जातीय जनगणना जारी रहेगी, पटना हाईकोर्ट का बड़ा फैसला, राजस्थान में 2011 में हुई थी जातिगत जनगणना, आंकड़े जारी करने पर कोर्ट की रोक

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मूकनायक मीडिया ब्यूरो | 01, अगस्त 2023 | जयपुर-पटना-दिल्ली : बिहार में जातीय जनगणना को लेकर पटना हाईकोर्ट (Patna HighCourt on Caste Census) ने बड़ा फैसला दिया है। कोर्ट ने साफ कर दिया कि राज्य में जातीय जनगणना जारी रहेगी। अदालत ने जातीय जनगणना पर रोक को लेकर दायर सभी याचिकाओं को खारिज कर दिया है। हाईकोर्ट ने बिहार में जाति आधारित गणना और आर्थिक सर्वे पर लगी रोक से संबंधित याचिका को खारिज कर दिया है। नीतीश कुमार सरकार के लिए ये राहत भरी खबर है।

कोर्ट ने खारिज की सारी याचिकाएं

बिहार में जातीय जनगणना को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर लगातार सुनवाई हो रही थी। जुलाई में सुनवाई पूरी हुई थी जिसके बाद पटना हाईकोर्ट ने फैसला सुरक्षित रख लिया था। जातीय जनगणना के खिलाफ दायर याचिकाओं पर चीफ जस्टिस केवी चंद्रन की खंडपीठ लगातार पांच दिनों से सुनवाई कर रही थी। सुनवाई पूरी होने के बाद फैसला सुरक्षित रखा और अब फैसला सुनाया गया।

बिहार में सात जनवरी 2023 से जातीय जनगणना की शुरुआत हुई थी। हालांकि, हाईकोर्ट ने अंतरिम आदेश देते हुए राज्य सरकार की ओर से कराई जा रही जातीय और आर्थिक सर्वेक्षण पर चार मई को रोक लगा दिया था। रोक लगा देने के बाद कोर्ट ने ये जानना चाहा था कि जातियों के आधार पर गणना और आर्थिक सर्वेक्षण कराना कानूनी बाध्यता है? कोर्ट ने ये भी पूछा था कि ये अधिकार राज्य सरकार के क्षेत्राधिकार में है या नहीं? साथ ही कोर्ट ने ये भी जानना कि इससे निजता का उल्लंघन होगा क्या?

हाईकोर्ट ने क्या कहा

हालांकि, अब कोर्ट ने जातीय जनगणना पर रोक को लेकर दायर सभी याचिकाएं खारिज कर दीं। हाईकोर्ट के फैसले से साफ हो गया कि राज्य में जातीय जनगणना आगे भी जारी रहेगी। नीतीश कुमार सरकार ने खास तौर से कास्ट सर्वे का फैसला लिया था। इसके लिए केंद्र से अपील भी की गई थी लेकिन कोई सुनवाई नहीं हुई। जिसके बाद प्रदेश सरकार ने अपने स्तर पर इस कराने का फैसला लिया।

पटना हाईकोर्ट से जनगणना को हरी झंडी

“जनगणना का अधिकार केंद्र सरकार में निहित होता है”- इसका ध्यान रखते हुए अब देश के दूसरे राज्यों में भी वहां की राज्य सरकार जाति आधारित सर्वे करा सकती हैं। पटना हाईकोर्ट में मंगलवार को आए फैसले के बाद याचिकाकर्ता सुप्रीम कोर्ट जा रहे हैं, लेकिन अब यह नजीर बन गया है। पटना हाईकोर्ट ने अंतरिम फैसले में जातीय जनगणना बताते हुए बिहार में इसपर रोक लगाई थी, लेकिन अब अंतिम फैसले में इसे सर्वे की तरह कराने की छूट दे दी गई है। राजस्थान समेत कांग्रेस शासित राज्यों में तो इस फैसले का इंतजार हो ही रहा था, भाजपा शासित उत्तर प्रदेश की भी नजर पटना हाईकोर्ट के फैसले पर थी।

नौ या छह- बिहार में यह कहावत खूब चलती है। मंगलवार को पटना हाईकोर्ट अपने अंतरिम फैसले से आगे अंतिम फैसले में यही करेगा। हाईकोर्ट ने पिछले महीने सुप्रीम कोर्ट की दी तारीख के अंदर बिहार में जातीय जनगणना को लेकर उठ रहे सवालों पर सुनवाई कर ली। चीफ जस्टिस के विनोद चंद्रन व जस्टिस पार्थ सार्थी की खंडपीठ ने लगातार पांच दिनों तक (3 जुलाई से लेकर 7 जुलाई तक) याचिकाकर्ता और बिहार सरकार की दलीलें सुनीं।

कोर्ट ने जाति आधारित जनगणना बताने वालों की भी पूरी दलील सुन ली और फिर सरकार के उस दावे का पक्ष भी सुना, जिसके अनुसार यह जाति आधारित सर्वे है। आज पटना हाईकोर्ट ने सीएम नीतीश कुमार के ड्रीम प्रोजेक्ट को हरी झंडी दे दी है। कोर्ट ने इसे सर्वे की तरह कराने की मंजूरी दे दी है। जल्दी ही बिहार सरकार फिर से जातीय जन-जनगणना शुरू करवाएगी। हालांकि कोर्ट के इस फैसले से याचिकाकर्ता नाखुश हैं। उनका कहना है कि अब वह इस मामले को लेकर सुप्रीम कोर्ट जाएंगे।

अंतिम फैसला आए बिना सुप्रीम कोर्ट में नहीं होगी सुनवाई
सुप्रीम कोर्ट ने 19 मई को तीसरी बार बिहार की जाति आधारित जन-गणना के केस को पटना हाईकोर्ट के पास भेजा था। दो बार जनहित के नाम पर याचिका पहुंचने पर सुप्रीम न्यायालय ने इसे हाईकोर्ट का केस बताते हुए वापस किया था। इसके बाद पटना हाईकोर्ट में सुनवाई हुई और यहां 04 मई को अंतरिम फैसला राज्य सरकार के खिलाफ आया। कोर्ट ने जाति आधारित जनगणना प्रक्रिया पर अंतरिम रोक लगाते हुए 04 मई तक जुटाए सभी डाटा को सुरक्षित रखने का आदेश दिया था। पटना हाईकोर्ट से अपने खिलाफ अंतरिम आदेश को देखकर बिहार की नीतीश सरकार अगली तारीख का इंंतजार किए बगैर सुप्रीम कोर्ट पहुंच गई थी। सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट कहा- “पटना हाईकोर्ट के अंतरिम फैसले में काफी हद तक स्पष्टता है, लेकिन अंतिम फैसला आए बगैर सुप्रीम कोर्ट में कोई सुनवाई नहीं होगी।

जानिए, आदेश का असर और ऑनलाइन डाटा की स्थिति
पटना हाईकोर्ट ने 04 मई को अंतरिम आदेश दिया और कुछ ही घंटे में सामान्य प्रशासन विभाग के निर्देश पर तमाम जिलाधिकारियों के जरिए गणना में लगे सारे कर्मियों तक एक लाइन का मैसेज पहुंच गया कि डाटा को यथास्थिति सुरक्षित किया जाए। इसके बाद क्या हुआ? दरअसल, भले ही सरकार ने 80 प्रतिशत काम पूरा होने की बात की है लेकिन सच्चाई यही है कि यह आंकड़ा कागज पर जानकारी जुटाने वालों का है। मतलब, 80 फीसदी के करीब लोगों की जानकारी पेपर पर ली गई है।

बिहार और दूसरे प्रदेशों के बाद अब राजस्थान में भी जातिगत जनगणना के आंकड़े सार्वजनिक करने की मांग उठने लगी है। ओबीसी से जुड़े संगठन और कांग्रेस नेता जातिगत जनगणना का समर्थन कर रहे हैं। बीजेपी के नेता इस मुद्दे पर राजस्थान में बोलने से बच रहे हैं। ओबीसी से जुड़े संगठन जातिगत जनगणना के आंकड़े सार्वजनिक करने की मुखर पैरवी कर रहे हैं। ओबीसी संगठन इस मुहिम को और तेज करने के लिए बैठकें कर रहे हैं। जातिगत जनगणना पर सियासत तेज हो गई है। इसका असर आने वाले दिनों में राजस्थान में भी दिखेगा।

jangadna 1630044646 300x225 जातीय जनगणना जारी रहेगी, पटना हाईकोर्ट का बड़ा फैसला, राजस्थान में 2011 में हुई थी जातिगत जनगणना, आंकड़े जारी करने पर कोर्ट की रोकजातिगत जनगणना के आंकड़े सार्वजनिक करने के लिए ओबीसी संगठन सबसे ज्यादा मुखर होकर आगे आ रहे हैं। ओबीसी संगठन अक्टूबर में दिल्ली में बड़ी सभा की तैयारियों में जुट गए हैं। 29 अक्टूबर को दिल्ली में सभा रखी गई है।

इस मुहिम का कांग्रेस ओबीसी विभाग से जुड़े नेताओं ने भी समर्थन किया है। कांग्रेस ओबीसी विभाग से जुड़े नेता श्रवण तंवर, राजेंद्र सैन सहित सभी पदाधिकारियों ने जातिगत जनगणना के आंकड़े सार्वजनिक करने की मुहिम का समर्थन किया है।

ओबीसी सर्व समाज और फुले समता परिषद छेड़ेगी मुहिम, दिल्ली में 29 अक्टूबर को सभा
ओबीसी सर्व समाज और अखिल भारतीय महात्मा फुले समता परिषद ने जातिगत जनगणना के आंकड़े सार्वजनिक करने की मुहिम को तेज करने का फैसला किया है। फुले समता परिषद के राष्ट्रीय कार्यकारी अध्यक्ष बापू भुजबल ने ओबीसी से जुड़े संगठनों को साथ जोड़ रहे हैं।

जयपुर में इस मुद्दे पर ओबीसी से जुड़े संगठनों की बैठक करके आगे दिल्ली कूच की रणनीति बनाई गई है। 29 अक्टूबर को दिल्ली में सभा रखी गई है। दिल्ली की सभा में राजस्थान से भी बड़ी संख्या में नेता और कार्यकर्ता शामिल होंगे।

ओबीसी के नेताओं ने कहा, जिसकी जितनी संख्या वह सामने आए
ओबीसी वर्ग से जुड़े नेताओं ने एक सुर में कहा कि जब सब कुछ जातिगत आधार पर तय हो रहा है, राजनीतिक दल टिकट से लेकर सत्ता में भागीदारी तक जातिगत आधार पर दे रहे हैं तो जातिगत जनगणना के आंकड़े सामने लाने में कोई हर्ज नहीं होना चाहिए। इससे पिछड़े वर्ग तक योजनाओं का लाभ पहुंचाने में आसानी होगी।

गुर्जर नेता हिम्मत सिंह बोले- जातिगत जनगणना से ही पिछड़ों को हक मिलेगा
गुर्जर नेता हिम्मत सिंह गुर्जर ने जातिगत जनगणना की मांग का समर्थन करते हुए कहा- जब पशु-पक्षियों की गणना हो सकती है तो इंसानों की जातिवार जनगणना क्यों नहीं हो सकती। प्रधानमंत्री पिछड़े समाज की हकमारी क्यों करना चाहते हैं? सरकार जब तक पिछड़ों की जनगणना जातिवार कॉलम बनाकर नहीं करेगी तब तक पिछड़े समाज की जातियों को उनका हक, हिस्सेदारी नहीं मिल सकेगी। पिछड़े समाज की जातिवार जनगणना कराने से बीजेपी, आरएसएस इतना डर क्यों रहे हैं। जातिगत जनगणना से वे ही डर रहे हैं।

जातीय जनगणना जारी रहेगी, पटना हाईकोर्ट का बड़ा फैसला, राजस्थान में 2011 में हुई थी जातिगत जनगणना, आंकड़े जारी करने पर कोर्ट की रोक
यूपीए सरकार ने 2011 में सामाजिक-आर्थिक सर्वे के साथ जातिगत जनगणना भी करवाई थी। उस समय भी जातिगत जनगणना पर खूब विवाद हुआ था। बाद में जातिगत जनगणना के आंकड़े जारी करने पर रोक लगा दी। केवल सामाजिक आ​र्थिक जनगणना के आंकड़े ही सार्वजनिक किए गए थे। अब 10 साल बाद फिर से यह मांग जोर पकड़ रही है।

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