बीजेपी पर हमलावर कांग्रेस नेता प्रतिपक्ष चुनाव में कई खेमों में बंटी, नेता प्रतिपक्ष के 5 मुख्य दावेदार, मूकनायक मीडिया की स्पेशल रिपोर्ट

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मूकनायक मीडिया ब्यूरो | 13 जनवरी 2024 | जयपुर – दिल्ली – जोधपुर : विधानसभा सत्र शुरू होने में महज सप्ताह भर का समय बचा है, लेकिन अभी तक कांग्रेस में नेता प्रतिपक्ष के नाम पर फैसला नहीं हो पाया है। अंदरूनी खींचतान के चलते कांग्रेस में नेता प्रतिपक्ष के चुनाव को लेकर तीन धड़े बन गए हैं।

तीनों ही अलग-अलग नाम आलाकमान को सुझा रहे हैं। एक तरफ सचिन पायलट खेमा है तो दूसरी तरफ पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत। गहलोत जिस नाम से सहमत नहीं, पायलट गुट उसी के लिए पैरवी करने में जुटा है। तीसरा खेमा उन नेताओं का है जो दिल्ली की सियासत में भी दखल रखता है।

पार्टी सूत्रों की मानें तो कांग्रेस कोई नया प्रयोग नहीं करना चाहती, इसलिए दलित-आदिवासी कार्ड और जाट-ब्राह्मण कॉम्बिनेशन में से एक चुनने पर मंथन कर रही है। फिलहाल कौनसा धड़ा किस फॉर्मूले पर किसको आगे कर रहा है। महेंद्रजीत सिंह मालवीय बागीदौरा से कांग्रेस विधायक एवं पूर्व कैबिनेट मिनिस्टर रहे हैं।

पढ़िए- मूकनायक मीडिया की स्पेशल रिपोर्ट ….

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नेता प्रतिपक्ष के 5 मुख्य दावेदार

कांग्रेस में नेता प्रतिपक्ष के लिए फिलहाल महेंद्रजीत मालवीय, गोविंद सिंह डोटासरा, हरीश चौधरी, हरिमोहन शर्मा, टीकाराम जूली के नाम प्रमुख दावेदारों के तौर पर चल रहे हैं। आलाकमान चाहता है कि प्रदेशाध्यक्ष और नेता प्रतिपक्ष पद के चुनाव में दलित-आदिवासी कार्ड के साथ जाट-ब्राह्मण, जाट-दलित का कॉम्बिनेशन बने।

पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत आदिवासी-एसटी वोटर्स में मैसेज के लिए महेंद्रजीत मालवीय की पुरजोर पैरवी कर रहे हैं। लेकिन मालवीय के नाम पर पायलट खेमा और दूसरे नेता तैयार नहीं हैं। आलाकमान के करीब मानें जाने वाले पूर्व केंद्रीय मंत्री भंवर जितेंद्र सिंह सहित एक खेमा गहलोत सरकार में सामाजिक न्याय मंत्री रहे और अब अलवर ग्रामीण से विधायक टीकाराम जूली की पैरवी कर रहे हैं।

जूली पार्टी के प्रमुख दलित चेहरों में माने जाते हैं। जूली का नाम नेता प्रतिपक्ष नहीं बनाए जाने की स्थिति में उपनेता प्रतिपक्ष के विकल्प के लिए भी सुझाया गया है। टीकाराम जूली अलवर ग्रामीण से विधायक हैं। गहलोत कैबिनेट में मंत्री भी रहे हैं।

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जाट चेहरों में डोटासरा, हरीश चौधरी, लेकिन एक धड़ा सहमत नहीं
नेता प्रतिपक्ष के लिए जाट दावेदारों में पहला नाम कांग्रेस प्रदेशाध्यक्ष गोविंद सिंह डोटासरा का चल रहा है। डोटासरा विपक्ष में रहते वक्त कांग्रेस विधायक दल के सचेतक रहे थे, तब विधानसभा में उनकी तैयारी और सरकार को घेरने के तेवर चर्चित रहे थे।

अब प्रदेशाध्यक्ष के तौर पर लंबी पारी की कम संभावनाएं देखकर डोटासरा की दावेदारी नेता प्रतिपक्ष के लिए चल रही है। अगर डोटासरा को नेता प्रतिपक्ष बनाया जाता है तो प्रदेशाध्यक्ष के पद पर गैर जाट नेता को मौका दिया जाएगा। फिलहाल इस फॉर्मूले पर चर्चा ही हो रही है, लेकिन नतीजा कुछ नहीं निकला है।

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दूसरे जाट चेहरे के तौर पर हरीश चौधरी भी नेता प्रतिपक्ष के लिए दावेदार माने जा रहे हैं, एआईसीसी में एक लॉबी उनके पक्ष में है, लेकिन उनके नाम पर अशोक गहलोत सहमत नहीं हैं। हालांकि सचिन पायलट खेमा हरीश चौधरी के समर्थन में है। हालांकि उनके नाम पर भी अभी फाइनल सहमति नहीं बन पाई है।

ब्राह्मण चेहरे की भी चर्चा, पारीक-शर्मा रेस में

पार्टी में नेता प्रतिपक्ष या प्रदेशाध्यक्ष में से एक पद ब्राह्मण चेहरे को देने पर भी सुझाव दिया गया है। एक खेमा ब्राह्मण चेहरे के तौर पर वरिष्ठ विधायक हरिमोहन शर्मा, राजेंद्र पारीक के नाम भी आगे बढ़ा रहा है। कांग्रेस में जाट-ब्राह्मण, जाट-दलित, जाट-आदिवासी कॉम्बिनेशन के फाॅर्मूले पर काम होता रहा है। प्रदेशाध्यक्ष और नेता प्रतिपक्ष पदों में जाट-ब्राह्मण कॉम्बिनेशन पहले भी चलता रहा है।

पहले ब्राह्मण को नेता प्रतिपक्ष और जाट को प्रदेशाध्यक्ष या फिर जाट नेता प्रतिपक्ष होने पर ब्राह्मण चेहरे को प्रदेशाध्यक्ष बनाया जाता रहा है। जब बीडी कल्ला (ब्राह्मण) नेता प्रतिपक्ष थे तब नारायण सिंह (जाट) कांग्रेस के प्रदेशाध्यक्ष जाट-ब्राह्मण कॉम्बिनेशन था। इसके बाद रामनारायण चौधरी नेता प्रतिपक्ष बने तो बीडी कल्ला प्रदेशाध्यक्ष पद पर आए।

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जनवरी में ही होता रहा है नेता प्रतिपक्ष का फैसला

नई सरकार बनने के बाद आम तौर पर जनवरी में नेता प्रतिपक्ष बनते आए हैं। पिछली बार कांग्रेस ने 20 जनवरी 2014 को रामेश्वर डूडी को नेता प्रतिपक्ष बनाया था। वसुंधरा राजे की पहली सरकार के समय बीडी कल्ला को 16 जनवरी 2004 को नेता प्रतिपक्ष बनाया गया। इससे पहले भैरोंसिंह शेखावत की अगुवाई वाली सरकार के समय 31 दिसंबर 1993 को परसराम मदेरणा नेता प्रतिपक्ष बने थे।

वहीं, बीजेपी ने नेता प्रतिपक्ष जनवरी में ही तय किए। पिछली गहलोत सरकार के समय 13 जनवरी 2019 को गुलाबचंद कटारिया को विधानसभा सत्र से ठीक पहले नेता प्रतिपक्ष नियुक्त किया था। गहलोत की अगुवाई वाली दूसरी सरकार के समय बीजेपी ने वसुंधरा राजे को नेता प्रतिपक्ष की जिम्मेदारी 2 जनवरी 2009 को दी थी। पहली गहलोत सरकार के समय 8 जनवरी 1999 को भैरोंसिंह शेखावत नेता प्रतिपक्ष नियुक्त हुए थे। वसुंधरा राजे के प्रदेशाध्यक्ष बनने पर गुलाबचंद कटारिया को नेता प्रतिपक्ष बनाया था।

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गहलोत सरकार में 2008 से 2013 : बीजेपी ने तीन बार नेता प्रतिपक्ष बनाए, वसुंधरा राजे और फिर कटारिया बने नेता प्रतिपक्ष

2008 से 2013 तक बीजेपी ने दो बार नेता प्रतिपक्ष बनाए। 2 जनवरी 2009 से 25 फरवरी 2010 तक वसुंधरा राजे नेता प्रतिपक्ष रहीं। इसके बाद 9 मार्च 2011 से 20 फरवरी 2013 तक नेता प्रतिपक्ष रहीं। चुनाव अभियान शुरू होने से पहले वसुंधरा राजे ने कैंपेन शुरू किया और पार्टी की कमान संभाली, ऐसे में गुलाबचंद कटारिया को नेता प्रतिपक्ष बनाया। 21 फरवरी 2013 से 9 दिसंबर 2013 तक गुलाबचंद कटारिया नेता प्रतिपक्ष रहे।

2018 से 2023 : गुलाबचंद ​कटारिया और राजेंद्र राठौड़ रहे नेता प्रतिपक्ष

गुलाबचंद कटारिया 13 जनवरी 2019 को नेता प्रतिपक्ष बने, 17 जनवरी को विधानसभा से कंफर्म किया। कटारिया 12 फरवरी 2023 में असम के राज्यपाल बन गए, 16 फरवरी 2023 तक नेता प्रतिपक्ष रहे। कटारिया की जगह राजेंद्र राठौड़ को 6 अप्रैल 2023 को नेता प्रतिपक्ष की जिम्मेदारी दी गई।

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वर्ष 2003 से 2008 : कांग्रेस ने तीन नेता प्रतिपक्ष बनाए

वसुंधरा राजे की अगुवाई वाली पहली सरकार के वक्त कांग्रेस ने 5 साल में तीन नेता प्रतिपक्ष बनाए थे। सबसे पहले बीडी कल्ला को 16 जनवरी 2004 को नेता प्रतिपक्ष नियुक्त किया, कल्ला 26 जनवरी 2006 तक नेता प्रतिपक्ष के पद पर रहे। इसके बाद कल्ला कांग्रेस प्रदेशाध्यक्ष बने तो रामनारायण चौधरी को यह जिम्मेदारी दी। रामनारायण चौधरी 27 जनवरी 2006 से 22 अक्टूबर 2007 तक नेता प्रतिपक्ष रहे। इसके बाद फिर नेता प्रतिपक्ष बदला गया और इस बार हेमाराम चौधरी को यह पद दिया। हेमाराम चौधरी 23 अक्टूबर 2007 से 10 दिसंबर 2008 तक नेता प्रतिपक्ष रहे।

वर्ष 2013 से 2018 : रामेश्वर डूडी पूरे समय नेता प्रतिपक्ष रहे

रामेश्वर डूडी को 20 जनवरी 2014 को नेता प्रतिपक्ष बनाया गया था। 23 जनवरी 2014 को विधानसभा से मान्यता मिली। डूडी पूरे समय नेता प्रतिपक्ष रहे।

वर्ष 1998 से 2003: पहली गहलोत सरकार में शेखावत थे नेता प्रतिपक्ष, बाद में उपराष्ट्रपति बने

अशोक गहलोत के नेतृत्व वाली पहली कांग्रेस सरकार में भैरोंसिंह शेखावत नेता प्रतिपक्ष रहे थे। उपराष्ट्रपति बनने तक वे इस पद पर रहे। शेखावत 8 जनवरी 1999 से 18 अगस्त 2002 तक नेता प्रतिपक्ष रहे। इसके बाद वे उपराष्ट्रपति बन गए। भैरोंसिंह शेखावत सबसे लंबे समय तक नेता प्रतिपक्ष की भूमिका में रहे हैं।

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भैरोंसिंह शेखावत तीन बार में 14 साल के लिए नेता प्रतिपक्ष रहे

भैरोंसिंह शेखावत तीन बार नेता प्रतिपक्ष रहे। सबसे पहले 15 जुलाई 1980 से 9 मार्च 1985 तक नेता प्रतिपक्ष रहे। दूसरी बार 28 मार्च 1985 से 30 दिसंबर 1989 तक नेता प्रतिपक्ष रहे। तीसरी बार 8 मार्च 1999 से 18 अगस्त 2002 तक नेता प्रतिपक्ष रहे।

1993 से 1998 : शेखावत सरकार में परसराम मदेरणा रहे नेता प्रतिपक्ष

भैरोंसिंह शेखावत के नेतृत्व वाली आखिरी सरकार में पूरे समय परसराम मदेरणा नेता प्रतिपक्ष रहे। परसराम मदेरणा 31 दिसंबर 1993 से 30 नवंबर 1998 तक इस पद पर रहे। कांग्रेस में दिग्गज नेता परसराम मदेरणा पहले नेता प्रतिपक्ष बने थे।

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1977 में परसराम मदेरणा कांग्रेस के पहले नेता प्रतिपक्ष थे

परसराम मदेरणा कांग्रेस के पहले नेता प्रतिपक्ष थे। 1977 में इमरजेंसी हटने के बाद हुए चुनावों में पहली गैर कांग्रेसी सरकार बनी। उस वक्त परसराम मदेरणा कांग्रेस से पहले नेता प्रतिपक्ष थे। मदेरणा को 18 जुलाई 1977 को नेता प्रतिपक्ष बनाया, वे 13 नवंबर 1978 तक पद पर रहे।

  • 13 नवंबर 1978 को रामनारायण चौधरी को नेता प्रतिपक्ष बनाया गया, वे 15 फरवरी 1979 तक नेता प्रतिपक्ष रहे।
  • फिर 16 फरवरी 1979 को परसराम मदेरणा को नेता प्रतिपक्ष बनाया, वे 29 अगस्त 1979 तक नेता प्रतिपक्ष रहे।

जसवंत सिंह थे राजस्थान विधानसभा के पहले नेता प्रतिपक्ष

बीकानेर से विधायक जसवंत सिंह राजस्थान विधानसभा के पहले नेता प्रतिपक्ष थे। 1952 के पहले विधानसभा चुनाव हुए थे, उन चुनावों में जसवंत सिंह ने बीकानेर से कुंभाराम आर्य को हराया था। जसवंत सिंह 29 मार्च 1952 से 9 अप्रैल 1956 तक नेता प्रतिपक्ष रहे। जसवंत सिंह बीकानेर रियासत की तरफ से संविधान सभा के मेंबर रहे थे। वे तत्कालीन बीकानेर महाराजा गंगा सिंह के निजी सहायक और बीकानेर रियासत में मंत्री रहे थे।

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