बिकिनी मेडिसिन कॉन्सेप्ट रिसर्च, फिजियोलॉजी-जेंडर के हिसाब से हो इलाज, महिला और पुरुष के शरीर की अंदरूनी बनावट अलग

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मूकनायक मीडिया ब्यूरो | 12, जुलाई 2023 | जयपुर-दिल्ली : महिलाएं आज हर फील्ड में आगे बढ़ रही हैं। नेतृत्व कर रही हैं। लोगों की सोच में भी धीरे-धीरे बदलाव आ रहा है। मगर, बात जब महिलाओं की सेहत की आती है, तो महिला-पुरुष का अंतर सीधे तौर पर समझ आने लगता है। उन्हें ‘बिकिनी मेडिसिन’ (Bikini medicine) तक सीमित कर दिया जाता है। डॉक्टर्स जो ट्रीटमेंट पुरुष के लिए बताते हैं, वही महिला मरीज के लिए भी लिख देते हैं। देखा जाए तो एक महिला का शरीर पुरुष से बिल्कुल अलग होता है। किसी भी तकलीफ में उसका इलाज वैसे नहीं किया जा सकता जैसे एक पुरुष का होता है।

बिकिनी मेडिसिन के कॉन्सेप्ट को एक और केस से समझा जा सकता है। बिकिनी मेडिसिन यानी वह सोच, जिसमें दवा देते वक्त डॉक्टर यह नहीं सोचता कि उसके सामने महिला बैठी है या पुरुष। बस परेशानी जानकर दवाई लिख दी जाती है। इसमें माना जाता है कि महिलाएं पुरुषों से बस बिकिनी एरिया यानी प्राइवेट पार्ट के मामले में ही अलग हैं, और इसलिए उनके शरीर के बाकी हिस्सों को इलाज के लिए अलग सावधानी की ज़रूरत नहीं है।

‘बिकिनी मेडिसिन’ कॉन्सेप्ट की कैसे हुई शुरुआत 

अमेरिकी डॉक्टर नानेते कास वेंगर (Nanette Wenger) ने बिकिनी मेडिसिन शब्द को गढ़ा था। आज से करीब तीन दशक पहले उन्होंने यह कहकर मेडिकल साइंस की दुनिया में तहलका मचा दिया कि ‘बिकिनी मेडिसिन’ की वजह से दुनियाभर में महिलाओं के इलाज में कोताही बरती जा रही है। वेंगर ने कहा कि मेडिकल प्रोफेशनल्स महिलाओं की बीमारियों के बारे में सोचते वक्त उनके ब्रेस्ट और प्राइवेट पार्ट तक ही सीमित रह जाते हैं। और, महिलाओं के बाकी शरीर के इलाज को इतना महत्वपूर्ण नहीं मानते।


डॉक्टर नानेते कास वेंगर ने अपने लेखों के जरिए दुनिया को बताया कि हार्ट अटैक हो या डिप्रेशन, दोनों में ही महिलाओं की तादाद पुरुषों से कम नहीं है। ऐसी कई बीमारियां हैं, जिनमें महिलाओं को अलग तरह के इलाज की जरूरत होती है।

महिलाएं अपनी जिंदगी में कई तरह के हार्मोनल बदलावों से गुजरती हैं। जैसे- हर महीने आने वाले पीरियड्स (Periods), प्रेग्नेंसी (Pregnancy) और मेनोपॉज (Menopause)। यही वजह है कि महिलाओं को स्वस्थ रहने के लिए पुरुषों के मुकाबले कई दूसरे पोषक तत्व और विटामिन चाहिए होते हैं।

गाइनकॉलजिस्ट डॉक्टर निधि गुरुरानी कहती हैं, ‘महिलाओं में पीरियड्स के चलते हर महीने हार्मोंस में अप-डाउन होता है, इससे शरीर में कई तरह के बदलाव आते हैं। पुरुषों के मुकाबले महिलाओं को कैंसर का खतरा काफी ज्यादा होता है। प्रजनन से जुड़ी समस्याएं, यूटीआई और बैक्टीरियल इंफेक्शन से भी वे काफी प्रभावित होती हैं। इसलिए, इलाज के दौरान डॉक्टर को यह याद रखना चाहिए कि वह महिला का इलाज कर रहा है और उसे उसकी बॉडी के हिसाब से ही ट्रीटमेंट दिया जाना चाहिए।’

WHO की एक रिपोर्ट भी बताती है कि महिलाओं में अवसाद, चिंता और कई तरह के मनोविकार, पुरुषों के मुकाबले ज्यादा होते हैं। हार्मोंस की वजह से महिलाओं में पुरुषों से जल्दी मोटापा, डायबिटीज, दिल की बीमारियां और ब्लड प्रेशर जैसी समस्याएं होती हैं। वहीं गर्भावस्था के दौरान महिलाओं को अस्थमा, डायबिटीज या डिप्रेशन जैसी दिक्कतें होने लगती हैं।

इस पर फिज़िशियन संजय महाजन भी अपनी राय रखते हैं। वह कहते हैं, ‘महिला हो या पुरुष, सभी का मेटाबॉलिज्म और फिजियोलॉजी अलग होती है। दोनों में हार्मोन का स्तर, उनके अंदरूनी अंगों के अलावा बाहरी अंगों का आकार और मजबूती भी अलग होती है। इसलिए, दवाओं की डोज़ भी उसी आधार पर तय की जानी चाहिए। जिस तरह बच्चे की दवाइयां बड़ों की दवाइयों से अलग होती हैं, वैसे ही अगर पुरुष और महिला की दवाइयां भी अलग-अलग होंगी, तो शरीर पर ज्यादा असरदार रहेंगी।’

यूनिवर्सिटी ऑफ कोलोराडो (University Of Colorado) की एक रिसर्च में सामने आया है कि दिल की बीमारी होने पर महिलाएं, पुरुषों जितनी ही दवाएं खाती हैं। मगर, फिर भी उन पर इसका बुरा असर पड़ता है, वह भी पुरुषों के मुकाबले दोगुना।

जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (JNU) और इंटरनैशनल इंस्टीट्यूट फॉर एप्लाइड सिस्टम्स एनालिसिस (IIASA) की एक रिसर्च से पता चलता है कि भारत में पुरुष मरीजों पर सालाना करीबन 28 हजार रुपये खर्च किए जाते हैं, वहीं महिला मरीजों पर यह खर्च सिर्फ 17 हजार रुपये ही है। पुरुषों की तुलना में महिलाएं अस्पताल में कम भर्ती होती हैं, लिहाज़ा उन पर होने वाला खर्च भी कम है।

अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (AIIMS) और हार्वर्ड विश्वविद्यालय (Harvard University) ने एम्स में इलाज कराने आए करीब 24 लाख मरीजों के रिकॉर्ड का अध्ययन किया। इसमें मालूम हुआ कि सिर्फ 33 फीसदी महिलाओं को ही स्वास्थ्य सेवा मिल पाती है। वहीं यूनिवर्सिटी ऑफ कोलोराडो के सेंटर फॉर विमेंस हेल्थ रिसर्च के मुताबिक, 700 से ज्यादा बीमारियों में पुरुषों के मुकाबले महिलाओं को या तो कम इलाज मिल पाता है या उनके इलाज में देरी होती है।

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नॉर्डिक जर्नल ऑफ साइकेट्री (Nordic General Of Psychiatry) की नवंबर, 2020 में छपी एक स्टडी भी बताती है कि अटेंशन डेफिसिट हाइपरएक्टिविटी डिसऑर्डर (Attention deficit hyperactivity disorder) समेत तमाम मानसिक बीमारियों के इलाज में महिलाओं और पुरुषों में भेदभाव किया जाता है। इसके पीछे यह सोच भी काम करती है कि महिलाएं ज्यादा लंबे समय तक जिंदा रहती हैं, तो उनके बीमार होने के चांस कम हैं।

इतना ही नहीं, महिलाओं की बीमारियों पर अलग से रिसर्च भी बहुत कम की जाती है। बायोमेड सेंट्रल (BioMed Central) जर्नल की 2019 में छपी स्टडी में कहा गया है कि मेडिकल रिसर्च के फील्ड में पुरुषों का दबदबा ज्यादा है। उन पर रिसर्च अधिक होती हैं और उनके शरीर के आधार पर ही दवाएं तय की जाती हैं। इसी के चलते महिला हो या थर्ड जेंडर, ज्यादातर डॉक्टरों को यह पता ही नहीं कि आखिर उनका बेहतर इलाज कैसे हो।

एक स्टडी के मुताबिक, पुरुषों के मुकाबले महिलाओं में डिप्रेशन, एंग्जाइटी और अवसाद की संभावना अधिक होती है। डिप्रेशन का हर दूसरा मरीज कोई महिला होती है। प्रसव के बाद डिप्रेशन की शिकार भी महिलाएं ही होती हैं। यही वजह है कि महिलाओं में डिप्रेशन का आंकड़ा पुरुषों के मुकाबले कहीं ज्यादा है।


शराब-सिगरेट महिलाओं में कैंसर की संभावना को पुरुषों के मुकाबले 14 गुना बढ़ा देता है। हार्ट अटैक औरत या आदमी किसी को भी हो सकता है, लेकिन पूरी दुनिया में हार्ट अटैक के मामले में महिलाओं का मोर्टेलिटी रेट पुरुषों से 26 गुना ज्यादा है।

अगर किसी महिला को दिल का दौरा पड़ जाए तो उसके बचने की संभावना पुरुष के मुकाबले बहुत कम होती है। महिलाओं को आर्थराइटिस की समस्या भी पुरुषों के मुकाबले 27 गुना ज्यादा होती है। इसके बावजूद उनकी बीमारियों पर अलग से रिसर्च न के बराबर है।

एक स्टडी में तो यहां तक पाया गया कि अगर महिला और पुरुष एक जैसे दर्द के साथ इमरजेंसी डिपार्टमेंट में आते हैं, तो महिला पर पुरुष को तरजीह दी जाती है। उनका इलाज ज्यादा क्लीनिकल तरीके से किया जाता है। यही नहीं, ज्यादा दर्द की शिकायत करने पर कई बार महिलाओं को मनोचिकित्सक के पास भेज दिया जाता है जबकि आदमी के दर्द की वजह जानने के लिए कई तरह की जांचें कराई जाती हैं।

जब कहा हार्ट अटैक महिलाओं को भी ज्यादा आते हैं तो मचा तहलका

वेंगर हॉर्वर्ड मेडिकल स्कूल से 1954 में मेडिसिन में डिग्री लेने वाली पहली महिला बनीं। वेंगर ने 1300 से ज्यादा रिसर्च और लेख लिखे। उन्हें दिल के विज्ञान और दवाओं के गणित को समझने में महारत हासिल है। 1993 में उन्होंने अपने एक अध्ययन में लिखा कि हार्ट अटैक से महिलाओं की भी ज्यादा मौत हो रही है, तो हंगामा मचना स्वाभाविक था। तब तक यही माना जाता था कि हार्ट अटैक तो पुरुषों को ही आता है। वेंगर के मुताबिक, डॉक्टर हों या मेडिकल प्रोफेशनल्स सभी को महिलाओं को बिकिनी जोन के दायरे से बाहर निकलकर उनके इलाज के बारे में सोचना होगा।

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महिलाओं में हार्ट अटैक के लक्षण तब ज्यादा हो सकते हैं, जब वे आराम कर रही हों या सो रही हों। ऐसी महिलाओं को हर साल अपने दिल की जांच कराने की सलाह दी जानी चाहिए। वेंगर का कहना है कि मेनोपॉज या प्रेग्नेंसी में दिक्कतें भी हार्ट अटैक के खतरे को बढ़ा सकती हैं। महिला को अगर डायबिटीज है, या वो स्मोकिंग करती है, डिप्रेशन में हो या तनाव में हो तो भी हार्ट अटैक का खतरा बढ़ सकता है। इस बात को मेडिकल प्रोफेशनल्स को समझना होगा।

आज बात इसी बिकिनी मेडिसिन के बारे में। आप सोच रहे होंगे कि ये किस तरह का इलाज है, कैसी दवा है और किस बाजार में मिलती है। दरअसल, बिकिनी मेडिसिन उस भ्रामक धारणा पर आधारित है कि महिलाएं पुरुषों से बस बिकिनी एरिया यानी प्राइवेट पार्ट के मामले में ही अलग हैं, इसलिए उनके शरीर के बाकी हिस्सों को इलाज के लिए विशिष्ट या अलग सावधानी की जरूरत नहीं है। नेशनल लाइब्रेरी ऑफ मेडिसिन के अनुसार, सोसाइटी में ज्यादातर लोग यही मानते हैं कि हार्ट अटैक पुरुषों को ही आते हैं। जागरूकता की इस कमी की वजह से हार्ट अटैक से मरने वाली महिलाओं की संख्या बढ़ी है।

दिल की बीमारियों के इलाज में महिलाओं से भेदभाव

maxresdefault 76 300x169 बिकिनी मेडिसिन कॉन्सेप्ट रिसर्च, फिजियोलॉजी जेंडर के हिसाब से हो इलाज, महिला और पुरुष के शरीर की अंदरूनी बनावट अलगयूनिवर्सिटी ऑफ कोलोराडो की ही एक और रिसर्च कहती है कि दिल की बीमारियों के मामले में महिलाएं पुरुषों जितनी ही दवा की डोज लेती हैं, मगर इसका बुरा असर उन पर पुरुषों के मुकाबले दोगुना होता है। असल में ज्यादातर फिजिशियन पुरुष और महिला मरीजाें को बराबर डोज ही खाने के लिए लिखते हैं।

दवाओं की डोज भी बिकिनी मेडिसिन की सोच के मुताबिक

रांची में इंटरनल मेडिसिन के विशेषज्ञ और दिल्ली एम्स में सेवा दे चुके डॉ. रविकांत चतुर्वेदी के मुताबिक, ‘मेडिकल साइंस की दुनिया में बरसों से दवाओं की डोज भी बिकिनी मेडिसिन की धारणा के मुताबिक ही तय की जाती है। जबकि हकीकत यह है कि स्त्री हो या पुरुष सभी का मेटाबॉलिज्म और फिजियोलॉजी अलग होती है।

दोनों में हॉर्मोन का स्तर, उनके अंदरूनी अंगों के अलावा बाहरी अंगों का आकार और मजबूती भी अलग होती है। दुनियाभर में एडवांस्ड साइंस में अब मेडिकल प्रोफेशनल्स को बिकिनी मेडिसिन की सोच से उबरने की सलाह दी जा रही है।

आज बुखार, सर्दी, जुकाम, खांसी जैसी आम समस्याओं में ज्यादातर दवाएं तो जेंडर न्यूट्रल हैं, मगर कुछ जेंडर स्पेसिफिक बीमारियों की दवाएं अलग हैं। ’ बिकिनी मेडिसिन असल में उस सोच के लिए एक शब्द है, जिसमें महिलाओं को सदियों से पुरुषों से कमतर माना जाता रहा है। वजह जो भी हो महिलाओं काे पुरुषों के मुकाबले इलाज कम मिलता है या इलाज ही नहीं मिलता।

पुरुषों के मुकाबले महिलाओं के इलाज पर खर्च भी कम, 33 फीसदी महिला मरीजों को ही स्वास्थ्य सेवा

जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय और इंटरनेशनल इंस्टीट्यूट फॉर एप्लाइड सिस्टम्स एनालिसिस की एक रिसर्च में सामने आया है कि भारत में पुरुष मरीज पर सालाना औसतन 24 हजार रुपए खर्च किया जाता है, जबकि महिलाओं के लिए यह सिर्फ 16 हजार रुपए ही है।

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पुरुषों के मुकाबले महिलाएं अस्पताल में कम भर्ती होती हैं, इसलिए उन पर होने वाला खर्च भी कम है। अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान और हार्वर्ड विश्वविद्यालय ने एम्स में इलाज कराने आए करीब 24 लाख मरीजों के रिकॉर्ड का अध्ययन किया गया, जिसमें ये बात सामने आई कि सिर्फ 33% महिलाओं को ही स्वास्थ्य सेवा मिल पाती है। यही नहीं, नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे (NFHS)-5 की रिपोर्ट के अनुसार, देश में 15 से 19 साल की 59.1% लड़कियों को खून की कमी है। वहीं 15 से 49 साल की 52.2% प्रेग्नेंट महिलाएं एनीमिया की चपेट में आती हैं।

ये तीनों आंकड़े बताते हैं कि देश में महिलाओं में कमजोरी और खून की कमी ज्यादा है, घर हो या अस्पताल दोनों जगहों पर उनके इलाज में लापरवाही बरती जाती है। उनके इलाज पर होने वाला खर्च भी परिवार के पुरुष सदस्यों के मुकाबले कम है क्योंकि महिला की सेहत पर खर्च करना गैरजरूरी समझा जाता है।

सिरदर्द, गंध महसूस न होना, स्वाद का जाना जैसी दिक्कतें भी होती हैं नजरअंदाज

pelvic pain 300x196 बिकिनी मेडिसिन कॉन्सेप्ट रिसर्च, फिजियोलॉजी जेंडर के हिसाब से हो इलाज, महिला और पुरुष के शरीर की अंदरूनी बनावट अलगजर्नल ऑफ वुमंस हेल्थ में इस साल छपी एक स्टडी में कहा गया है कि 14 लाख मरीजों के डेटा का आकलन करने के बाद यह पाया गया कि सिरदर्द, सूंघने की क्षमता खत्म होना, स्वाद का पता न चल पाना जैसी दिक्कतें महिलाओं के साथ ज्यादा होती हैं।

आंख, कान, नाक और गले का संक्रमण भी महिलाओं को ज्यादा होता है, मगर या तो वो इसे नजरअंदाज कर देती हैं या फिर उनका इलाज ही नहीं कराया जाता है। यही हाल कोरोना के दौरान भी रहा। पुरुषों के मुकाबले महिलाएं कोरोना से ज्यादा प्रभावित हुईं। खासकर टीनएज और युवतियों में यह ज्यादा देखा गया।

महिला मरीज को इमोशनल प्रॉब्लम्स तो पुरुष को मेंटल डिसऑर्डर

नॉर्डिक जर्नल ऑफ साइकेट्री की नवंबर, 2020 में छपी एक स्टडी के मुताबिक, अटेंशन डेफिसिट/हाइपरएक्टिविटी डिसऑर्डर(ADHD) समेत मानसिक बीमारियों के इलाज में भी स्त्री और पुरुषों में भेदभाव किया जाता है। इस अध्ययन में पाया गया है कि औसतन महिला मरीज पुरुषों के मुकाबले डॉक्टर के पास ज्यादा जाती हैं।

वहां उनका इलाज इमोशनल प्रॉब्लम्स के रूप में किया जाता है, जबकि यही लक्षण पुरुषों में दिखें तो यह कहा जाता है कि उन्हें न्यूरोडेवलपमेंटल डिसऑर्डर है। इसी तरह लड़कियों में ADHD लक्षणों को टीचर या पेरेंट्स पहचान नहीं पाते हैं, जिससे उनमें भावनात्मक समस्याएं बढ़ती जाती हैं।

रांची में साइकेट्रिस्ट डॉ. वरुण एस मेहता कहते हैं कि हॉर्मोन में अंतर और सामाजिक दबाव की वजह से भी महिलाओं का ठीक से इलाज नहीं हो पाता है। पुरुषों को दर्द होने पर उन्हें बहादुर कहा जाता है तो महिलाओं को कहा जाता है कि यह उनकी भावनात्मक समस्या है।

स्ट्रोक के मामले में महिलाओं पर ध्यान ही नहीं दिया जाता

जर्नल मैटीरियल्स में छपी एक स्टडी में कहा गया है कि स्ट्रोक से पीड़ित महिलाओं में जो लक्षण दिखते हैं, वो पुरुषों में नहीं पाए गए। स्ट्रोक के दौरान पुरुष या स्त्री दोनों को ही हाथ-पैर और चेहरे का सुन्न पड़ जाना, लड़खड़ाना, भयानक सिरदर्द, चलने-फिरने में दिक्कत महसूस होती है। महिलाओं में इनके अलावा कुछ और लक्षण भी नजर आते हैं। जैसे-जी मिचलाना, हिचकी, थकान, सांस लेने में तकलीफ और धड़कन बढ़ जाना।

main emotionally hurt 300x169 बिकिनी मेडिसिन कॉन्सेप्ट रिसर्च, फिजियोलॉजी जेंडर के हिसाब से हो इलाज, महिला और पुरुष के शरीर की अंदरूनी बनावट अलगमुंबई में न्यूरोलॉजिस्ट डॉॅ अणु अग्रवाल कहती हैं कि वैसे तो स्त्री और पुरुष के ब्रेन में कोई अंतर नहीं होता है। मगर, मेनोपॉज स्टेज के बाद महिलाओं की मनोदशा में काफी बदलाव होता है। उनमें कई तरह के हॉर्मोनल बदलाव देखने को मिलते हैं। जैसे हिस्टीरिया महिलाओं में ज्यादा पाई जाती है। यह कोई बीमारी नहीं है। यह साइकोलॉजिकल प्रॉब्लम है। पुरुषों को भी होती है, मगर उनके मुकाबले महिलाएं ज्यादा साइकोलॉजिस्ट के पास जाती हैं।

बिकिनी मेडिसिन को पिछड़ा विचार बताने के साथ अब यह भी सवाल किए जा रहे हैं कि क्या महिला-पुरुष और थर्ड जेंडर का इलाज अलग-अलग तरीके से होना चाहिए? इसे समझने के लिए हमने एक पशु-चिकित्सक से भी सवाल किए क्योंकि इंसानों पर किसी भी दवा या इलाज का तरीका अपनाने से पहले उसे पशुओं पर ही अपनाया जाता है।

महिला हो या थर्ड जेंडर, ज्यादातर डॉक्टरों को यह पता नहीं कि बेहतर इलाज क्या

ज्यादातर डॉक्टर इस बात पर गौर नहीं करते कि महिला, इंटरसेक्स या थर्ड जेंडर के इलाज का अलग या बेहतर तरीका क्या होना चाहिए। बायोमेडिसिन सेंट्रल जर्नल की 2019 में छपी स्टडी में कहा गया है कि मेडिकल रिसर्च के फील्ड में पुरुषों का दबदबा ज्यादा है।

महिला मरीज के लक्षणों को नजरअंदाज किया गया तो उसे ठीक हाेने में बरसों लग जाते हैं। डेनमार्क में ऐसी एक स्टडी में पता चला कि 72 फीसदी महिलाओं को पुरुषों के मुकाबले इलाज में लापरवाही झेलनी पड़ी। महिला होने की वजह से कई मरीजों को जान तक गंवानी पड़ी।

बिकिनी मेडिसिन से दवा कंपनियों की होगी चांदी ही चांदी

maxresdefault 97 1 300x169 बिकिनी मेडिसिन कॉन्सेप्ट रिसर्च, फिजियोलॉजी जेंडर के हिसाब से हो इलाज, महिला और पुरुष के शरीर की अंदरूनी बनावट अलगहाल ही में जर्नल नेचर में छपी एक स्टडी में कहा गया है कि दवा देते वक्त यह जरूर ध्यान रखा जाना चाहिए कि मरीज पुरुष है या स्त्री। हालांकि, डॉक्टर रविकांत चतुर्वेदी का कहना है यह एक तरह से दवा बनाने वाली कंपनियों के लिए ज्यादा मुनाफा कमाने का मौका होगा। उनकी तो चांदी हो जाएगी, क्योंकि अब वो जेंडर स्पेसिफिक दवाएं बनाएंगी और इस आधार पर उनकी कीमत भी तय की जाएगी।

हो सकता है कि महिलाओं के लिए बनी जेंडर स्पेसिफिक दवाइयां ‘पिंक टैक्स’ के दायरे में आएं यानी कंपनियां इनकी कीमत ज्यादा रखने का सोच सकती हैं। वहीं, डॉ. चतुर्वेदी के अनुसार, जब तक डॉक्टरों को बिकिनी मेडिसिन के बारे में जागरूक नहीं कराया जाएगा और उनकी दवाओं की डोज को लेकर ट्रेनिंग नहीं होगी, तब तक डॉक्टर किसी स्पेसिफिक बीमारी में महिला या पुरुष को एक तरह की ही खुराक देते रहेंगे।

आने वाले समय में दिल की बीमारियों में महिला और पुरुष को अलग-अलग डोज दी जा सकती हैं। ये नया कॉन्सेप्ट है। थर्ड जेंडर या ट्रांसजेंडर को भी दवा की खुराक बहुत सोच-समझकर देनी होगी।

बिकिनी मेडिसिन का विचार खारिज करने के बाद अब तो ट्रांसजेंडर्स को दी जाने वाली दवाओं की डोज पुरुष या महिला मरीज जैसी देने पर भी सवाल किए जा रहे हैं। ट्रांसजेंडर्स में होने वाले हॉर्मोन्स के उतार-चढ़ावों पर आम बीमारियों की दवाएं भी कैसे असर करती हैं, इसको भी अभी तक जांचा नहीं गया है। इसलिए दवाओं की इस लेवल पर भी जांच की मांग की जा रही है।

रिसर्चरों का कहना है कि जब महिला और पुरुष के शरीर की अंदरूनी बनावट, उसकी फिजियोलॉजी में फर्क है तो मरीज का इलाज भी उसके जेंडर के हिसाब से होना चाहिए।

FAQs
सवाल- बिकिनी मेडिसिन क्या है?
जवाब– बिकिनी मेडिसिन यानी वह सोच, जिसमें दवा देते वक्त डॉक्टर यह नहीं सोचता कि उसके सामने महिला बैठी है या पुरुष। बस परेशानी जानकर दवाई लिख दी जाती है।

सवाल- बिकिनी मेडिसिन शब्द किस डॉक्टर ने गढ़ा था?
जवाब– अमेरिकी डॉक्टर नानेते कास वेंगर (Nanette Wenger) ने बिकिनी मेडिसिन शब्द को गढ़ा था। आज से करीब तीन दशक पहले उन्होंने यह कहकर मेडिकल साइंस की दुनिया में तहलका मचा दिया कि ‘बिकिनी मेडिसिन’ की वजह से दुनियाभर में महिलाओं के इलाज में कोताही बरती जा रही है।

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