बीएचयू : वीसी के खिलाफ जारी हुआ गैर-जमानती वारंट, प्रोफेसर बनने के बाद भी झेला जातीय भेदभाव, न्याय और बराबरी के लिए आवाज़ उठाने की जरूरत

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मूकनायक मीडिया ब्यूरो | 07 दिसंबर 2023 | जयपुर – दिल्ली : उत्तर प्रदेश के आंबेडकरनगर में एक दलित परिवार में उनका जन्म हुआ। बचपन से ही उन्हें जाति की वजह से भेदभाव का सामना करना पड़ा। पढ़ाई के पूरी करने के बाद उन्हें बीएचयू के इंग्लिश डिपार्टमेंट में असिस्टेंट प्रोफेसर के तौर पर नौकरी मिली। वहां भी उन्हें भेदभाव से जूझना पड़ा। अब वह गांव-गांव जाकर लोगों को उनके अधिकार बता रही हैं, उन्हें जगा रही हैं। कई बार उन्हें जान से मारने की धमकियां दी गईं, लेकिन वह डरी नहीं। न्याय के लिए उनका संघर्ष जारी है।

मिलिए डॉ. इंदु चौधरी से और जानिए उनकी कहानी, खुद उनकी जुबानी…

डॉ. इंदु चौधरी गांव-गांव जाकर लोगों को जागरूक करती हैं। पापा लखनऊ में जॉब करते थे। मेरी पढ़ाई-लिखाई भी वहीं हुई। छुट्टियों में जब पापा के साथ गांव जाती तो देखती कि ऊंची जाति वालों के घरों में हमारे लिए अलग बर्तन रखे जाते हैं। एक बार गांव में ही मैं 5-6 लोगों के साथ एक परिचित के घर गई। जिन्हें मैं मामा-मामी कहती थी। वहां हम सबको एकसाथ खाना परोसने की बजाए दो-दो लोगों को बारी-बारी से खाना खिलाया गया।

फिर मामी सफाई देने लगीं कि वे माली बिरादरी से हैं और हमारे लिए उनके घर में सिर्फ 2 थाली ही हैं। वही थाली साफ कर-करके बारी-बारी से खाना खिलाया गया। जबकि, वह मामी लखनऊ में हमारे पास आतीं, तो हमारे घर में ठहरतीं, हमारे ही बर्तनों में खाना भी खातीं। गांव में हमारे साथ उनका बर्ताव एकदम उलटा हो गया।

खेतों में मजदूरी के बदले मिलती थी सिर्फ जूठन
लखनऊ में कभी ऐसे भेदभाव का सामना नहीं करना पड़ा था, सब एक-दूसरे के साथ उठते-बैठते और साथ में खाना खाते। गांव पहुंचते ही माहौल बदल जाता। गांव में कुछ महिलाएं कहतीं कि तुम बहुत अच्छी दिखती हो, लगता नहीं कि दलित परिवार से हो। मुझे ये बातें समझ न आतीं। घर लौटकर पापा से पूछती तो वे समझाते कि हमारी जाति की वजह से हमारे साथ भेदभाव किया जाता है।

ननिहाल और दादी के घर दोनों जगह मामा, मम्मी-पापा पुराने दिनों के बारे में बताते कि कैसे उन्हें कुएं से पानी नहीं भरने दिया जाता था। वे सारा दिन खेतों में मजदूरी करते और बदले में सिर्फ जूठन खाने को मिलती। गांव में बैलगाड़ी पर बैठ जाती तो कथित ऊंची जातियों के बच्चे कमेंट करते कि चाहे जितना पढ़ लो, गाड़ी में घूम लो, लेकिन रहोगे तो तुम लोग नीच के नीच ही। मुझे बचपन से ही भेदभावों का सामना करना पड़ा और आज भी इससे संघर्ष जारी है।

ऊंची जाति वाले हमारे लिए रखते अलग बर्तन
2-3 साल पहले सामाजिक कार्यकर्ता ललई यादव की जयंती मनाने के लिए मैं अपनी टीम के साथ गांव-गांव जा रही थी। एक गांव में प्रधान जी को हमारे बारे में पता चला तो उन्होंने कहा कि आप लोग दरवाजे पर आए हैं तो पानी पी लीजिए। वह यादव समुदाय से हैं। उन्होंने सबको प्लास्टिक के गिलास में पानी और गुड़ दिया और मुझसे थोड़ी देर रुकने को कहा।

पंद्रह-बीस मिनट बाद प्रधान जी स्टील के गिलास में पानी लेकर आए तब जाकर देरी की वजह समझ आई। मैं कुछ बोली नहीं और हंसकर पानी पी लिया। अगले दिन पास के गांव में कार्यक्रम हुआ, वहां प्रधान जी भी अपनी पत्नी के साथ आए।

तब मैंने सबके सामने कहा- ‘प्रधान जी ने मुझे स्टील के गिलास में पानी पिलाकर कल खास तरीके से मेरा स्वागत किया। पहले उन्होंने दलितों को पानी पिलाने के लिए रखे गए स्टील के गिलास खोजे होंगे। फिर गिलास को मांजकर साफ किया होगा। तब जाकर मुझे पानी मिला।’

मेरी बात सुनकर प्रधान जी शर्मिंदा हुए तो मैंने उन्हें समझाया कि न तो मुझे इस बात का बुरा लगा और न मैं आपको शर्मिंदा करना चाहती हूं। मैं सिर्फ इसलिए बता रही हूं, क्योंकि कल जैसा बर्ताव आपने मेरे साथ किया, आपके साथ वैसा ही व्यवहार ऊंची जातियों के लोग अपने घर पर करेंगे। इसके बाद उन्होंने गलती मानी। न्याय और बराबरी के लिए समाज को जगाने की शुरुआत मेरी नौकरी के साथ हुई। खुद भेदभाव झेलने वाली इंदु अब समाज को जाति के बंधन से मुक्त कराने की मुहिम चला रही हैं।

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प्रधानमंत्री मोदी के संसदीय क्षेत्र में दलित महिला प्रोफ़ेसर के साथ भेदभाव

प्रोफेसर बनने के बाद भी झेला भेदभाव
पढ़ाई पूरी करने के बाद मुझे बनारस हिंदू यूनिवर्सिटी में बतौर शिक्षक नौकरी मिल गई। नौकरी ज्वाइन करने के बाद मेरे डिपार्टमेंट के हेड ने कहा कि आप लखनऊ से अकेले आई हैं, होटल में रहने की बजाए फैकल्टी गेस्ट हाउस में रुक जाइए। गेस्ट हाउस गई तो वॉर्डन मेरा अपॉइंटमेंट लेटर पढ़कर कहने लगे कि तुम तो शेड्यूल कास्ट से हो, इस गेस्ट हाउस में कैसे रह सकती हो।

यह सुनकर मन में तो आया कि पलट कर थप्पड़ मार दूं, लेकिन खुद को शांत करते हुए मैंने जवाब दिया, हां सर, तो क्या हुआ?

तब तक मेरे डिपार्टमेंट के हेड का फोन वॉर्डन के पास आ गया। उनके कहने पर वॉर्डन 200 रुपए प्रतिदिन के किराए पर कमरा देने को तैयार हो गया। 2-3 दिन बाद अगल-बगल के कमरों में रहने वाली दूसरी टीचर्स से पता चला कि वे 4 साल से वहां रह रही हैं और सिर्फ 50 रुपए प्रतिदिन किराया दे रही हैं। उन्होंने यह भी बताया कि गेस्ट हाउस में 3 कमरे ऐसी अविवाहित महिला शिक्षकों के लिए रिजर्व हैं, जो बाहर से आई हैं।

मुझे कार चलाते देख वॉर्डन को होती जलन
मुझसे 4 गुना ज्यादा चार्ज वसूलने पर मैंने वॉर्डन को लेटर लिखा कि जैसे दो लोगों को रहने की अनुमति दी गई है, वैसे ही मुझे भी रहने दिया जाए। लेकिन, उसने मना कर दिया और कहा कि आप वाइस चांसलर से परमिशन लेकर आइए। वीसी के पास गई तो उन्होंने तुरंत अनुमति दे दी। वीसी का लेटर देखकर वॉर्डन का पारा और हाई हो गया। लेकिन, 100 रुपए प्रतिदिन के किराए पर 3 महीने रहने की अनुमति दे दी।

उन दिनों मेरे पास कार थी, लेकिन वॉर्डन को इससे भी जलन होती। जहां मेरी गाड़ी खड़ी होती थी, वहां उसने गेट लगवा दिया। बाहर गाड़ी पार्क करने लगी तो वहां भी गेट लगवा दिया गया। 3 महीने बाद फिर परमिशन मांगी तो उन्होंने कहा कि आप वीसी से लिखवाकर लाई हैं, तो उन्हीं के पास जाइए। मैं दोबारा वीसी से अनुमति ले आई। लेकिन, अबकी बार भी वॉर्डन ने मुझे सिर्फ 3 महीने ही रहने दिया और लेटर में लिख दिया कि 3 महीने बाद 200 रुपए प्रति दिन का चार्ज चुकाना पड़ेगा।

कमरे का ताला तोड़ गायब कर दिया सामान
मैंने वीसी को लेटर लिखा, लेकिन वह रिटायर हो रहे थे और उनका रेस्पॉन्स नहीं आया। 3 महीने बीत गए। इसी बीच यूनिवर्सिटी में छुट्टी हो गई। वीसी को रिमाइंडर लेटर भेजकर मैं अपने घर चली गई। इधर, वॉर्डन और उनकी चीफ वॉर्डन मैडम ने 24 घंटे में कमरा खाली करने का एक लेटर बनाया और छुट्टियां शुरू होने के बाद मेरे डिपार्टमेंट में दे दिया।

सड़क पर भूखे-प्यासे बितानी पड़ी पूरी रात
3 दिन बाद वापस आई तो देखा कि मेरे कमरे का ताला खुला था, अंदर कोई और गेस्ट रुका था और मेरा सारा सामान गायब था। संयोग से गेस्ट ने उसी दिन चेकआउट कर दिया। मैंने अपने रूम में सामान रखा और तैयार होकर एग्जाम ड्यूटी पर चली गई। ड्यूटी से लौटकर वॉर्डन से मिलने की कोशिश की, लेकिन उन्होंने मना कर दिया। अपने रूम पर पहुंची तो देखा कि मेरे ताले के ऊपर वॉर्डन ने अपना ताला लगा दिया था।

मुझे समझ नहीं आ रहा था कि अब रात में क्या करूं, कहां जाऊं। मैं रोने लगी। थाने गई, लेकिन पुलिस ने कोई एक्शन नहीं लिया। मेरा बैग कमरे में बंद था और पास में इतने पैसे भी नहीं थे कि खाना खा सकूं। पूरी रात भूखे प्यासे फैकल्टी गेस्ट हाउस के बाहर सड़क पर बैठी रही। उस दिन मुझे समझ में आया कि हम भले ही कितना पढ़-लिख लें, लेकिन समाज में जाति के आधार पर होने वाले भेदभाव से छुटकारा तब भी नहीं मिलता।

खबर छपने के बाद पुलिस ने दिलाया कमरा

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आरएसएस आदिवासियों और दलितों पर अत्याचार के मामलों में चुप्पी क्यों साथ लेता है?

कुछ पत्रकारों को घटना के बारे में पता चला तो वे रात में ही मेरे पास आए। अगले दिन अखबारों में खबर छपी। सुबह गेस्ट हाउस के बाहर लगे एक नल में अपना हाथ-मुंह धोकर मैं फिर से अपनी ड्यूटी पर चली गई। दूसरा दिन भी सिर्फ ड्यूटी पर मिले चाय-समोसे के सहारे बीत गया। तब तक खबर छपने का असर दिखने लगा। शाम को पुलिस आई और वॉर्डन से ताला खुलवाकर मुझे रूम दिलाया। मेस में मेरे खाने का इंतजाम कराया।

इस घटना के बाद दूसरे कर्मचारी भी मुझसे संपर्क करने लगे। अपने साथ होने वाले भेदभाव के बारे में बताने लगे कि कैसे उन्हें परेशान किया जाता है। कभी उनकी छुट्‌टी मंजूर नहीं होती, समय पर प्रमोशन नहीं मिलता। फिर मैंने बीएचयू में ही अपने जैसी सोच वाले कुछ लोगों को इकट्‌ठा किया और एसी-एसटी एम्प्लॉयीज वेलफेयर असोसिएशन- सेवा बीएचयू के नाम से संस्था बनाई। जिसके जरिए कर्मचारियों की मदद करने लगे संवैधानिक अधिकारों और बाबा साहेब के संदेशों को जन-जन तक पहुंचाने में जुटी हैं डॉ. इंदु

प्रोफेसर ने लिखा- ‘एससी बने प्रोफेसर तो होगा नुकसान’
इसी दौरान रिक्त पदों के बारे में जानकारी जुटाने के लिए आरटीआई फाइल की। जवाब में एक डॉक्यूमेंट मिला, जिसमें फिजिक्स डिपार्टमेंट के एक प्रोफेसर ने लिखा था कि उनके विभाग में शेड्यूल कास्ट के 3 असिस्टेंट प्रोफेसर नियुक्त हो चुके हैं। अगर आगे और ऐसे लोगों को नौकरी पर रखा गया तो विभाग को बहुत नुकसान होगा। उनकी इस टिप्प्णी पर वीसी ने एक कमिटी भी बना दी, जिसने असोसिएट और प्रोफेसर लेवल पर रिजर्वेशन खत्म करने की सिफारिश कर दी।

वीसी के खिलाफ जारी हुआ गैर-जमानती वारंट
ऐसी जातिवादी मानसिकता रखने वाले प्रोफेसर के खिलाफ वाइस चांसलर से शिकायत की। कोई कार्रवाई नहीं हुई तो राष्ट्रीय अनुसूचित जाति आयोग से शिकायत की। आयोग ने वीसी को नोटिस जारी किया, नोटिस पर नहीं आए तो वारंट जारी किया, तब भी नहीं आए तो गैर जमानती वारंट जारी किया। साथ ही मानव संसाधन मंत्रालय के सेक्रेटरी को भी तलब किया गया। आयोग ने राष्ट्रपति को भी रिपोर्ट भेजी।

उधर, वीसी गैर जमानती वारंट पर हाई कोर्ट से स्टे ले आए। हाई कोर्ट में अपना पक्ष रखने के लिए मैंने अर्जी दी। पूरी तैयारी के साथ यूनिवर्सिटी में हो रही गड़बड़ियों से जुड़े सारे दस्तावेज और तथ्य रखने शुरू कर दिए। लेकिन, तथ्यों पर गौर करने की बजाए जज कहने लगे कि तुम लोग खुद के दलित जाति से होने का फायदा उठाते हो। जहां मुझे न्याय की उम्मीद थी, वहां मेरी जाति पर टिप्पणी हुई तो मैंने बिना डरे तुरंत आपत्ति दर्ज कराई।

गांव-गांव जाकर लोगों को जगाने की मुहिम
सुनवाई के बाद बाहर निकली तो वकीलों ने घेर लिया और बिना डरे अपनी बात कहने पर मेरा हौसला भी बढ़ाया। उस दिन जब मैंने देखा कि इतनी पढ़ाई-लिखाई करने, प्रोफेसर बनने के बाद भी जब हमारे साथ ऐसा बर्ताव हो सकता है, तो गांवों में रहने वाले कम पढ़े-लिखे लोगों पर क्या बीतती होगी।

मैंने और मेरे पति ने तय किया कि हमारा संघर्ष सिर्फ बीएचयू के कैंपस तक सीमित नहीं रहेगा, हम गांव-गांव जाकर लोगों को जागरूक करेंगे। रोज क्लास खत्म होने के बाद मैं आसपास के गांवों में जाकर लोगों को उनके अधिकारों के बारे में बताने लगी। धीरे-धीरे लोग जुड़ने लगे और हमारा दायरा बढ़ने लगा। आसपास के जिलों में भी हमारे कार्यक्रम होने लगे।

जान से मारने की मिलीं धमकियां
इस काम में भी बहुत अड़चनें आईं। लोगों को भड़काने की कोशिशें की गईं। मुझे जान से मारने, जलाने की धमकियां मिलीं। लोगों ने कीचड़ उछाला कि मैं राजनीति करना चाहती हूं। ऐसे लोगों को मैं सिर्फ इतना ही कहती हूं कि मैं न तो किसी से डरूंगी और न ही रुकूंगी। मैं जो कर रही हूं, वह राजनीति से परे है। समाज की बेहतरी के लिए है। शुरू में हमारी बात सुनने के लिए 2-4 लोग ही आते थे, लेकिन आज हजारों लोगों की भीड़ उमड़ती है। अब तो लोग खुद कार्यक्रम आयोजित करते हैं और हमें बुलाते हैं। महिलाएं आपस में चंदा करके ट्रैक्टर ट्रॉली से इन कार्यक्रमों में पहुंचती हैं। कुछ औरतें तो मेरे लिए अपने घर से खाना भी बनाकर ले आती हैं।

बेटियों को पढ़ाने पर खर्च कर रहे शादी का पैसा
इसका असर भी दिखने लगा है। लोग अपने हक के लिए लड़ने लगे हैं। न्याय के लिए पुलिस और प्रशासन से भिड़ने से भी पीछे नहीं हटते। अपना विरोध जताने के लिए हर संवैधानिक तरीका अपना रहे हैं। महिलाएं अपने बच्चों को पढ़ा रही हैं। शादी के लिए रखे गहने और पैसे बेटियों को पढ़ाने पर खर्च कर रही हैं। ऐसे कई बच्चे टीचर, एसडीएम और डॉक्टर बन चुके हैं। तेरहवीं पर होने वाले मृत्युभोज आयोजित करने की बजाए उस पैसे का इस्तेमाल दूसरों की मदद के लिए कर रहे हैं।

जिस गेस्ट हाउस में ठहरने के लिए मेरा संघर्ष शुरू हुआ, वहां फिर मैं बिना एक भी पैसा दिए साढ़े 3 साल रही। शादी के बाद पति के साथ रहने के लिए मुझे मेरी पसंद का घर भी दिया गया। अगर हम बिना डरे अपने हक के लिए लड़ें, तो जीत मिलनी तय है। कोई भी हमसे हमारे अधिकार नहीं छीन सकता।

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