जन्मदिन विशेष : शहीद-ए-आजम भगत सिंह केसमें कोई चश्मदीद नहीं था, उनकी झूठी गवाई RSS-स्वयंसेवकों ने दी

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मूकनायक मीडिया ब्यूरो || सितंबर 27, 2020 || जयपुर : आरएसएस स्वतंत्रता संग्राम के दौरान अपने प्राण निछावर करने वाले शहीदों को कितनी हीन दृष्टि से देखता था यह जान कर किसी भी देशवासी की रूह-काँपना लाजमी है। शहीद-ए-आजम भगत सिंह की झूठी गवाई आरएसएस-स्वयंसेवकों ने दी, इनमें से एक था सादी लाल और दूसरा था सोभा सिंह । आरएसएस-रूपी देशद्रोही और भ्रष्टाचार के ऑक्टोपस ने मानव-अस्मिताओं को क्षत-विक्षत कर दिया है। इसके आदमखोर नाख़ून देशवासियों के मन-मस्तिष्कों पर गहरे गढ़े हैं। चारों ओर नाग-ही-नाग हैं। देश की आवो-हवा में विष-फुंकारें हैं। आवाम स्तब्ध है। ग्लोबल दहशत, आतंक का भूमंडलीकृत माहौल सर्वत्र है। यह भी पढ़ें : पेरियार की नजर में भविष्य की दुनिया आरएसएस स्वार्थों की खरीद-फ़रोख्त में व्यस्त है। ‘भू’, ‘मंडल’, दशों दिशाएँ आरएसएस-संघियों के अग्नि-आचरण से सहमी हैं। अंबेडकर, गाँधी, भगत सिंह जैसे महामानव इनके छलों से छले गये हैं। आरएसएस का तांडव-डमरू बजने को है। जन-मानस का तीसरा नेत्र खुलने को तैयार है। इस नखदंती वर्तमान में सुरक्षित कौन है ? सर्वोच्य न्यायपीठ विवश है। साल के नौवें महीने का यह 27वां दिन इतिहास में भारत माता के सबसे लाडले पुत्र और उसे अंग्रेजों की गुलामी से मुक्ति दिलाने के लिए 23 बरस की छोटी सी उम्र में फाँसी के फंदे पर झूल गये अमर शहीद भगत सिंह के जन्मदिन के तौर पर दर्ज है। 27 सितंबर 1907 को अविभाजित पंजाब के लायलपुर :अब पाकिस्तान: में जन्मे भगत सिंह बहुत छोटी उम्र से ही आजादी की लड़ाई में शामिल हो गए और उनकी लोकप्रियता से भयभीत ब्रिटिश हुक्मरान ने 23 मार्च 1931 को 23 बरस के भगत को फाँसी पर लटका दिया। आज ये शहीद भगतसिंह का शहीदी दिवस और जन्मदिन तो मनाते हैं ताकि जनता की आँखों में धूल झोंक सकें। लेकिन क्या कभी सचमुच इन्होंने शहीदों का सम्मान किया है? यह भी पढ़ें : ‘मैं नास्तिक क्यों हूँ’ : शहीद-ए-आज़म भगतसिह (संकलनकर्ता – प्रोफ़ेसर राम लखन मीना) क्या जब तमाम क्रान्तिकारी जेलों की कोठरियों में कोड़े खा रहे थे, देश की आजादी के लिए फाँसी का फन्दा चूम रहे थे, तो संघी बात बहादुरों ने एक बार भी उनका सम्मान किया, एक बार भी उनका साथ दिया? इसका स्पष्ट उत्तर है, नहीं! संघ का पूरा संगठन और सोच झूठ और कुत्स-प्रचार का पुलिन्दा है। भगतसिंह, राजगुरू, अशफाक उल्ला, रामप्रसाद ‘बिस्मिल’ की जो शहादत आज भी देश के हर एक इंसान के लिए देशभक्ति का एक आदर्श है। पर आरएसएस के आदर्श हमारे क्रांतिकारी नहीं है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ दावा करता है कि वह इस देश का सबसे बड़ा रखवाला, सबसे बड़ा राष्ट्रभक्त और सबसे बड़ा वफादार है! यह भी पढ़े : ‘मुझे गर्व है, मैं जंगली हूँ’- जयपाल सिंह मुंडा : प्रोफ़ेसर राम लखन मीना वह और उसके सहयोगी संगठन तथा व्यक्ति लगातार इस प्रचार में लगे हैं कि आरएसएस और देशभक्ति एक दूसरे के पर्याय हैं। इस देश में कौन वफादार है और कौन नहीं, इसका प्रमाण-पत्र देने का ठेका भी आरएसएस ने अपने सर ले रखा है। जबकि आरएसएस एक ऐसा संगठन है जो न तो स्वतंत्र इंडिया के संविधान, राष्ट्र-ध्वज (तिरंगा) और प्रजातांत्रिक-धर्मनिर्पेक्ष जैसी राष्ट्रीय मान्यताओं में विश्वास करता है और न ही इंडिया के स्वतंत्रता संग्राम से इसका कोई लेना देना था। जब दिल्ली में भगत सिंह पर अंग्रेजों की अदालत में मुकद्दमा चला तो भगत सिंह के खिलाफ गवाही देने को कोई तैयार नहीं हो रहा था। बड़ी मुश्किल से अंग्रेजों ने दो लोगों को गवाह बनने पर राजी कर लिया। सादीलाल और सोभा सिंह की गवाई की वजह से ही मुकद्दमे में भगत सिंह को उनके दो साथियों समेत फांसी की सजा मिली। वरना, तो भगत सिंह केस में अंग्रेजों के पास कोई भी चश्मदीद गवाह नहीं था। यह भी पढ़ें : ‘अबुआ दिशोम रे अबुआ राज’ बिरसा मुंडा का सपना कब पूरा होगा! इधर दोनों को वतन से की गई इस गद्दारी का इनाम भी मिला। दोनों को न सिर्फ सर की उपाधि दी गयी बल्कि और भी कई दूसरे फायदे मिले। सोभा सिंह को दिल्ली में बेशुमार दौलत और करोड़ों के सरकारी निर्माण कार्यों के ठेके मिले जबकि सादी लाल को बागपत के नजदीक अपार संपत्ति मिली। आज भी श्यामली में सादी लाल के वंशजों के पास चीनी मिल और शराब कारखाना है। यह अलग बात है कि सादी लाल को गाँव वालों का ऐसा तिरस्कार झेलना पड़ा कि उसके मरने पर किसी भी दुकानदार ने अपनी दुकान से कफन का कपड़ा भी नहीं दिया। सादी लाल के लड़के उसका कफ़न दिल्ली से खरीद कर लाये तब जाकर उसका अंतिम संस्कार हो पाया था। जवाहरलाल नेहरू ने भी अपनी आत्मकथा में भगत सिंह के बारे में लिखा है कि ‘भगत सिंह एक प्रतीक बन गये थे। सैण्डर्स के वध का कार्य तो भुला दिया गया लेकिन चिह्न शेष बना रहा और कुछ ही माह में पंजाब का प्रत्येक गांव और नगर तथा बहुत कुछ उत्तरी भारत उसके नाम से गूंज उठा। उनके बारे में बहुत से गीतों की रचना हुई और इस प्रकार भगत सिंह को जो लोकप्रियता प्राप्त हुई वह आश्चर्यचकित कर देने वाली थी।’

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