चंद्रशेखर आजाद के महिला पहलवानों के समर्थन के बाद बृजभूषण सिंह की मुश्किलें बढ़ी, पॉक्सो में अरेस्ट का ही नियम है, जमानत का कोई प्रावधान नहीं

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मूकनायक मीडिया ब्यूरो | 18 मई, 2023 | जयपुर-दिल्ली-लखनऊ : यौन उत्पीड़न के आरोपों के संबंध में भारतीय कुश्ती महासंघ के प्रमुख बृजभूषण शरण सिंह की गिरफ्तारी की मांग को लेकर यहां जंतर-मंतर पर भीम आर्मी चीफ चंद्रशेखर अनिश्चित कालीन धरने पर बैठ गये हैं। उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री जी, देश की बेटियों को इंसाफ की जगह लाठियों से पिटवाना आपको बहुत भारी पड़ेगा।

दिल्ली के जंतर-मंतर पर पहलवानों का धरना प्रदर्शन लगातार जारी है। अब तक पहलवानों के इस प्रदर्शन को कई राजनीतिक दलों का समर्थन मिल चुका है। वहीं अब एक के बाद एक नए किरदारों की एंट्री पहलवानों के प्रदर्शन में हो रही है। बता दें कि, खाप पंचायतों के सदस्य अब इस प्रदर्शन में शामिल हो गए हैं। साथ ही इस प्रदर्शन में पंजाब के किसान संगठन भी शामिल हुए हैं।

क्या बोले चंद्रशेखर

वहीं आजाद समाज पार्टी के राष्ट्रीय अध्यख चंद्रशेखर आज़ाद ने भी खुली चुनौती देते हुए कहा है कि अगर मांगों को पूरा नहीं किया गया तो इस आंदोलन को औऱ मजबूत बनाने का काम लिया जाएगा। उन्होंने यह भी कहा कि मैं पहलवानों को अपना समर्थन देने जंतर-मंतर आ चुका हूं। मांगे पूरी नहीं होने तक मैं यहीं पहलवानों के साथ बैठूंगा।

कुश्ती संघ के अध्यक्ष बृजभूषण सिंह पर FIR दर्ज हुए भी 10 दिन बीत चुके हैं। नाबालिग समेत 7 महिला रेसलर्स ने उनके खिलाफ यौन शोषण का केस दर्ज कराया है। इनमें POCSO जैसी गंभीर धाराएं हैं, जिनमें आरोपी को फौरन गिरफ्तार करने के नियम हैं। इसके बावजूद अब तक गिरफ्तारी नहीं हुई है।

पॉक्सो एक्ट काफी सख्त

बृजभूषण शरण सिंह के खिलाफ पॉक्सो एक्ट और सेक्शुअल हैरेसमेंट के केस दर्ज हुए हैं। नाबालिग से होने वाले सेक्शुअल हैरेसमेंट को रोकने के लिए पॉक्सो एक्ट कानून बना है। ये कानून काफी सख्त है। इस केस में आरोपी को पुलिस बेल नहीं दे सकती है। पुलिस सबसे पहले आरोपी को गिरफ्तार करती है और उसके बाद जांच आगे बढ़ाती है। यूपी के पूर्व DGP विक्रम सिंह के मुताबिक पुलिस गिरफ्तारी से पहले आरोप की सत्यता की जांच कर सकती है।

प्राइमरी जांच में पुलिस को आरोप सही लगता है तो आरोपी को गिरफ्तार होने से कोई नहीं रोक सकता है। सुप्रीम कोर्ट के वकील विराग गुप्ता के मुताबिक पॉक्सो कानून में केस दर्ज होने के बाद अपराधों की जांच और उनके ट्रायल के लिए विशेष व्यवस्था बनी है। ऐसे मामलों में गिरफ्तारी के बाद जमानत मिलने में भी मुश्किल होती है। FIR और गिरफ्तारी के लिए CrPC में कानूनी व्यवस्था बनाई गई है।

सुप्रीम कोर्ट इ आदेश का भी हो रहा है उल्लंघन 

केस दर्ज करने के लिए सुप्रीम कोर्ट ने 2014 में अरनेश कुमार और बिहार सरकार के मामले में गाइडलाइन बनाई थीं, लेकिन बृजभूषण शरण सिंह के मामले में उनका पालन नहीं हुआ। सुप्रीम कोर्ट में मामला जाने के बाद दिल्ली पुलिस ने FIR दर्ज की है। CrPC की धारा-41 और 42 के तहत पुलिस आरोपी को गिरफ्तार कर सकती है।

सुप्रीम कोर्ट ने सतेंद्र कुमार अंतिल बनाम केंद्रीय जांच ब्यूरो के मामले में कहा है कि संज्ञेय अपराध में भी गिरफ्तारी अनिवार्य नहीं है। जब तक ऐसा केस के जांच अधिकारी को न लगता हो। यानी यहां दिल्ली पुलिस के जांच अधिकारी को बृजभूषण सिंह की गिरफ्तारी जरूरी नहीं लगती। इसलिए उन्हें गिरफ्तार करने की कोशिश नहीं की जा रही।

4 सिनेरियो में आरोपी की गिरफ्तारी जरूरी

हालांकि ऐसे ही दूसरे मामलों में आरोपियों को गिरफ्तार किया जा चुका है। कानून के एक्सपर्ट का मानना है कि पुलिस गिरफ्तारी न करके अपने अधिकारों का दुरुपयोग कर रही है। रेप, मर्डर, किडनैपिंग और डकैती जैसे मामलों में शामिल लोगों की गिरफ्तारी जरूर होती है, जिससे समाज को और अपराधों से बचाया जा सके। इस तरह 4 सिनेरियो में आरोपी की गिरफ्तारी जरूरी हो जाती है…

1. अगर संगीन अपराध हुआ है। 2. अगर आरोपी से समाज को खतरा है। 3. अगर आरोपी से सबूतों और गवाहों को खतरा है। 4. अगर आरोपी के भागने का खतरा है। बृजभूषण सिंह के केस में 4 में से 3 सिनेरियो गिरफ्तार किए जाने की तरफ इशारा करते हैं।

बृजभूषण के खिलाफ पॉक्सो एक्ट में केस दर्ज हुआ है, जो संगीन अपराध है। इस आधार पर देखें तो गिरफ्तारी होनी चाहिए। बृजभूषण के खिलाफ 30 से ज्यादा केस दर्ज हुए हैं। इनमें मर्डर, आर्म्स एक्ट जैसे अपराध शामिल हैं। इस आधार पर देखें तो गिरफ्तारी होनी चाहिए।

बृजभूषण सिंह 6 बार से सांसद हैं। वह कुश्ती संघ के अध्यक्ष हैं। इस पद रहते हुए उन पर ये गंभीर आरोप लगे हैं। इसके बावजूद वह अपने पद पर बने हुए हैं। ऐसे में पद और रसूख का इस्तेमाल करके वह सबूत से छेड़छाड़ कर सकते हैं। इस आधार पर भी उनकी गिरफ्तारी होनी चाहिए। वह बड़े नेता हैं। एक बार फिर चुनाव लड़ने की तैयारी में हैं। ऐसे में उनके भागने की संभावना कम है। ऐसे में इस आधार पर उनकी गिरफ्तारी की जरूरत नहीं लगती है।

बृजभूषण शरण को विशेष कानूनी कवच नहीं

आपराधिक कानून के मामले में संविधान के अनुसार राष्ट्रपति और राज्यपाल को विशेष सुरक्षा मिली है और अन्य सभी लोग कानून के सामने बराबर हैं। संसद सत्र के दौरान यदि किसी सांसद की गिरफ्तारी होती है तो स्पीकर को सूचित करने का नियम और प्रोटोकॉल है, लेकिन भारतीय कुश्ती संघ के अध्यक्ष और सांसद होने के नाते बृजभूषण शरण को विशेष कानूनी कवच नहीं मिला है।

बृजभूषण के खिलाफ महिला की लज्जा भंग करने के आरोप में IPC की धारा 354, 354(A), 354(D) के तहत केस दर्ज किया गया है। इस मामले में अगर वो दोषी पाए जाते हैं तो उन्हें अधिकतम 3 साल तक की सजा हो सकती है। वहीं, एक केस पॉक्सो एक्ट में भी दर्ज किया गया है। पॉक्सो एक गैर-जमानती अपराध है। इसमें दोषी पाए जाने पर कम से कम 7 साल की जेल और अधिकतम उम्रकैद तक की सजा हो सकती है।

देश में एक तिहाई विधायक और सांसदों के खिलाफ आपराधिक मामले दर्ज हैं। बृजभूषण शरण के खिलाफ पहले भी कई आपराधिक मामले दर्ज हो चुके हैं। सरकारी अधिकारियों के खिलाफ FIR हो जाए तो उन्हें नौकरी से निलंबित कर दिया जाता है, लेकिन ऐसे मामलों में सांसदों की सेहत पर कोई फर्क नहीं पड़ता है।

इस मामले की जांच के बाद चार्जशीट फाइल होगी या फिर पुलिस क्लोजर रिपोर्ट भी फाइल कर सकती है। लोकसभा की अवधि एक साल के भीतर समाप्त हो रही है, इसलिए उनकी वर्तमान सांसदी पर कोई संकट नहीं दिखता है। अदालत में लंबे ट्रायल के बाद यदि उन्हें दो साल से ज्यादा की सजा हुई तो अयोग्य होने के कारण भविष्य में वह 6 साल तक चुनाव नहीं लड़ पाएंगे।

पॉक्सो में अरेस्ट का ही नियम है और बेल का कोई प्रावधान नहीं

2012 में निर्भया कांड की वजह से यौन अपराधों के मामले में जांच के लिए वर्मा कमीशन बना। 2013 में इस कमीशन की रिपोर्ट आने के बाद कई कानूनों में बदलाव हुए। यौन अपराध को लेकर कानून पहले से ज्यादा मजबूत हुए हैं। यूपी के पूर्व DGP विक्रम सिंह के मुताबिक बाकी धाराओं में दर्ज केस से पॉक्सो एक्ट में दर्ज केस दो वजहों से अलग होते है।

यौन अपराध के मामले में सही से कार्रवाई नहीं करने पर IPC की धारा 166A के तहत पुलिस अधिकारी के खिलाफ कार्रवाई हो सकती है। उचित कार्रवाई नहीं करने वाले अधिकारियों को अपराधी माना जाएगा और उन्हें 6 महीने की जेल हो सकती है।

सेक्शुअल हैरेसमेंट के केस में CrPC के तहत 90 दिनों के अंदर जांच पूरी होनी चाहिए। गिरफ्तारी के लिए कोई तय समय नहीं होती है। हालांकि पॉक्सो में अरेस्ट का ही नियम है और बेल का कोई प्रावधान नहीं है। बृजभूषण शरण सिंह के खिलाफ विदेश में यौन उत्पीड़न करने के आरोप लगे हैं। ऐसे मामलों की जांच में क्षेत्राधिकार का सवाल खड़ा हो सकता है। मामले बहुत पुराने होने की वजह से सबूतों को जुटाना भी मुश्किल होगा।

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