जिन्होंने सर्विस के दौरान अपने समाज के शोषितों-वंचितों को तवाज़ो नहीं दी, 15-20 रिटायर्ड ब्यूरोक्रेट की आगामी चुनावों में पॉलिटिकटल कॅरियर शुरू करने की तैयारी

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मूकनायक मीडिया ब्यूरो | 29 अप्रैल, 2023 | जयपुर-दिल्ली : राजस्थान में इसी साल विधानसभा चुनाव हैं। नेताओं के साथ ही 15-20 रिटायर्ड ब्यूरोक्रेट भी इन चुनावों में पॉलिटिकटल कॅरियर शुरू करने की तैयारी में हैं। टिकट के लिए लॉबिंग शुरू कर दी है। ज्यादातर ब्यूराेक्रेट्स किसी पार्टी विशेष की विचारधारा से नहीं जुड़े हैं। कोशिश यही है कि टिकट मिल जाए, भले किसी भी पार्टी से हो।

टिकट के लिए हर ब्यूरोक्रेट की अलग रणनीति है। कोई पद पर रहते हुए जिन नेताओं से नजदीकियां रहीं, उनके जरिए टिकट के लिए प्रयास कर रहा है तो कुछ ब्यूरोक्रेट जातिगत और सामाजिक संगठनों की गतिविधियों में सक्रिय होकर टिकट मांगने के लिए अपना बायोडाटा मजबूत कर रहे हैं।

ब्यूरोक्रेट्स का रिटायरमेंट में बाद राजनीति में आना कोई नई बात नहीं है। राजस्थान की राजनीति का दो दशक का एनालिसिस करें तो बहुत से ब्यूरोक्रेट्स को न केवल चुनाव के टिकट मिले हैं, बल्कि उन्हें विधायक, सांसद और मंत्री तक बनने के अवसर भी। मूकनायक मीडिया ने पूरे प्रदेश से ऐसे रिटायर ब्यूरोक्रेट्स की डिटेल जुटाई तो सामने आया कि इस बार प्रदेशभर में 15-20 सीटों पर ब्यूरोक्रेट्स टिकट चाहने वाले अकूत धन-बल से स्थापित राजनेताओं को कड़ी टक्कर देंगे।

पढ़िए- कौन-कौन कहां से लड़ सकते हैं चुनावaaaaaaaaaaaaaaaaaaaa copy 300x231 जिन्होंने सर्विस के दौरान अपने समाज के शोषितों वंचितों को तवाज़ो नहीं दी, 15 20 रिटायर्ड ब्यूरोक्रेट की आगामी चुनावों में पॉलिटिकटल कॅरियर शुरू करने की तैयारी

निरंजन आर्य: कांग्रेस से टिकट की कोशिश

आर्य जनवरी-2022 में राजस्थान की ब्यूरोक्रेसी के सबसे बड़े पद मुख्य सचिव से रिटायर हुए हैं। वे दलितों के बड़े पैरोकार माने जाते हैं और वर्तमान में मुख्यमंत्री अशोक गहलोत के सलाहकार के रूप में नियुक्त भी हैं। पूर्व में उनकी पत्नी संगीता आर्य सोजत (पाली) से कांग्रेस के टिकट पर चुनाव लड़ चुकी हैं, हालांकि वे हार गई थीं। फिलहाल वह राजस्थान लोक सेवा आयोग (अजमेर) की सदस्य हैं। इस बार इस सीट से आर्य स्वयं चुनाव लड़ सकते हैं। वे कांग्रेस से टिकट लेने का प्रयास करेंगे।

अनिल गोठवाल: चाकसू से टिकट की कोशिश

गोठवाल लंबे समय तक आरपीएस एसोसिएशन के अध्यक्ष भी रहे हैं। बाद में वे प्रमोट होकर आईपीएस बने थे। उनके पुत्र माधोराजपुरा (जयपुर) पंचायत समिति से प्रधान हैं। वे चाकसू (जयपुर) की आरक्षित सीट से चुनाव लड़ने के लिए क्षेत्र में सक्रिय हैं।

चंद्रमोहन मीणा: बस्सी से टिकट की कोशिश

मीणा राज्य के मुख्य सूचना आयुक्त रह चुके हैं। वह अतिरिक्त मुख्य सचिव रह कर रिटायर हुए थे। वे बस्सी (जयपुर) से चुनाव लड़ने के कोशिश करेंगे। वह भाजपा या कांग्रेस किसी भी पार्टी से चुनाव लड़ सकते हैं। बस्सी से वर्तमान में विधायक लक्ष्मण मीणा हैं, जो स्वयं भी रिटायर्ड आईपीएस हैं।

सतवीर सिंह: अलवर की आरक्षित सीट पर ढूंढ़ रहे अवसर

रिटायर्ड आईपीएस सतवीर सिंह हाल ही मानसरोवर में दलित समुदाय के एक बड़े सम्मेलन में मंच पर आपदा राहत राज्य मंत्री गोविंद राम मेघवाल से उलझते हुए दिखे थे। दोनों के बीच मंच पर संबोधित करने के समय को लेकर नोंक-झोंक भी हुई थी। सतवीर अलवर जिले की किसी आरक्षित सीट से चुनाव लड़ना चाहते हैं। वे भाजपा, कांग्रेस या किसी भी पार्टी से टिकट ले सकते हैं।

विजय सिंह झाला: कांग्रेस की ले चुके हैं सदस्यताc1 20221103 20244303 1024x1024 1 287x300 जिन्होंने सर्विस के दौरान अपने समाज के शोषितों वंचितों को तवाज़ो नहीं दी, 15 20 रिटायर्ड ब्यूरोक्रेट की आगामी चुनावों में पॉलिटिकटल कॅरियर शुरू करने की तैयारी

झाला जयपुर में ट्रैफिक एसपी जैसे शीर्ष पद पर रहे हैं। वे पत्र-पत्रिकाओं में लेख लिखने सहित पुस्तक लेखन में भी सक्रिय रहे हैं। वे बिलाड़ा (जोधपुर) से चुनाव लड़ना चाहते हैं। कांग्रेस की सदस्यता ले चुके हैं और टिकट भी इसी पार्टी से चाहते हैं।

लालचंद असवाल: बगरू से लड़ सकते हैं चुनाव

असवाल मूलत: आरएएस थे और प्रमोट होकर आईएएस बने थे। वे टोंक व दौसा जिले के कलेक्टर और जयपुर नगर निगम के आयुक्त भी रहे हैं। दलित समाज के लिए सेवा में रहने के दौरान और रिटायर होने के बाद भी कई कार्यक्रम-सम्मेलन आदि करवाते रहे हैं। वे बगरू (जयपुर) से चुनाव लड़ने के लिए प्रयासरत हैं। वे भाजपा, कांग्रेस या किसी भी अन्य पार्टी से टिकट ले सकते हैं।

महेंद्र चौधरी: भाजपा से टिकट की कोशिश

चौधरी जयपुर ग्रामीण, अजमेर आदि जिलों में एसपी रह चुके हैं। डीआईजी के पद से रिटायर्ड होने के बाद अपने गृह जिले बाड़मेर में सक्रिय हैं। वे भाजपा से टिकट चाहते हैं और बाड़मेर सीट से ही चुनाव लड़ने के लिए प्रयासरत हैं।

हनुमान सिंह भाटी: पुष्कर से टिकट की कोशिश

भाटी जयपुर के संभागीय आयुक्त रहे हैं और अब पुष्कर (अजमेर) से चुनाव लड़ना चाहते हैं, हालांकि वे मूलत: जोधपुर के रहने वाले हैं, लेकिन उनके सेवाकाल का बड़ा हिस्सा अजमेर में गुजरा है। ऐसे में पुष्कर से राजनीति में कॅरियर की शुरुआत करना चाहते हैं। भाटी भाजपा से टिकट लेना चाहते हैं।

मदन लाल मेघवाल: बीकानेर से लड़ सकते हैं चुनाव

रिटायर्ड आईपीएस मेघवाल बीकानेर से चुनाव लड़ना चाहते हैं। वे क्षेत्र में राजनीतिक-सामाजिक रूप से सक्रिय हैं। उन्होंने 2019 में कांग्रेस के टिकट पर लोकसभा चुनाव लड़ा था, लेकिन हार गए थे। वे इस बार भी कांग्रेस ही टिकट लेने के लिए प्रयासरत हैं।

ओपी सैनी: अलवर या भरतपुर से टिकट की कोशिश%name जिन्होंने सर्विस के दौरान अपने समाज के शोषितों वंचितों को तवाज़ो नहीं दी, 15 20 रिटायर्ड ब्यूरोक्रेट की आगामी चुनावों में पॉलिटिकटल कॅरियर शुरू करने की तैयारी

सैनी राजस्थान की ब्यूरोक्रेसी अतिरिक्त मुख्य सचिव के पद से रिटायर हुए थे। फिलहाल वे अलवर जिले में राजनीतिक-सामाजिक स्तर पर सक्रिय हैं। वे कांग्रेस, भाजपा या किसी भी पार्टी से टिकट लेने के लिए प्रयासरत हैं। चुनाव भी अलवर-भरतपुर क्षेत्र की किसी सीट से ही लड़ेंगे।

मदन लाल शर्मा: अलवर के रामगढ़ से लड़ सकते हैं चुनाव

शर्मा सीबीआई में डायरेक्टर स्पेशल के पद से रिटायर हुए हैं। इन दिनों रामगढ़ (अलवर) क्षेत्र में राजनीतिक-सामाजिक रूप से सक्रिय हैं और भाजपा से टिकट चाहते हैं।

केसी वर्मा: भाजपा जॉइन कर चुके हैं

वर्मा जयपुर के संभागीय आयुक्त रहे हैं और फिलहाल निवाई (टोंक) क्षेत्र में सक्रिय हैं। वे भाजपा जॉइन कर चुके हैं और पार्टी से निवाई का टिकट चाहते हैं। निवाई एससी के लिए आरक्षित सीट है।

हरिप्रसाद शर्मा: फुलेरा से मांगेंगे टिकट

शर्मा वर्तमान में राजस्थान कर्मचारी चयन बोर्ड के चैयरमेन हैं। वे रिटायर होने से पहले अजमेर, नागौर, बीकानेर, जयपुर ग्रामीण के पुलिस अधीक्षक रहे हैं। वे अपने किशनगढ़ रेनवाल (जयपुर) क्षेत्र के रहने वाले हैं और बोर्ड के चैयरमेन बनने से पहले इसी क्षेत्र की विधानसभा सीट (फुलेरा) से कांग्रेस का टिकट मांग रहे थे। इस बार भी क्षेत्र में उनके चुनाव लड़ने की चर्चाएं हो रही हैं।

अशफाक हुसैन: कांग्रेस से टिकट का प्रयास

हुसैन दौसा जिले के कलेक्टर रह चुके हैं। वे आरएएस से प्रमोट होकर आईएएस बने थे। वे मूलत: झुंझुनूं के रहने वाले हैं और इन दिनों वहीं राजनीतिक-सामाजिक स्तर पर सक्रिय हैं। उनकी बेटी भी आईएएस हैं। वे कांग्रेस से टिकट पाने का प्रयास कर रहे हैं। पूर्व में उनके भाई रिटायर्ड आईपीएस लियाकत हुसैन कांग्रेस से सांसद का चुनाव लड़ चुके हैं।

60 की उम्र के बाद भी राज भोगने की इच्छा है वजहBewafa Shayari 2021 300x300 जिन्होंने सर्विस के दौरान अपने समाज के शोषितों वंचितों को तवाज़ो नहीं दी, 15 20 रिटायर्ड ब्यूरोक्रेट की आगामी चुनावों में पॉलिटिकटल कॅरियर शुरू करने की तैयारी

आजाद समाज पार्टी के प्रदेशाध्यक्ष प्रोफ़ेसर एआरएम लखन मीणा का कहना है कि दलित, आदिवासी और पिछड़े समाजों के युवाओं में राजनीतिक प्रतिभा खूब है, पर पैसे की कमी के कारण  पॉलिटिकल पार्टियाँ उन्हें टिकट नहीं देती है।

ऐसे में वंचित समाजों को समर्पित लीडरशिप आगे नहीं बढ़ पाती है और मौके का फायदा उठा कर इन वर्गों से ब्यूरोक्रेट बनने वाले कुछ महत्वाकांक्षी अफसर रिटायर होने के बाद उस कमी का लाभ उठाते हैं। लीडर्स की कमी आज तक राजस्थान में बनी हुई है।

खुद के बायोडाटा को पॉलिटिकल पार्टियों के सामने प्रस्तुत करते हैं। पार्टियों को भी भीड़ खींचने वाले चेहरों की जरूरत होती है, तो वे उन्हें टिकट भी देते हैं। राजस्थान में ब्यूरोक्रेसी से पॉलिटिक्स में प्रवेश करने वाले ज्यादातर अफसर इसी पृष्ठभूमि से आते हैं।

प्रोफ़ेसर मीणा का यह भी कहना है कि पद और सत्ता सभी को ललचाते हैं, ब्यूरोक्रेट्स भी इससे अछूते नहीं हैं। राजनीति सभी को लुभाती है। इसमें पद है, पैसा है पावर है। इसकी चमक-दमक से कोई बच नहीं पाता। ब्यूरोक्रेट्स वर्षों तक इसकी चमक-दमक को नजदीक से देखते हैं। ऐसे में रिटायरमेंट के बाद लगता है कि वे भी इस कार्यक्षेत्र को अपना सकते हैं।

यही कारण है कि बहुत से ब्यूरोक्रेट राजनीति में आते हैं। कुछ ऐसे भी उदाहरण हैं, जिन्हें उनकी विशेष योग्यता, उनका धन-बल  देखकर मनुवादी पार्टियाँ उन्हें अपने दलालों के रूप में चुनते हैं।

अनुभव, प्रतिष्ठा और वोट बैंक का लाभ उठाना चाहते हैं

राजनीतिक सामाजिक विषयों के टिप्पणीकार वेद माथुर ने भास्कर को बताया कि ज्यादातर ब्यूरोक्रेट्स उन इलाकों से टिकट मांग रहे हैं, जहां वे अपनी पोस्टिंग के दौरान चर्चित रहे हैं। वे उस लोकप्रियता को भुनाना चाहते हैं, ताकि रिटायर होने के बाद भी राज-काज में बने रहें। यह अलग बात है कि एक-दो ऐसे ब्यूरोक्रेट भी हो सकते हैं, जो जन सेवा की भावना के साथ रिटायरमेंट के बाद राजनीति में जाना चाहते हों।

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