डंकियों की कहानी मूकनायक मीडिया की जुबानी, डंकी रूट से कैसे जाते हैं अमेरिका, बर्फीली नदी फिर तपता रेगिस्तान, #डंकी_रूट का खर्चा 50 से 70 लाख

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मूकनायक मीडिया ब्यूरो | 24 दिसंबर 2023 | जयपुर – दिल्ली – कनाडा यूएस बॉर्डर : कनाडा-यूएस बॉर्डर पर अमेरिकी सीमा से महज 12 मीटर दूर 4 लोगों की लाश मिली। इनकी शिनाख्त गुजरात के जगदीश बलदेवभाई पटेल, उनकी पत्नी वैशालीबेन, 12 साल की बेटी विहंगा और 3 साल के बेटे धार्मिक के रूप में हुई। गांधीनगर जिले के डिगुंचा गांव के स्कूल टीचर बलदेवभाई अमीरी का सपना संजाए अमेरिका जाना चाहते थे। ये पूरा परिवार टूरिस्ट वीजा पर कनाडा पहुंचा था। वहां से अवैध तरीके से अमेरिका में घुसने की कोशिश कर रहा था। माइनस (-) 35 डिग्री की सर्दी को बर्दाश्त नहीं कर सके और सभी की मौत हाे गई।

हर साल हजाराें भारतीय अमेरिका, कनाडा, ऑस्ट्रेलिया, यूके जाने के लिए अवैध तरीका अपनाते हैं। पॉपुलर टर्म में इन्हें डंकी रूट कहा जाता है। हाल ही में रिलीज हुई शाहरुख खान की फिल्म ‘डंकी’ इसी पर बेस्ड है। मूकनायक मीडिया बतायेगा डंकी रूट की पूरी कहानी ।

भारत से अमेरिका की दूरी करीब 13,500 किमी है। हवाई यात्रा से यहां जाने में 17 से 20 घंटे लगते हैं। हालांकि डंकी रूट से यही दूरी 15 हजार किमी तक हो जाती है और इस सफर में महीनों लग जाते हैं। अमेरिका जाने के लिए 3 पड़ाव पार करने होते हैं…

पहला पड़ाव: भारत से लैटिन अमेरिकी देश

भारत में डंकी रूट का सबसे लोकप्रिय और पहला पड़ाव लैटिन अमेरिकी देश पहुंचना है। इनमें इक्वाडोर, बोलीविया और गुयाना जैसे देश शामिल हैं। इन देशों में भारतीयों को वीजा ऑन अराइवल मिल जाता है। मतलब ये कि इन देशों में जाने के लिए पहले से वीजा लेने की जरूरत नहीं है और ऑन द स्पॉट वीजा दे दिया जाता है।

ब्राजील और वेनेजुएला समेत कुछ अन्य देशों में भारतीयों को आसानी से टूरिस्ट वीजा दे दिया जाता है। यहां से डंकी कोलंबिया पहुंचते हैं। कई लोग दुबई के रास्ते लैटिन अमेरिकी देश जाते हैं। इसमें उन्हों महीने कंटेनर्स में रहना पड़ता है। डंकी रूट इस बात पर डिपेंड करता है कि जिस एजेंट के माध्यम से आप जा रहे हैं, उसके संबंधित देशों में कितने कनेक्शन हैं।

हालांकि लैटिन अमेरिकी देशों में पहुंचना कठिन नहीं है, फिर भी यहां पहुंचने में महीनों लग जाते हैं। कई बार लोग दस महीने में कठिन परिश्रम और पैसा खर्च करके पहुंचते हैं। जालंधर, पंजाब के एक एजेंट ने दैनिक भास्कर को बताया कि अमेरिका तक के डंकी रूट के लिए 70 लाख रुपए तक का खर्च आता है, जितना पैसा खर्च करेंगे उतनी परेशानियां कम होंगी।

दूसरा पड़ावः लैटिन अमेरिकी देशों से अमेरिका

कोलंबिया पहुंचने के बाद डंकी पनामा में एंटर करते हैं। इन दोनों देशों के बीच खतरनाक जंगल डेरियन गैप है। इसे पार करना बेहद जोखिम भरा है। नदी-नालों के बीच में जहरीले कीड़े और सांप का हमेशा डर बना रहता है। ये जंगल डेंजर क्रिमिनल्स के लिए भी जाना जाता है। इस जंगल में डंकी से लूट होती है। महिला हो या पुरुष यहां के अपराधी उनके साथ रेप तक करते हैं।

कई बार डंकी थोड़ी देर के लिए सोता है और सांप उसे डस लेता है। इस जंगल में डंकियों की लाशें मिलना कोई नहीं बात नहीं है। यहां कोई सरकार नहीं है। अगर भाग्य ने साथ दिया और सब कुछ ठीक रहा तो डंकी 10 से 15 दिन में पनामा का जंगल पार कर जाता है।

ग्वाटेमाला बड़ा सेंटर, यहां एक्सचेंज होते हैं एजेंट

पनामा का जंगल पार करने के बाद अगला पड़ाव ग्वाटेमाला है। ह्यूमन ट्रैफिकिंग करने वालों के लिए ग्वाटेमाला एक बड़ा काेऑर्डिनेशन सेंटर है। अमेरिकी बॉर्डर की ओर बढ़ते हुए यहां डंकी को दूसरे एजेंट के हैंडओवर किया जाता है। पिछले साल की बात है पंजाब के गुरदासपुर का एक युवक गुरपाल सिंह (26) डंकी रूट से मैक्सिको तक पहुंच गया था, लेकिन उसे मैक्सिको में पुलिस ने देख लिया और रुकने लिए कहा।

जल्दबाजी में उसने एक बस पकड़ी और इस दौरान अपनी बहन को पंजाब फोन किया कि पुलिस ने उसे देख लिया है। इसी दौरान उस बस का एक्सीडेंट हो गया। स्पॉट पर ही उसकी मौत हो गई, लेकिन ये खबर मिलने में परिवार वालों को एक सप्ताह लग गया। उसकी लाश को गुरदासपुर के सांसद सनी देओल की मदद से भारत लाया गया।

पनामा के जंगल से बचना है तो खतरनाक नदी से जाना पड़ेगा

अगर कोई डंकी पनामा जंगल से नहीं जाना चाहता तो कोलंबिया से एक रास्ता और है। यह रास्ता सैन एन्ड्रेस से शुरू होता है। बताया जाता है कि ये रास्ता बेहद रिस्की है। सैन एन्ड्रेस से डंकी सेंट्रल अमेरिका के देश निकारागुआ के लिए नाव लेते हैं। यहां से 150 किलोमीटर का सफर नाव से करने के बाद दूसरी नाव में ट्रांसफर हाेते हैं, जो मेक्सिको के लिए जाती है। इस नदी में सीमा पुलिस पेट्रोलिंग तो करती ही है। नदी में खतरनाक जानवर जान लेने के लिए तैयार रहते हैं।

इसी साल 31 मार्च को अमेरिका-कनाडा के बॉर्डर पर 8 लोगों के शव मिले थे। इनमें से चार भारतीय थे जो गुजरात के मेहसाणा के रहने वाले थे। मृतकों में प्रवीण चौधरी (50), पत्नी दीक्षा (45), मीत (20) और बेटी विधि (23) थी। ये चारों पहले टूरिस्ट वीजा पर कनाडा गया था। वहां से अमेरिका जाने के लिए डंकी रूट पकड़ा था। जब ये लोग क्यूबेक-ओंटेरियो सीमा के पास सेंट लॉरेंस नदी पार कर रहे थे। तेज हवा से नाव पलट गई और सभी की मौत हो गई।

तीसरा पड़ावः मेक्सिको से बॉर्डर क्रॉस करके सीधे अमेरिका में दाखिल

अब डंकी को मेक्सिको से यूएस बॉर्डर जाना होगा। रास्ते अलग-अलग तरह की मुसीबतें है। सर्दी के साथ बीच में रेगिस्तान भी पड़ता है। इसके बाद डंकी पहुंचता है यूएस मेक्सिको सीमा पर जहां 3,140 किलोमीटर लंबी दीवार बनी हुई है।

डंकी इसी को कूदकर अमेरिका में प्रवेश करते हैं। जो लोग दीवारों को पार नहीं कर पाते वे वे रियो ग्रांडे नदी को पार करने का खतरनाक रास्ता चुनते हैं। अमेरिका जाने से पहले डंकी से उसका पासपोर्ट और पहचान वाले दस्तावेज ले लिए जाते हैं। ऐसा इसलिए क्योंकि उसकी पहचान हो जाएगी और उसे वापस इंडिया डिपोर्ट कर दिया जाएगा। अब डंकी अमेरिका में अवैध तरीके से आ गया है।

अमेरिका पहुंचने के बाद क्या होता है?

  • पंजाब, हरियाणा और दिल्ली में काम करने वाली संस्था स्टडी अब्रॉड कंसल्टेंट एसोसिएशन के चैयरमैन सुकांत त्रिवेदी के मुताबिक अमेरिका में घुसने के बाद डंकी जानबूझकर अपने आप को वहां की पुलिस के हवाले कर देता है। इसके बाद उसे जेल में डाला जाता है। इस जेल को कैम्प कहा जाता है।
  • डंकी को जेल से छुड़ाने के लिए वकील हायर किया जाता है। इसका खर्च एजेंट या डंकी का कोई रिश्तेदार उठाता है। वकील अपनी दलीलों से कोर्ट को भरोसा दिलाता है कि डंकी को अमेरिका में रहने दिया जाए। इसके बाद डंकी को जेल से रिहा किया जाता है।
  • डंकी अमेरिका पर बोझ न बने, इसलिए उसे कमाने और खाने की अनुमति दी जाती है। ये अनुमति बढ़ती रहती है। 8-10 साल में ग्रीन कार्ड मिल जाता है। ग्रीन कार्ड मिलने का मतलब हैं डंकी अब यूएस में परमानेंट रह सकता है और उसे काम करने का अधिकार है। इसके 10-15 साल बाद उसे अमेरिका की नागरिकता भी मिल जाती है।
  • जिस तरह से भारत में अवैध कॉलोनियों का वैध करने के लिए हर 5 से 7 साल के बीच स्कीम निकाली जाती है। ठीक वैसे ही अमेरिका में अवैध लोगों को नागरिकता देने के लिए स्कीम निकाली जाती है। इसमें कुछ फीस भरने के बाद डंकी अमेरिका का नागरिक बन जाता है।

यदि डंकी का कोई रिश्तेदार या परिचित अमेरिका का नागरिक है तो…

  • जेल में डंकी से पूछा जाता है कि क्या अमेरिका में उसका कोई परिचित रहता है। यदि वह हां कहता है तो उस परिचित से संपर्क किया जाता है और डंकी को रिहा करने के बदले इमिग्रेशन बॉन्ड भरने के लिए कहा जाता है। यह एक तरह की जमानत है, जिसके बदले डंकी को कई शर्तों के साथ रिफ्यूजी कैम्प से रिहा किया जाता है। इस परिचित का इंतजाम एजेंट करते हैं, लेकिन इसके बदले अलग से पैसा लेते हैं।
  • बॉन्ड की राशि इंडिया से डंकी के परिजन एजेंट के देते हैं। ये राशि 3 लाख 40 हजार से 2 करोड़ तक हो सकती है। बॉन्ड कितना लगेगा ये इमिग्रेशन मामलों की अदालत पर डिपेंड करता है।
  • डंकी को कमाने-खाने की अनुमति के साथ जेल से रिहा कर दिया जाता है। इस दौरान डंकी पर अवैध रूप से बॉर्डर पार करने का केस चलता है, जिसमें उसे हर सुनवाई में मौजूद होना जरूरी है। ये जरूरी नहीं है कि हर डंकी को इमिग्रेशन बॉन्ड का मौका मिले। कई लोगों को रिफ्यूजी कैंप में रखने के बाद इंडिया डिपोर्ट भी कर दिया जाता है।

डंकी रूट का खर्चा 50 से 70 लाख 

भारत से एक डंकी के अमेरिका पहुंचने का औसत खर्च 20 से 50 लाख रुपए है। कभी-कभी ये खर्च 70 लाख तक पहुंच जाता है। एजेंट वादा करता है कि डंकी को कम परेशानी झेलनी पड़ेगी, लेकिन असल में ऐसा कुछ नहीं होता। ज्यादातर पेमेंट तीन किस्तों में होती है। पहली भारत से निकलने पर दूसरी कोलंबिया बॉर्डर पहुंचने पर तीसरी अमेरिकी बॉर्डर के पास पहुंचने पर। पैसों का भुगतान नहीं होने पर एजेंटों के गिरोह मैक्सिको या पनामा में डंकी की हत्या करके पीछा छुड़ा लेते हैं।

अब सवाल उठता है कि लोग लीगल तरीके से क्यों नहीं जाते। दरअसल, ये लोग कम एजुकेटेड होते हैं और विदेशों में बसने के लिए होने वाले एग्जाम क्रैक नहीं कर पाते। यहां तक कि वे ठीक से अंग्रेजी भी नहीं बोल पाते। कुछ समय पहले तक डंकी रूट लेने वाले सबसे ज्यादा लोग पंजाब से हुआ करते थे और ये कनाडा ही जाते थे। जब से स्टडी और वर्किंग वीजा मिलने लगा है। यहां के लोग लीगल तरीके से जाने की तैयारी करने लगे हैं। अब डंकी रूट पकड़ने हरियाणा से भी बड़ी संख्या में लोग जाते हैं।

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