UGC का आरक्षण विरोधी फरमान, आरक्षित पदों को ओपन केटेगरी के लिए भरने का मसौदा तैयार, आरक्षित वर्गों को संरक्षण देने के बजाय बाहर करने का षडयंत्र

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मूकनायक मीडिया ब्यूरो | 28 जनवरी 2024 | जयपुर – दिल्ली : विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) ने उच्च शिक्षा संस्थानों (एचईआई) में एससी, एसटी और ओबीसी उम्मीदवारों के लिए रिक्तियों को डी-आरक्षित करने और पर्याप्त आरक्षित उम्मीदवार उपलब्ध नहीं होने पर उन्हें सामान्य वर्ग के लिए भरने के लिए मसौदा दिशानिर्देश जारी किये हैं।

सीधी भर्ती में आरक्षित रिक्तियों को अनारक्षित करने पर सामान्य प्रतिबंध

केंद्रीय विश्वविद्यालयों, आइआइटीज, एमएनआईटीज जैसे उच्च शिक्षण संस्थानों (एचईआईज) में आरक्षण नीति के कार्यान्वयन के लिए दिशानिर्देश यूजीसी द्वारा 27 दिसंबर को जारी किये गये थे और आम राय प्रदान करने की अंतिम तिथि आज 28 जनवरी को समाप्त हो रही है।

%name UGC का आरक्षण विरोधी फरमान, आरक्षित पदों को ओपन केटेगरी के लिए भरने का मसौदा तैयार, आरक्षित वर्गों को संरक्षण देने के बजाय बाहर करने का षडयंत्रमसौदे में कहा गया है कि सीधी भर्ती में आरक्षित रिक्तियों को अनारक्षित करने पर सामान्य प्रतिबंध है, लेकिन दुर्लभ और असाधारण मामलों में जब समूह ए के पद पर किसी रिक्ति को सार्वजनिक हित में खाली रहने की अनुमति नहीं दी जा सकती है, तो संबंधित विश्वविद्यालय एक प्रस्ताव तैयार कर सकता है।

आरक्षण रद्द करने के लिए या ऐसा करने के लिए, उसे पदनाम, वेतनमान, सेवा का नाम, जिम्मेदारियां, आवश्यक योग्यताएं, पद भरने के लिए किये गये प्रयास और इसे खाली रहने की अनुमति क्यों नहीं दी जा सकती जैसी जानकारी प्रदान करनी होगी।

जबकि ग्रुप सी और डी पदों के लिए डी-रिजर्वेशन (अनारक्षण) के प्रस्ताव को विश्वविद्यालय की कार्यकारी परिषद द्वारा अनुमोदित किया जा सकता है, ग्रुप ए और बी पदों के लिए डी-आरक्षण का प्रस्ताव शिक्षा मंत्रालय को प्रस्तुत किया जाना चाहिए, जिसमें इसके लिए पूरी जानकारी दी जाएगी। अनुमोदन। मसौदे में कहा गया है कि मंजूरी के बाद पद भरा जा सकता है और कोटा आगे बढ़ाया जा सकता है।

ड्राफ्ट में आरक्षित रिक्त पदों में कमी और बैकलॉग की भी बात कही गई है और कहा गया है कि विश्वविद्यालयों को जल्द से जल्द दूसरी बार भर्ती बुलाकर रिक्तियों को भरने का प्रयास करना चाहिए। यदि आरक्षित रिक्तियों के विरुद्ध पदोन्नति के लिए पर्याप्त संख्या में एससी/एसटी उम्मीदवार उपलब्ध नहीं हैं तो यह पदोन्नति में आरक्षण को रद्द करने की भी अनुमति देता है। ऐसे मामलों में आरक्षित रिक्तियों के आरक्षण को रद्द करने की मंजूरी देने की शक्ति यूजीसी/शिक्षा मंत्रालय को सौंपी गई है।

यदि मंजूरी मिल जाती है, तो दिशानिर्देश सभी केंद्रीय विश्वविद्यालयों, डीम्ड-टू-यूनिवर्सिटी और केंद्र सरकार के तहत अन्य स्वायत्त निकायों/संस्थानों या यूजीसी, केंद्र सरकार या समेकित निधि से अनुदान सहायता प्राप्त करने वालों तक बढ़ा दिए जाएंगे।

यूजीसी का आरक्षित वर्गों को संरक्षण देने के बजाय बाहर करने का षडयंत्र

राजस्थान केंद्रीय विश्वविद्यालय शिक्षक संघ के पूर्व अध्यक्ष प्रोफ़ेसर राम लखन मीणा ने आश्चर्य व्यक्त करते हुए कहा कि यह पहली बार है कि विश्वविद्यालयों में रिक्तियों के लिए आरक्षण हटाने के लिए इस तरह के प्रावधान का सुझाव दिया गया है।

प्रोफ़ेसर मीणा ने मूकनायक मीडिया से बातचीत में कहा कि उन्होंने मार्च 2012 में तत्कालीन मानव ससाधन विकास मंत्री से मिलकर बड़ी मुश्किल से हमने इस व्यवस्था को लागू करवाया था क्योंकि केंद्रीय उच्च शिक्षण संस्थानों में आरक्षित-वर्गों को बेवजह अनुपयुक्त उम्मीदवार (NFS) घोषित किया जा रहा था।

प्रोफ़ेसर मीणा का कहना है कि पहले की अपेक्षा अब आरक्षित वर्गों के लोगों नेट/जेआरएफ पास करके केंद्रीय उच्च शिक्षण संस्थानों में शैक्षणिक पदों पर अपने दावे बड़ी सटीकता से कर रहे हैं जबकि यूजीसी आरक्षित वर्गों को संरक्षण देने के बजाय बाहर करने का षडयंत्र रच रही है।

प्रोफ़ेसर मीणा का जोर देकर कहना है कि पहले यूजीसी ने उदासीनता बरतते हुए केंद्रीय उच्च शिक्षण संस्थानों में आरक्षित-पदों को षडयंत्रपूर्वक खाली रखा और अब उन पदों को अनारक्षित कर ओपन केटेगरी से भरने के लिए साजिश रच रही है जो ठीक वैसे ही जैसे खेत की रखवाली करने वाले ही खेत को खाने लगे।

मूर्धन्य शिक्षाविद् और सामाजिक चिंतक प्रोफ़ेसर दिलीप मंडल ने अपने ट्विटर (X) हैंडल पर इस सम्बन्ध में लिखा है कि द्रोणाचार्य बरसों से एससी, एसटी और ओबीसी के योग्य कैंडिडेट को “नॉट फाउंड सुटेबल” बताकर अपने किसी अर्जुन को नौकरी पर रख लेते थे। लेकिन ये था ग़ैर-क़ानूनी। अब यूजीसी ने इसे क़ानूनी करने का षड्यंत्र रचा है।

अगर इसे न रोका गया तो उच्च शिक्षा संस्थानों में एससी, एसटी, ओबीसी का आरक्षण ख़त्म। ये बदमाश सुधरने वाले नहीं है। पब्लिक राम मंदिर में लगी है और ये चुपके से आरक्षण ख़त्म करने का प्रस्ताव लेकर आ गए। चोर हैं बिलकुल @ugc_india  को बर्खास्त किया जाए।

उनका यह भी कहना है कि जातिवादियों का पेट कितना बड़ा है! केंद्र सरकार ने संसद को जानकारी दी है कि केंद्रीय विश्वविद्यालयों में 85% टीचर सवर्ण हैं। थोड़े से टीचर एससी, एसटी और ओबीसी के हैं। अब उतना भी न आ पाएँ, इसके लिए नियम बनाया जा रहा है। कुछ जातिवादी दीमक आरक्षण और संविधान को खाने की कोशिश कर रहें है। राष्ट्र हित में इनको रोकना होगा। ये चाहते हैं कि एससी, एसटी और ओबीसी के लोग टीचर न बनें। साज़िश करके उनके पद ख़ाली रखें जाएँ और फिर अनरिजर्व से उनको भर दिया जाए।

‘मानदंड अस्पष्ट, पर्याप्त सुरक्षा उपाय नहीं’

प्रोफ़ेसर मीणा का यह भी कहना है कि “आरक्षण रद्द करने का मानदंड अस्पष्ट है। विश्वविद्यालय यह कह सकते हैं कि आरक्षित श्रेणी में कोई भी उम्मीदवार उपयुक्त नहीं है और किसी पद को अनारक्षित कर सकते हैं। डी-आरक्षण के लिए एससी/एसटी/पिछड़ा वर्ग पैनल से अनिवार्य राय की आवश्यकता नहीं है।”

राष्ट्रीय शिक्षा नीति (एनईपी) पर उन्होंने कहा कि इसने एक रोड मैप प्रदान किया है कि कैसे उत्कृष्टता पर ध्यान केंद्रित किया जाए, कैसे सुनिश्चित किया जाए कि हम अपने छात्रों को जो शिक्षा प्रदान करते हैं वह समग्र, कौशल-आधारित और अभिनव हो।

बाद में, मीडियाकर्मियों से बातचीत करते हुए यूजीसी अध्यक्ष ने कहा, “तमिलनाडु में कौशल शिक्षा प्रदान करने पर ध्यान केंद्रित किया गया है और यही कारण है कि कई विनिर्माण क्षेत्रों में यह एक अग्रणी राज्य है। हम शेष भारत में इसका अनुकरण करना चाहेंगे।”

एनईपी पर आपत्तियों पर एक सवाल पर उन्होंने कहा, “चूंकि हमारा सिस्टम कुछ प्रक्रियाओं का आदी है और जब हम उसे बदलना चाहते हैं, तो प्रतिरोध स्वाभाविक है। लेकिन देश भर में कई वी-सी सम्मेलनों के माध्यम से हम देखते हैं कि एनईपी 2020 को लागू करने के लिए बहुत उत्साह है।

यूपीए सरकार ने 2006 में आरक्षण नीति का कार्यान्वयन के लिए ठोस कदम उठाये

केंद्र ने 2006 में भारत सरकार की आरक्षण नीति के कार्यान्वयन से संबंधित दिशानिर्देश तैयार किए। दिशानिर्देश यूजीसी वेबसाइट पर उपलब्ध हैं। यूजीसी ने देश के विश्वविद्यालयों/मानित विश्वविद्यालयों, कॉलेजों और अन्य अनुदान प्राप्त संस्थानों और केंद्रों में सरकार की आरक्षण नीति के कार्यान्वयन के लिए दिशानिर्देश तैयार करने के लिए एक विशेषज्ञ समिति का गठन किया है। यूजीसी द्वारा विशेषज्ञ समिति के गठन का मुख्य उद्देश्य 2006 के आरक्षण दिशानिर्देशों को तैयार करना और उनकी समीक्षा करना है, जो लागू हैं।M954 300x170 UGC का आरक्षण विरोधी फरमान, आरक्षित पदों को ओपन केटेगरी के लिए भरने का मसौदा तैयार, आरक्षित वर्गों को संरक्षण देने के बजाय बाहर करने का षडयंत्र

प्रोफ़ेसर मीणा ने मूकनायक मीडिया से यह भी कहा कि केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान द्वारा राज्यसभा में 1 जुलाई 2023 तक के आँकड़ों को पेश करते हुए कहा था कि 45 केंद्रीय विश्वविद्यालयों में अनुसूचित जाति (एससी), अनुसूचित जनजाति (एसटी) और अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) के उम्मीदवारों के लिए आरक्षित 42% से अधिक शिक्षण पद खाली पड़े हैं। मंत्री द्वारा साझा किए गए आंकड़ों के अनुसार, केंद्रीय विश्वविद्यालयों में ओबीसी, एससी और एसटी उम्मीदवारों के लिए 7,033 पद स्वीकृत हैं और इनमें से 3,007 पद खाली हैं।

यूजीसी की आरक्षित-पदों को ख़त्म करने की साजिश बेनकाब

आंकड़ों से पता चलता है कि जहां ओबीसी के लिए 46% पद (1665) खाली हैं, वहीं एससी और एसटी के लिए रिक्त पद क्रमशः 37% और 44% हैं। प्रधान ने आगे कहा कि 2023 में आरक्षित श्रेणी के तहत 517 उम्मीदवारों की नियुक्ति की गई थी. इनमें से 285 ओबीसी उम्मीदवार, 150 एससी उम्मीदवार और 82 एसटी उम्मीदवार थे।

शिक्षा मंत्री ने केंद्रीय विश्वविद्यालयों में कुल रिक्तियों पर पूछे गए एक अन्य प्रश्न का उत्तर देते हुए, प्रधान ने कहा कि 1 जुलाई तक, 45 केंद्रीय विश्वविद्यालयों में 54,512 स्वीकृत पदों में से 22,412 पर काम चल रहा है। शिक्षा मंत्रालय के दायरे में नियमित मोड, रिक्त पड़े हैं।

इस बात पर जोर देते हुए कि रिक्तियों का होना और उन्हें दाखिल करना एक सतत प्रक्रिया है, प्रधान ने कहा, “छात्रों की बढ़ती संख्या के कारण सेवानिवृत्ति, इस्तीफे और अतिरिक्त आवश्यकताओं के कारण रिक्तियां उत्पन्न होती हैं। केंद्रीय विश्वविद्यालयों को रिक्तियां उत्पन्न होने पर भरने का निर्देश दिया गया है।” मंत्री ने आगे कहा कि विशेष भर्ती अभियान के माध्यम से, डीओपीटी मिशन भर्ती पोर्टल के अनुसार केंद्रीय विश्वविद्यालयों द्वारा अब तक 6,087 पद भरे गए हैं। जबकि यूजीसी साजिशन आरक्षित-पदों को ख़त्म कर रही है।

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