मैतेई कुकी पति-पत्नी की प्रेग्नेंसी के बावजूद साथ रहने का मतलब है मौत चुनना

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मूकनायक मीडिया ब्यूरो | 28, जुलाई 2023 | जयपुर-इंफाल-लद्दाख : ‘3 मई की रात थी। करीब 10 बज रहे थे। भीड़ आई और तोड़फोड़ करने लगी। मैं प्रेग्नेंट थी। ये सब देखकर बहुत डर लग रहा था। मेरे पति मैतेई हैं और मैं कुकी। मणिपुर की लड़ाई में हम किसके साथ खड़े होंगे, आप बताइए। डर के इस माहौल में पेट में पल रहे मेरे बच्चे पर क्या असर होगा।’

ये नगाहोइचोंग हैं। उम्र 27 साल। अभी 9 महीने की प्रेग्नेंट हैं। मणिपुर में कुकी और मैतेई की लड़ाई शुरू हुई, तो इनका परिवार बिखर गया। नगाहोइचोंग कांगपोकपी में रह रही हैं और पति जोतिन इंफाल में। स्कूल में प्यार हुआ, 11 साल पहले शादी हुई। तब कुकी-मैतेई में आज जैसी नफरत नहीं थी, इसलिए सब राजी-खुशी से हुआ। नगाहोइचोंग अभी कांगपोकपी के एक रिलीफ कैंप में रह रही हैं। साथ में उनकी मां और दो बच्चे रहते हैं।

दोनों के दो बच्चे हैं। बच्चों के दो नाम रखे हैं, एक कुकी और दूसरा मैतेई। 5 साल की बेटी का कुकी नाम नेंगनेईकिम और मैतेई नाम लानथेनबी रखा है। वहीं 3 साल के बेटे का कुकी नाम थांगलेनहांग और मैतेई नाम लामसिंगदा है। बच्चे नगाहोइचोंग के पास रहते हैं। पूरा परिवार साथ नहीं सकता क्योंकि कुकी मैतेई को मार रहे हैं, मैतेई कुकी को। नगाहोइचोंग और जोतिन के लिए साथ रहने का मतलब है मौत चुनना।

नगाहोइचोंग और जोतिन की कहानी आज के मणिपुर की कहानी है। रिश्ता कोई हो, कितना भी पुराना हो, अगर कम्युनिटी अलग है, तो साथ नहीं रह सकते। नगाहोइचोंग और जोतिन भी अलग-अलग रिलीफ कैंप में रह रहे हैं। दोनों अपने आसपास के लोगों से एक-दूसरे की बात नहीं कर सकते।

मणिपुर हिंसा को कवर करते हुए हम कांगपोकपी के रिलीफ कैंप पहुंचे, तो वहां नगाहोइचोंग की कहानी मिल गई। मणिपुर से नगालैंड के लिए जाने वाले रास्ते पर 45 किमी दूर कांगपोकपी पहाड़ियों पर बसा है। चुराचांदपुर के बाद कांगपोकपी ही कुकी समुदाय का सबसे ज्यादा आबादी वाला जिला है।

रिलीफ कैंप में नगाहोइचोंग दो छोटे बच्चों के साथ बैठी मिलीं। कभी भी उनकी डिलीवरी हो सकती है। परिवार की जब सबसे ज्यादा जरूरत है, वो उनके पास नहीं है। मणिपुर में लगी आग ने उनका घर-परिवार सब छीन लिया है।

नगाहोइचोंग से बात शुरू की, तो वे 11 साल पीछे चली गईं, जब जोतिन से पहली मुलाकात हुई थी… ‘मैं 16 साल की थी। इंफाल के हायर सेकेंडरी स्कूल में पढ़ती थी। मां इंफाल में शिजा हॉस्पिटल में सपोर्ट स्टाफ थीं। पिता बहुत पहले गुजर गए थे। जोतिन स्कूल में साथ पढ़ता था। पहली बार देखते ही वो मुझे पसंद आ गया था।’

‘मेरे घर की हालत ठीक नहीं थी, जोतिन भी गरीब परिवार से था। इसलिए हम दोनों आगे पढ़ाई नहीं कर पाए। हमारी बातें होती रहीं। प्यार हुआ, फिर 2017 में हमने शादी कर ली। तब कुकी और मैतेई में इतनी नफरत नहीं थी कि कोई प्यार के आड़े आता।’

‘आज कुकी और मैतेई में लड़ाई-झगड़ा और नफरत है, 11 साल पहले ऐसा नहीं था। दोनों समुदाय एक-दूसरे के साथ प्यार से रहते थे। मुझे याद नहीं कि इंफाल में किसी ने कुकी होने की वजह से मेरे साथ भेदभाव किया हो। मुझे यकीन था, हमारी शादी से कोई नाराज नहीं होगा और ऐसा ही हुआ।’

हमने नगाहोईचोंग से पूछा कि जब आपने घर में बताया कि आप मैतेई लड़के से शादी करना चाहती हैं, तो घर वालों ने क्या कहा? वो बताती हैं, ‘मां ने कहा- कोई बात नहीं। जोतिन अच्छा लड़का है। केयरिंग है। मां ने शादी की इजाजत दे दी थी।’

अब लौटते हैं 30 जुलाई, 2023 में…
11 साल बाद आज हालात पूरी तरह बदल चुके हैं। 3 मई को मणिपुर में कुकी और मैतेई के बीच हिंसा शुरू हुई। नगाहोईचोंग पति, बच्चों और सास के साथ इंफाल के नेशनल गेम्स विलेज के वार्ड नंबर-2 में रहती थीं। ये जगह फुटहिल एरिया में है, जहां तनाव ज्यादा है। नगाहोईचोंग प्रेग्नेंट थीं, इसलिए उन्होंने और जोतिन ने तय किया कि वे घर छोड़ देंगे और रिलीफ कैंप में रहेंगे। दोनों ने कुछ सामान लिया और पास में लेइराक कम्युनिटी के रिलीफ कैंप में चले गए।

untitled design 66 1690731094 मैतेई कुकी पति पत्नी की प्रेग्नेंसी के बावजूद साथ रहने का मतलब है मौत चुनना
अपने बच्चे के साथ नगाहोईचोंग। हिंसा की वजह से पति का साथ छूटा, तो वे दोनों बच्चों के साथ मां के पास कांगपोकपी आ गई थीं। ये फोटो मार्च, 2019 की है। नगाहोईचोंग कहती हैं, ‘रिलीफ कैंप में मैतेई लोग रह रहे थे। दूसरे ही दिन लोगों ने मुझे आधार कार्ड दिखाने के लिए कहा।
आधार कार्ड देखकर बोलने लगे कि ये कुकी लड़की है, इसे भगाओ।’ ‘हमें लग गया कि यहां रहना मुश्किल होगा। 5 मई को हम कैंप से निकल गए। तभी मेरी मां का फोन आया। उन्होंने कहा कि मणिपुर के हालात देखकर लग नहीं रहा कि तुम दोनों साथ रह पाओगे।’

‘हमने तय किया कि मैं बच्चों को लेकर कांगपोकपी मां के पास चली जाऊंगी। हम बच्चों को लेकर लांगोल के एक आर्मी कैंप में पहुंचे। एक रात वहीं रुके। दूसरे दिन आर्मी की गाड़ी में बैठकर मैं कांगपोकपी चली गई। जोतिन इंफाल में ही रुक गए।’ नगाहोईचोंग के पति जोतिन। वे हिंसा से पहले तक नेशनल गेम्स विलेज में पत्नी के साथ रहते थे। अब मैतेई कम्युनिटी के रिलीफ कैंप में रह रहे हैं।

जोतिन कहते थे- फिक्र नहीं करना, बच्चे पर बुरा असर होगा…
6 मई को नगाहोईचोंग कांगपोकपी पहुंचीं, तब से जोतिन से उनकी लगातार बात हो रही थी। नगाहोईचोंग बताती हैं ‘वो कहता रहता था कि प्रेग्नेंट हो, इसलिए किसी बात की चिंता मत करना। अगर मैं दुखी होऊंगी, तो पेट में पल रहे बच्चे पर उसका असर होगा।’

13 जून को नगाहोईचोंग ने जोतिन को कॉल किया। नंबर नॉट रीचेबल आ रहा था। उसके बाद नगाहोईचोंग सुबह, दोपहर, शाम, दिन-रात कॉल करती रहीं, लेकिन जोतिन का फोन नहीं लगा। नगाहोईचोंग का एक फोन कांगपोकपी आते हुए रास्ते में कहीं खो गया। इसलिए उनके पास किसी का नंबर भी नहीं था, जिसके जरिए वो जोतिन से बात कर पाएं। उनके पास पति का फोटो तक नहीं है।

भरे गले से नगाहोईचोंग कहती हैं- ‘मैं अपनी खुशहाल जिंदगी को याद करती हूं। मैं पति, बच्चों और सास के साथ एक घर में खुशी से रहती थी। हमारी प्यारी फैमिली थी। मैतेई और कुकी की लड़ाई ने हमें अलग-अलग कर दिया। हम प्रार्थना करते हैं कि PM मोदी और अमित शाह को हमारे बारे में पता चले और वे ये मसला सुलझाएं।’

नगाहोईचोंग ने बताया था कि जोतिन इंफाल में हैं। हमने उनसे सभी डिटेल लीं, जिससे हम जोतिन को खोज सकते थे, जैसे घर का पता, उनका नंबर, पड़ोसियों का पता। कांगपोकपी से लौटकर हम इंफाल आ गए। नगाहोईचोंग के बताए पते पर पहुंचे। थोड़ी खोज-खबर के बाद जोतिन से हमारी मुलाकात हो गई। जोतिन को बताया कि हम कांगपोकपी में आपकी पत्नी नगाहोईचोंग से मिलकर आ रहे हैं।

पत्नी का जिक्र होते ही जोतिन सहम गए। कहने लगे कि यहां अच्छे से बात नहीं हो पाएगी, मेन रोड पर चलते हैं। हमने भी कहा कि कार में बैठकर बात करते हैं। हमने जोतिन से उनकी पत्नी का जिक्र किया तो वे लोगों के बीच से हट गए। उन्हें डर था कि कुकी पत्नी के बारे में मोहल्ले में बात करना ठीक नहीं होगा।

32 साल के जोतिन के पिता भी कम उम्र में गुजर गए थे। इसलिए परिवार की जिम्मेदारी जोतिन पर ही थी। वे दिहाड़ी मजदूर हैं। खेती-किसानी, मजदूरी जो काम मिल जाए, कर लेते हैं। इस तरह महीने में 8-10 हजार रुपए तक कमा लेते हैं।

नगाहोईचोंग भी वर्किंग वुमन ही थीं। शिजा हॉस्पिटल में स्टाफ के तौर पर काम करती थीं। उन्हें भी 8 हजार सैलरी मिलती थी। इस तरह परिवार का गुजर-बसर ठीक से हो जाता था। जोतिन को अस्थमा की दिक्कत है। इलाज में काफी पैसे खर्च हो जाने से सेविंग के नाम पर कुछ नहीं बचा है। जोतिन बताते हैं, ‘हमारी शादी से किसी को परेशानी नहीं थी। मैतेई लोग ही हमारे सपोर्ट में थे। मेरी मां ने हमारे रिश्ते काे सपोर्ट किया।’

हमने जोतिन को वो वीडियो दिखाए, जो हमने कांगपोकपी में नगाहोईचोंग से मिलते हुए बनाए थे। वीडियो देखकर जोतिन रोने लगे। वे कहते हैं, ‘मेरी सारी सेविंग अस्थमा की वजह से खत्म हो गई। मेरे फोन का रिचार्ज खत्म हो गया। इंटरनेट भी नहीं चल रहा था कि किसी से बोलकर रिचार्ज करवा लेते।’

‘हमारे इलाके में चेक पोस्ट भी बहुत हैं, इसलिए कुछ दिन तक मैं फोन रिचार्ज नहीं करवा पाया। पत्नी से बात करने की बहुत कोशिश की, लेकिन बात ही नहीं हो पाई।’

हालांकि, जोतिन की 29 जुलाई की रात पत्नी नगाहोईचोंग से बात हो गई। दोनों ने एक महीने बाद एक-दूसरे की आवाज सुनी। दोनों सेफ हैं, ये जानकर चैन मिला। ये सिर्फ एक नगाहोईचोंग और जोतिन की कहानी है। कम्युनिटी की लड़ाई ने इतनी बड़ी दीवारें खड़ी कर दी हैं कि नगाहोईचोंग और जोतिन कब मिल पाएंगे, कहना मुश्किल है।

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