रैन बसेरा : महिलाओं के कपड़े बदलने को जगह तक नहीं, बाथरूम के दरवाजे में कुंडी नहीं, दाल से बदबू आती, सूखी रोटियां हलक में उतारना मुश्किल

12 min read

मूकनायक मीडिया ब्यूरो | 04 जनवरी 2024 | जयपुर – दिल्ली : इस साल दिल्ली में कड़कड़ाती ठंड की वजह से 203 बेघरों की जान चली गई। सड़कों पर ठिठुरने को विवश, भूख और ठंड से जंग। शहरों में रहने वाले 70 लाख से अधिक लोग बेघर हैं और सड़कों पर रहते हैं। अकेले दिल्ली में ही 1,50,000 से 2,00,000 लाख लोगों के सिर पर छत नहीं है। इसमें भी 10,000 महिलाएं हैं जो बस स्टैंड, रेलवे स्टेशन और दूसरी सार्वजनिक जगहों पर रहती हैं जहां उनमें यह डर समाया होता है कि कहीं कुछ हो न जाए। कुछ रैन बसेरा में शरण लेती हैं।

दिल्ली के आनंद विहार के 242 नंबर रैन बसेरा में रीना कुमारी अपनी 19 साल की बेटी के साथ रह रही हैं। साहिबाबाद की एक फैक्टरी में काम करती हैं। दुबला-पतला शरीर लेकिन फैक्टरी में 50-50 किलो का वजन उठाना पड़ता है। 150 से अधिक कर्मचारियों के बीच में वो अकेली महिला है लेकिन काम पुरुषों से ज्यादा करती है।

रीना के माता-पिता असम के हैं लेकिन वो बहुत पहले गुजर गए। वो दिल्ली में ही रह गई। किस्मत ने उसके साथ एक और मजाक किया। पति भी साथ छोड़ गया। रीना ने बड़ी मुश्किलों से बेटी को पाला। पहले खानपुर में रहती थी लेकिन काम छूट गया तो घर का किराया नहीं दे पाई। मकान मालिक ने रीना को बुरी तरह मारपीट कर निकाल दिया। घर का सारा सामान भी रख लिया। बेटी की पढ़ाई छूट गई।

रीना कहती हैं-जैसे घर का रुटीन होता है वैसे ही सुबह में 9.30 बजे रैन बसेरा से निकलती हूं और रात 7.30 बजे रैन बसेरा पहुंचती है। कहती हैं कि बेटी तीन साल से बैठी है अगर पढ़ रही होती तो वो 12वीं पास कर जाती। उसने कई स्कूलों से बेटी के एडमिशन के लिए गुहार लगाई लेकिन किसी ने नहीं उसका दाखिला नहीं किया।

रैन बसेरा तो मायका, जब कहीं ठौर नहीं मिलता यहां आ जाती हूं

सामने के बेड पर ज्योति कंबल ओढ़कर लेटी हैं। आवाज सुनकर उठती हैं। छोटे बालों वाली ज्योति 28 साल की है, कनॉट प्लेस में LIC में अकाउंट से जुड़ा काम देखती है। रैन बसेरा क्यों आई? इस सवाल पर ज्योति थोड़ी संजीदा हो गईं। आंखें डबडबाई पर चेहरे पर मुस्कान भी तैरी कि ‘मेरा तलाक हो गया है जी’।

दो बेटे हैं एक 10 साल का, दूसरा 8 साल का। दोनों कुरुक्षेत्र के एक गुरुकुल में पढ़ते हैं। ज्योति जहां काम करती है वहीं के लोगों ने बेटों का गुरुकुल में प्रवेश करा दिया। ज्योति कहती है पति अलग है, बेटे गुरुकुल में तो मैं क्या करती रैन बसेरा ही चुन लिया। यहां सबसे बोलती, बतियाती हूं।

लेकिन बाहर न मेरे बेटे और न ही रिश्तेदार जानते हैं कि ज्योति रैन बसेरा में है। उन्हें यही पता है कि ज्योति दिल्ली में कहीं रहती है। कहां रहती है, किस हाल में है किसी को कुछ नहीं पता। जब बेटे छुटि्टयों में दिल्ली आते हैं तो अपने रिश्तेदारों के यहां ही मिलती हूं।

सड़क पर लोग बोलते, मेरे साथ चल रानी बना कर रखूंगा

ज्योति की बातें सुन रही सोनी अपने बिस्तर पर बैठे बैठे ही बोलने लगती हैं-रैन बसेरा न होता तो सड़कों पर लोग नोंच डालते। वह बुलंदशहर की है जब पहली बार दिल्ली आई तो सड़कों पर भटक रही थी। तीन बच्चों की मां सोनी पारिवारिक कारणों से रैन बसेरा में रहने को मजबूर है। वह अपनी परेशानी नहीं बताना चाहती। कहती है कि कोई मन की खुशी से रैन बसेरा में रहने नहीं आता। खासकर औरत।

जवान लड़की को लोग घूरते हैं। पीछे लग जाते हैं, बोलते हैं, ‘मेरे साथ चल, खुश कर दूंगा, रानी बनाकर रखूंगा।’ सोनी जैसी हजारों महिलाएं हैं जिनका कोई ठौर-ठिकाना नहीं। सड़कों पर रहेंगी तो खुद के साथ अनहोनी का डर उन्हें सताता है।

इंडो ग्लोबल सोशल सर्विस सोसाइटी (IGSSS) की 2019 की रिपोर्ट ‘अंडरस्टैंडिंग होमलेसनेस इन दिल्ली’ के अनुसार, बेघर महिलाओं में से 85% को सेक्शुअल हैरासमेंट का डर रहता है। कब कौन मुंह दबाकर खींच ले जाएगा, नहीं कह सकते।

‘वॉयलेंस एंड वॉयलेशंस: द रियल्टी ऑफ होमलेस वुमन इन इंडिया’ रिपोर्ट के अनुसार, देश की सड़कें महिलाओं के लिए सुरक्षित नहीं हैं। इन महिलाओं के साथ ही ज्यादातर रेप, सेक्शुअल हैरासमेंट, किडनैपिंग, मर्डर, चोरी जैसे अपराध देखने-सुनने को मिलते हैं।

कुछ भी हो जाए तो भी पुलिस नहीं आएगी

अधिकतर बेघर महिलाएं सड़क किनारे पटरी लगाकर कुछ सामान बेचती हैं। लेकिन इन्हें सबसे ज्यादा परेशानी झेलनी पड़ती है। सीलमपुर स्थित जग प्रवेश हॉस्पिटल के सामने बने रैन बसेरा में पुरुषों और महिलाओं के लिए शेल्टर होम बने हैं। लेडीज शेल्टर में 4 महिलाएं ही हैं। सब कैंपस में ही लकड़ियां जला ठंड से बचने की कोशिश कर रही हैं।

इनमें से हरियाणा के गुरुग्राम की रहने वाली सविता (बदला हुआ नाम) पटरी पर सामान बेचती है। इससे हर दिन 300 से 400 कमा लेती है। सविता कहती है बेघर लोगों को कोई पूछता नहीं । पेट पालने के लिए पटरी पर सामान बेचो तो पुलिस वाले उठाकर फेंक देते हैं। लफंगे सामान छीन लेते हैं। ऐसे में कोई महिला भीख नहीं मांगेगी तो क्या करेगी।

यहां की केयरटेकर तरन्नुम बताती हैं कि पुलिस वाले को लाख फोन करो लेकिन वे नहीं आते। कई बार लोग शराब पी कर या ड्रग्स लेकर आ जाते हैं। मना करो तो चाकू दिखा मारने की धमकी देते हैं। पुलिस बोलती है कि रैन बसेरा में शराबी, नशेड़ी या अपराधी किस्म के लोग नहीं आएंगे तो क्या अच्छे घर के लोग आएंगे। कोई भी हो, रैन बसेरा में उसे जगह देनी है।

कपड़े बदलने को जगह नहीं, बाथरूम के दरवाजे में कुंडी नहीं

दिल्ली में महिलाओं के लिए 19 रैन बसेरे हैं और ठंड को लेकर कुछ टेंटनुमा अस्थायी रैन बसेरे भी बने हैं पर प्राइवेसी और सिक्योरिटी पुख्ता नहीं है। आनंद विहार में एक ही कैंपस में बायें-दाएं पुरुषों और महिलाओं के रैन बसेरा हैं जो कि पक्की छत वाली नहीं है बल्कि यह पोर्टेबल केबिन है।

ठंड बढ़ी है तो टेंट लगाकर भी कुछ बेड लगा दिए गए हैं। 24 साल की रेशमा दिव्यांग हैं, 12वीं तक पढ़ी है। एक अस्पताल में टीबी के मरीजों के सर्वे का काम करती हैं। कुछ समय पहले पति भी यहीं सफाईकर्मी का काम कर रहा था। गीता कॉलोनी में बने शेल्टर में उसे भेजा गया तो वहीं की महिला को लेकर भाग गया। तब से रेशमा इसी शेल्टर में जी रही है।

रेशमा कहती हैं कि रैन बसेरा में जहां बेड लगे हैं वहां सबके सामने ही कपड़े बदलने पड़ते हैं। कई बार रैन बसेरा में 20-21 महिलाएं आ जाती हैं उन सबके सामने आपकी कोई प्राइवेसी नहीं रहती। बेघरों के लिए काम करने वाली संस्था हाउसिंग एंड लैंड राइट्स नेटवर्क (HLRN) के एक्टिविस्ट अशोक पांडे बताते हैं कि जिन रैन बसेरों में महिला-पुरुष दोनों के पोर्टेबल केबिन हैं वहां सिक्योरिटी बहुत कम है।

महिलाओं को अपने पर्सनल कपड़े टांगने, सुखाने के लिए कोई जगह नहीं है। किसी महिला के साथ बच्चा है तो ब्रेस्ट फीडिंग के लिए कोई जगह नहीं है। प्राइवेसी और सिक्योरिटी नहीं होने के कारण रैन बसेरों में सेक्शुअल हैरासमेंट की घटनाएं होती हैं। अशोक पांडेय बताते हैं कि ब्रेस्ट फीडिंग कराने वाली महिलाएं, गर्भवती महिलाओं के लिए क्रेज बनाने की उन्होंने मांग की है।

HLRN की रिपोर्ट बताती है कि बेघर महिलाएं के साथ यौन शोषण होने की घटनाएं पुरुषों से 10 गुना अधिक है। बावजूद रैन बसेरों में सुरक्षा नहीं है। कहीं रैन बसेरों का फाटक टूटा है तो कहीं बाउंड्री इतनी छोटी है कि कोई भी कूद कर अंदर आ जाए।

कई महिलाएं मंदिर की सीढ़ियों को ज्यादा सुरक्षित बताती

महिलाएं शेल्टर होम की जगह मंदिर, मस्जिद, गुरुद्वारा, बस स्टैंड, रेलवे स्टेशन, अस्पताल जैसी सार्वजनिक जगहों पर क्यों रहती हैं? अशोक पांडेय बताते हैं कि शेल्टर होम्स में सामान रखने के लिए जगह नहीं होता। जबकि महिलाओं के पास रहने-खाने के कई सामान होते हैं। कुछ परिवार साथ रहना चाहता है जबकि शेल्टर होम्स में महिला और पुरुष को अलग-अलग रहना होता है।

शेल्टर होम्स में आप अपनी पंसद का खाना नहीं बना सकते। रैन बसेरों में रहने वाले यह नहीं चुन सकते कि उन्हें क्या खाना है क्या बनाना है। सबसे बड़ा मुद्दा प्राइवेसी और सिक्योरिटी का है। रैन बसेरा में कई बार नशा करने वाले आ जाते हैं। सुरक्षा हमेशा ताक पर रहती है।

लेकिन मंदिर, मस्जिद, गुरुद्वारा, बस स्टैंड, रेलवे स्टेशन जैसी जगहों पर पब्लिक होती है इसलिए उन्हें यहां रहना ज्यादा सेफ लगता है। दिल्ली के राजा गार्डन में शेल्टर होम है लेकिन बगल में फ्लाई ओवर के नीचे 25-30 महिलाएं रहती हैं। इसका कारण यही है। ये महिलाएं इस कड़कड़ाती ठंड में भी बच्चों के साथ रहती हैं वो बगल के सेंटर में नहीं जाती। इसका कारण यही है कि उन्हें यहां ज्यादा फ्रीडम और सिक्योरिटी लगती है।

अशोक पांडे बताते हैं कि रैन बसेरों को एक्टिविटी सेंटर के तौर पर डेवलप करने की जरूरत है जहां वोकेशनल ट्रेनिंग दी जाए। केयर टेकर को भी ट्रेनिंग देने की जरूरत है। अशोक पांडेय बताते हैं कि दो तरह की बेघर महिलाएं होती हैं एक जो परिवार के साथ रहती हैं और दूसरी जो अकेली होती हैं। अकेली रहने वाली महिलाएं खुद को ज्यादा असुरक्षित महसूस करती हैं।

बंगला साहेब गुरुद्वारा, सरायकेला खां, मीना बाजार उर्दू पार्क जैसे रैन बसेरों में महिला और पुरुषों का शेल्टर साथ साथ है। इससे महिलाओं की सुरक्षा खतरे में पड़ती है। मानसरोवर पार्क स्थित रैन बसेरे में रह चुकी बिहार की रेणु (बदला नाम) का कहना है कि सड़क किनारे सोने पर या रहने पर लोग सेक्स वर्कर समझ लेते हैं। इसलिए गाली-गलौज की भाषा में लोग बात करते हैं।

रैन बसेरों के आसपास मंडराते अपराधी, चाकू मार देते हैं

कई रैन बसेरे ऐसे हैं जिनके आसपास अपराधी मंडराते रहते हैं। दिल्ली के टेलीफोन एक्सचेंज ईदगाह, चमेलियन रोड, कमर्शियल बिल्डिंग मोतिया खान सहित सदर बाजार इलाके के कई रैन बसेरों में सुरक्षा बेहद लचर है। पहाड़गंज में भी रैन बसेरों में लोग सुरक्षित नहीं हैं।

चमेलियन रोड में पहली मंजिल पर एक रैन बसेरा है जहां 18-20 लोगों के रहने की व्यवस्था है। पड़ताल के दौरान सीढ़ियों पर एक व्यक्ति नशा करता पाया गया। वह ड्रग्स को मिलाकर नशा कर रहा था। चमेलियन रोड के केयरटेकर विनोद और ईदगाह रैन बसेरे के केयरटेकर अभिनव उर्फ आनंद सिंह ने बताया कि इन नशेड़ियों को आप मना नहीं कर सकते। नशेड़ी और स्मैकर्स यहां बेरोकटोक नशा करते हैं। किसी ने टोक दिया तो चाकू तक मार देते हैं। ऐसी घटनाएं कई बार हो चुकी हैं।

रैन बसेरा में ज्यादातर रिक्शा चलाने वाले

रैन बसेरे किसी के लिए अस्थायी ठिकाना है तो कोई वर्षों से यहां रह रहा है। पहाड़गंज के नबी करीम इलाके में स्थित रैन बसेरा में केयरटेकर सनुप कुमार रजिस्टर देख बताता है कि कोई मथुरा, कोई प्रयागराज, मुजफ्फरपुर तो कोई नेपाल से आया है।

अधिकतर लोग टिकते नहीं हैं यानी एक-दो दिन रहकर चले जाते हैं। लेकिन कई ऐसे लोग हैं जो रैन बसेरों में एक-दो दिन या एक-दो साल नहीं बल्कि 20-22 सालों से रह रहे हैं। चमेलियन रोड स्थित रैन बसेरे में बिहार के मधुबनी के रहने वाले मो. नसीर से भी मुलाकात हुई। वो पिछले 22 साल से रैन बसेरे में रह रहे हैं। 12 लोगों का परिवार है जिसमें 4 लड़के और 2 लड़कियां हैं। एक बेटा उनके साथ ही रहता है।

नसीर बताते हैं कि कौन बाप ऐसा चाहेगा कि बेटा उसके साथ रैन बसेरे में रहे। लेकिन घर चलाने की मजबूरी है इसलिए वो खुद रिक्शा चलाते हैं और बेटा पास के मार्केट में नौकरी करता है। खुश होकर बताते हैं कि बेटा कंप्यूटर भी सीख रहा है ताकि अच्छी नौकरी मिल सके।

नसीर बताते हैं कि जब दिल्ली आया तो जवान था, अब बूढ़ा हो चला हूं। सबकुछ महंगा है कहां से घर का किराया देते इसलिए रैन बसेरा ही घर बन गया। इसी रैन बसेरे में दरभंगा के रहने वाले हैदर हैं, वो भी रिक्शा चलाते हैं। दिनभर में 400-500 कमा लेते हैं। जो पैसे बचाते हैं वही घर भेजते हैं।

मधुबनी के बासोपट्‌टी के रहनेवाले मो. अब्बास भी लंबे समय से रैन बसेरा में हैं। वो कहते हैं कि अपने सगे भाई ने ही प्रोपर्टी के विवाद में चाकू मार दिया। पूरा पेट फाड़ दिया (पेट दिखाते हुए)। ऑपरेशन में तब 15 लाख से ज्यादा लगे। घर का सबकुछ बिक गया। दाने-दाने को मोहताज हो गए तब दिल्ली आ गए।

यहां किसी तरह रिक्शा खींचकर पैसे कमाते हैं। ऐसे ही उमेर, मुजाहिद भी रैन बसेरे में गुजर-बसर करते हैं। अब्बास बताते हैं कि गरीबों को कौन पूछता है। रिक्शा किराया पर लिया है तो हर दिन 50 रुपए देते हैं। फिर रात में पार्किंग में लगाने के लिए 50 रुपए देने पड़ते हैं। यानी जो कुछ कमाते हैं उसमें से हर दिन 100 रुपए निकल जाते हैं।

दाल से बदबू आती, सूखी रोटियां हलक में उतारना मुश्किल

रैन बसेरों में सुबह की चाय, दोपहर का खाना और रात का खाना मिलता है। लेकिन खाना ऐसा कि जानवर भी मुंह न लगाए। चमेलियन रोड और नबी करीम स्थित रैन बसेरा में कनस्तर में रखी दाल, दाल कम पानी नजर आ रही थी। दाल से आती बदबू ऐसी कि उबकाई आ जाए। खुले में एक तरफ रोटियों का ढेर पड़ा था। सूखी, आधी-कच्ची रोटियां, देखने में पापड़ जैसी लगती हैं। ज्यादातर लोग इन रोटियों को नहीं खाते।

मोतिया खान रैन बसेरा में ठहरे ग्वालियर के संतोष की उम्र 60 साल है। पेटिंग का काम करते हैं। वह यहां का खाना नहीं खाते। यहां का खाना खाने से कई बार बीमार हुए, अस्पताल में भर्ती होना पड़ा है। क्या केयरटेकर के लिए यही खाना आता है इस पर मोतिया खान रैन बसेरा के केयरटेकर कहते हैं कि केयर टेकर अपना खाना खुद बनाते हैं।

एक ही बाथरूम का इस्तेमाल, जगह-जगह गंदगी की भरमार

दिल्ली सरकार दिल्ली अर्बन शेल्टर इम्प्रूवमेंट बोर्ड (DUSIB) और कई NGO के जरिए रैन बसेरे चलाती है। स्थायी और अस्थायी रैन बसेरों को जोड़ दिया जाए तो 250 से ऊपर इसकी संख्या होगी। रैन बसेरों को चलाने के लिए SOP (स्टैंडर्ड ऑपरेटिंग प्रोसेज्योर) बनाया गया है जिसे NGO को मानना पड़ता है।

रैन बसेरों में पूरी गाइडलाइन लिख कर टांगी गई है। लेकिन हकीकत में नियमों का पालन नहीं किया जाता। रैन बसेरों के बाथरूम गंदगी से भरे हैं। एक ही बाथरूम को कई लोग इस्तेमाल करने वाले। सफाईकर्मी है लेकिन सफाई नाम मात्र की भी नहीं होती। यानी ये रैन बसेरा बीमारियों का सेंटर है।

10 सालों से कंबल नहीं धोया, कभी नया कंबल नहीं देखा

मोतिया खान कमर्शियल बिल्डिंग रैन बसेरा में एक बड़ा हॉल है जिसमें 50 लोगों के बेड लग सकते हैं। यहां एक कोने में एक के ऊपर एक कई कंबल रखे हैं। हावड़ा के रहने वाले दीपक बताते हैं कि वो 10 साल से रैन बसेरे में रह रहे हैं लेकिन कभी नया कंबल नहीं देखा। पुराने और भयानक बदबूदार कंबल ही ओढ़ने पड़ते हैं। रैनबसेरा चला चुकीं तब्बसुम बताती हैं कि नए कंबल आते हैं लेकिन उन्हें रैन बसेरों में नहीं दिया जाता। कुछ लोग इसका भी पैसा डकार जाते हैं।

21,000 केयर टेकर की सैलरी, हाथ में आते 8,000-10,000

रैन बसेरों का सिस्टम समझें। एक रैन बसेरे में 3 केयरटेकर और 1 सफाईकर्मी रखना है। DUSIB रैन बसेरों को चलाने की जिम्मेदारी NGO को देता है। कई केयरटेकर ने बताया कि उन्हें समय पर सैलरी नहीं मिलती।सपुरवाइजर रहे विजय कुमार बताते हैं कि मैंने सबूत के साथ DUSIB को शिकायत की है। एनजीओ वाले बोलते हैं कि ऊपर तक चढ़ावा चढ़ता है कोई कुछ नहीं बिगाड़ सकता।

Facebook
Twitter
LinkedIn
WhatsApp

डॉ अंबेडकर की बुलंद आवाज के दस्तावेज : मूकनायक मीडिया पर आपका स्वागत है। दलित, आदिवासी, पिछड़े और महिला के हक़-हकुक तथा सामाजिक न्याय और बहुजन अधिकारों से जुड़ी हर ख़बर पाने के लिए मूकनायक मीडिया के इन सभी links फेसबुक/ Twitter / यूट्यूब चैनलको click करके सब्सक्राइब कीजिए… बाबासाहब डॉ भीमराव अंबेडकर जी के “Payback to Society” के मंत्र के तहत मूकनायक मीडिया को साहसी पत्रकारिता जारी रखने के लिए PhonePay या Paytm 9999750166 पर यथाशक्ति आर्थिक सहयोग दीजिए…
उम्मीद है आप बिरसा अंबेडकर फुले फातिमा मिशन से अवश्य जुड़ेंगे !

बिरसा अंबेडकर फुले फातिमा मिशन के लिए सहयोग के लिए धन्यवाद्

Recent Post

Live Cricket Update

Rashifal

You May Like This