राजस्थान में दलित आदिवासी महिलाओं से पैसे ऐंठने के लिए बेवजह गर्भाशय निकालने का गंदा धंधा, दौसा में बड़ी संख्या में महिलाओं के गर्भाशय नहीं, किसी पर नहीं हुई कार्रवाई, मिटा दिए सबूत

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मूकनायक मीडिया ब्यूरो | 12, जुलाई 2023 | जयपुर-दिल्ली-दौसा : राजस्थान के चित्तौड़गढ़ में रहने वाली 32 साल की एक महिला को पेट दर्द हुआ। 29 मई को महिला नर्सिंग होम में भर्ती हुई। दर्द की वजह किडनी में स्टोन बताई गई। आरोप है कि डॉक्टरों ने पथरी का इलाज करने के बजाए महिला की बच्चेदानी निकाल दी। ज्यादा ब्लीडिंग से उसकी जान चली गई।

पेट और पीठ दर्द जैसी परेशानियों के नाम पर कोख निकाल देने का यह पहला मामला नहीं है। राजस्थान से लेकर बिहार, झारखंड, छत्तीसगढ़, गुजरात, महाराष्ट्र और यूपी तक, एक दशक से महिलाओं की कोख छीनने का सिलसिला जारी है। सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बावजूद इसपर अंकुश नहीं लग पा रहा। आजाद समाज पार्टी के प्रदेशाध्यक्ष प्रोफ़ेसर राम लखन मीणा ने इस गंधे-धंधे की सीबीआई जाँच गहलोत सरकार से माँग की है।

यही वजह है कि हाल ही में केंद्र सरकार ने सारे राज्यों को चिट्ठी भेजकर पूछा कि उनके यहां कितनी महिलाओं के गर्भाशय निकाले गए हैं। एक्सपर्ट्स बताते हैं कि बीते एक दशक में लाखों महिलाओं के गर्भाशय निकाले जा चुके हैं, लेकिन सरकारी दस्तावेजों में इसका जिक्र नहीं है।

दौसा में कई महिलाओं के गर्भाशय नहीं, प्राइवेट अस्पतालों में हुआ था इलाजhindi 300x192 राजस्थान में दलित आदिवासी महिलाओं से पैसे ऐंठने के लिए बेवजह गर्भाशय निकालने का गंदा धंधा, दौसा में बड़ी संख्या में महिलाओं के गर्भाशय नहीं, किसी पर नहीं हुई कार्रवाई, मिटा दिए सबूत
इलाज का बिल बढ़ाने के लिए बिना जरूरत महिलाओं की कोख निकालने का खुलासा राजस्थान के ही डॉ सावर्णिका ने किया। सवाई माधोपुर के एक एनजीओ ‘ग्रामीण विकास समिति माणोली’ से जुड़ी डॉ सावर्णिका बताती हैं कि एक स्टडी के दौरान पता चला कि दौसा में बड़ी संख्या में महिलाओं के गर्भाशय नहीं हैं।

इन सभी के ऑपरेशन प्राइवेट अस्पतालों में हुए थे। ये सभी महिलाएं पीठ-पेट दर्द, थकान और पीरियड्स से जुड़ी समस्याओं से परेशान थीं। वे इलाज के लिए डॉक्टर के पास गईं। उन्हें बताया गया कि गर्भाशय खराब हो गया है। तुरंत न निकलवाया गया तो कैंसर हो सकता है और उन्हें तुरंत भर्ती होना पड़ा।

दूसरे डॉक्टर की सलाह लेने, सोचने तक का मौका नहीं मिला

कई महिलाओं ने कहा कि वे कपड़े नहीं लाई हैं, पैसे भी नहीं हैं तो उनसे कहा गया कि पहले इलाज शुरू कराओ। कपड़े और पैसे घर से मंगवा लो। इसके बाद उनका यूट्रस निकाल दिया गया। अधिकतर महिलाओं ने यही आपबीती बताई। उन्हें इतना समय भी नहीं दिया गया कि वे किसी दूसरे डॉक्टर के पास जाकर फिर से सलाह ले सकें। न ही डॉक्टरों ने ऑपरेशन से पहले इलाज के दूसरे तरीके या कोई थेरेपी आजमाने की कोशिश की।

बिहार में 46 हजार महिलाओं की बच्चेदानी निकाली गई
इसी बीच कई राज्यों में भी महिलाओं के गर्भाशय बिना किसी कारण निकालने की खबरें मिलीं। 2012 में बिहार में 46 हजार से ज्यादा गरीब महिलाओं की बच्चेदानी निकाली गई। उसी साल छत्तीसगढ़ में इसी रैकेट के चलते हजारों महिलाओं के गर्भाशय निकाले गए। महाराष्ट्र के बीड में गन्ना कटाई करने वाली महिलाओं से लेकर गुजरात की खेतिहर मजदूर महिलाओं और उनके परिवार को समझा दिया गया कि क्योंकि बच्चे हो चुके हैं, इसलिए अब गर्भाशय रखने की जरूरत नहीं है।

मामला खुला तो पीड़िताओं को ही बनाया गया निशाना
जब ये मामले बाहर आए तो यह जताने की कोशिश की गई कि इन महिलाओं ने अपनी मर्जी से यूट्रस निकलवाया है, ताकि पीरियड्स बंद हो जाएं और वे काम कर सकें। आजाद समाज पार्टी के प्रदेशाध्यक्ष प्रोफ़ेसर राम लखन मीणा बताते हैं कि ‘यह कहना गलत है कि महिलाएं गर्भाशय निकलवाना चाहती हैं। इन महिलाओं को तो यह भी नहीं पता कि यूट्रस कब निकलवाना चाहिए और कब नहीं, इसके क्या नुकसान हो सकते हैं।’

ऐसे बिछाया जाता है कोख उजाड़ने के लिए जाल
maxresdefault 98 300x169 राजस्थान में दलित आदिवासी महिलाओं से पैसे ऐंठने के लिए बेवजह गर्भाशय निकालने का गंदा धंधा, दौसा में बड़ी संख्या में महिलाओं के गर्भाशय नहीं, किसी पर नहीं हुई कार्रवाई, मिटा दिए सबूत  प्रोफ़ेसर मीणा मूकनायक मीडिया से बातचीत में कहते हैं कि खेतों में काम करने वाली महिलाएं वाइट डिस्चार्ज, पीरियड्स में ज्यादा ब्लीडिंग, कमजोरी और चक्कर आने जैसी दिक्कतों से काम नहीं कर पाती हैं।

हॉस्पिटल जाकर दवा लेती हैं, खर्च होता है। दिहाड़ी का नुकसान अलग झेलती हैं। थोड़ा आराम मिलने पर इलाज बंद कर देती हैं। जिससे उनकी परेशानी ज्यों का त्यों बनी रहती है।

दो-चार बार हॉस्पिटल जाने के बाद उन्हें कैंसर का डर दिखाकर बच्चेदानी निकलवाने की गलत सलाह दी जाती है। मां बनने के बाद बच्चेदानी का साइज बढ़ जाता है या वह शरीर से बाहर आने लगती है, तब भी डॉक्टर उन्हें डराते हैं। अपनी तकलीफ से परेशान महिलाएं मरने और बच्चों के अनाथ होने के डर से गर्भाशय निकलवा का फैसला लेती हैं।

सही इलाज और काउंसलिंग की बजाए खेलते हैं डर का खेल
प्रोफ़ेसर मीणा के मुताबिक 30 साल की उम्र तक महिलाओं को कैंसर का खतरा बहुत कम होता है। फिर भी उनसे झूठ बोला जाता है। ऑपरेशन के बजाए उनकी काउंसलिंग होनी चाहिए। डॉक्टर उन्हें उनकी बीमारी की सही वजह बताएं। समय पर दवा लेने, पोषक आहार लेने, ज्यादा वजन न उठाने और आराम करने के लिए जागरूक करें।

ऐसा करने की जगह हमेशा के लिए सहूलियत के नाम पर डॉक्टर बच्चेदानी निकलवाने की बात कहते हैं। इतना डरा देते हैं कि ऑपरेशन न कराया तो 15 दिन बाद कोई डॉक्टर कुछ नहीं कर पाएगा। ये वही डॉक्टर हैं जो अपने प्रोफेशन के मूल्यों को दरकिनार करते हैं।

दोषियों को बचाने के लिए पति और परिवार पर लगाए आरोप
कई मामलों में पतियों पर भी आरोप लगते हैं कि उनके दबाव की वजह से महिलाएं यूट्रस रिमूव करवाने को मजबूर हो जाती हैं। लेकिन, इन्हीं महिला मजदूरों के बीच काम करने वाली मनीषा टोकले इसे भी गलत बताती हैं। वह कहती हैं कि पति पर आरोप इसलिए लगाए जाते हैं, ताकि असली दोषियों की तरफ ध्यान न जाए।

main emotionally hurt 300x169 राजस्थान में दलित आदिवासी महिलाओं से पैसे ऐंठने के लिए बेवजह गर्भाशय निकालने का गंदा धंधा, दौसा में बड़ी संख्या में महिलाओं के गर्भाशय नहीं, किसी पर नहीं हुई कार्रवाई, मिटा दिए सबूतबीड में गन्ने की कटाई का काम पति-पत्नी की जोड़ी को दिया जाता है। ठेकेदार पति को पैसा एडवांस देते हैं। पैसा लेने के बाद पत्नी बीमार हुई तो दोनों की मजदूरी अकेले पति को ही करनी पड़ती है। पत्नी का इलाज कराने के लिए पति डॉक्टरों के चक्कर काटता है। यहां भी हिस्टरेक्टमी को ही आखिरी इलाज बताया जाता है। पत्नी की जान बचाने के लिए डॉक्टर की सलाह माननी पड़ती है।

कोख गंवाने वाली महिलाएं कौन
डॉ सावर्णिका ने बताया कि कोख गंवाने वाली अधिकतर महिलाएं गरीब, आदिवासी और दलित परिवारों से होती हैं। 10वीं तक पढ़ी महिला के ऐसी धोखाधड़ी में फंसने की आशंका 53 फीसदी तक होती है। गैर-जरूरी हिस्टरेक्टमी का लिंक नसबंदी से भी है। नसबंदी कराने के बाद कुछ महिलाओं के पीरियड्स अनियमित हो जाते हैं। फिर वे इलाज कराने जाती हैं, जहां उनका ऑपरेशन कर दिया जाता है।

66 फीसदी ऑपरेशन प्राइवेट अस्पतालों में
प्रोफ़ेसर मीणा बताते हैं कि करीब 66 फीसदी हिस्टरेक्टमी प्राइवेट अस्पतालों में ही होते हैं। 2008 में शुरू होने वाली ‘राष्ट्रीय स्वास्थ्य बीमा योजना’ में सबसे ज्यादा क्लेम हिस्टरेक्टमी के ही किए गए। ‘आयुष्मान भारत योजना’ में भी ऐसे क्लेम बढ़ने लगे, तो सरकार ने नियम सख्त कर दिए। प्राइवेट अस्पतालों में यूट्रस रिमूव करवाने के खर्च के क्लेम पर पूरी तरह रोक लग गई। जिन महिलाओं का बीमा नहीं होता, उनका ऑपरेशन करके भी बड़ी रकम वसूली जाती है।

डॉक्टरों द्वारा महिलाओं और उनके परिवार के दिमाग में यह बात भर दी जाती है कि बच्चेदानी निकलवाने से पीरियड्स के ‘झंझट’ और ऐसी दूसरी ‘समस्याओं’ से हमेशा के लिए पिंड छूट जाएगा। लेकिन, वे यह नहीं बताते कि गर्भाशय निकलने के बाद उन्हें किन जानलेवा खतरों से जूझना पड़ सकता है।

कम उम्र में बच्चेदानी निकालने के कई खतरे
मुंबई में डॉ अनुष्का गौतम बताती हैं कि खासकर 34 साल से कम उम्र में यूट्रस निकलवाने पर महिलाओं की फिजिकल और मेंटल हेल्थ पर बुरा असर पड़ता है। हिस्टरेक्टमी की वजह से ओवरी को खून की सप्लाई 50 फीसदी तक घट सकती है। इससे अर्ली मेनोपॉज के लक्षण दिखने लगते हैं। महिलाएं एंग्जायटी, डिप्रेशन की चपेट में आ जाती हैं और प्रेग्नेंसी तो असंभव हो ही जाती है। डॉ गौतम बताते हैं, रिसर्च में पाया गया है कि हिस्टरेक्टमी के बाद हॉर्मोनल बदलाव होते हैं। कम उम्र में गर्भाशय निकालने से दिल की बीमारियों, किडनी की समस्याओं और कैंसर का खतरा बढ़ जाता है।

18 साल पहले ही खत्म कर दी मां बनने की क्षमताpelvic pain 300x196 राजस्थान में दलित आदिवासी महिलाओं से पैसे ऐंठने के लिए बेवजह गर्भाशय निकालने का गंदा धंधा, दौसा में बड़ी संख्या में महिलाओं के गर्भाशय नहीं, किसी पर नहीं हुई कार्रवाई, मिटा दिए सबूत
महिलाओं पर बढ़ते इस खतरे को देख डॉ सावर्णिका ने 2013 में सुप्रीम कोर्ट में जनहित याचिका दायर की और एक अखिल भारतीय गोष्ठी का आयोजन किया, ताकि इस मामले की तह तक पहुंचा जा सके। गोष्ठी में सामने आया कि सामान्य रूप से जो माहवारी 48 से 50 साल की उम्र तक होती, उसे यूट्रस रिमूवल से 31 साल की उम्र में ही रोक दिया गया। इससे उनकी मां बनने की क्षमता भी 18 साल पहले ही खत्म हो गई।

15 से 49 साल की 3.3 फीसदी महिलाओं की कोख छीनी, आधी से ज्यादा 35 साल से कम
प्रोफ़ेसर मीणा कहते हैं कि उस वक्त नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे का चौथा चक्र शुरू होने वाला था। सरकार से NFHS-4 के जरिए हिस्टरेक्टमी के आंकड़े जुटाने की मांग की गई। NFHS 4 और 5 के आंकड़ों से पता चला कि देश में 15 से 49 साल की 3.3 फीसदी महिलाओं का गर्भाशय निकाला जा चुका है।

2015-16 में हिस्टरेक्टमी कराने वाली महिलाओं की औसत उम्र 34 साल थी, जो 2019-21 में 34.6 साल हो गई। जबकि, अमेरिका, ब्रिटेन जैसे देशों में औसतन 44-59 साल की उम्र में महिलाओं का गर्भाशय निकाला जाता है। इस उम्र तक उनका मेनोपॉज हो चुका होता है। NFHS-5 के आंकड़े बताते हैं कि आधी से ज्यादा महिलाओं की बच्चेदानी तो पीरियड्स के दर्द से राहत दिलाने के बहाने निकाल दी गई…

किसी पर नहीं हुई कार्रवाई, मिटा दिए सबूत
डॉ अनुष्का गौतम बताती हैं कि जो मामले पकड़ में आ गए, उनमें भी दोषियों पर कोई कार्रवाई नहीं हो सकी। 90 फीसदी मामलों में डॉक्टरों ने महिलाओं को ऑपरेशन और इलाज के डॉक्यूमेंट्स ही नहीं दिए थे। जिन महिलाओं के पास डॉक्यूमेंट्स थे, उनके साथ फिर धोखाधड़ी हुई। उन्हें बरगलाया गया कि सरकार उन्हें मुआवजा देगी। जांच के नाम पर उनसे इलाज से जुड़े सारे दस्तावेज ले लिए गए। इस तरह सारे सबूत मिटा दिए गए।

कहीं कार्रवाई के बाद पलटी सरकार, तो कहीं जांच ही नहीं हुई पूरी
सुप्रीम कोर्ट ने राजस्थान, बिहार और छत्तीसगढ़ तीनों राज्यों को नोटिस जारी किया। राजस्थान सरकार ने बताया कि जांच जारी है। छत्तीसगढ़ सरकार ने जांच करके 12 अस्पतालों के लाइसेंस और डॉक्टरों के रजिस्ट्रेशन 6 महीने के लिए कैंसल कर दिए। इसके बाद डॉक्टरों का दबाव बना तो दूसरी कमेटी बनाई गई। जिसमें कहा गया कि डॉक्टरों की कोई गलती नहीं है।

छत्तीसगढ़ सरकार ने कोर्ट को बताया कि दूसरी कमेटी की रिपोर्ट की वजह से रजिस्ट्रेशन और लाइसेंस निरस्त करने का फैसला रद्द करना पड़ा है। बिहार में हुई जांच में पाया गया कि कई जिलों में महिलाओं की बच्चेदानी बेवजह निकाल दी गई। लेकिन, इन महिलाओं को 2012 से अब तक न न्याय मिला है और न ही मुआवजा। बिहार के गर्भाशय घोटाले का मामला पटना हाईकोर्ट में है। इसमें अगली सुनवाई 23 जून 2023 को होनी है।

सुप्रीम कोर्ट के आदेश से बनीं गाइडलाइंस, बिना जांच ऑपरेशन पर रोक
सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद हिस्टरेक्टमी के लिए गाइडलाइंस बनी। अब 40 साल से कम उम्र की महिला का यूट्रस निकालने से पहले उसकी पूरी जांच होगी। हर जिले में एक मॉनिटरिंग कमिटी होगी, जो देखेगी कि वाकई महिला को ऑपरेशन की जरूरत है या नहीं। हिस्टरेक्टमी का हर केस दर्ज होगा। जिसमें महिलाओं की उम्र, गर्भाशय निकालने की वजह और हॉस्पिटल की पूरी जानकारियां शामिल होंगी।

अभी भी जारी है गर्भाशय निकालने का गंदा धंधा6676110 300x300 राजस्थान में दलित आदिवासी महिलाओं से पैसे ऐंठने के लिए बेवजह गर्भाशय निकालने का गंदा धंधा, दौसा में बड़ी संख्या में महिलाओं के गर्भाशय नहीं, किसी पर नहीं हुई कार्रवाई, मिटा दिए सबूत
प्रोफ़ेसर मीणा ने मूकनायक मीडिया को बताया कि गाइडलाइंस के मुताबिक सिविल सर्जन की अनुमति के बिना हिस्टरेक्टमी नहीं कर सकते। लेकिन, अब दौसा की महिलाओं को जयपुर, भरतपुर जैसे दूसरे जिलों में भेजा जा रहा है, जहां चोरी-छिपे उनकी बच्चेदानी निकाली जाती है।

सख्ती बढ़ी दोगुना हो गया ऑपरेशन का खर्च
डॉ सावर्णिका बताती हैं कि 10 साल पहले यूट्रस रिमूवल में 25 से 30 हजार रुपये लगते थे। सख्ती बढ़ने और परमिशन जरूरी होने के बाद अब यह खर्च दोगुना हो गया है। ऑपरेशन के लिए 50 से 70 हजार रुपये वसूले जा रहे हैं। अगर महिला कमजोर हो तो यह खर्च 1 लाख रुपये पार कर जाता है। इसमें 10 से 15 हजार रुपये सिर्फ पैथोलॉजी जांच में लगते हैं।

डॉक्टर हड़प जाते हैं दंपती की 2 से 3 साल की कमाई, नेटवर्क में सभी शामिल
महिला को ऑपरेशन टेबल तक पहुंचाने के लिए कदम-कदम पर कमीशनखोरों का जाल बिछा है। बच्चेदानी निकालने वाले डॉक्टरों के एजेंट सरकारी अस्पतालों में घूमते हैं। वहां महिला को सरकारी अस्पताल से ज्यादा अच्छा इलाज दिलाने के लिए बरगलाकर निजी अस्पताल पहुंचाते हैं।

कई बार आंगनबाड़ी कार्यकर्ता, आशा वर्कर, सरकारी नर्स से लेकर पैथोलॉजी लैब और मेडिकल स्टोर संचालक तक इस सांठगांठ में शामिल होते हैं। ऑपरेशन के लिए जरूरत से दोगुनी दवाएं मंगाई जाती हैं। बची दवाएं फिर से बेची जाती हैं।

कुछ सरकारी डॉक्टर अपने निजी क्लिनिक, नर्सिंग होम चलाते हैं, वे भी यह गलत काम करते हैं। ऑपरेशन के लिए दूसरे जिले में मरीजों को रेफर करने वाले डॉक्टर भी कमीशन लेते हैं। ऑपरेशन के लिए कर्ज देने वाले साहूकार से लेकर एडवांस देने वाले ठेकेदार तक इस नेटवर्क में शामिल होते हैं। वे दंपती को कर्ज के जाल में फंसाते ही हैं।

डॉ सावर्णिका कहती हैं कि बच्चेदानी निकलवाने से पहले महिलाओं को हमेशा एक नहीं दो अलग-अलग डॉक्टरों की सलाह लेनी चाहिए, ताकि इलाज सही और बेहतर तरीके से हो सके।

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