अफसरों और राजनेताओं के भ्रष्टाचार का फेबिकॉल गठजोड़, रिटायर होने के बाद भी कोई न कोई पॉलिटिकल पोस्टिंग, 104 बोर्ड-आयोग की टॉप कुर्सियों में ब्यूरोक्रेट आगे

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मूकनायक मीडिया ब्यूरो | 08, जुलाई 2023 | जयपुर-मुंबई-दिल्ली : कमल-कांग्रेस की सरकारें भ्रष्टाचार में शामिल ज्यादातर अधिकारियों को फिर से फील्ड में पोस्टिंग भी दे देती है। इससे ये साफ होता है कि भ्रष्ट अधिकारियों को राजनीतिक संरक्षण भी प्राप्त है। भ्रष्ट नेता बिना नौकरशाही की मदद के सरकारी धन की यह लूट नहीं कर सकते थे। ख़ास बात यह है कि इस भ्रष्टाचार में निजी क्षेत्र और कॉरपोरेट पूँजी की भूमिका भी शालिम होती है। बाज़ार की प्रक्रियाओं और शीर्ष राजनीतिक- प्रशासनिक मुकामों पर लिए गये निर्णयों के बीच साठगाँठ के बिना यह भ्रष्टाचार इतना बड़ा रूप नहीं ले सकता।

आज़ादी के बाद भारत में भी राजनीतिक और प्रशासनिक भ्रष्टाचार की यह परिघटना तेज़ी से पनपी है। अवैध निजी लाभ के लिये सरकारी अधिकारियों द्वारा अपने विधायी शक्तियों (legislated powers) का उपयोग राजनैतिक भ्रष्टाचार (Political corruption) कहलाता है। किन्तु सामान्यतः सरकारी शक्तियों का दुरुपयोग (जैसे अपने राजनैतिक प्रतिद्वंदियों को सताना/दबाना, पुलिस की निर्दयता आदि) राजनैतिक भ्रष्टाचार में नहीं गिना जाता। कड़वा सत्य है कि राजनीतिक और प्रशासनिक भ्रष्टाचार एक-दूसरे के परस्पर गठजोड़ से ही पनपते हैं।

राजनीतिक और प्रशासनिक भ्रष्टाचार की दो श्रेणियाँ0.63804100 1523426180 bbb 259x300 अफसरों और राजनेताओं के भ्रष्टाचार का फेबिकॉल गठजोड़, रिटायर होने के बाद भी कोई न कोई पॉलिटिकल पोस्टिंग, 104 बोर्ड आयोग की टॉप कुर्सियों में ब्यूरोक्रेट आगे

राजनीतिक और प्रशासनिक भ्रष्टाचार को ठीक से समझने के लिए अध्येताओं ने उसे दो श्रेणियों में बाँटा है। सरकारी पद पर रहते हुए उसका दुरुपयोग करने के ज़रिये किया गया भ्रष्टाचार और राजनीतिक या प्रशासनिक हैसियत को बनाये रखने के लिए किया जाने वाला भ्रष्टाचार।

पहली श्रेणी में निजी क्षेत्र को दिये गये ठेकों और लाइसेंसों के बदले लिया गया कमीशन, हथियारों की ख़रीद-बिक्री में लिया गया कमीशन, फ़र्जीवाड़े और अन्य आर्थिक अपराधों द्वारा जमा की गयी रकम, टैक्स-चोरी में मदद और प्रोत्साहन से हासिल की गयी रकम, राजनीतिक रुतबे का इस्तेमाल करके धन की उगाही, सरकारी प्रभाव का इस्तेमाल करके किसी कम्पनी को लाभ पहुँचाने और उसके बदले रकम वसूलने और फ़ायदे वाली नियुक्तियों के बदले वरिष्ठ नौकरशाहों और नेताओं द्वारा वसूले जाने वाले अवैध धन जैसी गतिविधियाँ पहली श्रेणी में आती हैं।

दूसरी श्रेणी में चुनाव लड़ने के लिए पार्टी-फ़ण्ड के नाम पर उगाही जाने वाली रकमें, वोटरों को ख़रीदने की कार्रवाई, बहुमत प्राप्त करने के लिए विधायकों और सांसदों को ख़रीदने में ख़र्च किया जाने वाला धन, संसद-अदालतों, सरकारी संस्थाओ, नागर समाज की संस्थाओं और मीडिया से अपने पक्ष में फ़ैसले लेने या उनका समर्थन प्राप्त करने के लिए ख़र्च किये जाने वाले संसाधन और सरकारी संसाधनों के आबंटन में किया जाने वाला पक्षपात आता है।

ब्यूरोक्रेट रिटायर्ड नहीं हुए हैं, उनकी भी मलाईदार पदों के लिए भाग-दौड़ शुरू

राजस्थान में विभिन्न आयोग-बोर्ड-अथॉरिटी में चेयरमैन व सदस्यों के 8 पदों के लिए कई रिटायर्ड IAS-IPS जैसे ब्यूरोक्रेट जी-जान से कोशिशों में जुटे हैं। उन्हें विश्वास है कि जैसे उनसे पहले सरकार ने 22 ब्यूरोक्रेट्स को इस तरह के पद देकर नवाजा, वैसे ही उन्हें भी पुरस्कृत किया जाएगा। इस बीच जो ब्यूरोक्रेट रिटायर्ड नहीं हुए हैं, वे भी इन पदों के लिए भाग-दौड़ कर रहे हैं।

प्रदेश में 104 के करीब संवैधानिक, शैक्षणिक, प्रशासनिक आयोग-बोर्ड-अथॉरिटी हैं। ऐसा नहीं है कि सभी में प्रशासनिक अधिकारियों को नियुक्त किया गया हो, जिस भी पार्टी की सरकार है वो अपने कार्यकर्ताओं को ऐसे पदों पर नवाजती हैं, लेकिन ब्यूरोक्रेट भी इस मामले में पीछे नहीं है। अब एक बार फिर खाली हुए 8 शीर्ष पदों पर नियुक्ति पाने के लिए ब्यूरोक्रेट्स ही कतार में दिख रहे हैं। इससे पहले बीते कुछ सालों में 20 से ज्यादा पद ऐसे हैं जिन पर पूर्व ब्यूरोक्रेट्स को ही नियुक्त किया गया है।

प्रदेश के 75 साल के राजनीतिक-प्रशासनिक इतिहास में यह पहली बार है, जब प्रदेश की 14 यूआईटी (नगर विकास न्यास) में चेयरमैन के पद पिछले साढ़े चार सालों से रिक्त चल रहे हैं। इन सभी पदों का कार्यभार जिलों में कलेक्टर संभाल रहे हैं। कोटा, भीलवाड़ा, अलवर जैसे बड़े UIT में बिना चेयरमैन के ब्यूरोक्रेट ही प्रशासनिक कार्यों के निर्णय ले रहे हैं। साढ़े चार साल में इन्हें भरा नहीं गया है। वहां चेयरमैन के अलावा 4 से 10 सदस्यों की भी नियुक्ति करनी होती है, वो भी नहीं हुई।

ब्यूरोक्रेट्स खुद भी रहते हैं सरकारी गाड़ी-बंगले के लिए प्रयासरत141209075501 anty corruption logo  624x351 un nocredit 300x169 अफसरों और राजनेताओं के भ्रष्टाचार का फेबिकॉल गठजोड़, रिटायर होने के बाद भी कोई न कोई पॉलिटिकल पोस्टिंग, 104 बोर्ड आयोग की टॉप कुर्सियों में ब्यूरोक्रेट आगे

रिटायरमेंट के बाद सरकार के प्रशासनिक, आर्थिक, शैक्षणिक बोर्ड-आयोग में टॉप पोस्टिंग पाने के लिए ब्यूरोक्रेट्स हमेशा प्रयासरत रहते हैं। वे नौकरी के अंतिम वर्षों में इसकी तैयारी शुरू कर देते हैं। पॉलिटिकल लीडरशिप को अपने काम-काज से खुश करते हैं, ताकि उन्हें रिटायर होने के बाद भी कोई न कोई पोस्टिंग मिल जाए।

आम तौर पर राजस्थान के प्रशासनिक आयोगों-बोर्ड-कमेटी आदि में सदस्यों और चेयरमैन के पदों पर डेढ़ लाख रुपए से लेकर दो लाख रुपए मासिक तक का वेतनमान है। सरकारी बंगला, वाहन, नौकर, ड्राइवर आदि की सुविधाएं वेतन के अलावा मिलती हैं। अधिकांश का कार्यकाल 3 से 5 वर्ष तक रहता है।

क्या केवल IAS-IPS ही हो सकते हैं नियुक्त, कहता है नियम?

मूल रूप से हर बोर्ड आयोग के अलग-अलग नियम हैं कि किस में किन लोगों को कितनी अवधि तक और कितने वेतनमान के साथ सदस्य या चेयरमैन बनाया जाएगा। लेकिन कहीं पर भी ऐसा कोई नियम (एक-दो बोर्ड निगम को छोड़कर) नहीं है, जहां केवल ब्यूरोक्रेट्स को ही सदस्य बनाया जाए।

अपीलेट प्राधिकरण (रेट) मे तय नियम है, जबकि शेष सभी बोर्ड-निगम-आयोग में सरकार और मुख्यमंत्री के विवेक पर ही निर्भर करता है कि वे किसे सदस्य या चेयरमैन बनाएं। आरपीएससी, यूआईटी, बिजली रेगुलेटरी आदि सहित ज्यादातर बोर्ड निगम में तो विज्ञापन या आवेदन करने की भी आवश्यकता नहीं है। सरकार सीधे ही किसी को भी मनोनीत कर सकती है।

एक्सपर्ट का क्या कहना है?pm 1617973405 300x300 अफसरों और राजनेताओं के भ्रष्टाचार का फेबिकॉल गठजोड़, रिटायर होने के बाद भी कोई न कोई पॉलिटिकल पोस्टिंग, 104 बोर्ड आयोग की टॉप कुर्सियों में ब्यूरोक्रेट आगे

शिक्षाविद् प्रोफ़ेसर राम लखन मीणा का कहना है कि भारत में पब्लिक सेक्टर संस्थाओं के मुखिया अफ़सरों को ‘सरकारी मुग़लों’ की संज्ञा दी जा सकती है। न्यायाधीशों द्वारा किये जाने वाले न्यायिक भ्रष्टाचार की परिघटना भारत में अभी नयी है लेकिन उसका असर दिखाई देने लगा है। नीरव मोदी, विजय माल्या, मेहुल चौकसे इत्यादि प्रकरणों में हुए भीषण भ्रष्टाचार के पीछे भी नेताओं और अफ़सरों का शीर्ष खेल ही था।

राफेल सौदेबाजी के आबंटन में हुए भ्रष्टाचार को भी क्लेप्टोक्रैसी के ताज़े उदाहरण के तौर पर लिया जा सकता है। निचले स्तर पर होने वाला भ्रष्टाचार ‘स्पीड मनी’ या ‘सुविधा शुल्क’ के तौर पर जाना जाता है। थाना स्तर के पुलिस अधिकारी, बिक्री कर या आय कर अधिकारी, सीमा और उत्पाद-शुल्क अधिकारी और विभिन्न किस्म के इंस्पैक्टर इस तरह के भ्रष्टाचार से लाभांवित होते हैं। इसी तरह ज़िला स्तर पर दिये जाने वाले ठेकों के आबंटन में पूरे ज़िला प्रशासन में कमीशन की रकम का बँटना एक आम बात है।

प्रोफ़ेसर मीणा यह भी कहते हैं कि भारत में इसके सामाजिक प्रभाव का एक उदाहरण विवाह के बाज़ार में लाभ के पदों पर बैठे वरों की ऊँची दहेज-दरों के रूप में देखा जा सकता है। लेकिन दूसरी तरफ़ भारतीय उदाहरण ही यह बताता है कि भ्रष्टाचार का यह रूप न केवल शीर्ष पदों पर होने वाली कमीशनखोरी, दलाली और उगाही से जुड़ता है, बल्कि दोनों एक-दूसरे को पानी देते हैं।

पिछले बीस वर्षों से भारतीय लोकतंत्र में राज्य सरकारों के स्तर पर सत्तारूढ़ निज़ाम द्वारा अगला चुनाव लड़ने के लिए नौकरशाही के ज़रिये नियोजित उगाही करने की प्रौद्योगिकी लगभग स्थापित हो चुकी है। इस प्रक्रिया ने क्लेप्टोक्रैसी और सुविधा शुल्क के बीच का फ़र्क काफ़ी हद तक कम कर दिया है। भारत जैसे संसदीय लोकतंत्र में चुनाव लड़ने और उसमें जीतने-हारने की प्रक्रिया अवैध धन के इस्तेमाल और उसके परिणामस्वरूप भ्रष्टाचार का प्रमुख स्रोत बनी हुई है।

प्रोफ़ेसर मीणा का मानना है कि राजनेताओं को चुनाव लड़ने और पार्टियाँ चलाने के लिए धन की ज़रूरत। नौकरशाही का इस्तेमाल करके धन उगाहने के साथ-साथ राजनीतिक दल निजी स्रोतों से बड़े पैमाने पर ख़ुफ़िया अनुदान प्राप्त करते हैं। यह काला धन होता है। बदले में नेतागण उन्हीं आर्थिक हितों की सेवा करने का वचन देते हैं। निजी पूँजी न केवल उन नेताओं और राजनीतिक पार्टियों की आर्थिक मदद करती है जिनके सत्ता में आने की सम्भावना है, बल्कि वह चालाकी से हाशिये पर पड़ी राजनीतिक ताकतों को भी पटाये रखना चाहती है ताकि मौका आने पर उनका इस्तेमाल कर सके। मीडिया मैनेजमेंट के नाम पर अफसरों और राजनेताओं ने मिलकर भ्रष्टाचार को नयी बुलंदियों पर पहुँचा दिया है। mqdefault 5 300x169 अफसरों और राजनेताओं के भ्रष्टाचार का फेबिकॉल गठजोड़, रिटायर होने के बाद भी कोई न कोई पॉलिटिकल पोस्टिंग, 104 बोर्ड आयोग की टॉप कुर्सियों में ब्यूरोक्रेट आगे

रिटायरमेंट के 5 वर्ष तक नहीं मिलनी चाहिए पोस्टिंग

राजनीतिक टिप्पणीकार वेद माथुर का कहना है कि सरकार के साथ तीन-चार दशक काम करने पर ब्यूरोक्रेट्स के संबंध व ट्यूनिंग बहुत से राजनेताओं से बहुत गहन स्तर तक हो जाती है। ऐसे में राजनेता जब भी पावर में आते हैं, तो वे अपने चहेते ब्यूरोक्रेट्स को ऐसे पद देकर उपकृत करते हैं।

कई बार तो ब्यूरोक्रेट्स के दबाव में पोस्टिंग के नए नियम भी बना दिए जाते हैं ताकि उन पर केवल आसानी से चयन हो सके। जबकि मूल रूप से IAS-IPS तो किसी भी कार्यक्षेत्र या विषय विशेष के एक्सपर्ट होते ही नहीं हैं। सीधे रूप से कानून बनाया जाए कि सरकारी नौकरी से रिटायर होने के बाद 5 वर्ष तक किसी तरह की सरकारी, राजनीतिक, प्रशासनिक, संवैधानिक पोस्टिंग पर ब्यूरोक्रेट की नियुक्ति नहीं की जाएगी।

राजनेताओं के लिए अफसरों का चयन करना ज्यादा आसान व सुविधानजक

रिटायर्ड आईपीएस अफसर बहादुर सिंह राठौड़ का कहना है कि राजनेताओं के लिए ब्यूरोक्रेट्स का चयन ज्यादा आसान व सुविधानजक होता है। वे लंबे अर्से तक उनको नजदीक से देखते हैं, तो उनके गुण-दोष से परिचित होते हैं। हालांकि इस तरह के पदों पर किसी को चयनित करने का अधिकार सीधे मुख्यमंत्री, सरकार या उनके द्वारा बनाई कमेटी आदि के पास ही होता है।

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