को मारकर डूंगरपुर पर अधिकार कर लिया।

बांसवाड़ा : बांसवाड़ा राज्य बांसिया नामक भील के अधिकार में था। जगमाल (डूंगरपुर के उदयसिंह के द्वितीय पुत्र) ने इस राज्य को जीतकर अपना अधिकार कर लिया।

कुशलगढ़ : कुशलगढ़ राज्य पर कुशला भील का आधिपत्य था।

रामपुरा और भानपुरा : मेवाड़ और मालवा के बीच का क्षेत्र आमद के नाम से जाना जाता हैं। आमद प्रदेश में रामपुरा और भानपुरा नामक राज्यों में क्रमशः रामा और भाणा नामक भीलों का अधिकार था। चंद्रावतों ने इन्हें हराकर अपना अधिकर लिया।

गढ़ मांदलिया : अजमेर मेरवाड़ा क्षेत्र में स्थित मीणाय ठिकाने पर भी मांदलिया भीलों का राज्य था । मांदलिया भीलों द्वारा बनाया किला आज भी स्थित हैं जो गढ़ मांदलिया के नाम से प्रसिद्ध हैं।

जवास जगरगढ़ : मेवाड़ के जवास जगरगढ़ पर भी भील राजाओं का शासन था। जगरगढ़ को जोगराज ने बसाया था जिस पर खींची राजाओं ने अपना अधिकार कर लिया।

ईडर : गुजरात के ईडर पर सोढ़ा गोत्र के सावलिया भील का शासन था । राठौड़ों ने भीलों को हराकर ईडर पर अपना अधिकार कर लिया।

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आज़ादी का अमृत-महोत्सव मनाने वाले देश में आदिवासियों के रिहायसी घर

जीवन-शैली    

इन लोगों के बारे में कहा जाये तो, वे दुनिया से अजनबी है। वे अपने ही लोगों में रहते हैं। जैसे कहा गया है कि वे दुनिया के वास्तविकता से कोई तालुक्कात नहीं करते लेकिन, गुजरात पास में है तो काम के सिलसिले में अहमदाबाद में पलायन होता है और नेशनल हाईवे की स्थित में ही इलाका होने के नाते लोग अब जानने लगे हैं।

इनमें देखा जाये तो वे एक-दूसरे के लिए हमेशा मदद के लिए तैयार होते हैं। यही इनकी विशेषता है जैसे शादी की बात की जाये तो लोगों की मदद की वजह से शादी की विधि पूरी की जाती है| शादी के हल्दी की रस्म में जो कोई हल्दी लगाने दूल्हा या दुल्हन को लगाने आते है, हर कोई अपने अपने हिसाब से पैसे देने की कोशिश करता है और उसीसे से शादी की आगे की रस्म पूरी की जाती है।

हमारी भारतीय संस्कृती पुरुष-प्रधान मानी जाती है। लेकिन इनमें औरते और पुरुष एक जैसे ही माने जाते हैं। लड़के और लडकियों को अपने पसंदीदार व्यक्ति को चुनने की संमती होती है। जैसे अप्रैल महीने में “भगोरिया” नाम का त्यौहार होता है। इनमे लड़के लडकिया मेले में आते है। इस मेले में वे अपने पसंदीदार व्यक्ति को चुनके शादी की जाती है।

यहाँ की भाषा अगर जानो तो वागडी में बोली में बोली जाती है। यह भाषा थोडी-सी गुजराती तथा हिंदी भाषा से मिलती-जुलती है। वैसे तो पास में ही 25 किलोमीटर की दुरी पर गुजरात है। इस वजह से भाषा उनसे मिलती जुलती है।13 42 049316000rai ll 300x208 आदिवासी भील राजा डूंगर बरंडा ने बसाया डूंगरपुर भीलों का गढ़, राजपूतों से मिला धोखा, महाराणा प्रताप ने भीलों के सहयोग से मुगलों का वर्षों तक किया सामना

यहाँ पर महुआ नाम की शराब बनाई जाती है। जब महुआ के पेड़ पर फूल आते है, तो बड़े से लेकर छोटे बच्चे तक महुआ के फूलों को बीनते है और उसके बाद उस पर महुआ जाती है। शिक्षा अब इन लोगों में बढ़ रही है, स्कूल में लडकियों की संख्या ज्यादा से ज्यादा दिखेगी । युवाओं ज्यादातर वहाँ पर शिक्षक की बनने की रूचि है।

बिच्छिवारा के इलाके में नागफणी नाम का मंदिर है जो जैन धर्म लोगो के दैवत है। चुंडावाडा और कनबा नाम के गाव लोगो में जाना माना है क्योंकि वहा का हर घर पढ़ा-लिखा है। कनबा गाव में ज्यादा से ज्यादा शिक्षको के घर स्थित है। उसके अलावा वकील, डाक्टरी की हुई लोग भी वहाँ पर रहते हैं। चुंडावाडा में चुंडावाडा नाम का महल जाना माना है। इनके लिए फसली होली सबसे महत्वपूर्ण त्यौहार है। होली के 15 दिन पहले से ही ढोल बजाये जाते हैं। होली दे दिन में लड़के-लड़कियाँ नृत्य करते हैं।

 दूर-दूर तक फैली हैं पहाड़ियां। इनकी हरियाली, खेत-खलिहान, सीधे-सरल लोग…। डूंगरपुर पहुंचकर आप एक ऐसी दुनिया में प्रवेश करते हैं, जो आधुनिक जीवन में अब दुर्लभ हो गई है। आप जिधर भी नजर दौड़ाएंगे, आपको कुछ न कुछ रोचक नजर आएगा। शहर हो या गांव, यहां भील आदिवासियों की टोलियां विचरण करती हुई नजर आ जाएंगी। दरअसल, यहां भीलों की संख्या काफी है। यहां रंग-बिरंगी लुभावनी प्राकृतिक छटा व राजस्थान के अन्य प्रदेशों की तरह अचंभित कर देने वाले महल और झील ही नहीं हैं, बल्कि इस शहर की समृद्ध संस्कृति भी आपका दिल लुभा लेगी।

खासतौर पर भीलों की दुनिया को देखना आपके लिए नया और अनोखा अनुभव होगा। दक्षिणी राजस्थान में बसे डूंगरपुर को पहाड़ियों का शहर कहा जाता है। यहां बसा है भील आदिवासियों का सुंदर संसार, जिन्होंने पुरानी संस्कृति को आज भी जीवित रखा है। बांगड़ अंचल के इस जिले में हाल ही में ‘आदिवासियों का कुंभ’ कहा जाने वाला वेणेश्वर मेला संपन्न हुआ है। 

बांगड़ का जीवन-आधार सोम और माही नदियां
अरावली पर्वत श्रेणियों के बीच बसा है डूंगरपुर शहर। पहाड़ी ढलानों पर हरियाली और घास के मैदान दूर से ही लुभा लेते हैं। यहां की टेकरियों यानी छोटी पहाड़ियों पर बसी भीलों की बस्तियां इसकी सुंदरता को और बढ़ा देती हैं। टेढ़े-मेढ़े रास्ते, पगडंडियां, बरसाती झरने, नदी-नाले और सागवान, महुआ, आम व खजूर के पेड़ इसका गहना हैं। इन सबके साथ इसकी सुंदरता में चार चांद लगाने का काम करती हैं यहां की सोम और माही नदियां। इन्हें बांगड़ अंचल के जीवन का आधार कहा जाता है।

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भगोरिया पर्व पर जीवनसाथी का चुनाव
भील आदिवासी नृत्य-गीतों के खूब शौकीन होते हैं और अपने सामाजिक उत्सवों में तरह- तरह के नृत्य करते हैं। इनके नृत्यों में ‘गवरी नृत्य’ प्रमुख है, जो वर्षा ऋतु में किया जाता हैं। अप्रैल महीने में भगोरिया नामक त्योहार मनाया है। इस अवसर पर भी मेला लगता है। आदिवासी कुंभ मेले यानी बेणेश्वर मेले के अलावा भगोरिया त्योहार के मौके पर भी स्थानीय युवक-युवतियां अपने पसंदीदा जीवनसाथी का चुनाव कर सकते हैं।

गैब सागर जलाशय
शहर की सुंदरता को और भी खूबसूरत बनाता है यहां का गैब सागर जलाशय। इसे स्थापत्य कला के मर्मज्ञ महारावल गोपीनाथ ने बनवाया था। इसके तट पर ही स्थित है महाराव उदयसिंह द्वारा बनवाया गया उदयविलास महल और विजय राज राजेश्वर मंदिर।

ये दोनों ही इमारतें स्थापत्य कला की अद्भुत उदाहरण हैं। गैब सागर के भीतर बादल महल और इसकी पाल पर महारावल पुंजराज द्वारा निर्मित श्रीनाथजी का विशाल मंदिर है, जिसके प्रांगण में अन्य कई छोटे-छोटे मंदिर बने हुए हैं।

भित्तिचित्रों से अलंकृत जूना महल की दीवारें

डूंगरपुर शहर में धनमाता पहाड़ी की ढलान पर बना जूना महल तकरीबन 750 वर्ष पुराना है। इसे ‘पुराना महल’, ‘बड़ा महल’ या फिर ‘ओल्ड पैलेस’ भी कहते हैं। रावल वीरसिंह देव ने इस महल की नींव विक्रम संवत् 1339 में कार्तिक शुक्ल एकादशी को रखी थी।

सात मंजिले इस महल में रहने की माकूल सुविधा के साथ-साथ आक्रमणकारियों से सुरक्षा का भी समुचित प्रबंध था। इस महल ने 13वीं से 18वीं शताब्दी तक कई उतार-चढ़ाव देखे। महल के चौकोर खंभे, सुंदर पच्चीकारी के तोड़े, छज्जे, झरोखे तथा सुंदर जालियां राजपूती स्थापत्य कला का सुंदर नमूना पेश करती हैं। यहां की सभी दीवारें भित्तिचित्रों से अलंकृत हैं। इन पर कांच की बेजोड़ कारीगरी की गई है।

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आसपास के आकर्षण
12वीं सदी का देवसोमनाथ मंदिर डूंगरपुर शहर से 24 किमी. दूर देव गांव में सोम नदी के तट पर स्थित ‘देवसोमनाथ’ नामक शिव मंदिर पर्यटन की दृष्टि से भी दर्शनीय है। श्वेत पत्थरों से बने इस भव्य शिवालय की शोभा देखते ही बनती है। स्थापत्य शैली के आधार पर इसे 12वीं शताब्दी का माना जाता है। मंदिर के पूर्व, उत्तर तथा दक्षिण में एक-एक द्वार तथा प्रत्येक द्वार पर दोमंजिले झरोखे निर्मित हैं।

मंदिर के गर्भगृह के ऊपर एक ऊंचा शिखर तथा गर्भगृह के सामने आठ विशाल स्तंभों से निर्मित एक आकर्षक सभा-मंडप बना हुआ है। सभा-मंडप से मुख्य मंदिर में प्रवेश करने के लिए आठ सीढ़ियां नीचे जाती हैं।

मुख्य मंदिर में स्फटिक से निर्मित शिवलिंग स्थापित है। मंदिर के कलात्मक सभा- मंडप में बने तोरण अपने समय की स्थापत्य कला के सुंदर नमूने हैं। मंदिर में अनेक शिलालेख हैं, जिनसे इसके प्राचीन वैभव की जानकारी मिलती है।

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अद्भुत उदय विलास महल
डूंगरपुर शहर की पूर्वी सरहद को छूता हुआ एक और आकर्षण है ‘उदय विलास पैलेस’। गैब सागर के किनारे हरे-भरे बाग-बगीचों से सजा उदय विलास पैलेस पाषाण कारीगरी का नायाब नमूना है। महल का केंद्रीय भाग अहाते के मध्य निर्मित है, जो एक विशाल टॉवरनुमा और चारों ओर से सुंदर मूर्तिकला व नक्काशी तथा जाली वाले झरोखों से सुसज्जित है। पौराणिक दृश्यों को भी इसकी दीवारों पर करीने से उकेरा गया है। बस आपको एक नजर में ही भा जाएगा उदय विलास महल।

भविष्यवक्ता संत मावजी का मंदिर
डूंगरपुर से 55 किलोमीटर दूर साबला ग्राम में अपनी भविष्यवाणियों तथा भजनों के लिए प्रसिद्ध संत मावजी महाराज का मंदिर है। इस मंदिर की स्थापत्य कला भी दर्शनीय है।

देवेंद्रकुंवर राज्य संग्रहालय
डूंगरपुर शहर में राजमाता देवेंद्रकुंवर राज्य संग्रहालय है, जिसे वर्ष 1988 में आम जनता के लिए खोला गया था। संग्रहालय की दीर्घा में तत्कालीन बांगड़ प्रदेश के इतिहास के बारे में जानकारी मिलती है। संग्रहालय शुक्रवार छोड़कर बाकी दिनों में प्रात: 10 से सायं 4.30 बजे तक खुला रहता है।

गलियाकोट में है सैय्यद फखरुद्दीन की मजार
डूंगरपुर जिले में दाउदी बोहरा संप्रदाय का प्रसिद्ध धर्मस्थल गलियाकोट है। यहां सैय्यद फखरुद्दीन नामक पीर की मजार पर जियारत करने के लिए दूर-दूर से उनके अनुयायी आते हैं, जिनके ठहरने के लिए आरामदायक धर्मशालाएं बनी हुई हैं। यहां मुहर्रम के 27वें दिन उर्स मनाया जाता है। डूंगरपुर से 37 मील दूर बसा यह प्राचीन नगर कभी परमारों की राजधानी भी रहा था।

आदिवासियों का कुंभ
बेणेश्वर मेला बेशक इन दिनों प्रयाग कुंभ अपनी समाप्ति की ओर है, पर क्या आप जानते हैं कि राजस्थान के डूंगरपुर जिले में भी एक कुंभ लगता है। जिला मुख्यालय से करीब 70 किलोमीटर दूर माही, सोम और जाखम नदियों के पवित्र संगम स्थल पर स्थित है बेणेश्वर धाम।

तीनों नदियों के संगम स्थल पर एक टापू है, जिसे ‘आबूदरा’ कहते हैं। इस आबूदरा टापू को स्थानीय बोलचाल की भाषा में ‘बेण’ कहते हैं। शायद इसी कारण इस स्थान का नाम बेणेश्वर पड़ा। यहां हर वर्ष माघ पूर्णिमा के अवसर पर सात दिवसीय विशाल मेला लगता है, जो आदिवासियों के कुंभ के रूप में प्रसिद्घ है। यह मेला 15 दिनों तक चलता है। मेले में लाखों की तादाद में भील आदिवासी परंपरागत ढंग से बड़े उत्साह एवं उमंग के साथ भाग लेते हैं।

यह देश में सबसे बड़े आदिवासी मेले के रूप में विख्यात है। माघ पूर्णिमा के दिन यहां श्रद्धालु स्नान करते हैं और दिवंगत परिजनों की अस्थियां जल में प्रवाहित करते हैं। मेले में राजस्थान, मध्य प्रदेश एवं गुजरात के अलावा अन्य स्थानों से भी बड़ी तादाद में श्रद्धालु आते हैं। यह मेला भील युवक-युवतियों को जीवनसाथी चुनने का भी अवसर देता है। मेले में हाथों में तीर-कमान, तलवार व लाठी लिए युवक होते हैं तो परंपरागत गहनों-कपड़ों में सजी भील कन्याएं खास आकर्षण का केंद्र होती हैं।

लजीज लापसी और कुरकुरी जलेबी
यहां स्थानीय लोगों द्वारा अपने खानपान में अन्य भारतीय घरों की तरह ज्यादातर दालों, सब्जियों, गेहूं-मक्का आदि का उपयोग किया जाता है। पर यदि आप डूंगरपुर के खास खानपान के बारे में जानना चाह रहे हैं तो बता दें कि आपको यहां मिलने वाली गुड़ से बनी लापसी का स्वाद कभी नहीं भूलेगा। यहां के लोग शादी समारोह, त्योहार आदि हर तरह की खुशी के मौके पर लापसी बनाना पसंद करते हैं। वैसे, यहां के हाट बाजार और क्षेत्रीय मेलों की दुकानों में जलेबी की दुकानें भी खूब सजती है। यहां की जलेबी बड़ी रसभरी और कुरकुरी होती है।

हाट में खरीदारी का आनंद
सदर बाजार और घुमटा बाजार यहां खरीदारी के प्रमुख केंद्र हैं। ये शहर के पुराने बाजार माने जाते हैं। जिले के सीमलवाड़ा, सागवाड़ा, कुआं, चितरी, आसपुर आदि बाजार भी खरीदारी के लिए उपयुक्त हैं। डूंगरपुर के सोने और चांदी के कारीगर अपनी दक्षता के लिए प्रसिद्ध हैं। यहां से आप पिक्चर फ्रेम और रंग-बिरंगे खिलौने भी ले जा सकते हैं। सागवाड़ा व डूंगरपुर शहर में सोने-चांदी का प्रमुख बाजार भी है।

यदि आप राजस्थानी वस्त्रों की खरीदारी करना चाहते हैं तो आपको यहां सीमलवाड़ा, सागवाड़ा, आसपुर आदि में शॉपिंग के लिए आना होगा। ये बाजार शहर के ही अंदर हैं। विभिन्न कस्बों में आयोजित होने वाले मेले व हाट बाजार स्थानीय लोगों की जरूरत का सामान उपलब्ध कराते हैं। यहां से आपको ग्रामीण हाट-बाजार में खरीदारी का आनंद मिल सकता है। आप यहां से मिट्टी के बर्तन, मूर्तियां और लकड़ी के खिलौने व औजार खरीद सकते हैं।

कैसे और कब जाएं?
हवाई मार्ग से डूंगरपुर जाने के लिए निकटतम एयरपोर्ट डबोक (उदयपुर) में है। यह शहर से 110 किलोमीटर दूर है। निकटतम रेलवे स्टेशन रतलाम (म.प्र.) यहां से तकरीबन 180 किमी. की दूरी पर है। यह रेलवे स्टेशन देश के प्रमुख शहरों से जुड़ा हुआ है। डूंगरपुर को राजस्थान एवं उत्तरी भारत के शहरों से जोड़ने वाले अनेक सड़क मार्ग हैं। राजस्थान राज्य पथ परिवहन की बसों के अलावा निजी बसें भी डूंगरपुर के लिए चलती हैं। आप यहां वर्ष भर आ सकते हैं, लेकिन सर्दी का मौसम यहां आने के लिए ज्यादा अनुकूल है।

मुख्य आकर्षण : डूंगरपुर की हवेली जूना महल
जूना महल
सफेद पत्थरों से बने इस सातमंजिला महल का निर्माण १३वीं शताब्दी में हुआ था। इसकी विशालता को देखते हुए यह महल से अधिक किला प्रतीत होता है। इसका प्रचलित नाम पुराना महल है। इस महल का निर्माण तब हुआ था जब मेवाड़ वंश के लोगों ने अलग होकर यहाँ अपना साम्राज्य स्थापित किया था। महल के बाहरी क्षेत्र में बने आने जाने के संकर रास्ते दुश्मनों से बचाव के लिए बनाए गए थे। महल के अंदर की सजावट में काँच, शीशों और लघुचित्रों का प्रयोग किया गया था। महल की दीवारों और छतों पर डूंगरपुर के इतिहास और 16वीं से 18वीं शताब्दी के बीच राजा रहे व्यक्तियों के चित्र उकेरे गए हैं। इस महल में केवल वे मेहमान की आ सकते हैं जो उदय विलास महल में ठहरे हों।

देव सोमनाथ मंदिर
देव सोमनाथ डूंगरपुर से 24 किलोमीटर उत्तर-पूर्व में स्थित है। दियो सोमनाथ सोम नदी के किनार बना एक प्राचीन शिव मंदिर है। मंदिर के बार में माना जाता है कि इसका निर्माण विक्रम संवत 12 शताब्दी के आसपास हुआ था। और इस मंदिर के बारे में यह भी कहा जाता है कि इसे एक रात में बनाया गया था। बिना किसी चूनाई के सफेद पत्थर से बने इस मंदिर पर पुराने समय की छाप देखी जा सकती है। मंदिर के अंदर अनेक शिलालेख भी देखे जा सकते हैं।

संग्रहालय
इस संग्रहालय का पूरानाम है राजमाता देवेंद्र कुंवर राज्य संग्रहालय और सांस्कृतिक केंद्र। यह संग्रहालय 1988 में आम जनता के लिए खोला गया था। यहाँ एक खूबसूरत शिल्प दीर्घा है। इस दीर्घा में तत्कालीन वागड़ प्रदेश की इतिहास के बार में जानकारी मिलता है। यह वागड़ प्रदेश आज के डूंगरपुर, बंसवाड़ा और खेरवाड़ा तक फैला हुआ था। समय: सुबह 10 बजे-शाम 4.30 बजे तक, शुक्रवार और सरकारी अवकाश के दिन बंद

गैब सागर झील
इस झील के खूबसूरत प्राकृतिक वातावरण में कई पक्षी रहते हैं। इसलिए यहाँ बड़ी संख्या में पक्षियों को देखने में रुचि रखने वाले यहाँ आते हैं। झील के पास ही श्रीनाथजी का प्रसिद्ध मंदिर है। मंदिर परिसर में मुख्य मंदिर के अलावा कई छोटे-छोटे मंदिर हैं। इनमें से एक मंदिर विजय राज राजेश्वर का है जो भगवान शिव को समर्पित है।

बेणेश्वर धाम
बेणेश्वर धाम (60 किलोमीटर) बेणेश्वर धाम डूंगरपुर से 60 किलोमीटर दूर है। इस मंदिर में इस क्षेत्र का सबसे प्रसिद्ध और पवित्र शिवलिंग स्थापित है। यह मंदिर सोम माही और जाखम के मुहाने पर बना है। यह एक त्रिवेणी संगम है इसे वागड़ के कुंभ के नाम से भी जाना जाता इस दो मंजिला भवन में बारीकी से तराशे गए खंबे और दरवाजे हैं।

माघ शुक्ल एकादशी से माघ शुक्ल पूर्णिमा तक यहाँ एक मेला लगता है। शिव मंदिर के पास ही भगवान विष्णु का मंदिर है। एक अनुमान के अनुसार इस मंदिर का निर्माण 1793 ई. में हुआ था। इस मंदिर के बारे में माना जाता है कि इसी जगह भगवान कृष्ण के अवतार मावजी ने ध्यान लगाया था। जोकि डूंगरपुर जिले में स्थित गेपसागर जील के उपर से पैदल चलकर बेणेश्वर धाम पहुंचे थे यहाँ पर एक और मंदिर भी है जो ब्रह्माजी को समर्पित है।

गलीयाकोट
माही नदी के किनार बसा गलीयाकोट गाँव डूंगरपुर से 58 किलोमीटर दक्षिण पूर्व में स्थित है। एक जमाने में यह परमारों की राजधानी हुआ करता था। आज भी यहाँ पर एक पुराने किले के खंडहर देखे जा सकते हैं। यहाँ पर सैयद फखरुद्दीन की मजार है। उर्स के दौरान पूरे देश से हजारों दाउद बोहारा श्रद्धालु आते हैं। यह उर्स प्रतिवर्ष माहर्रम से 27वें दिन मनाया जाता है। सैयद फखरुद्दीन धार्मिक व्यक्ति थे और घूम-घूम कर ज्ञान का प्रचार-प्रसार करते थे। इसी क्रम में गलीकोट गाँव में उनकी मृत्यु हुई थी। इस मजार के अलावा भी इस जिले में अन्य महत्वपूर्ण स्थान भी हैं जैसे मोधपुर का विजिया माता का मंदिर और वसुंधरा का वसुंधरा देवी मंदिर।

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