घरेलू हिंसा : पति रोज पीटता है, खामोशी समस्या का हल नहीं, घरेलू हिंसा और फिजिकल अब्यूज की कैटेगरीज

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मूकनायक मीडिया ब्यूरो | 07 जनवरी 2024 | जयपुर – दिल्ली – कोटा : पति से पिटना सिर्फ हमारे देश की समस्या नहीं, विश्वभर में पुरुष बेदर्दी से महिला पर हाथ उठाते हैं और उन्हें इस बात का कोई अपराधबोध भी नहीं होता। चैट-रूम में आज चर्चा एक ऐसी महिला की जो रोज पति के हाथों पिटती है और तब भी असमंजस में है कि पति से रिश्ता तोड़े या नहीं। पति-पत्नी के बीच होने वाले फिजिकल अब्यूज की वजहें और इससे बचने के रास्ते।

हमारी शादी को 5 साल हो गए हैं। हमारी 3 साल की बेटी है। मेरी समस्या ये है कि पति को रोज शराब पीने की आदत है, जिसके बाद वो रोज घर में शोर-शराबा और मारपीट करते हैं। शादी के बाद जब ये पहली बार हुआ तो मैंने सासू मां से शिकायत की। उन्होंने कहा कि थोड़ा सब्र रखो, समय के साथ सब ठीक हो जाएगा। मेरी मां ने भी हर हाल में शादी बचाने की हिदायत दी।

शादी के दो महीने बाद जब मैं प्रेग्नेंट हो गई तो सासू मां ने मुझे मायके भेज दिया ताकि मैं उनके बेटे के अत्याचार से बची रहूं। मायके वालों ने भी मेरी गृहस्थी बचाने के लिए हर मुमकिन कोशिश की। बेटी के जन्म के बाद जब मैं फिर से ससुराल आई, तो पति में कोई बदलाव नहीं दिखा। दिन में वो सभ्य इंसान होते हैं, लेकिन शाम होते ही उनका रूप बदल जाता है। शराब पीकर मारपीट करना उनकी आदत बन चुकी है।

मैं इस तरह रोज मार खाकर तंग आ चुकी हूं। मुझे समझ नहीं आ रहा कि मैं क्या करूं। न मायके वाले मेरी स्थिति समझने को तैयार हैं और न ही ससुराल वाले। मैं एक वर्किंग वुमन हूं और अपनी बेटी की परवरिश अच्छी तरह कर सकती हूं। क्या मुझे पति से रिश्ता तोड़ देना चाहिए?

मार खाकर रिश्ता निभाना कोई समझदारी नहीं है। पति-पत्नी ही नहीं, किसी को भी किसी पर हाथ उठाने का अधिकार नहीं है। कई घरों में महिलाएं चुपचाप पति की मार खाती हैं, लेकिन ये बात घर से बाहर नहीं निकलती। पढ़ी-लिखी महिलाएं भी पति से पिटती हैं, लेकिन इसके बारे में किसी से बात नहीं करतीं। उन्हें अपनी प्रेस्टीज की चिंता रहती है, लेकिन इसे बढ़ावा देकर कई बार वो अपने लिए मुसीबत मोल ले लेती हैं। फिर जब पति किसी के सामने हाथ उठाता है तो भेद खुल ही जाता है। तब उनके लिए इसे बर्दाश्त करना मुश्किल हो जाता है।

घरेलू हिंसा और फिजिकल अब्यूज की कैटेगरीज

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मूकनायक मीडिया : पति रोज पीटता है

पहली कैटेगरी- स्त्री-पुरुष के बीच फिजिकल अब्यूज को 3 कैटेगरी में बांट कर समझा जा सकता है। एक कैटेगरी वो है जहां महिलाएं पढ़ी-लिखी हैं, फिर भी मार खाती है। इसकी वजह है उनकी फैमिली हिस्ट्री। ऐसी महिलाओं ने अपनी मां को पिता के हाथों पिटते देखा है। उनकी मां सुबह पिता की मार खातीं और शाम को पति के साथ बैठकर एक ही थाली में खाना खातीं। ऐसी महिलाओं की ये धारणा बन जाती है कि पिता के हाथों पिटना नॉर्मल है।

दूसरी कैटेगरी- ये वो कैटेगरी है जहां महिला चाहती है कि उसे पति के रूप में ऐसा माचोमैन मिले जो हर तरह से उसकी रक्षा करे। वो भले ही उसकी पिटाई करे, लेकिन कोई यदि उसकी तरफ आंख उठाकर भी देखे तो उसे अच्छी तरह सबक सिखा दे। जो महिलाएं बचपन में बहुत इनसिक्योरिटी देखती हैं वो ऐसे पुरुष के प्रति आकर्षित होती हैं।

तीसरी कैटेगरी- इसमें वो महिलाएं आती हैं जो किसी फिल्म या अपने आसपास के ऐसे पुरुष से आकर्षित हो जाती हैं जो अपनी प्रेमिका या पत्नी पर हाथ तो उठाता है, लेकिन उसे जान से भी ज्यादा प्यार करता है। उन्हें ऐसे पुरुष हीरो लगते हैं और उनकी मार खाने में उन्हें कोई बुराई नजर नहीं आती। शाहिद कपूर और कियारा आडवाणी की फिल्म ‘कबीर सिंह’ इसका बेहतरीन उदाहरण है।

आपके जैसी कई महिलाएं हैं जो पहले इसलिए चुप रहती हैं कि शायद पति सुधर जाएंगे और सब ठीक हो जाएगा। फिर बच्चों के जन्म के बाद वो उनके भविष्य के लिए चुपचाप पति की मार खाकर भी रिश्ता निभाती हैं।

उन पर समाज का प्रेशर भी होता है कि अब शादी के इतने साल बाद शादी तोड़कर कहां जाऊं। महिलाएं हर हाल में घर बचाने और रिश्ता निभाने की कोशिश करती हैं। पढ़ी-लिखी वर्किंग वुमन भी बच्चों के भविष्य की खातिर पति की मार सहती हैं।

पति से प्रताड़ित होने वाली महिला को मायके और ससुराल से यही सलाह दी जाती है कि महिला को घर बचाने के लिए त्याग करना ही पड़ता है। महिला घर की मर्यादा होती है इसलिए ये उसका फर्ज है कि वो घर की बात बाहर न उछाले। सबकुछ सह कर भी हर हाल में रिश्ता निभाए।

खामोशी समस्या का हल नहीं

खामोश रहने से समस्या हल नहीं होगी। आप पति से बहस करने से बच रही हैं, लेकिन उनसे नॉर्मल बातचीत तो कर ही सकती हैं। आपके मन में अपने रिश्ते को लेकर जो इनसिक्योरिटी है, उसके बारे में पति से बात करें। उनसे पूछें कि आखिर अचानक ऐसा क्या हो गया जो उन्होंने आपसे दूरी बना ली। यदि उन्हें आपसे कोई शिकायत है तो वह भी जानने की कोशिश करें। बात करने से समस्या का हल निकल आएगा, खामोशी रिश्ते में दूरियां बढ़ाती है।

आप रिश्ता तोड़ने से पहले पति को एक मौका दें। उन्हें समझाएं कि यदि वो नहीं बदले तो आप उनसे रिश्ता तोड़ देंगी। पति की शराब की लत दूर करने के लिए उनका सही इलाज कराएं। यदि आपके कहने से बात नहीं बनती तो एक्सपर्ट की मदद लें। फिर भी बात नहीं बनती तो ऐसे अब्यूसिव रिश्ते से खुद को अलग कर लें। जो पुरुष आपके स्वाभिमान की कद्र नहीं करता, वो बच्चे का भविष्य कैसे सुधार सकता है?

पति की मार खाने वाली महिला को सबसे पहले इस बात की जानकारी होनी चाहिए कि ऐसा अब्यूसिव रिश्ता न उनके लिए सही है और न ही बच्चों के भविष्य के लिए। रिश्ता तोड़ने से पहले पति को सुधरने का मौका दें। जरूरत पड़े तो काउंसलर की मदद लें। तब भी बात नहीं बनती तो उस रिश्ते से अलग हो जाएं।

पेरेंट्स बेटी को मार खाते रहने की सलाह न दें। उन्हें स्वाभिमान से जीना सिखाएं। बेटी को मेंटली और फिजिकली मजबूत बनाएं। पेरेंट्स बच्चों के सामने झगड़ें नहीं, ताकि वो भी आगे चलकर ऐसी हरकत न करें। सबसे जरूरी बात, बेटे को महिलाओं की इज्जत करना और स्वाभिमान का सम्मान करना सिखाएं।

घरेलू तथा पारिवारिक हिंसा

घरेलू तथा पारिवारिक हिंसा अन्तरंग रिश्तों या अन्य प्रकार के पारिवारिक रिश्तों में दुर्व्यवहारपूर्ण बर्ताव का एक पैटर्न होता है जहाँ एक व्यक्ति सोचता है कि वह दूसरे व्यक्ति पर हावी है और स्वयँ को शक्तिशाली समझने वाला व्यक्ति भय उत्पन्न करता है। इसे घरेलू हिंसा, पारिवारिक हिंसा या अन्तरंग साथी हिंसा के रुप में भी जाना जाता है।

इस तरह की हिंसा विभिन्न प्रकार के रिश्तों में हो सकती है, उदाहरणार्थः पति और पत्नि या गर्ल फ्रैंड और बॉय फ्रैंड के बीच; व्यस्कों और बच्चों या व्यस्कों और वृद्ध माता-पिता के बीच; अथवा कुटुम्ब (विस्तारित परिवार) के सदस्यों जैसे चाचियों, मामियों, चाचाओं, मामाओं तथा दादा-दादी, नाना-नानी; अथवा गैर-यौन संबंधों में साथ रहने वाले लोगों के बीच।

इसे अक्सर जबरदस्ती तथा नियंत्रणके एक पैटर्न के रुप में उल्लिखित किया जाता है। कभी-कभी दुर्व्यवहारकर्ताओं को ‘हिंसा-कर्ता’ कहा जाता है। हमेशा ऐसा नहीं होता कि किसी रिश्ते के टूट जाने पर घरेलू या पारिवारिक हिंसा समाप्त हो जाती हो, अतः यह पूर्व-साथियों के बीच भी हो सकती है।

घरेलू हिंसा क्या है?

  • घरेलू हिंसा अर्थात् कोई भी ऐसा कार्य जो किसी महिला एवं बच्चे (18 वर्ष से कम आयु के बालक एवं बालिका) के स्वास्थ्य, सुरक्षा, जीवन पर संकट, आर्थिक क्षति और ऐसी क्षति जो असहनीय हो तथा जिससे महिला व बच्चे को दुःख एवं अपमान सहन करना पड़े, इन सभी को घरेलू हिंसा के दायरे में शामिल किया जाता है।
  • घरेलू हिंसा अधिनियम के अंतर्गत प्रताड़‍ित महिला किसी भी वयस्क पुरुष को अभियोजित कर सकती है अर्थात उसके विरुद्ध प्रकरण दर्ज करा सकती है।

भारत में घरेलू हिंसा के विभिन्न रूप

भारत में घरेलू हिंसा अधिनियम, 2005 के अनुसार, घरेलू हिंसा के पीड़ित के रूप में महिलाओं के किसी भी रूप तथा 18 वर्ष से कम आयु के बालक एवं बालिका को संरक्षित किया गया है। भारत में घरेलू हिंसा के विभिन्न रूप निम्नलिखित हैं-

  • महिलाओं के विरुद्ध घरेलू हिंसा- किसी महिला को शारीरिक पीड़ा देना जैसे- मारपीट करना, धकेलना, ठोकर मारना, किसी वस्तु से मारना या किसी अन्य तरीके से महिला को शारीरिक पीड़ा देना,महिला को अश्लील साहित्य या अश्लील तस्वीरों को देखने के लिये विवश करना, बलात्कार करना, दुर्व्यवहार करना, अपमानित करना, महिला की पारिवारिक और सामाजिक प्रतिष्ठा को आहत करना, किसी महिला या लड़की को अपमानित करना, उसके चरित्र पर दोषारोपण करना, उसकी शादी इच्छा के विरुद्ध करना, आत्महत्या की धमकी देना, मौखिक दुर्व्यवहार करना आदि। यूनाइटेड नेशंस पॉपुलेशन फंड रिपोर्ट के अनुसार, लगभग दो-तिहाई विवाहित भारतीय महिलाएँ घरेलू हिंसा की शिकार हैं और भारत में 15-49 आयुवर्ग की 70% विवाहित महिलाएँ पिटाई, बलात्कार या ज़बरन यौन शोषण का शिकार हैं।
  • पुरुषों के विरुद्ध घरेलू हिंसा- इस तथ्य पर कोई प्रश्नचिन्ह नहीं है कि महिलाओं के खिलाफ घरेलू हिंसा एक गंभीर और बड़ी समस्या है, लेकिन भारत में पुरुषों के खिलाफ घरेलू हिंसा भी धीरे-धीरे बढ़ रही है। समाज में पुरुषों का वर्चस्व यह विश्वास दिलाता है कि वे घरेलू हिंसा के प्रति संवेदनशील नहीं हैं। हाल ही में चंडीगढ़ और शिमला में सैकड़ों पुरूष इकट्ठा हुए, जिन्होंने अपनी पत्नियों और परिवार के अन्य सदस्यों द्वारा उनके खिलाफ की जाने वाली घरेलू हिंसा से बचाव और सुरक्षा की गुहार लगाई थी।
  • बच्चों के विरुद्ध घरेलू हिंसा- हमारे समाज में बच्चों और किशोरों को भी घरेलू हिंसा का सामना करना पड़ता है। वास्तव में हिंसा का यह रूप महिलाओं के खिलाफ हिंसा के बाद रिपोर्ट किये गए मामलों की संख्या में दूसरा है। शहरी और ग्रामीण क्षेत्रों तथा भारत में उच्च वर्ग और निम्न वर्ग के परिवारों में इसके स्वरूप में बहुत भिन्नता है। शहरी क्षेत्रों में यह अधिक निजी है और घरों की चार दीवारों के भीतर छिपा हुआ है।
  • बुजुर्गों के विरुद्ध घरेलू हिंसा- घरेलू हिंसा के इस स्वरूप से तात्पर्य उस हिंसा से है जो घर के बूढ़े लोगों के साथ अपने बच्चों और परिवार के अन्य सदस्यों द्वारा की जाती है। घरेलू हिंसा की यह श्रेणी भारत में अत्यधिक संवेदनशील होती जा रही है। इसमें बुजुर्गों के साथ मार-पीट करना, उनसे अत्यधिक घरेलू काम कराना, भोजन आदि न देना तथा उन्हें शेष पारिवारिक सदस्यों से अलग रखना शामिल है।

घरेलू हिंसा के कारण

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MOOKNAYAK MEDIA : Stop Domestic Violence
  • महिलाओं के प्रति घरेलू हिंसा का मुख्य कारण मूर्खतापूर्ण मानसिकता है कि महिलाएँ पुरुषों की तुलना में शारीरिक और भावनात्मक रूप से कमजोर होती हैं।
  • प्राप्त दहेज़ से असंतुष्टि, साथी के साथ बहस करना, उसके साथ यौन संबंध बनाने से इनकार करना, बच्चों की उपेक्षा करना, साथी को बताए बिना घर से बाहर जाना, स्वादिष्ट खाना न बनाना शामिल है।
  • विवाहेत्तर संबंधों में लिप्त होना, ससुराल वालों की देखभाल न करना, कुछ मामलों में महिलाओं में बाँझपन भी परिवार के सदस्यों द्वारा उन पर हमले का कारण बनता है।
  • पुरुषों के प्रति घरेलू हिंसा के कारणों में पत्नियों के निर्देशों का पालन न करना, ‘पुरुषों की अपर्याप्त कमाई, विवाहेत्तर संबंध, घरेलू गतिविधियों में पत्नी की मदद नहीं करना है’ बच्चों की उचित देखभाल न करना, पति-पत्नी के परिवार को गाली देना, पुरुषों का बाँझपन आदि कारण हैं।
  • बच्चों के साथ घरेलू हिंसा के कारणों में माता-पिता की सलाह और आदेशों की अवहेलना, पढ़ाई में खराब प्रदर्शन या पड़ोस के अन्य बच्चों के साथ बराबरी पर नहीं होना, माता-पिता और परिवार के अन्य सदस्यों के साथ बहस करना आदि हो सकते हैं।
  • ग्रामीण क्षेत्रों में बच्चों के साथ घरेलू हिंसा के कारणों में बाल श्रम, शारीरिक शोषण या पारिवारिक परंपराओं का पालन न करने के लिये उत्पीड़न, उन्हें घर पर रहने के लिये मजबूर करना और उन्हें स्कूल जाने की अनुमति न देना आदि हो सकते हैं।
  • गरीब परिवारों में पैसे पाने के लिये माता-पिता द्वारा मंदबुद्धि बच्चों के शरीर के अंगों को बेचने की ख़बरें मिली हैं। यह घटना बच्चों के खिलाफ क्रूरता और हिंसा की उच्चता को दर्शाता है।
  • वृद्ध लोगों के खिलाफ घरेलू हिंसा के मुख्य कारणों में बूढ़े माता-पिता के ख़र्चों को झेलने में बच्चे झिझकते हैं। वे अपने माता-पिता को भावनात्मक रूप से पीड़ित करते हैं और उनसे छुटकारा पाने के लिये उनकी पिटाई करते हैं।
  • विभिन्न अवसरों पर परिवार के सदस्यों की इच्छा के विरुद्ध कार्य करने के लिये उन्हें पीटा जाता है। बहुत ही सामान्य कारणों में से एक संपत्ति हथियाने के लिये दी गई यातना भी शामिल है।

घरेलू हिंसा के प्रभाव

  • यदि किसी व्यक्ति ने अपने जीवन में घरेलू हिंसा का सामना किया है तो उसके लिये इस डर से बाहर आ पाना अत्यधिक कठिन होता है। अनवरत रूप से घरेलू हिंसा का शिकार होने के बाद व्यक्ति की सोच में नकारात्मकता हावी हो जाती है। उस व्यक्ति को स्थिर जीवनशैली की मुख्यधारा में लौटने में कई वर्ष लग जाते हैं।
  • घरेलू हिंसा का सबसे बुरा पहलू यह है कि इससे पीड़ित व्यक्ति मानसिक आघात से वापस नहीं आ पाता है। ऐसे मामलों में अक्सर देखा गया है कि लोग या तो अपना मानसिक संतुलन खो बैठते हैं या फिर अवसाद का शिकार हो जाते हैं।
  • घरेलू हिंसा की यह सबसे खतरनाक और दुखद स्थिति है कि जिन लोगों पर हम इतना भरोसा करते हैं और जिनके साथ रहते हैं जब वही हमें इस तरह का दुख देते हैं तो व्यक्ति का रिश्तों पर से विश्वास उठ जाता है और वह स्वयं को अकेला कर लेता है। कई बार इस स्थिति में लोग आत्महत्या तक कर लेते हैं।
  • घरेलू हिंसा का सबसे व्यापक प्रभाव बच्चों पर पड़ता है। सीटी स्कैन से पता चलता है कि जिन बच्चों ने घरेलू हिंसा में अपना जीवन बिताया है उनके मस्तिष्क का कॉर्पस कॉलोसम और हिप्पोकैम्पस नामक भाग सिकुड़ जाता है, जिससे उनकी सीखने, संज्ञानात्मक क्षमता और भावनात्मक विनियमन की शक्ति प्रभावित हो जाती है।
  • बालक अपने पिता से गुस्सैल व आक्रामक व्यवहार सीखते हैं। इस का असर ऐसे बच्चों का अन्य कमज़ोर बच्चों व जानवरों के साथ हिंसा करते हुए देखा जा सकता है।
  • बालिकाएँ नकारात्मक व्यवहार सीखती हैं और वे प्रायः दब्बू, चुप-चुप रहने वाली या परिस्थितियों से दूर भागने वाली बन जाती हैं।
  • प्रत्येक व्यक्ति के जीवन की गुणवत्ता पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है क्योंकि हिंसा की शिकार हुई महिलाएँ समाजिक जीवन की विभिन्न गतिविधियों में कम भाग लेती हैं।

समाधान के उपाय

  • शोधकर्त्ताओं के अनुसार, यह ध्यान रखना महत्त्वपूर्ण है कि घरेलू हिंसा के सभी पीड़ित आक्रामक नहीं होते हैं। हम उन्हें एक बेहतर वातावरण उपलब्ध करा कर घरेलू हिंसा के मानसिक विकार से बाहर निकल सकते हैं।

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    मूकनायक मीडिया : घरेलु हिंसा कब रुकेगी आखिरकार
  • भारत अभी तक हमलावरों की मानसिकता का अध्ययन करने, समझने और उसमें बदलाव लाने का प्रयास करने के मामले में पिछड़ रहा है। हम अभी तक विशेषज्ञों द्वारा प्रचारित इस दृष्टिकोण की मोटे तौर पर अनदेखी कर रहे हैं कि “महिलाओं और बच्चों के साथ होने वाली हिंसा और भेदभाव को सही मायनों में समाप्त करने के लिये हमें पुरुषों को न केवल समस्या का एक कारण बल्कि उन्हें इस मसले के समाधान के अविभाज्य अंग के तौर पर देखना होगा।”
  • सुधार लाने के लिये सबसे पहले कदम के तौर पर यह आवश्यक होगा कि “पुरुषों को महिलाओं के खिलाफ रखने” के स्थान पर पुरुषों को इस समाधान का भाग बनाया जाए। मर्दानगी की भावना को स्वस्थ मायनों में बढ़ावा देने और पुराने घिसे-पिटे ढर्रे से छुटकारा पाना अनिवार्य होगा।
  • सरकार ने महिलाओं और बच्चों को घरेलू हिंसा से संरक्षण देने के लिये घरेलू हिंसा अधिनियम, 2005 को संसद से पारित कराया है। इस कानून में निहित सभी प्रावधानों का पूर्ण लाभ प्राप्त करने के लिये यह समझना ज़रूरी है कि पीड़ित कौन है। यदि आप एक महिला हैं और रिश्तेदारों में कोई व्यक्ति आपके प्रति दुर्व्यवहार करता है तो आप इस अधिनियम के तहत पीड़ित हैंl
  • मानसिक स्वास्थ्य अधिनियम, 2017 द्वारा भारत मानसिक स्वास्थ्य के प्रति गंभीर हो गया है, लेकिन इसे और अधिक प्रभावशाली बनाने की आवश्यकता है। नीति निर्माताओं को घरेलू हिंसा से उबरने वाले परिवारों को पेशेवर मानसिक स्वास्थ्य सेवाओं का लाभ उपलब्ध कराने के लिये तंत्र विकसित करने की ज़रूरत है।
  • सरकार ने वन-स्टॉप सेंटर’ जैसी योजनाएँ प्रारंभ की हैं, जिनका उद्देश्य हिंसा की शिकार महिलाओं की सहायता के लिये चिकित्सीय, कानूनी और मनोवैज्ञानिक सेवाओं की एकीकृत रेंज तक उनकी पहुँच को सुगम व सुनिश्चित करता है।
  • महिलाओं के साथ होने वाली हिंसा के बारे में जागरूकता फैलाने के लिये वोग इंडिया ने ‘लड़के रुलाते नहीं’ अभियान चलाया, जबकि वैश्विक मानवाधिकार संगठन ‘ब्रेकथ्रू’ द्वारा घरेलू हिंसा के खिलाफ ‘बेल बजाओ’ अभियान चलाया गया। ये दोनों ही अभियान महिलाओं के साथ होने वाली घरेलू हिंसा से निपटने के लिये निजी स्तर पर किये गए शानदार प्रयास थे।
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