खाद्य सुरक्षा और पोषण पर संयुक्त राष्ट्र की 2023 की रिपोर्ट, भारत के 4 में से 3 नागरिक अल्पपोषित हैं

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मूकनायक मीडिया ब्यूरो | 16 दिसंबर 2023 | जयपुर – दिल्ली : खाद्य सुरक्षा और पोषण पर संयुक्त राष्ट्र की 2023 की रिपोर्ट में कहा गया है कि 74.1 फीसदी भारतीय या भारत के एक अरब से अधिक लोग 2021 में स्वस्थ आहार का इंतजाम करने में असमर्थ थे। यह आंकड़े भारत सरकार के उस दावे पर सवाल उठाते हैं कि देश में केवल 81.3 करोड़ लोगों की ही खाद्य सहायता की ज़रूरत है।

द टेलीग्राफ के मुताबिक, संयुक्त राष्ट्र की पांच एजेंसियों की यह रिपोर्ट इस सप्ताह की शुरुआत में जारी की गई थी। रिपोर्ट में 2020-22 के दौरान भारत की कुपोषित आबादी का अनुपात 16.6 प्रतिशत होने का अनुमान लगाया गया है। रिपोर्ट के मुताबिक, तुलना करें तो बांग्लादेश में लगभग 66 प्रतिशत, पाकिस्तान में 82 प्रतिशत, ईरान में 30 प्रतिशत, चीन में 11 प्रतिशत, रूस में 2.6 प्रतिशत, अमेरिका में 1.2 प्रतिशत और ब्रिटेन में 0.4 प्रतिशत लोग 2021 में स्वस्थ आहार लेने में असमर्थ थे।

यह रिपोर्ट संयुक्त राष्ट्र की एक विशेष एजेंसी खाद्य और कृषि संगठन (एफएओ) और अन्य एजेंसियों द्वारा तैयार की गई है। केंद्र ने देश में अल्पपोषित लोगों के अनुपात के रूप में 16.6 प्रतिशत के एफएओ रिपोर्ट के अनुमान को चुनौती देते हुए कहा है कि यह आंकड़ा एक सर्वेक्षण पर आधारित है जिसमें आठ प्रश्न और 3,000 उत्तरदाताओं का सैंपल सर्वे शामिल था। केंद्र ने कहा है, ‘भारत जैसे बड़े देश के लिए एक छोटे से नमूने से एकत्र किए गए डेटा का उपयोग भारत में अल्पपोषितों (जनसंख्या) के अनुपात की गणना करने के लिए किया गया है, जो न केवल गलत और अनैतिक है, बल्कि इसमें स्पष्ट पूर्वाग्रह की भी बू आती है।’

भारत में अल्पपोषण बड़ी चिंता

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राजस्थान केंद्रीय विश्वविद्यालय में जनसंख्या स्वास्थ्य और मीडिया एक्सपर्ट के प्रोफ़ेसर राम लखन मीणा, जो भारत में भोजन की कमी का अध्ययन करने वाले विशेषज्ञों में से हैं, ने मूकनायक मीडिया को बताया, ‘भारत में भूख और भोजन की कमी के अनुमान के बारे में केंद्र की वाजिब चिंताओं के आलोक में, 81.3 करोड़ लोगों को खाद्य सहायता की जरूरत का अनुमान भी आश्चर्यजनक रूप से अधिक है, क्योंकि यह अल्पपोषण की व्यवहारिक संख्या से अधिक है।’

वहीं, खाद्य सुरक्षा के लिए अभियान चलाने वाले एक गैर-सरकारी नेटवर्क, भोजन का अधिकार अभियान (आरएफसी) के सदस्यों, ने कहा कि एफएओ का अनुमान कि 1.043 अरब लोग स्वस्थ आहार नहीं ले सकते, यह हमारे भी आकलन के अनुरूप है कि एक अरब से अधिक लोगों को खाद्य सहायता की आवश्यकता है।

प्रोफ़ेसर मीणा ने कहा, ‘81.3 करोड़ का अनुमान 2011 की जनगणना पर आधारित है- अगली जनगणना दो साल से लंबित है.’ उन्होंने जोड़ा, ‘नई जनगणना के बिना कई जरूरतमंद, कमजोर लोगों के पास राशन कार्ड नहीं होंगे जो उन्हें पीएमजीकेएवाई के लाभों का हकदार बनाएंगे।’

प्रोफ़ेसर मीणा यह भी कहा कि कई बार सरकार को पत्र लिखकर खाद्य सहायता सामग्री में विस्तार के लिए अनुरोध किया था ताकि स्वस्थ आहार के लिए आवश्यक दाल, खाना पकाने का तेल और सब्जियों जैसी अन्य वस्तुओं को शामिल किया जा सके. उन्होंने कहा, ‘कुछ राज्यों ने ऐसी चीजें शामिल की हैं, लेकिन हमें केंद्र से कोई प्रतिक्रिया नहीं मिली है।’ भोजन की कमी की जो बात विशेषज्ञ कह रहे हैं वह केंद्र के स्वयं के राष्ट्रव्यापी पारिवारिक स्वास्थ्य सर्वेक्षणों में भी सामने आई है।

तत्काल ध्यान देने की जरूरत

राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण 2021 पर आधारित एक अध्ययन में पाया गया कि सबसे गरीब 20 प्रतिशत सामाजिक-आर्थिक परिवारों में, 40 प्रतिशत से अधिक महिलाएं, यहां तक कि गर्भवती महिलाएं भी डेयरी उत्पादों का सेवन नहीं करती हैं. इसमें यह भी पाया गया कि देश में 50 प्रतिशत से अधिक महिलाएं और 40 प्रतिशत पुरुष विटामिन-ए वाले फलों का सेवन नहीं करते हैं।

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आहार विशेषज्ञों का कहना है कि अल्पपोषण, खासकर सूक्ष्म पोषक तत्वों (माइक्रोन्यूट्रिएंट) की कमी भारत में अब भी चिंता का बड़ा विषय है, जिस पर तत्काल ध्यान दिए जाने की जरूरत है। अल्पपोषण का मतलब है कि कोई व्यक्ति स्वस्थ रहने के लिए जरूरी पोषक तत्व पर्याप्त मात्रा में नहीं ले पा रहा है।

इंटरनेशनल फूड पॉलिसी रिसर्च इंस्टीट्यूट (आईएफपीआरआई) ने इस हफ्ते काठमांडू में जारी ‘द ग्लोबल फूड पॉलिसी रिपोर्ट (जीएफपीआर) 2023’ में कहा था कि वैश्विक स्तर पर अल्पपोषित आबादी 2014 में 57.3 करोड़ से 34.2 फीसदी बढ़कर 2021 में 76.8 करोड़ हो गई।

रिपोर्ट के मुताबिक, 2019 से 2021 तक अफगानिस्तान में सर्वाधिक 30 फीसदी अल्पपोषण दर्ज किया गया। इस अ‍वधि में पाकिस्तान में अल्पपोषण का स्तर 17 फीसदी, भारत में 16 फीसदी, बांग्लादेश में 12 फीसदी, नेपाल में छह फीसदी और श्रीलंका में चार फीसदी था।
आईएफपीआरआई के निदेशक (दक्षिण एशिया) शाहिदुर राशिद ने कहा कि भारत खाद्यान्न के उत्पादन और उपलब्धता के मामले में ठीक स्थिति में है, लेकिन वहां पहुंच के संबंध में चुनौतियां व्याप्त हैं। काठमांडू में ‘पीटीआई-भाषा’ के साथ साक्षात्कार में कहा, “स्वस्थ जीवन के लिए पर्याप्त मात्रा में चावल या गेहूं खाना ही काफी नहीं है।
भारत में लोगों के आहार में पोषण का अभाव एक बड़ा मुद्दा
भारत में लोगों के आहार में पोषण का अभाव एक बड़ा मुद्दा है। भविष्य में भारत को इस मुद्दे का हल गंभीरता से निकालना होगा। मीणा ने कहा, “मिसाल के तौर पर, सूक्ष्म पोषक तत्वों की कमी को ले लीजिए, जिसे छिपी हुई ‘भुखमरी’ कहा जाता है। भारत और दक्षिण एशिया में यह काफी अधिक है। लिहाजा, हमें सूक्ष्म पोषक तत्वों की पर्याप्त आपूर्ति सुनिश्चित करने के उपाय करने होंगे, ताकि हम भविष्य में एक स्वस्थ पीढ़ी तैयार कर सकें।”

इंटरनेशनल राइस रिसर्च इंस्टीट्यूट (आईआरआरआई) में भारत की प्रतिनिधि डॉ. रंजीता पुष्कर ने राशिद की राय से सहमति जताई। उन्होंने कहा कि भारत में खाद्य असुरक्षा एक बड़ी समस्या नहीं हो सकती है, लेकिन पोषक तत्वों की कमी वास्तव में एक गंभीर समस्या है।

पुष्कर ने ‘पीटीआई-भाषा’ से कहा, “पोषक तत्वों की कमी गंभीर चिंता का विषय है। ऐसा अनुमान है कि गर्मी का स्तर बढ़ने के साथ ही कई फसलों, चावल-गेहूं की गुणवत्ता और उनमें पोषक तत्वों की उपलब्धता में और कमी आएगी। ऐसे में हमें इस कमी की भरपाई के उपाय तलाशने होंगे।”

एग्रिकल्चरल इकोनॉमिक्स रिसर्च एसोसिएशन के पूर्व अध्यक्ष डॉ. प्रमोद के. जोशी के मुताबिक, अल्पपोषण मुख्यत: वितरण से संबंधित समस्या है, न कि खाद्य सुरक्षा का मुद्दा। उन्होंने कहा, “भारत का पूरा जोर खाद्य सुरक्षा पर रहा है। अल्पपोषण से निपटने के लिए आपको विविध सामग्री-युक्त आहार की जरूरत है। सरकार खाद्य वितरण प्रणाली के तहत विविध सामग्री-युक्त आहार नहीं उपलब्ध करा सकती है।” जोशी ने ‘पीटीआई-भाषा’ से कहा, “पोषण सुरक्षा के लिए आपको अलग तरह की नीतियों की जरूरत है। खाद्य सुरक्षा और पोषण सुरक्षा के मुद्दे को एक ही नीति के जरिये निपटा नहीं जा सकता है।”

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