टू-फिंगर टेस्ट पर सुप्रीम कोर्ट की रोक, टेस्ट के इस्तेमाल का हिमाचल में नया केस, डॉक्टरों को फटकार 5 लाख रुपये जुर्माना भी लगाया

8 min read

मूकनायक मीडिया ब्यूरो | 14 जनवरी 2024 | जयपुर – दिल्ली – शिमला : सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार (31 अक्टूबर 2022 और उससे पहले 2013 में निर्भया केस) को बलात्कार के मामलों में “टू-फिंगर टेस्ट” करने पर रोक लगा दी है। कोर्ट ने इसे अपराध की श्रेणी में रखा है। ऐसा करने वालों को दोषी माना जाएगा। हालांकि कोर्ट ने इस बाबत पहले भी आदेश जारी किया था। ‘टू-फिंगर’ टेस्ट अर्थात कौमार्य परिक्षण’ एक ऐसा सवाल है जिसने देश की शीर्ष अदालत को भी बेचैन कर दिया। साथ ही कोर्ट ने इसे लेकर सख्त टिप्पणी की है।

अदालत ने कहा कि रेप पीड़िता की जांच के लिए अपनाया जाने वाला ये तरीका अवैज्ञानिक है जो पीड़िता को एक बार फिर से प्रताड़ित करता है। यौन उत्पीड़न के मामलों में टू फिंगर टेस्ट कराने वाला कोई भी व्यक्ति कदाचार का दोषी होगा। इस टेस्टिंग का कोई वैज्ञानिक आधार नहीं है। विज्ञान का मानना है कि महिलाओं की वर्जिनिटी में हाइमन के इनटैक्‍ट होने से साबित नहीं होता है कि बलात्कार हुआ है या नहीं।

क्या है ‘टू-फिंगर’ टेस्ट?

%name टू फिंगर टेस्ट पर सुप्रीम कोर्ट की रोक, टेस्ट के इस्तेमाल का हिमाचल में नया केस, डॉक्टरों को फटकार 5 लाख रुपये जुर्माना भी लगाया

आइए जानते हैं कि क्या होता है यह टेस्ट जिसे लेकर इतना बवाल हो रहा है। ‘टू-फिंगर’ टेस्ट (Two-Finger Test) का इस्तेमाल रेप के आरोपों की जांच के लिए किया जाता रहा है। इसे वर्जिनिटी टेस्‍ट भी कहा जाता था।

टेस्ट में पीड़िता के प्राइवेट पार्ट में दो अंगुलियां डाली जाती है। इससे डॉक्टर यह जानने की कोशिश करते हैं कि क्या पीड़िता शारीरिक संबंधों की आदी रही है। टेस्ट करने का मकसद यह पता लगाना होता है कि महिला के साथ शारीरिक संबंध बने थे या नहीं।

इसमें प्राइवेट पार्ट की मांसपेशियों के लचीलेपन और हाइमन की जांच होती है। अगर प्राइवेट पार्ट में हाइमन मौजूद होता है तो किसी भी तरह के शारीरिक संबंध ना होने का पता चलता है। अगर हाइमन को नुकसान पहुंचा होता है तो उस महिला को सेक्‍सुअली एक्टिव माना जाता है।

हिमाचल में नया मामला

हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने नाबालिग रेप पीड़िता का टू फिंगर टेस्ट करने वाले डॉक्टरों को फटकार लगाई है। इसी के साथ पीड़िता का टू फिंगर टेस्ट करने वाले डॉक्टर 5 लाख रुपये जुर्माना भी लगाया है। जस्टिस तरलोक सिंह चौहान औरत्येन वैद्य ने पालमपुर के सिविल अस्पताल के उस हर डॉक्टर को ये जुर्माना लगाया जिन्होंने ये टेस्ट किया है। अपने आदेश में हाईकोर्ट ने कहा कि रिपोर्ट के लिए इस्तेमाल किए गए टेस्ट सहित पूरी प्रक्रिया कानून के मुताबिक बेहद खराब थी।

हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट के जस्टिस त्रलोक सिंह चौहान और जस्टिस सत्येन वैद्य ने कांगड़ा के पालमपुर सिविल हॉस्पिटल के डॉक्टरों के खिलाफ जांच का आदेश दिया है। आरोप है कि डॉक्टरों ने रेप पीड़ित बच्ची की जांच की थी और वैसी जांच भी की गई जिसपर रोक लगा दी गई थी। कोर्ट ने कहा कि इस मामले में असंवेदनशीलता दर्शाई गई। जिसने भी मेडिको लीगल रिपोर्ट पर हस्ताक्षर किया है उसके खिलाफ जांच की जाएगी।

यही नहीं, कोर्ट ने स्पेशल जज और जिला अटॉर्नी को भी फटकारा। कोर्ट ने टू फिंगर टेस्ट करने वालो डॉक्टर्स पर 5 लाख रुपये का जुर्माना भी लगाया है। हिमाचल के स्वास्थ सचिव को हाईकोर्ट ने इस मामले में बुलाया था। उन्होंने कोर्ट को बताया कि कुछ डॉक्टर्स ने पालमपुर अस्पताल में ये परफॉर्मा बनाया था। स्वास्थ सचिव ने कहा कि इस तरह की गतिविधि राज्य में कही और नहीं होती है।

तो क्या देश में इंसानियत मरती जा रही है? ये सवाल इसलिए उठ रहा है कि जिस चीज पर सुप्रीम कोर्ट तक ने पाबंदी लगाई हो उसे धता बताते हुए डॉक्टर जैसे एक पवित्र पेशे में काम करने वाले लोग उसकी अनुमति दे देते हैं। मामला नाबालिग रेप पीड़ित का है। जिसे वहशी दरिंदों ने बेइंतहा दर्द दिया था। लेकिन उसके बाद धरती पर भगवान कहे जाने वाले डॉक्टर्स ने उस पीड़ित को फिर से दर्द दिया।

मामला टू फिंगर टेस्ट का है। 31 अक्टूबर 2022 को सुप्रीम कोर्ट ने रेप और यौन हिंसा की जांच के लिए होने वाले इस टेस्ट को पर तत्काल रोक लगाने का आदेश दिया था। शीर्ष अदालत ने साफ कहा था कि पीड़िताओं का टू फिंगर टेस्ट करना उन्हें फिर से प्रताड़ित करना है। इसके अलावा कोर्ट ने मेडिकल की पढ़ाई से भी टू-फिंगर टेस्ट हटाने को कहा था।

टू फिंगर टेस्ट पर बिफर पड़ा था सुप्रीम कोर्टM66 300x225 टू फिंगर टेस्ट पर सुप्रीम कोर्ट की रोक, टेस्ट के इस्तेमाल का हिमाचल में नया केस, डॉक्टरों को फटकार 5 लाख रुपये जुर्माना भी लगाया

सुप्रीम कोर्ट ने अपने कई फैसलों में टू फिंगर टेस्ट पर नाराजगी जताई थी। कोर्ट ने कहा था कि किसी महिला के साथ बलात्कार हुआ है या नहीं उसको जांचने का ये तरीका बेहद गलत है। यही नहीं, कोर्ट ने कहा था कि बड़ी दुख की बात है कि सालों से हमारे देश के अंदर ये चलता आ रहा है, यह गलत है।

टू-फिंगर टेस्ट पर सुप्रीम कोर्ट की रोक, कोर्ट ने कहा था कि किसी के साथ रेप हुआ है या नहीं इसको जांचने के लिए अलग तरीकों का इस्तेमाल करिए। महिला के प्राइवेट पार्ट में अंगुली के जरिए यह तय करना कि उसके साथ बलात्कार हुआ है या नहीं, यह गलत है।

सुप्रीम कोर्ट का रहा है सख्त रुख

2013 में ही सुप्रीम कोर्ट ने एक फैसले में टू फिंगर टेस्ट को रेप पीड़ित महिलाओं के अधिकारों का उल्लंघन बताया था। शीर्ष अदालत की इस टिप्पणी के बाद 2013 में यौन अपराध कानूनों में संशोधन हुआ था। जिसमें एक तरफ रेप का दायरा बढ़ाते हुए पुरुष जननांगों के अतिरिक्त पेनिट्रेशन के अन्य तरीकों को संज्ञान में लिया गया।

वहीं दूसरी तरफ यह भी साफ किया गया कि सहमति के सवाल पर विचार करते हुए महिला के यौन व्यवहार की पृष्ठभूमि कोई मायने नहीं रखती। 2014 में केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय ने भी विस्तृत गाइडलाइन जारी करते हुए कहा था कि टू फिंगर टेस्ट नहीं होना चाहिए क्योंकि यौन हिंसा के मामलों में इसका कोई मतलब नहीं बनता। बावजूद इन सबके ये टेस्ट कराना एक पीड़िता के साथ अन्याय है।

महिलाओं की यातना पर सुप्रीम टिप्पणी

उस समय के जस्टिस डी वाई चंद्रचूड़ और जस्टिस हिमा कोहली ने फैसला सुनाते हुए कहा था कि अदालत स्वास्थ विभाग को सतर्क कर रही है। उन्होंने कहा था कि जो पीड़ित महिला होती है वह पहले ही काफी शारीरिक और मानसिक यातना झेल चुकी होती है। अगर किसी महिला के साथ बलात्कार होता है तो उसका टू फिंगर टेस्ट का तरीका सही नहीं है। कोर्ट ने कहा था कि महिलाओं को भी पुरुषों के बराबर जीने का अधिकार है। राउट टु इक्वॉलिटी, राइट टु लाइफ सभी के लिए एक समान होता है। कोर्ट ने कहा था कि अगर कोई महिला शिकायत दर्ज करती है तो उसकी जांच करिए लेकिन टू फिंगर टेस्ट को बंद करिए।

टू फिंगर टेस्ट न करने के निर्देश

न्यायमूर्ति चौहान और वैद्य ने उच्च न्यायालय में सभी स्वास्थ्य पेशेवरों को इस टेस्ट का सहारा लेने से बचने का निर्देश दिया। यदि वे ऐसा करते हैं तो अवमानना और अन्य दंडात्मक कार्रवाई की चेतावनी दी। रिपोर्ट के लिए उपयोग किए गए प्रोफार्मा पर, न्यायाधीशों ने कहा कि यह 2013 में एक संशोधन द्वारा पेश किए गए भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा 53ए का उल्लंघन करता है। यह यौन हिंसा से बचे लोगों से निपटने के लिए स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय द्वारा जारी दिशा-निर्देशों और प्रोटोकॉल को भी ओवरराइड करता है।

अनसाइंटिफिक है टेस्टM supreme 300x173 टू फिंगर टेस्ट पर सुप्रीम कोर्ट की रोक, टेस्ट के इस्तेमाल का हिमाचल में नया केस, डॉक्टरों को फटकार 5 लाख रुपये जुर्माना भी लगाया

एक्सपर्ट इस टेस्ट को अवैज्ञानिक मानते हैं। एक्सपर्ट्स का टू-फिंगर’ टेस्ट को लेकर कहना है कि संभोग के अलावा कई कारणों से हाइमन टूट सकता है। इसमें कोई खेल खेलना, साइकिल चलाना, टैम्पोन का उपयोग करना या चिकित्सा परीक्षाओं के दौरान शामिल है।

वहीं डॉक्टरों का यह भी मत है कि जब प्राइवेट पार्ट की मांसपेशियों में शिथिलता का पता लगाने की बात आती है तो मनोवैज्ञानिक अवस्था एक प्रमुख भूमिका निभाती है। क्योंकि एक व्यथित व्यक्ति के मामले में प्राइवेट पार्ट की मांसपेशियां तनावपूर्ण हो सकती हैं – जैसा कि एक बलात्कार पीड़िता के मामले में होता है।

टू फिंगर टेस्ट कब हुई थी इस टेस्ट की शुरुआत ?

इस परीक्षण की शुरुआत 1898 में एल थोइनॉट ने की थी। इस टेस्ट के अंतर्गत कहा गया कि सहमति के साथ बनाये गये यौन संबंधों में हाइमन लचीलेपन की वजह से टूटता नहीं है, जबकि जबरन बलात्कार करने से यह टूट जाता है।

लड़कियां जब पहली बार सेक्स करती हैं तो हाइमन टूटने की वजह से उनकी योनि से खून बहने लगता है। ये कोई जरूरी भी नहीं है। कुछ महिलाओं का सेक्स से पहले ही हाइमन टूट चुका होता है। कई बार वर्जिश करते हुए या खेलकूद करते हुए भी हाइमन अक्सर पहले ही टूट जाता है।

टू-फिंगर टेस्ट के संबंध में कानून क्या कहता है?

टू-फिंगर टेस्ट एक ऐसी तकनीक है जिसे स्वास्थ्य सेवा क्षेत्र में पूरी तरह से अनावश्यक मानकर नजरअंदाज कर दिया गया है क्योंकि यह गोपनीयता और गरिमा के अधिकारों के साथ-साथ कानून का भी उल्लंघन करता है। सुप्रीम कोर्ट ने आक्रामक टू-फिंगर टेस्ट को समाप्त करने की मांग करते हुए केंद्र और राज्यों को मेडिकल स्कूलों में पाठ्यक्रम की समीक्षा करने का निर्देश दिया ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि यह अभ्यास बलात्कार पीड़ितों और यौन उत्पीड़न पीड़ितों की जांच करते समय आवश्यक प्रक्रियाओं में से एक नहीं है।

निजता का अधिकार अनुच्छेद 21 के तहत जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार का एक अभिन्न अंग है, जो संविधान के भाग III द्वारा गारंटीकृत अधिकारों और स्वतंत्रता के हिस्से के रूप में संरक्षित है। बुनियादी मानवाधिकारों में से एक के रूप में, निजता के अधिकार को पूर्ण नहीं माना जाता है और इसे नैतिकता, स्वास्थ्य और अव्यवस्था की सुरक्षा के लिए कानूनी रूप से प्रतिबंधित किया जा सकता है।

टू-फिंगर टेस्ट की प्रथा को कानून और चिकित्सा क्षेत्र में एक बहुत ही अनावश्यक चिकित्सा पद्धति माना गया है, जिससे मानव गोपनीयता, गरिमा और कानून का उल्लंघन होता है। सुप्रीम कोर्ट ने “एक्स वी. हॉस्पिटल जेड, एआईआर 1999” में मानव अधिकार के यूरोपीय सम्मेलन के अनुच्छेद 8 का उल्लेख किया जो निजता के अधिकार को परिभाषित करता है:

  • हर किसी को अपने निजी और पारिवारिक जीवन, अपने घर और अपने पत्राचार का सम्मान करने का अधिकार है।

विश्व स्वास्थ्य संगठन ने यह भी सुझाव दिया है कि बलात्कार के बाद महिलाओं की जांच न्यूनतम आक्रामक होनी चाहिए और यह भी सलाह दी है कि यौन उत्पीड़न से पीड़ित महिला की किसी भी प्रकार की चिकित्सा जांच करना शायद ही आवश्यक हो।

Facebook
Twitter
LinkedIn
WhatsApp

डॉ अंबेडकर की बुलंद आवाज के दस्तावेज : मूकनायक मीडिया पर आपका स्वागत है। दलित, आदिवासी, पिछड़े और महिला के हक़-हकुक तथा सामाजिक न्याय और बहुजन अधिकारों से जुड़ी हर ख़बर पाने के लिए मूकनायक मीडिया के इन सभी links फेसबुक/ Twitter / यूट्यूब चैनलको click करके सब्सक्राइब कीजिए… बाबासाहब डॉ भीमराव अंबेडकर जी के “Payback to Society” के मंत्र के तहत मूकनायक मीडिया को साहसी पत्रकारिता जारी रखने के लिए PhonePay या Paytm 9999750166 पर यथाशक्ति आर्थिक सहयोग दीजिए…
उम्मीद है आप बिरसा अंबेडकर फुले फातिमा मिशन से अवश्य जुड़ेंगे !

बिरसा अंबेडकर फुले फातिमा मिशन के लिए सहयोग के लिए धन्यवाद्

Recent Post

Live Cricket Update

Rashifal

You May Like This