‘आदिवासियों को महज सर्वणों के नेतृत्व में सत्ता के लिए इस्तेमाल करना चाहती है बीजेपी’ – प्रोफ़ेसर मीणा, राजस्थान और छत्तीसगढ़ में उठ रही है आदिवासी मुख्यमंत्री की माँग

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मूकनायक मीडिया ब्यूरो | 05 दिसंबर 2023 | जयपुर – दिल्ली : यह आम राय बन चुकी है कि बीजेपी राज्यों में आदिवासी नेतृत्व को सत्ता नहीं देती है। यही नहीं राजनीतिक और आर्थिक स्तर पर महत्वपूर्ण आदिवासी बहुल राज्यों में कांग्रेस, बीजेपी या वामपंथी समेत दूसरी पार्टियों का राजनैतिक चरित्र सवर्णवादी है? राजस्थान, मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ जैसे आदिवासी बहुल राज्यों में दलित आदिवासी वोटों से सत्ता में काबिज होने के कारण चुनावी नतीजों के बाद यही सवाल एक बार फिर से कहीं ज्यादा ध्यान खींच रहा है।

Meena 3 300x169 आदिवासियों को महज सर्वणों के नेतृत्व में सत्ता के लिए इस्तेमाल करना चाहती है बीजेपी   प्रोफ़ेसर मीणा, राजस्थान और छत्तीसगढ़ में उठ रही है आदिवासी मुख्यमंत्री की माँगदेश में सर्वाधिक आदिवासी आबादी वाला राज्य झारखंड या छत्तीसगढ़ नहीं बल्कि मध्यप्रदेश है। लिहाजा यहां आदिवासियों को लेकर सियासत भी खूब होती है। यहां की कुल आबादी का 21 फीसदी इसी समुदाय से आती हैं और 230 सीटों में से 47 सीटें आदिवासी समुदाय के लिए बकायदा आरक्षित हैं। लेकिन मौजूदा विधानसभा चुनाव में इस समुदाय से उम्मीदवार बेहद कम हैं।

छत्तीसगढ़, मध्यप्रदेश में अगर किसी एक समुदाय का सबसे ज्यादा सुरक्षित बीस सीटें हैं, तो वह आदिवासी है। आदिवासियों की आबादी भी दूसरी जातियों और समुदायों की तुलना में ज़्यादा है। छत्तीसगढ़ में अनसूचित जनजाति (STs) की आबादी करीब 30.6 फीसदी है, वहीं मध्यप्रदेश में आदिवासियों की आबादी 21.8 फ़ीसदी है। लेकिन क्या राजनीतिक तौर पर संभव है कि वहां का मुख्यमंत्री कोई आदिवासी हो सकता है?

डॉ किरोड़ी लाल मीना जैसी राजनीतिक ताक़त रखने वाले दूसरे राज्यों में सत्ता पर नेतृत्व का अध्ययन करें तो शायद इस सवाल का जवाब मिल सकता है। आजाद समाज पार्टी के प्रदेशाध्यक्ष प्रोफ़ेसर राम लखन मीणा का कहना है कि आदिवासी मनोवैज्ञानिक तौर पर ज्यादा जागरूक हैं। इस बार आदिवासियों ने तय किया है कि यदि राजस्थान, मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ में से कम से कम एक प्रदेश में बीजेपी आदिवासी सीएम नहीं बनाती है तो आगामी लोकसभा चुनावों में उन्हें ट्राइबल विरोधी सरकार का हिसाब करना है। इसलिए वे अपने मतों का विभाजन नहीं करना चाहते।

प्रोफ़ेसर मीणा का कहना है कि ‘आदिवासियों को महज सर्वणों के नेतृत्व में सत्ता के लिए इस्तेमाल करना चाहती है बीजेपी’। मध्यप्रदेश के 54 जिलों में 56 अनुसूचित जनजातियां हैं। इनमें छह आदिवासी समुदाय हैं- भील, गोड़, कोल, कुर्क, सहरिया और बैगा. राज्य में आदिवासियों की अनुमानित संख्या है-1.53 करोड़ मानी जाती है। सूबे में अनुसूचित जनजातियों के लिए 47 सीटें रिजर्व हैं। आदिवासी समुदाय ने पीएम मोदी के वादों पर आखरी बार यकीं जताया है। अगर इस बार मोदी अपने वादे पर खरे नहीं उतरे तो देश का आदिवासी समुदाय आगामी लोकसभा चुनावों में सबक सिखायेगा। वैसे ये कहना गलत नहीं होगा सूबे की सत्ता की चाबी आदिवासी समुदाय के पास भी है।

आदिवासी बहुल की परिभाषा

झारखंड, ओडिशा और छत्तीसगढ़ को आदिवासी बहुल राज्य के रूप में जाना जाता है. इन राज्यों के संदर्भ में आदिवासी बहुल की परिभाषा को यहां स्पष्ट कर देना ज़रूरी है। ये राज्य देश के उन छह राज्यों से अलग हैं, जहां आदिवासियों की आबादी पचास फ़ीसदी से भी ज्यादा है।

इनमें उत्तर पूर्व के अरुणाचल प्रदेश, नगालैंड, मिजोरम, मेघालय, दादर एवं नागर हवेली और लक्षद्वीप है। उत्तर पूर्व के सिक्किम में 33.8 फ़ीसदी और मणिपुर में 35.1 फ़ीसदी आदिवासी आबादी है। जिन राज्यों में पचास फ़ीसदी से ज़्यादा की आबादी है, वहां पर राजनीतिक पार्टियों के सामने ये सवाल नहीं होता है कि सत्ता का नेतृत्व किसे सौंपा जाये।

राजनीतिक चुनौती उन राज्यों में होती है, जहां आदिवासी आबादी एक तिहाई है। तो क्या वहां की राजनीतिक सत्ता किसी आदिवासी के हाथों में देने का फ़ैसला लेने की हिम्मत विधानसभा चुनाव में बहुमत हासिल करने वाली मुख्यधारा की कोई पार्टी कर सकती है?

राजस्थान, मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ में अधिकांश आदिवासी बहुल सीटों पर जीत हासिल करने का श्रेय तो बीजेपी आदिवासियों को दे रही है लेकिन क्या वह आदिवासी नेतृत्व को वहां स्वीकार कर सकती है? छत्तीसगढ़ जैसे राज्यों में क्या केवल आदिवासी बहुल आबादी संसदीय पार्टियों के सवर्ण नेतृत्व के लिए हार और जीत के रूप में ही स्वीकार्य हैं?

झारखंड और छत्तीसगढ़

अगर हम त्रिपुरा का जवाब झारखंड में तलाश करें तो भाजपा वहां पिछले विधानसभा चुनाव में पहली बार अकेले बहुमत में आई थी और उसने गैर आदिवासी को मुख्यमंत्री बनाने का फैसला लिया। रघुवर दास को पहला गैर अदिवासी मुख्यमंत्री बनाया गया। रमण सिंह को छत्तीसगढ़ में तीन बार गैर आदिवासी मुख्यमंत्री बनाया। झारखंड को जब बिहार से अलग राज्य के रूप में गठित किया जा रहा था तो झारखंड के अलग राज्य होने की अहमियत इस रूप में दर्ज की गई थी कि वहां की आदिवासी आबादी के लिए यह ज़रुरी हैं।

आदिवासियों ने अलग राज्य की मांग के लिए स्वतंत्रता के बाद से आंदोलन जारी रखा। झारखंड़ में आदिवासी के मुख्यमंत्री बने रहने का नारा तभी तक जारी रहा जब तक कि अलग राज्य बनने के बाद किसी पार्टी को विधानसभा के चुनाव में बहुमत नहीं मिला।

छत्तीसगढ़ में भी भाजपा अपने बूते सत्ता में हैं और उसकी कमान गैर आदिवासी सवर्ण नेतृत्व के अधीन पिछले पन्द्रह वर्षों से है। छत्तीसगढ़ को मध्यप्रदेश से अलग एक नये राज्य़ के रुप में बनाने की मांग के पीछे आदिवासियों की बहुल आबादी को पिछड़ेपन को दूर करना था।

छत्तीसगढ़ में कांग्रेस ने पहले मुख्यमंत्री के तौर पर आदिवासी नौकरशाह अजीत जोगी को नेतृत्व सौंपा था लेकिन ऐसा छत्तीसगढ़ के लिए हुए पहले विधानसभा चुनाव की पूर्व ही हुआ था। झारखंड में आदिवासियों की आबादी 26.2 प्रतिशत तो छत्तीसगढ़ में 30.6 प्रतिशत है। इन राज्यों में आदिवासियों के लिए सुरक्षित क्षेत्रों की संख्या क्रमश 28 और 29 है। वे राजनीतिक तौर पर ज्यादा ताकतवर इस मायने में भी है कि उनकी आबादी पूरे राज्य में है।

उनके मतों पर गैर आदिवासियों की जीत हार निर्भर होती है। ओडिशा में भी सुरक्षित क्षेत्रों की संख्या महज 33 हैं और 22.8 प्रतिशत आबादी के साथ राज्य के बहुत बड़ी संख्या में चुनाव क्षेत्रों को वे प्रभावित करने की क्षमता रखती है।

लेकिन ओडीशा में भी गैर आदिवासी मुख्यमंत्री ही रहे हैं। कांग्रेस ने 1999 में गिरिधर गोमांग को मुख्यमंत्री बनाया था। लेकिन यह 1996 के विधानसभा चुनाव में बहुमत मिलने के बाद नहीं हुआ बल्कि जब 1999 में कांग्रेस पार्टी में राजनीतिक अस्थिरता आई तब उन्हें अंतरिम तौर पर मुख्यमंत्री बनाया था।

अस्थिरता की स्थिति में आदिवासी के मुख्यमंत्री बनाने का यह पहला उदाहरण है। इन राज्यों में आदिवासियों के हाथों में संसदीय पार्टियां नेतृत्व नहीं देती हैं और वहां आदिवासियों को महज सर्वणों के नेतृत्व में सत्ता के लिए इस्तेमाल करना चाहती है।

दांव खेल सकती है भाजपा

चुनाव परिणामों से ये स्पष्ट संकेत सामने आ चुके हैं कि भाजपा राजस्थान, मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ में अकेले दम पर सरकार बनाने जा रही है। इसी के साथ इन राज्यों में बनने वाले संभावित मुख्यमंत्रियों के नामों पर भी चर्चा शुरू हो गई है। इस बात की प्रबल संभावना है कि भाजपा छत्तीसगढ़ में किसी आदिवासी चेहरे को मुख्यमंत्री बना सकती है। मध्यप्रदेश में किसी पिछड़े समुदाय के नेता को सरकार की कमान सौंपी जा सकती है। वहीं, राजस्थान में पिछड़े समुदाय के किसी जाट या मीणा नेता पर दांव खेला जा सकता है। इसे 2024 के लोकसभा चुनाव में विपक्ष की रणनीति को देखते हुए भाजपा का दांव करार दिया जा रहा है।

भाजपा आगामी लोकसभा चुनावों की रणनीति बनाए रखने की कोशिश करेगी और यही कारण है कि इन वर्गों के प्रभावशाली चेहरों को नेतृत्व दिया जा सकता है। हालांकि, राजस्थान में वसुंधरा राजे सिंधिया भी मजबूत दावेदार हो सकती हैं। सीटों की अपेक्षाकृत कम संख्या और जिस तरह उन्होंने राज्यपाल से मुलाकात की है, इसे उनकी पेशबंदी के तौर पर देखा जा रहा है। लेकिन पार्टी ने जिस तरह पूरे चुनावी अभियान में उन्हें किनारे लगाए रखा, जानकार मानते हैं कि वसुंधरा को दोबारा कमान मिलने की संभावना न के बराबर है।

आदिवासी चेहरे के तौर किरोड़ी लाल मीणा?

राजस्थान में आदिवासी मतदाताओं को साधन के लिए भाजपा का शीर्ष नेतृत्व में मुख्यमंत्री के रूप में डॉ. किरोड़ी लाल मीणा के नाम पर भी मंथन कर रहा है। डॉ. किरोड़ी भ्रष्टाचार के खिलाफ लगातार सड़कों पर संघर्ष कर नरेन्द्र मोदी की नजरों में भी अपनी पैठ जाम चुके हैं। राज्य के एसटी वोटर्स पर मजबूत पकड़ मानी जाती है। नरेन्द्र मोदी डॉ. किरोड़ी लाल मीणा के आह्वान पर दोसा में मीणा समाज के एक स्थल पर कार्यक्रम में शामिल हो चुके हैं।

दलित चेहरे के रूप में अर्जुनराम मेघवाल?

राजस्थान में दलित चेहरे के रूप में भाजपा का बड़ा चेहरा है। दो बार से बीकानेर से लगातार सांसद है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के नजदीकी लोगों में शुमार होते हैं। संस्कृति मंत्रालय से कई बड़ी शुरुआत कर चर्चा में है। लोकसभा चुनावों में दलित मतदाताओं को साधने के लिए अजुनराम मेघवाल के नाम पर भी मंत्रणा चल रही है।

इनके अलावा ओम बिरला को भी विकल्प के रूप में देखा जा रहा है। लोकसभा स्पीकर है। सब को साथ लेकर चलने की खासियत के साथ ही नरेन्द्र मोदी के करीबी हैं। भाजपा के बड़े नेताओं में स्वच्छ छवि बनी है। दीया कुमारी जब से राजनीति में आई भाजपा ने हमेशा आगे रखा है। जयपुर राजघराने से होने के कारण इस नाम पर वसुंधरा के विकल्प के रूप में चर्चा होती रही है। गजेन्द्र सिंह शेखावत आरएसए कार्यकर्ता के रूप में अपनी पहचान रखते हैं। 20 साल संघ के साथ काम करने के बाद भाजपा ने जोधपुर से 2014 में लोकसभा चुनाव लड़ाया। इसके बाद 2019 में मुख्यमंत्री अशोक गहलोत के बेटे को पटखनी देकर दूसरी बार लोकसभा चुनाव जीता।

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