भजनलाल कैबिनेट के पोर्टफोलियो में देरी, गृहमंत्री की कसमकश, वरिष्ठता और संघर्षशीलता के कारण गृहमंत्री की दौड़ में किरोड़ी लाल मीणा सबसे आगे

7 min read

मूकनायक मीडिया ब्यूरो | 31  दिसंबर 2023 | जयपुर – दिल्ली – सवाई माधोपुरराजस्थान में सिर्फ सरकार ही नहीं बदली, राजनेताओं की पूरी पीढ़ी बदलने जा रही है। भजनलाल खुद पहली बार के विधायक हैं। उनकी टीम में 22 मंत्री में से 17 नए चेहरे हैं। दोनों डिप्टी सीएम में से भी दूसरी बार के विधायक हैं। एक और बात साफ है कि जिन नामों की सबसे ज्यादा चर्चा थी, उन्हें सिरे से खारिज कर दिया गया है।

ये मैसेज दिया गया है कि भाजपा तपे-तपाए और हार्डकोर चेहरों से बाहर निकल रही हैं। ध्रुवीकरण जहां सबसे ज्यादा हुआ, वहां के चर्चित चेहरे बाबा बालकनाथ, प्रतापपुरी और बालमुकंद आचार्य मंत्रिपरिषद में कहीं नहीं दिखे। इससे कुछ की पीड़ा तो साफ तौर पर दिखने लगी है।

कौन बनेगा गृहमंत्री ? 

राजस्थान विधानसभा चुनाव में बीजेपी ने हिंदुत्व के मुद्दे पर चुनाव लड़ा था। वरिष्ठता और संघर्षशील नेता की वजह से राजस्थान में जनता की पहली डिमांड गृहमंत्री के तौर पर डॉ किरोड़ी लाल मीणा की है। अब गृहमंत्री बनाने की अटकलो को लेकर सुर्खियों में सबसे आगे डॉ मीणा का नाम चल रहा है। उनके तेज तर्रार होने के कारण उन्हें गृह मंत्रालय सौंपा जा सकता है।

गृह विभाग के अन्‍तर्गत राजस्‍थान पुलिस, गृह रक्षा, अभियोजन, कारागार, भ्रष्‍टाचार निरोधक ब्‍यूरो एवं विधि विज्ञान प्रयोगशाला इत्‍यादि विभाग आते हैं। गृह विभाग के विभिन्‍न कार्यकारी अवयवों द्वारा प्रत्‍येक वर्ष प्रशासनिक प्रतिवेदन तैयार किया जाता है जो विधान सभा के बजट सत्र के समय विधान सभा के पटल पर रखा जाता है। गृह विभाग इन सभी अवयवों का प्रशासनिक विभाग है तथा इनके कार्यों का पर्यवेक्षण हेतु उत्‍तरदायी है।

सभी जातियों को साथ लेने की रणनीति

किसी समाज से अगर एक या दो विधायक चुनाव जीते हैं तो उसमें से एक को मंत्री बनाया गया है। पटेल, विश्नोई, जट सिख, देवासी, कुमावत, रावत, धाकड़, गुर्जर और माली समाज इसके उदाहरण हैं। हालांकि जाट समाज में सबसे ज्यादा 4 मंत्री बनाए गए हैं। किसान आंदोलन और क्षेत्रीय संतुलन के आधार पर ऐसा हुआ है। हालांकि भाजपा के कोर वोट बैंक में शामिल वैश्य समुदाय को इस बार ज्यादा महत्व नहीं मिल पाया है। कुछ और जातियां भी छूट गईं। यादव कोर वोटर रहा है, लेकिन एक भी मंत्री नहीं बनाया है।

मुद्दों के आधार पर जो उग्र थे, सिर्फ उन्हें जगह मिली

चुनाव और चुनाव के बाद सबसे ज्यादा चर्चा में रहे बाबा बालकनाथ, प्रतापपुरी और बालमुकुंद आचार्य में से दो को मंत्री बनाने के कयास थे। सांसद से विधायक बने बालकनाथ का नाम तो सीएम की रेस में भी था। प्रतापपुरी भी मंत्री बनने की उम्मीद से जयपुर में थे। दोनों को काफी निराशा हुई। उधर, पांच साल तक मुद्दों के आधार पर उग्र रहे डॉ. किरोड़ी मीणा और मदन दिलावर कैबिनेट मंत्री बनने में सफल रहे।

चलते चुनाव में प्रत्याशी को मंत्री बनाने के पीछे की रणनीति

श्रीकरणपुर में 5 जनवरी को चुनाव होने हैं। यहां भाजपा प्रत्याशी सुरेंद्रपाल टीटी को मंत्री बनाकर पार्टी ने चौंका दिया। राजस्थान में ऐसा पहला मामला है, जब चलते चुनाव के बीच किसी को मंत्री बना दिया गया है। बताया जाता है कि सरकार ने इसको लेकर चुनाव आयोग से पूछा था, तब जवाब मिला था कि ये नैतिक तौर पर तो गलत है, लेकिन कानूनी तौर पर सही है। ऐसे में भजनलाल ने कानून का रास्ता चुना। हालांकि ये तय है कि मतदाता जरूर प्रभावित होगा।

टीटी पहले भी मंत्री रह चुके हैं। अब इनको बिना विधायक बने मंत्री बनाया गया है। ऐसे में जनता में यह मैसेज जाएगा कि अगर टीटी चुनाव जीत जाते हैं तो एक मंत्री उनके इलाके का रहेगा। इससे भाजपा को सीधा फायदा होगा। कानून में वैसे भी मंत्री बनाने की मनाही नहीं है। कुछ राजनीतिक जानकर यह भी बताते हैं कि यह भाजपा की चौकाने वाली स्टाइल है। शपथ ग्रहण के दौरान नारे लगे थे- मोदी है तो मुमकिन है।

भजनलाल सरकार के लिए कोई चुनौती है क्या?

मंत्रिपरिषद में मुख्यमंत्री सहित 25 चेहरे हैं। सरकार ये ही लोग चलाएंगे। इनमें से मुख्यमंत्री खुद नए हैं। इसके अलावा 19 लोगों के पास भी पहले से कोई ज्यादा अनुभव नहीं है। ऐसे में भजनलाल के सामने सरकार के अंदर कोई बड़ी चुनौती नहीं है, लेकिन विपक्ष बड़ी चुनौती के रूप में रहेगा। सदन में नए चेहरे कैसा प्रदर्शन कर पाएंगे, ये देखना होगा।

…तो क्या सिर्फ विपक्ष ही सबसे बड़ी चुनौती है?

जैसा दिखता है वैसा होता नहीं। भाजपा में अंदरखाने भयंकर विरोध है। बालकनाथ की छवि से समझा जा सकता है। वसुंधरा खेमा लगभग नाराज है। हालांकि फिलहाल हाईकमान के डर से चुप है। असल में विपक्ष से बड़ी चुनौती भाजपा के लिए भाजपा ही है। भजनलाल सरकार की विफलता पर विपक्ष से ज्यादा नजर भाजपा की ही है। अब भजनलाल कितनी सूझबझ से सबको लेकर चलते हैं, ये देखने वाला विषय होगा।

आलाकमान के अलावा राजस्थान से किसकी चली?

राजस्थान में भजनलाल कैबिनेट के सिलेक्शन में आलाकमान के अलावा बात करें, तो यहां से तीन नेता अपने समर्थकों को शामिल करवा पाए। इनमें सबसे ज्यादा संगठन महामंत्री चंद्रशेखर की चली, इसके बाद डिप्टी सीएम दीया कुमारी और पूर्व प्रदेश अध्यक्ष सतीश पूनिया की। संघ के चेहरों को मंत्रिमंडल में शामिल करवाने के लिए चंद्रशेखर ने समन्वयक की भूमिका अदा की। झाबर सिंह खर्रा, संजय शर्मा, बाबू लाल खराड़ी जैसे चेहरों को मंत्रिमंडल में मौका दिया गया है।

दीया कुमारी ने अपने पूर्व संसदीय क्षेत्र राजसमंद से अविनाश गहलोत को शामिल करवा लिया। अविनाश पिछले लोकसभा चुनाव से लेकर अब तक दीया कुमारी के प्रमुख कार्यकर्ता के रूप में नजर आते रहे हैं। इसके बाद सतीश पूनिया समर्थक सुमित गोदारा, जिन्होंने पद की शपथ लेने के बाद पूनिया के पैर भी छुए। राजेंद्र राठौड़ ने बाबूलाल खराड़ी की पैरवी की थी।

जो दावेदार थे, उन्हें मंत्री नहीं बनाने के पीछे क्या वजह?
इसके 3 प्रमुख कारण हैं…
1. वसुंधरा गुट के विधायकों को मंत्रिमंडल में शामिल नहीं कर मैसेज दिया गया कि पार्टी बड़ी है, व्यक्ति नहीं। कई विधायक अनुभवी थे और पहले मंत्री रह चुके हैं, लिहाजा उनकी जगह नए को मौका दिया गया है।
2. हिंदुत्व की छवि वाले नेता बाबा बालकनाथ और प्रतापपुरी को मंत्री बनाने के कयास थे, लेकिन इन्हें कैबिनेट में शामिल नहीं कर मैसेज देने की कोशिश की है कि भाजपा अब इन नेताओं से दूरी बना रही है।
3. मंत्रिमंडल में जातिगत संतुलन और इलाके के अनुसार भी बैलेंस बनाने की कोशिश की गई है। यही वजह है कि कई दिग्गज इस फाॅर्मूले में फिट नहीं बैठे।

तस्वीर 2022 की है, जब सांसद दीया कुमारी बीजेपी प्रदेशाध्यक्ष सतीश पूनिया को दीपावली की बधाई देने उनके घर पहुंचीं।

वसुंधरा राजे के समर्थक साफ, अब भविष्य क्या

इस कैबिनेट को देखें सबसे अधिक झटका पूर्व सीएम और बीस साल से भाजपा का चेहरा रहीं वसुंधरा राजे को लगा। उनके खेमे के माने जाने वाले कालीचरण सराफ, श्रीचंद कृपलानी जैसे एक भी समर्थकों को भजनलाल कैबिनेट में नहीं रखा गया। गजेंद्र सिंह खींवसर को जरूर इस टीम में जगह मिली, लेकिन वे आलाकमान के खाते से मंत्री बने। उन्होंने राजे से दूरी बना ली थी।

ये भी साफ हो गया है कि चंद महीनों में होने वाले लोकसभा चुनाव में राजस्थान की 25 सीटों पर खड़े होने वाले प्रत्याशियों को लेकर राजे से राय नहीं ली जाएगी। लोकसभा चुनाव 2014 और 2019 के समय राजे से रायशुमारी जरूर की गई थी, लेकिन इस विधानसभा चुनाव से पहले राजे को थोड़ी-बहुत तवज्जो ही दी गई थी। बहुमत आने के बाद उतनी भी अहमियत नहीं दी जा रही। अब यह भी साफ हो गया है कि राजस्थान की राजनीति में राजे की भूमिका खास नहीं रहने वाली। हो सकता है कि आलाकमान राजे को लोकसभा चुनाव में बतौर प्रत्याशी उतारे और केंद्र की ओर रुख करवाए जाए।

क्या बड़े वोट बैंक वाले समाज संतुष्ट हो गए?

भजनलाल कैबिनेट को मोटे तौर पर देखें, तो आमतौर पर जातिगत समीकरणों को संतुष्ट करने के प्रयास किए गए हैं, लेकिन जाट समाज पूरी तरह संतुष्ट नहीं कहा जा सकता। जाट समाज से 4 मंत्री कैबिनेट में शामिल हैं, फिर भी राजभवन के बाहर शपथ के बाद जाट समाज के कुछ लोगों ने नाराजगी भरे नारे लगाए। जाट समाज को नाराजगी है कि अजय सिंह किलक, भैराराम जैसे सीनियर लीडर्स को नजरअंदाज किया गया है। किलक के मंत्री बनने की काफी संभावना थी।

Facebook
Twitter
LinkedIn
WhatsApp

डॉ अंबेडकर की बुलंद आवाज के दस्तावेज : मूकनायक मीडिया पर आपका स्वागत है। दलित, आदिवासी, पिछड़े और महिला के हक़-हकुक तथा सामाजिक न्याय और बहुजन अधिकारों से जुड़ी हर ख़बर पाने के लिए मूकनायक मीडिया के इन सभी links फेसबुक/ Twitter / यूट्यूब चैनलको click करके सब्सक्राइब कीजिए… बाबासाहब डॉ भीमराव अंबेडकर जी के “Payback to Society” के मंत्र के तहत मूकनायक मीडिया को साहसी पत्रकारिता जारी रखने के लिए PhonePay या Paytm 9999750166 पर यथाशक्ति आर्थिक सहयोग दीजिए…
उम्मीद है आप बिरसा अंबेडकर फुले फातिमा मिशन से अवश्य जुड़ेंगे !

बिरसा अंबेडकर फुले फातिमा मिशन के लिए सहयोग के लिए धन्यवाद्

Recent Post

Live Cricket Update

Rashifal

You May Like This