गहलोत का अहंकार या चिरंजीवी – फ्री मोबाइल और ओपीएस जैसी योजनाओं की डिलीवरी ले डूबी

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मूकनायक मीडिया ब्यूरो | 04 दिसंबर 2023 | जयपुर – दिल्ली : चिरंजीवी योजना, फ्री मोबाइल और ओपीएस का चुनावों में प्रभाव नहीं दिखा। यही वजह है कि 2003 और 2013 के मुकाबले इस बार कांग्रेस हारी। सनातन, हिंदुत्व और मोदी की गारंटी ने राजस्थान में ‘रिवाज’ को बरकरार रखते हुए ‘राज’ को बदल दिया।

मुख्यमंत्री अशोक गहलोत की मुफ्त की योजनाएं और गारंटियां पिछले 30 साल से चल रही परिणाम बदलने की परंपरा को नहीं तोड़ पाईं। चुनाव इस मायने में भी खास था कि पहली बार प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्री के बीच मुकाबला था। आक्रामक रणनीति से भाजपा ने यह मुकाबला जीत लिया।

gif 091691656738 1701613150 गहलोत का अहंकार या चिरंजीवी   फ्री मोबाइल और ओपीएस जैसी योजनाओं की डिलीवरी ले डूबीभविष्यवाणी के लिए इन नतीजों में काफी कुछ है। कांग्रेस के लिए भारी चिंताएं हैं- क्योंकि सबसे प्रतिष्ठित राज्य राजस्थान तो उसने गंवा ही दिया, छत्तीसगढ़ भी हाथ से निकल गया। पिछले दो चुनाव से लोकसभा में एक सीट के लिए तरस रही कांग्रेस के लिए 2024 का चुनाव बड़ी चुनौती से कम नहीं होगा। हार की सबसे बड़ी वजह वो खुद है।

असल में कांग्रेस जुलाई 2020 में उसी दिन ही हार गई, जब गहलोत और पायलट खेमे की अलग-अलग बाड़ेबंदी हुई थी। सितंबर 2022 में इसकी फाइनल रिहर्सल भी हो गई थी।

नतीजा 3 दिसंबर, 2023 को आया। अशोक गहलोत और सचिन पायलट के विवाद ने पार्टी को हाशिए पर धकेल दिया। पूरा चुनाव गहलोत ने अपने स्तर पर लड़ा और उनका मुकाबला सीधे मोदी से रहा।

मोदी ने गहलोत के हाथ से सत्ता छीन ली। उधर, मोदी ने राजस्थान में अलग तेवर अपनाते हुए जो गारटेंड फॉर्मूला दिया उसे जनता ने स्वीकार कर लिया।

इस चुनाव में एक रोचक ट्रेंड यह भी देखने को मिला, जिसमें दो पार्टियों के बड़े दिग्गज हार गए। भले भाजपा से पूर्व प्रदेशाध्यक्ष सतीश पूनिया हों या नेता प्रतिपक्ष राजेंद्र राठौड़।

वसुंधरा की कोर टीम के भी कई लोग चुनाव हार गए। इनमें पूर्व मंत्री प्रभुलाल सैनी, प्रहलाद गुंजल, नरेंद्र नागर जैसे नेता शामिल हैं।

उधर, कांग्रेस के विश्वेंद्र सिंह, प्रताप सिंह खाचरियावास, बीडी कल्ला, रामलाल जाट, भंवर सिंह भाटी जैसे मंत्री हार गए।

इस रिजल्ट से उठने वाले सवालों को समझते हैं? साथ ही भविष्य की राजनीति को यह चुनाव कितना और कैसे प्रभावित करेगा यह भी जानते हैं…

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बाय-बाय : CM अशोक गहलोत

1. भाजपा की इस जीत का सबसे बड़ा कारण क्या है?
भाजपा की आक्रामक रणनीति। सनातन और हिंदुत्व के मुद्दे के साथ पार्टी ने युवाओं पर फोकस किया। लाल डायरी के माध्यम से बेरोजगारी और भ्रष्टाचार के मुद्दे को हवा दी।

महंगाई की नब्ज पकड़ते हुए गहलोत की गारंटी पर मोदी की गारंटी लाए। पेट्रोल के रेट पर पुनर्विचार की बात की गई। चुनाव के आखिर में OPS पर पुनर्विचार की बात कर तीनों राज्यों को संजीवनी दे दी। यह काफी निर्णायक रहा।

गुजरात की तरह राजस्थान में संगठन काफी मजबूत रहा। कमजोर सीटों पर संघ ने अपनी कमान संभाली। जयपुर में सिविल लाइंस में नए कैंडिटेट ने गहलोत सरकार के मंत्री को हरा दिया।

2. क्या मोदी के दम पर इतनी बड़ी जीत संभव है?
हां। राजस्थान में चुनाव की पूरी कमान मोदी ने संभाल रखी थी। यहां किसी चेहरे को आगे करने की बजाय भाजपा ने ब्रांड मोदी को ही जनता के बीच रखा था।

इसका बड़ा कारण था यह चुनाव मुख्यमंत्री अशोक गहलोत के साथ सीधे था। 2013 के विधानसभा चुनाव में मोदी लहर में भाजपा को ऐतिहासिक 163 सीटें मिली थीं।

बाय-बाय : CM अशोक गहलोत ने परिणामों के बाद शाम को राजभवन जाकर राज्यपाल कलराज मिश्र को मुख्यमंत्री पद से अपना इस्तीफा सौंप दिया।

8dcebfd9 40b4 450f af30 79ab486cc397 1701612552 गहलोत का अहंकार या चिरंजीवी   फ्री मोबाइल और ओपीएस जैसी योजनाओं की डिलीवरी ले डूबी

3. भाजपा की सबसे बड़ी रणनीति क्या रही?
भाजपा ने कांग्रेस की कमजोर नस पर प्रहार किया। गहलोत और पायलट गुट के विवाद का पूरा फायदा उठाया। चुनाव के आखिरी दिनों में सचिन पायलट और उनके पिता राजेश पायलट के साथ अन्याय होने की बात कहकर गुर्जरों के अंसतोष को और बढ़ाया। इसका नतीजा ये रहा कि पूर्वी राजस्थान में कांग्रेस पिछड़ गई।

इसके अलावा उदयपुर के कन्हैयालाल मामले के जरिए हिंदू वोट बैंक का ध्रुवीकरण किया गया। एक भी मुस्लिम को कैंडिडेट नहीं बनाया गया। तीन संतों को टिकट देकर हिंदुत्व की छवि पेश की। तीनों बड़े मार्जिन से जीत गए।

4. कांग्रेस की हार के और बड़े कारण क्या हैं?
सही मायने में कहें तो यह चुनाव गहलोत ने ही लड़ा था। कांग्रेस के बाकी नेता इसे हारा हुआ ही मान चुके थे। किसी ने कोई बड़ी ताकत नहीं दिखाई। चुनाव प्रचार के आखिरी दिन राजस्थान में कांग्रेस के किसी राष्ट्रीय नेता की सभा तक नहीं हुई। शुरू से प्रचार फीका रहा। प्रेस कॉन्फ्रेंस से आगे नहीं बढ़ पाया। सचिन पायलट अपने इलाके या अपने समर्थकों तक ही सिमटे रहे। हालांकि वे दीपेंद्र सिंह, इंद्रराज गुर्जर, वेदप्रकाश सोलंकी जैसे अपने समर्थकों को भी नहीं बचा सके।

  • कांग्रेस की हार के पीछे बड़ी वजह पूर्वी राजस्थान में हुई बड़ी हार है। जयपुर संभाग में 50 सीटों में से कांग्रेस ने 2018 में बंपर 34 सीटें हासिल की थीं। इस बार यह आंकड़ा काफी गिर गया। इसके अलावा मेवाड़, मारवाड़ और मेरवाड़ा में भी कांग्रेस को करारी शिकस्त मिली।
  • दूसरा, मोदी ने डबल इंजन की सरकार का जो नारा दिया, वह काम कर गया। कांग्रेस जिन मुद्दों पर चुनाव लड़ रही थी, उनमें चिरंजीवी योजना को छोड़ दें तो बाकी का लाभ जनता तक नहीं पहुंच पाया। फ्री मोबाइल, फ्री राशन किट, ग्रामीण क्षेत्रों में इंदिरा रसोई जैसी योजनाओं को लागू करने में बहुत देरी हो गई।
चुनावी सभाओं से लेकर रोड शो तक करके PM मोदी ने राजस्थान जीतने के लिए पूरी ताकत झोंक दी थी। वहीं कांग्रेस स्तर के किसी भी नेता ने प्रचार के अंतिम दिन सभा तक नहीं की।

5. क्या गहलोत सरकार के प्रति असंतोष था? eb2bd32c 47e3 4514 9f21 f112e3e051cc 1701612899 गहलोत का अहंकार या चिरंजीवी   फ्री मोबाइल और ओपीएस जैसी योजनाओं की डिलीवरी ले डूबी
इसमें सरकार के प्रति असंतोष से ज्यादा गुस्सा विधायकों और मंत्रियों को लेकर था, जो दिख रहा है। मुख्यमंत्री अशोक गहलोत भले ही कहते रहें कि पिछले चुनावों की तरह इस बार एंटी इनकम्बेंसी नजर नहीं आ रही, लेकिन यह सच था कि कांग्रेस के मंत्रियों और विधायकों के प्रति नाराजगी थी। राजस्थान में पिछले 6 विधानसभा चुनावों को देखें, तो सरकार में रहते कोई भी पार्टी जनता का विश्वास नहीं जीत पाई।

6. गहलोत और पायलट गुट का विवाद का चुनाव पर कितना असर पड़ा?
हर कारण में ये शामिल है। पूरे पांच साल गहलोत अपनी सरकार बचाने के जतन करते रहे। हालात ये रहे कि कांग्रेस के पास बूथ लेवल तक का संगठन नहीं था। पूरे पांच साल कई संस्थानों यूआईटी और जेडीए में नियुक्तियां नहीं की गईं। चार साल तक जिलाध्यक्ष और ब्लॉक अध्यक्ष तक नहीं थे। आपसी रस्साकशी के चलते जनता के बीच सरकार का अनुशासन सवालों के घेरे में आ गया। गहलोत और पायलट के बीच विवाद के कारण कांग्रेस को सबसे ज्यादा नुकसान हुआ।

7. बड़े पैमाने पर मंत्रियों और विधायकों की हार के क्या संकेत हैं?
सर्वे में जनता की मंत्रियों व विधायकों से नाराजगी की बात सामने आने के बाद भी 90 फीसदी से अधिक विधायकों को वापस उन्हीं सीटों पर उतार दिया गया। मंत्री महेश जोशी, विधायक भरोसी लाल जाटव, जौहरीलाल मीणा जैसों के अलावा दूसरों के न तो टिकट काट पाए और न ही सीट बदली। स्थानीय स्तर पर मंत्रियों व विधायकों के भ्रष्टाचार व अहम के मुद्दे उभरने लगे।

यह तक कहा जाने लगा कि हर विधानसभा सीट पर एक सीएम बन गया है। यह भी लोगों से सुनने में आया कि जितनी इस सरकार में विधायकों की चल रही है, उतनी तो किसी सरकार में नहीं चली। मर्जी से चहेतों के तबादले करवाए। दलालों के जरिए लेन-देन तक के आरोप लगे, जिससे बाकियों की नाराजगी उठानी पड़ गई। वोटिंग के जरिए लोगों ने अपनी भड़ास निकाल ली।

beniwalhanuman 1701613038 गहलोत का अहंकार या चिरंजीवी   फ्री मोबाइल और ओपीएस जैसी योजनाओं की डिलीवरी ले डूबी8. इस चुनाव का सबसे बड़ा फैक्टर क्या है?
राजस्थान में तीसरे दल के लिए कोई बड़ी जगह नहीं बन पाई। हनुमान बेनीवाल की पार्टी RLP पूरी तरह से सिमट गई। पिछली बार तीन सीटें जीती थीं, लेकिन इस बार वे खुद फंस गए। इस बार बड़े दल के रूप में दावा कर रहे थे, लेकिन उन्हें एक सीट ही मिली। RLP ने भाजपा से ज्यादा कांग्रेस के वोट कांटे। वहीं, ऐसा ही BAP ने वागड़ के आदिवासी अंचल में किया। BAP ने 3 सीटें जीतीं। पिछले चुनाव में 6 सीटें जीतने वाली बसपा इस बार 2 सीटें ही जीत पाई। करीब आधा दर्जन सीटों पर निर्दलीयों ने कब्जा जमाया है।

इन चुनाव में हनुमान बेनीवाल की पार्टी आरएलपी पूरी तरह से सिमट गई। पिछली बार तीन सीटें जीती थीं। इस बार वे खुद फंस गए।

9. जिले बनाने से कांग्रेस को कोई फायदा हुआ क्या?
कांग्रेस ने आखिरी बजट में 17 जिले बनाने का मास्टर स्ट्रोक खेला था, लेकिन सबसे छोटे जिले दूदू पर कांग्रेस सबसे पहले हारी। इसके अलावा डीडवाना और फलोदी में कोई फायदा नहीं हुआ। यहां भाजपा से बागी और निर्दलीय यूनुस खान जीत गए। फलोदी जहां सालों से जिला बनाने की बात थी, वहां भी कांग्रेस हार गई। कुल मिलाकर जिला बनाने के फायदे कम, नुकसान ज्यादा हुए।

10. चिरंजीवी, फ्री मोबाइल, ओपीएस का मुद्दा कितना प्रभावी?
फ्री इलाज के लिए चिरंजीवी योजना, फ्री मोबाइल और ओपीएस जैसी योजनाओं का इस चुनाव में प्रभाव रहा है क्योंकि 2003 और 2013 वाली हार कांग्रेस ने नहीं दोहराई। अधिकतर योजनाओं का लाभ भले ही देरी से मिला हो, लेकिन थोड़ा असर जरूर रहा जिससे कांग्रेस को एक सम्मानजक हार मिली।

गहलोत-पायलट गुट के कितने जीते-कितने हारे
गहलोत गुट : 
बीडी कल्ला, सालेह मोहम्मद, प्रताप सिंह खाचरियावास, विश्ववेंद्र सिंह, प्रमोद जैन भाया, सुखराम विश्नोई, परसादी लाल मीणा, रामलाल जाट, भंवरसिंह भाटी, रमेश मीणा, गोविंदराम मेघवाल, ममता भूपेश, शकुंतला रावत, राजेंद्र यादव, जाहिदा खान, उदयलाल आंजना जैसे मंत्री हार गए। वहीं, शांति धारीवाल, टीकाराम जूली, महेंद्रजीत सिंह मालवीय, अशोक चांदना, अर्जुन बामनिया और आरएलडी गठबंधन वाली सीट से सुभाष गर्ग ने जीत हासिल की।

पायलट गुट : वेद प्रकाश सोलंकी, दीपेंद्र सिंह, अमर सिंह, जीआर खटाना, राकेश पारीक, इंद्रराज गुर्जर जैसे नेताओं को हार मिली। वहीं, मंत्री बृजेंद्र ओला, मुरारी लाल मीणा, हरीश मीणा, समरजीत सिंह, मुकेश भाकर, रामनिवास गावड़िया अपनी सीट बचाने में सफल रहे।

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