‘गाँधीजी : मेरा जीवन, मेरा संदेश’ प्रोफ़ेसर राम लखन मीना, सिंडिकेट,सदस्य,राजस्थान विश्वविद्यालय,जयपुर

28 min read

मूकनायक मीडिया ब्यूरो || सितंबर 30, 2020 || जयपुर- दिल्ली : महान वैज्ञानिक अल्बर्ट आइंस्टीन ने महात्मा गाँधी के लिए कहा था कि ‘आने वाली पीढ़ियों को मुश्किल से विश्वास होगा कि कभी हाड़-मांस का ऐसा व्यक्ति इस धरती पर हुआ करता था।’ इंडिया के इतिहास के पन्नों को उलटने पर आपको एक चित्र के दर्शन अवश्य मिलेंगे। बुढ़ापे को प्रकट करते हुए उनका वह दुबला-पतला शरीर, माथे पर सुंदर घने केशों का अभाव है, परंतु मूँछे घनी हैं। उनका चश्मा वैश्विक पहचान वाला है। मात्र एक धोती से उनका तन ढका हुआ है। उनकी कमर में एक गोलाकार घड़ी भी लटकी हुई है किंतु उनका मुस्कराता हुआ चेहरा जिसे देखकर ही लगता है कि यह किसी तपस्वी की ही तस्वीर है। उनके हाथ में एक लाठी भी है, जो न ही अधिक लंबी और न ही अधिक मोटी है, जिसे एक हाथ से ही सुविधापूर्वक अच्छी तरह पकड़ा जा सके। परंतु आप उस लाठी की तुलना किसी चरवाहे की लाठी या लठैत की लाठी के साथ कभी मत कीजियेगा और न ही यह किसी अंधे की ही लाठी है, बल्कि यह लाठी है एक महात्मा की, जिन्होंने हमें बिना खडग-तलवार के आजादी दिलायी है। जहाँ-जहाँ भी वह लाठी गयी वहाँ-वहाँ अपनी भारतीय पहचान भी ले गयी। अपने उद्देश्य की पूर्ति के पालन के लिए ही अपने मार्ग मे उस लाठी ने कभी गोलियों-बमों की भी आवाज सुनी तो कभी बच्चों एवं बूढों की उल्लास-जयकार एवं चीखें भी ! जवानों एवं वीरांगनाओं के लिए तो वह लाठी सदैव ही पथ-प्रदर्शक ही रही। उस लाठी ने लगातार कई घंटों तक मीलों की भी लंबी यात्राएँ की थी, तभी उस महात्मा ने हमें नमक कर से मुक्त किया। हमारी पीढ़ी के जनमने के ढाई दशक पहले ही गाँधीजी ने अंतिम बार ‘हे राम’ कहा था और हमारे होश सँभालने के आस-पास से गाँधीजी गुम होते जा रहे हैं। सिर्फ़ पीतल के पुतलों के रूप में ही वे खड़े दिखायी देते हैं। उनके नाम का उपयोग करने वाले अधिकांश ढोंगी, स्वार्थी, अवसरवादी ही दिखायी देते हैं, और ऐसा लगा था कि जिनका ये नाम लेते हैं, वे भी उन जैसे ही होंगे। लेकिन मैं अपने दादाजी का ऋणी हूँ कि घर में उनकी कही बातों में गाँधीजी की जो छवि थी, वह गाँधीजी का उपयोग सत्ता पाने के लिए करने वालों से भिन्न थी। दादाजी द्वारा मुझे सुनायी बाल-कहानियों ‘लाठी वाले बाबा’ से गाँधी मेरी स्मृतियों और दिलो-दिमाग में बस गये हैं। स्मृतियों में बसी गाँधीजी के जीवन की घटनाएँ और बातें सुनते हुए गाँधी प्रत्यक्ष होते गये, मात्र पुस्तकीय नहीं रहे। ऐसा प्रतीत होता कि वे हमारे घर में, हमारे साथ ही रहते हैं। मुझे आज भी याद है कि दादाजी सवाई माधोपुर में गाँधीजी के आगमन पर रातभर पैदल चलकर उनसे मिलने गये थे। उनके अनुसार गाँधीजी की हत्या के बाद उन्होंने कई दिन तक कुछ भी खाया-पीया नहीं था और आस-पास के गाँवों में आरएसएस की शाखाएँ नहीं लगाने देने का प्रण लिया और उसे जीवन-पर्यंत निभाया भी। बाल-स्मृतियों में गाँधीजी मिले और इस प्रकार मिले कि उन्होंने हमारे मन पर यही छाप छोड़ी, जो समय के साथ उभरती गयी। कभी-कभी मुझे प्रतीत होता है कि गाँधी की हत्या के पश्चात् जन्म लेने वाले बच्चे-सही कहें तो मध्यवर्गीय ब्राह्मण घरों में जन्म लेने वाली मेरी पीढ़ी, जाने-अनजाने गाँधी-द्वेष की जन्मघूँटी पीकर ही जनमी और बढ़ी हुई। मुझे अभी देश का अर्थ मालूम न था-पर यह मेरे देश का बँटवारा करनेवाला गाँधी। सामाजिक सरोकारों का परिचय नहीं था, फिर भी अल्पसंख्यकों का अनावश्यक लाड़ करनेवाला यही है। गोडसे से लेकर लोहिया तक सभी ने इन्हीं विविध इप्रेशन्स को प्रमुख रूप से उभारा और हद तो यहाँ तक हुई कि कहा जाने लगा, अहिंसा यानी एक गाल पर थप्पड़ पड़े तो दूसरा गाल सामने कर दीजिए। ‘यह कैसी अहिंसा? यह तो कायरता है। और कायर होने या अन्याय सहन करने की अपेक्षा हिंसा का उपयोग बेहतर है’ यह कहकर लाखों में निर्भयता जागृत करनेवाला, पौरुष को पुकारनेवाला महात्मा बहुत बाद में समझ में आया। समग्र आशय कहीं मन के पिछले हिस्से (छोटे दिमाग) में छिप गया होगा या बीज की तरह अंदर दब गया होगा। पीढ़ियों के अंतर के संघर्ष की चिंगारी जानने के साथ गाँधीजी को जानना भी संभव हुआ। फिर हाथ लगी ‘हिंद-स्वराज’ छोटी-सी पुस्तक, पर उतनी समझ कहाँ थी कि कच्ची-उम्र में उसे समझ पायें, उसे समझना तो आज भी एक पहेली जैसा है। तब तक समझ में नहीं आता था कि बाह्यत: अत्यन्त अनाकर्षक, रूखे-सूखे लगने वाले इस सनातनी ‘लाठी वाले बाबा’ ने चार्ली चैप्लिन, आर्चबिशप ऑफ कैंटरबरी और अल्बर्ट आइन्स्टाइन जैसे विभिन्न क्षेत्रों के प्रतिभावानों को भला कैसे आकर्षित किया होगा। अरे! जीवित रहते हुए तो इन प्रतिभावानों को आकर्षित किया ही, परंतु सदेह अस्तित्व समाप्त होने के बाद भी मार्टिन लूथर किंग, ड्यूबचेक, लेक वॉलेसा, अक्विनो आदि तक यह गाँधी पहुँचे कैसे? कौन-सी शक्ति है यह? ‘हाड़-मांस का बना एक ऐसा मनुष्य इस पृथ्वी पर जनमा था, इस पर आने वाली पीढ़ियाँ विश्वास नहीं कर पायेंगी…’ आइन्स्टाइन ने यह वाक्य कहा होगा, विश्वास नहीं होता था। किसी एक को नीचा दिखाकर ख़ुद सम्मानित होनेवाले भाव को देख गाँधीजी ताज्जुब करते थे। प्रतिक्रिया से जन्म लेने वाला व्यक्ति, समाज और देश भी द्वेषमूलक और प्रतिक्रियावादी होगा। गाँधीजी ने इससे बचते हुए देश के स्वतंत्रता-संग्राम को आगे बढ़ाने का प्रयत्न किया। भारतीय राष्ट्र के विचार को एक आकार मिला। ब्रिटिश से लड़ना है, परंतु द्वेष नहीं करना है। निर्वैर भाव से अपना ‘स्वत्व’ स्थापित करने का यह राष्ट्रवाद भारतीय मिट्टी से उपजा। ऐसे में कहीं गाँधीजी एक कोटेशन पढ़ा ‘मैं आपको एक नुस्खा बताता हूँ कि ‘जब कभी कोई योजना बनाते हुए या उसको कार्यान्वित करते हुए आपके मन में प्रश्न उठे कि ‘क्या करें ?’, तब अपनी आँखों के समक्ष समाज की अंतिम सीढ़ी पर खड़े सबसे आख़िरी आदमी को लाइए। जिससे उसका हित हो, वही करना चाहिए, वही योजना अमल में लानी चाहिए।’ शब्द कितने सरल और सीधे हैं पर साधना उतनी ही कठिन और दु:रह। इस मंत्र को समझने के लिए एक नहीं अनेक बार ‘सत्य के मेरे प्रयोग’ पढ़ी, उसे समझा और समझते-समझते गाँधीजी पर लिखे अनेक भाषाओं की किताबों, अनूदित सामग्रियों को पढ़ते जस्टिस जीवन लाल कपूर आयोग की रिपोर्ट तक पहुँचा। गाँधीजी की एक अन्य गूढ़ता-भरी सच्चाई पायी उनकी ‘अन्दर की आवाज़’। किंतु, शीशे के समक्ष खड़े होकर कोई भी अपने को ध्यान से निरखे, तो अनुभव होगा कि यह ‘अंदर की आवाज़’ हम सबके पास है, जो हमसे बात करने की कोशिश भी करती है। परंतु हम ही उसका कहा सुनने की तैयारी में नहीं होते, क्योंकि हम बाहर की आवाज़ों में व्यस्त होते हैं। जितने प्रमाण में गाँधीजी का व्यक्तित्व स्पष्ट होता गया, उतने प्रमाण में मैं और मेरे देश को जोड़ने वाला तत्त्व समझ में आने लगा। जितना इस तत्त्व का आकलन करने लगा, गाँधीजी उतने ही अधिक समझ में आने लगे। गाँधी जी को असली सौंदर्य प्रकृति की वास्तविकता और जीवन की ईमानदारी में दिखता था। उनके हिसाब से सौंदर्य का सार-तत्त्व सत्य में ही निहित है। वे कहते हैं-“मुझे तो सत्य के प्रतिबिम्ब वाली सभी वस्तुएँ सुंदर लगती हैं। गाँधीजी के लिए चरखा कातना और खादी पहनना भारत की आम गरीब जनता के साथ एकाकार होने का जरिया था। गाँधीजी ने खादी अपनायी थी क्योंकि वो भारत के आम गरीब लोगों की तरह दिखना चाहते थे। आज जो लोग खादी पहनकर उसके ब्रांड अम्बेसडर बनना चाहते हैं, वो आम लोगों के बीच ख़ास दिखना चाहते हैं। गाँधीजी ने अपने करियर को स्वेच्छा से त्यागकर गरीबी को अपना लिया था। वो पैदाइशी गरीब नहीं थे, उन्होंने गरीब हो जाने के रास्ते को सोच-समझकर चुना था। आज जो स्वांगी-लोग कैलेंडर पर चरखा कात रहे हैं वो कहते हैं कि वो पैदाइशी गरीब थे। उन्होंने उनके खुद के कहे मुताबिक़ रेलवे स्टेशन पर चाय तक बेची है। लेकिन अपने हाथ में ताकत आते ही उन्होंने अमीर रजवाड़ों जैसी जिंदगी चुन ली है। वो भोग-विलास और सुख-सुविधा की जिंदगी जीने वाले व्यक्ति हैं। महंगे कपडे उनके व्यक्तित्व का अभिन्न हिस्सा हैं। कई बार तो उनके सूट की कीमत कई-कई लाख होती है। उनके द्वारा इस्तेमाल किये गये पेन और घड़ियाँ भी दुनिया के सबसे महंगे ब्रांड हैं। इसलिए गाँधीजी जब चरखा कातते थे तो उसके पीछे त्याग की एक पूरी गाथा छिपी थी। जो व्यक्ति लंदन से बैरिस्टरी पढ़कर शानो-शौकत की जिंदगी बसर कर सकता था, उसने अपने लिए ताउम्र संघर्ष की राह चुनी थी। सादा-कठोर जीवन और थकाने वाली दिनचर्या- गाँधीजी के चरखे के पीछे यह नैतिक ताकत काम करती थी। गाँधीजी विलायत से लौटकर भारत आये तो वापस नहीं गये। दूसरे गोलमेज सम्मलेन के लिए ही वो लंदन गये और वहाँ भी उन्होंने अपनी वेशभूषा नहीं बदली। अपनी धोती को आधा पहने और आधा ओढ़े वो फ़कीर यूरोप की ठंडी आबोहवा में भी ब्रिटिश राज की आँख की किरकिरी बना रहा। लेकिन आज जो लोग कैलेंडर पर गाँधीजी की जगह लेने की हसरत पाल बैठे हैं, वो पूरी दुनिया का चक्कर लगाने के लिए भारत के प्रधानमंत्री बने हैं। उनका दिल अपने देश, अपने देश के लोगों और उसकी मिट्टी में लगने से ज्यादा विदेश में रमता है। गाँधीजी ने खुद को हर तरह के झूठ-फरेब और धोखाधड़ी से बचाकर आत्मबल इकठ्ठा किया था। नकलची अपने हवाई जुमलों, झूठे वायदों और कॉर्पोरेट के पक्ष में आम गरीब लोगों को ठगने के लिए जाने जाते हैं। वास्तव में, गाँधी की लाठी, चरखा, खादी आदि तो ऐतिहासिक घटनाओं की याद ताजा करवा देने वाले महान प्रतीक हैं जो जनमानस के दिलो-दिमाग में वह तस्वीर बनाते हैं जो सूरज, चाँद की तरह सदैव अमरत्व पा गये। उस लाठी को पुनः अपनी हृदय-व्यथा को प्रकट करने के लिए ‘रक्त रंजित’ नोआखाली की खूनी गलियों में भी भटकना पड़ा। फिर, 30 जनवरी 1948 को जब वह महात्मा के हाथ से छुटकर गिर पड़ी होगी, तब वह बेहद आहत हुई होगी। गाँधी-टोपी के मर्यादा का भी वह लाठी स्मरण कराती है जिसने स्वाधीनता-आंदोलन के समय अपने शीश को अहिंसा के पालन हेतु समर्पित किया था। ब्रिटिश सिपाहियों की लाठियों के आघात से लथपथ हुए सत्याग्रहियों का शरीर जब भूमि पर गिरता था, तब भारत-माता, गाँधी-टोपी को अपने संतान की राजमुकुट समझकर गोद में धारण करती थी। ‘स्वाधीनता आन्दोलन’ के समय जिन शहीदों ने ‘करेंगे या मरेंगे’ का नारा लगाते हुए अपनी आहुति दी थी, उनकी पहचान अभी भी उस ऐतिहासिक लाठी के हृदय में है। दुर्भाग्यवश, आजादी के वर्षों बाद अधिकांश लोग उनके आदर्श को भूलते जा रहे हैं। अतः गाँधी की लाठी-टोपी की मर्यादा का पालन भी वे ही कर पायेंगे, जिनमें मातृभूमि को‘शीश चढ़ाने’ या ‘नमन करूँ’ की भावना है । गाँधी का भारत के स्वतंत्रता संग्राम में अप्रितम योगदान था। महात्मा गाँधी का व्यक्तित्व बहुआयामी था। वे अत्यंत धार्मिक भी थे और साथ में एक सिद्धहस्त राजनेता भी। वे एक क्रांतिकारी भी थे और समाज सुधारक भी। वे विरोधाभासी और कठिन परिस्थितियों में से भी एक ऐसा रास्ता निकालने में सक्षम थे जो दुनिया को करूणा और प्रेम की राह पर ले जाता है। गाँधी केवल इस युग के महान व्यक्ति नहीं थे अपितु उनका स्थान इतिहास के उन समादरणीय महापुरुषों में है जिन्होंने अपनी कर्तव्यनिष्ठा एवं आदर्शवादिता से संपूर्ण मानवता को प्रेरित किया। डॉ धीरेंद्र मोहन दत्त ने ठीक ही लिखा है कि ‘आस्था एवं संकल्प के कारण गाँधी जी एक साधारण व्यक्ति से कोटि-कोटि लोगों के मसीहा बन गये।’ गाँधी जी प्रैक्टीकल थे यूटोपिया नहीं थे वे भारत के जन मानस की असली हैसियत समझते थे और शासक वर्ग की शातिर सोच से पूर्णतया वाकिफ थे। लोग ही जब लड़ने से पीछे हट जाते थे तब आंदोलन वापिस लेना ही पड़ता है। जब माहौल बनाने में वे कामयाब होते उस समय आंदोलन की अपील कर देते थे और जनता का जोश घटने लगता था, वे समझौता कर लेते या आंदोलन वापिस ले लेते थे। जो बाद में सच साबित हुआ। गाँधी जी का चर्खा मानचेस्टर पर बम बन कर फूटता था मानचेस्टर की मीलों का तैयार माल जब नहीं बिकता था, तो इंग्लैंड की बैचेनी सातवें आसमान तक बढ़ जाती थी। गाँधी जी शरीर के दुबले-पतले लेकिन आत्मा के महान, शरीर पर कपड़े के नाम पर एक धोती लेकिन दिल के धनी, अपनी बात पर अड़ने वाले परंतु अहिंसा के पुजारी, उनके इन्हीं गुणों के कारण भारत के साथ-साथ पूरा संसार उनके समक्ष नतमस्तक हो गया। और अल्बर्ट आइंस्टीन की युक्ति प्रसिद्धि पा गयी। गाँधीजी में कोई विशेष प्रतिभा नहीं थी न ही उन्हें खेलों में रुचि थी। वे हमेशा अकेला रहना पसंद करते थे। उन्होंने अपने पाठ्यक्रमों के अतिरिक्त कभी कोई पुस्तक नहीं पढ़ीं, लेकिन उन्होंने हमेशा अपने शिक्षकों का सम्मान किया। बात बिल्कुल साफ-साफ और सीधी-सी है, गाँधीजी ने जो भी किया, दिल से किया, ईमानदारी से किया। उनके किसी भी काम में दोगलापन नहीं है। उन्होंने स्कूल और कालेजों का बहिष्कार किया तो अपने बेटों का भी सरकारी स्कूल छुड़वा दिया। कस्तूरबा गाँधी जी का इन सब बातों के कारण गाँधी जी का विरोध करती थी। यही सब सामाजिक काम करने वालों के भी अनुभव में शामिल रहता है। हमें, कम से कम मुझे तो अपने गाँधी पर नाज है। गाँधी-मार्ग का सामान्य अर्थ है- गाँधी का मार्ग, वह रास्ता जिस पर गाँधी केवल स्वयं एकाकी नहीं चले, करोड़ों भारतीयों को राष्ट्रीय स्वाधीनता आंदोलन में अपने साथ चलाया, चलने का एक पथ बनाया। क्या यह पथ हमारे लिए गौण हो चुका है? गाँधी जी मानते थे कि सत्य और अहिंसा के रास्ते पर चलकर सब कुछ हासिल किया जा सकता है। सत्य और अहिंसा के माध्यम से उन्होंने जो कुछ किया वह सब आधुनिक युग में चमत्कार जैसा लगता है। उनके सुंदर किंतु अपूर्ण कार्यों को पूर्ण करने की जिम्मेवारी विश्व के सभी स्त्री-पुरुष पर और विशेष कर पौरूष और अभिक्रम से पूर्ण विश्व की युवा पीढ़ी पर है, जो विश्व का नैतिक नेतृत्व कर सके। बापू ने विश्व को शोषण तथा अत्याचार के खिलाफ संगठित रहकर सत्य, अहिंसा, अपरिग्रह और सामाजिक समरसता के मार्ग पर चलना सिखाया। हमें चाहिए कि हम राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी के आदर्शों का अनुसरण करते हुए उनका स्वच्छता का सिद्धांत अपनाएँ और अपने घर मोहल्ले व शहर को हर दृष्टि से साफ-सुथरा बनाएँ। गाँधीजी अपने शुरूआती जीवन में राजा हरिश्चन्द्र नाटक से भी बहुत प्रभावित हुए। राजा हरिश्चन्द्र की सच्चाई एवं कष्टकर जिंदगी से सफलतापूर्वक निकलने की अद्भुत क्षमता ने गाँधीजी को अत्यंत प्रभावित किया। उन्होंने भी राजा हरिश्चन्द्र के दिखाये मार्ग पर चलने का मन बना लिया। महात्मा गाँधी एक ऐसे व्यक्तित्व थे जिनके विचारों ने पूरी दुनिया को शांति, सद्भाव और अहिंसा का पाठ पढ़ाया। विश्व में ऐसे कई महान लोग हुए जो गाँधीजी के विचारों से बेहद प्रभावित हुए। समाज की भावनाओं का आदर करते हुए भारत के आदर्श समाज की कल्पना करने वाले समाज सुधारक, राष्ट्रचिंतक एँव दार्शनिक महात्मा गाँधी के लिए अहिंसा सबसे बड़ा शस्त्र था। गाँधी जी के अनुसार ‘अहिंसा वो मुख्य तत्व है जिसने संपूर्ण मानवता को प्रेम और आत्मशुद्धी की सहायता से कठिन से कठिन संकटों में सफलता पाने का संदेश दिया है।’ गाँधीजी अहिंसा को सर्वोच्य नैतिक और आध्यात्मिक शक्ति का प्रतीक मानते थे। वे कहते हैं ‘अहिंसा केवल दर्शन नहीं है बल्कि कार्य करने की पद्धति है, ह्रदय परिवर्तन का साधन है।’ गाँधीजी ने तो अहिंसा की भावना को सामाजिक, धार्मिक तथा आर्थिक तीनों क्षेत्रों के लिए आवश्यक तत्व माना है। अहिंसा पर गाँधी जी ने बड़ा सूक्ष्म विचार किया है। वे लिखते हैं ‘अहिंसा की परिभाषा बड़ी कठिन है। अमुक काम हिंसा है या अहिंसा यह सवाल मेरे मन में कई बार उठा है। मैं समझता हूँ कि मन, वचन और शरीर से किसी को भी दुःख न पहुँचाना अहिंसा है, लेकिन इस पर अमल करना, देहधारी के लिए असंभव है।’ हर शहर में सब एमजी रोड़ पर सभी चलते हैं, लेकिन महात्मा गाँधी रोड़ पर चलने वालों में कितने गाँधी-मार्ग के पथिक हैं? गाँधी-मार्ग सत्य और अहिंसा का मार्ग है। आज हिंसा नृत्य कर रही है और झूठों की विपुल संख्या है। गाँधी के इस्तेमाल से अपनी छवि बनाने-चमकाने वालों की कमी नहीं है। गाँधी के प्रशंसक गाँधी-मार्ग के पथिक हों, जरूरी नहीं है। गोडसे ने गाँधी को गोली मारने से पहले झुककर प्रणाम किया था तो क्या उसके मन-मस्तिष्क में गाँधीजी के प्रति तनिक भी श्रृद्धा थी। गाँधीवाद के दो प्रमुख स्तंभ हैं- सत्य और अहिंसा। राजनीति में इन दोनों स्तंभों के लिए कोई जगह नहीं है, पर गाँधी ने इसे राजनीतिक अस्त्र बनाया। वे सबसे बड़े राजनीतिज्ञ थे। उनका जीवन आदर्शमय था, पर एक राजनीतिज्ञ की हैसियत से गाँधी कहीं अधिक प्रैक्टिकल-टैक्टिकल थे। उन्होंने सत्य को नरसंहार के किसी भी बड़े हथियार से कहीं अधिक शक्तिशाली बना दिया था। सत्य और अहिंसा पर आधारित उनके विचार-दर्शन और जीवन-दर्शन से आज की राजनीति का कोई संबंध नहीं है। दो व्यक्ति, दो समुदाय, दो संप्रदाय, दो धर्म, दो राष्ट्र में भिन्नता हो सकती है, लेकिन वहाँ हिंसा को स्थान देना सबको आग की भट्टी में झोंक देना है। गाँधी ने हिंसा, भीड़ हिंसा और कायरता को कभी महत्व नहीं दिया। स्वाधीन भारत में कई रंगों की सरकारें आयीं और गयीं, लेकिन किसी सरकार ने उनके जीवन-दर्शन से कुछ भी नहीं सीखा। धनपशु, परिग्रही, उपभोगी, घोर व्यावसायिक-व्यावहारिक गाँधी को नहीं समझ सकते। गाँधी पर लिखना-बोलना, भाषण-वक्तव्य देना जितना सरल है, उतना ही अधिक कठिन भी है, उनके विचारों को अपने जीवन-आचरण में उतारना। गाँधी के यहाँ श्रम-परिश्रम प्रमुख था। शारीरिक श्रम न करनेवाले गाँधी को कैसे समझेंगे। दक्षिण अफ्रीका गाँधीजी के जीवन का एक महत्वपूर्ण पड़ाव साबित हुआ। यहाँ उन्हें अलग-अलग तरह की कठिनायीयों का सामना करना पड़ा। परिणामतः इन अनुभवों ने उनके जीवन को पूरी तरह बदल दिया। 1893 में गाँधीजी दादा अब्दुल्ला नामक व्यापारी के विधि सलाहकार के रूप में काम करने डरबन गये। दक्षिण अफ्रीका में काले भारतीयों एवं अफ्रीकियों के साथ जातीय-भेदभाव किसी से भी छुपा नहीं था। इस जातीय भेदभाव का सामना गाँधीजी को भी करना पड़ा। अफ्रीका में गाँधीजी के कार्यों ने उन्हें पूरी तरह से बदल दिया। एक दिन डरबन के एक न्यायालय में वहाँ के दंडाधिकारी ने उन्हें अपनी पगड़ी उतारने को कहा। गाँधीजी ने ऐसा करने से बिल्कुल मना कर दिया एवं न्यायालय से बाहर निकल गये। 31 मई 1893 को प्रिटोरिया जाने के दौरान एक श्वेत व्यक्ति ने गाँधीजी के प्रथम श्रेणी में यात्रा करने को लेकर अपनी नाराजगी जताई एवं उन्हें गाड़ी के अंतिम माल डिब्बे में जाने को कहा। गाँधीजी ने अपने पास प्रथम श्रेणी की टिकट होने की बात कहकर जाने से मना कर दिया, जिसके बाद पीटमेरित्जबर्ग में उन्हें ट्रेन से उतार दिया गया। सर्दी का समय था। स्टेशन के प्रतीक्षालय में गाँधीजी ठंड से ठिठुरते रहे, उसी समय गाँधीजी ने यह फैसला किया कि वे अफ्रीका में रहकर भारतीयों के साथ हो रहे जातीय भेदभाव के विरुद्ध संघर्ष करेंगें। इसी संघर्ष के दौरान उन्होंने अहिंसात्मक रूप से अपना विरोध जताया, जो बाद में ‘सत्याग्रह’ के नाम से जाना गया। आज भी वहाँ शहर के मध्य, चर्च स्ट्रीट में गाँधीजी की कांस्य मूर्ति स्थापित है। जो संदेश दे रही है कि गाँधी कौन थे, उनके उसूल क्या थे ? बार-बार हम सब कहते आ रहे हैं गाँधी जरूरी हैं, प्रासंगिक हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 2 अक्टूबर को ‘द न्यूयार्क टाइम्स’ के अपने लेख ‘इंडिया एँड द वर्ल्ड नीड गाँधी’ में गाँधी के स्वप्न को उनके प्रिय भजन ‘ वैष्णव जन तो’ में व्यक्त माना है। दूसरों को पीड़ा पहुँचानेवाला अपने विरोधियों को ‘राष्ट्र-द्रोह’ कहनेवाला क्या कोई गाँधी के मार्ग का पथिक हो सकता है? वह गाँधी-मार्ग का पथिक नहीं, एमजी रोड़ पर चलनेवाले लाखों लोगों में बस एक है। उन्होंने बताया कि हमें गाँधीजी के मार्ग पर चलना चाहिए, और खुद जेनेवा जाने वाले मार्ग पर चले गये। कई हैं, जो हमें महात्मा गाँधी मार्ग पर ठेलकर खुद पेरिस के मार्ग पर चल निकलते हैं। जयपुर शहर में महात्मा गाँधी मार्ग का अंत बार पर होता है। बार में अपनी दिलचस्पी नहीं है। एमजी रोड़ पर वह चलें, जिनकी बार में दिलचस्पी हो। वैसे महात्मा गाँधी मार्ग पर चलने वाले कई मित्र सांसद / विधायक हो गये और दारु के कई ठेके उन्हीं के हैं। बोले तो महात्मा गाँधी मार्ग पर चलकर सिर्फ बार ही नहीं मिलता, दारु के ठेके भी मिल जाते हैं, अगर बंदा कायदे से मन लगाकर महात्मा गाँधी मार्ग पर चले तो। एक हैं जो हमें तो बताते हैं कि हमें महात्मा गाँधी के मार्ग पर चलना चाहिए, पर खुद रतन लाल मटका किंग के मार्ग पर चले जाते हैं। शहर में कई जगह जुआ खेलने के अड्डे उन्हीं के हैं। मैंने उनसे पूछा कि आप तो खुद अलग रास्ते पर चलते हैं, और हमें अलग रास्ते पर भेज जाते हैं। तो उन्होंने हंसकर बताया कि सब एक ही राह पर चलेंगे, तो ट्रेफिक हो जायेगा। महात्मा गाँधी मार्ग पर इसलिए बहुत ट्रेफिक हो गया है, यह बात अब समझ में आ गयी है। बोले तो अकलमंदी इसी में है कि बंदा खुद तो महात्मा गाँधी मार्ग पर किसी और इंटरेस्ट से चल निकले, और बाकियों से आह्वान कर दे कि चले रहो, भईया गाँधी-मार्ग पर। आज हम अनेकानेक मौकों पर ‘महात्मा गाँधी की जय’ का नारा तो लगाते हैं, लेकिन उनके द्वारा बताये गये सिद्धांतों पर चलना नहीं चाहते। शायद यही वजह है कि आज का मानव पहले से ज्यादा परेशान दिखायी देता है। आज हर तरफ असत्य, हिंसा, फरेब का बोलबाला है। अगर आज गाँधी जी हम लोगों के बीच जीवित होते तो आज के भारत की दशा देखकर उन्हें बेहद निराशा होती। ऐसे समय में जब पूरे विश्व में हिंसा का बोलबाला है, राष्ट्र आपस में उलझ रहे हैं, मानवता खतरे में है, गरीबी, भूखमरी और कुपोषण लोगों को लील रहा है तो गाँधी के विचार प्रासंगिक हो जाते हैं। अब विश्व महसूस भी करने लगा है कि गाँधी के बताये रास्ते पर चलकर ही विश्व को हिंसा,द्वेष और प्रतिहिंसा से बचाया जा सकता है। गाँधी जी के विचार विश्व के लिए इसलिए भी प्रासंगिक हैं कि उन विचारों को उन्होंने स्वयं अपने आचरण में ढालकर सिद्ध किया। उन विचारों को सत्य और अहिंसा की कसौटी पर जाँचा-परखा। यकीनन गाँधी-सिद्धान्तों पर चलकर ही भारत को गाँधी के सपनों का भारत बनाया जा सकता है। गाँधीजी हम सब के बीच सदैव प्रासंगिक थे, हैं और रहेंगे। चुनौतियों के महासागर के बीच 2020 तक भारत को दुनिया की महाशक्ति के रूप में देखने का एक पुराना दावा 21वीं सदी के इस दूसरे दशक का सबसे बड़ा झूठ सिद्ध होता दिखायी दे रहा है। खासकर यदि गाँधी-अस्मिता के भारतीय निशानों को बचाये रखते हुए इस दावे को पूरा करना हो। यकीनन गाँधी के सिद्धान्तों पर चलकर ही भारत को गाँधी के सपनों का भारत बनाया जा सकता है। गाँधी के सपने से कितनी दूर – कितने पास गाँधी और नेहरू 1857 की लोकगीतों और लोककथाओं को सुनने-सुनाने के दौर में पले-बढ़े और पढ़े-सीखे थे जिसमें रौंगटें खड़े कर देने वाली वे दास्तानें होती थीं कि अमुक पेड़ पर लोगों को फाँसी दी गयी और उनकी लाशें कई महीनों तक उन पेड़ों पर लटकती रहीं और चील-कौओं ने उनके मांस को नोच-नोच कर खाया। उनके कंकालों को भी लोगों ने उतारने की हिम्मत नहीं की। इस प्रकार की किस्सागोई से धीरे-धीरे उनके बालमन पर जो असर पड़ा, जो छवि बनी, जाहिर सी बात है गाँधी जी भी भली प्रकार से जान गये थे कि जब तक अधिसंख्य लोग तैयार नहीं हो जाते हैं तब तक अंग्रेजों को भारत से नहीं भगाया जा सकता है। वस्तुतः वर्षों पूर्व गाँधीजी ने जो शिक्षाएँ दी थीं उसके बाद हमने एक लंबी यात्रा पार कर ली है। पर, आज गाँधी बौद्धिक-चिंतन का विषय बन कर रह गये हैं, जहाँ पर उनके आदर्शों को भुला दिया गया है और उनकी शिक्षाओं को चयनात्मक ढंग से याद किया जाता है या गलत समझा जाता है। अगर आप अपने आसपास नजर दौड़ाएँगे तो आपको पता चल जाएगा कि आप स्वतंत्रता के पश्चात के भारत के गाँधी के सपने से कितने दूर हैं। शायद कम लोगों को पता होगा कि गाँधी शासन के वैस्टमिंस्टर मॉडल के विरुद्ध थे, जिसका आज हम पालन कर रहे हैं क्योंकि इसमें शासक और शासित दो वर्ग थे। संसद स्वयं अंतिम निर्णय नहीं ले सकती है और सांसदों को पार्टी के सचेतक का पालन करना होता है जिसके कारण वे रबर स्टैम्प बन गये हैं। किंतु, सबसे बड़ा दुर्भाग्य यह है कि स्वतंत्रता के बाद भारत ने गाँधी की सलाह पर ध्यान नहीं दिया, न ही उनके ‘सादा जीवन-उच्च विचार’, सही और गलत तथा मूल्य प्रणाली के आदर्शों का पालन किया गया और एक राजनीतिक, सामाजिक और नैतिक दृष्टि से दीवालिया राष्ट्र से किसी प्रतिक्रिया की अपेक्षा कैसे की जा सकती है? आज हमारे पास नेता नहीं, कुर्सी और पैसे से चिपके हुए धनपशु हैं जबकि बेरोजगार युवाओं में हताशा है, मध्यम वर्ग निराश है, विभिन्न जातियों और पंथों में ध्रुवीकरण बना हुआ है। यदि अहिंसा के कारण महात्मा गाँधी को विश्व भर में जाना जाता है तो आज हमारे समाज में हिंसा सार्वभौमिक-सत्य बन गया है। बापू की शिक्षाओं को केवल दिखावा बना दिया गया है। उनका स्मरण केवल उनकी जयंती और शहीदी दिवस या चुनावों के दौरान किया जाता है और इसका कारण हमारे संकीर्ण मानसिकता के नेता हैं। उनके ‘करो या मरो’ के नारे पर सारा देश एकजुट हो गया था किंतु आज शक्ति प्रदर्शन के लिए किराए की भीड़ जुटायी जाती है। और आज के ‘कागजी-शेरों और बैलट के वीरों’ से हम और अपेक्षा भी क्या कर सकते हैं। क्या यह दुखद नहीं है कि गाँधी जयंती आतंक, हिंसा, अपराध, भ्रष्टाचार और उदासीनता तथा धन-बल, बाहुबल और माफियाबल के माहौल में मनायी जा रही है जिनसे गाँधीजी बेहद घृणा करते थे? कुछ फरेबियों और तंगदिल लोगों की बात अलग है। वो इतिहास का हर पन्ना फाड़कर हर कहीं अपना नाम लिखने को बेताब हैं। अगर ऐसा वो अपने कामों के बूते करते तो अलग बात थी! वो अपने गोएबल्स-प्रचार माध्यम से लोगों को यह यकीन दिलाने की कोशिश कर रहे हैं कि वो किसी भी महापुरुष से बड़े महापुरुष हैं। पहले उन्होंने नेहरूजी के खिलाफ दुष्प्रचार करने के लिए खुद को सरदार पटेल की तरह पेश किया। यह बात अलग है कि सरदार पटेल और नेहरू आपस में प्रतिद्वंदी नहीं सहयोगी थे। सरदार पटेल ने गाँधीजी की हत्या के बाद जाने कितनी बार लोगों से नेहरू को अपना नेता मानने की अपील की थी। लेकिन आरएसएस और उसके उत्पाद मोदीजी को इतिहास के सत्य से मतलब नहीं। उन्हें लोगों के दिमाग में यह गंध-कीड़ा डालने से मतलब है कि अगर नेहरू की जगह सरदार पटेल प्रधानमंत्री होते तो इतिहास कुछ और ही होता। गाँधीजी पर सीधा हमला बोलने की कुव्वत इस देश में किसी के पास नहीं है। लेकिन अपरोक्ष रूप से इसी बहाने वो गाँधीजी पर भी हमला बोल लेते हैं। गाँधीजी के आस-पास के सभी महापुरुष अगर आपस में लड़ने-झगड़ने वाले तुच्छ स्वार्थी सिद्ध हो गये तो गाँधीजी सहित आजादी की समूची लड़ाई को ध्वस्त करना आसान हो जाएगा। यह कहने की जरूरत नहीं है कि आज़ादी की लड़ाई से धोखा करने वालों के पास अपना चेहरा बचाने का सिर्फ एक रास्ता है— स्वतंत्रता संघर्ष की विरासत को जड़ से मिटा देना। गाँधीजी के बारे में उल-जुलूल बातें फैलाना और इतिहास के तथ्यों को विकृत करके पेश करना इसी योजना का हिस्सा है। हाल ही में इंटरनेट के प्रसार के बाद संघ और उससे जुड़े संगठनों ने सोशल मीडिया और डिजिटल स्पेस के जरिये लोगों के मन में गाँधीजी के प्रति नफरत फैलाने का काम और तेज किया है। अब यह पहले से कहीं सस्ता और सुलभ साधन है। इसलिए हर तरह की सोशल नेटवर्किंग साइट्स और यूट्यूब आदि पर गाँधीजी के विरुद्ध घृणित दुष्प्रचार किया है। ये कौन लोग हैं? यह ऐसा सवाल है जिसका उत्तर एकदम आसान है। गाँधीजी की हत्या में संलिप्तता के बावजूद संघ ने कभी यह नहीं माना कि उसने गाँधीजी की हत्या में हाथ बँटाया। उसी तरह कौन नहीं जानता कि छद्म नामों से इंटरनेट पर गाँधीजी के खिलाफ अभियान चलने वाले कौन हैं और किस विचारधारा के हामी हैं। ऐसे बुझदिल लोग आज समाज को नयी-नयी बारहखड़ी रटवाना चाह रहे हैं ! लेकिन सत्ता की ताकत से, सत्ता की पूँजी से, सत्ता के आदेश से और सत्ता के आतंक से समाज ऐसी बारहखड़ी नहीं सीखता है। सरकारी पैसों से छवि चमकाने का आसान रास्ता और भ्रष्ट रास्ता सबकी तरह इन्हें भी आसान लगता रहा और कमीशन का अजगर उन्हें अपनी जकड़ में ले चुका है। लेकिन हिटलर के नाती भूल कर रहे हैं कि ये तस्वीर तो बदल सकते हैं लेकिन विचारों की तासीर का क्या करेंगे ? वह गाँधी की तासीर ही थी जिससे टकरा कर संसार का सबसे बड़ा साम्राज्य ऐसा ढहा कि फिर जुड़ न सका; अब ये अपने शेखचिल्लीपन में तस्वीरें बदलने में लगे हैं। देखिए, इतिहास क्या-क्या बदलता है। मार्टिन लूथर किंग जूनियर ने सितंबर 1958 में महात्मा गाँधी, अहिंसा और सत्याग्रह के सिद्धांत के प्रति अपने लगाव और जुड़ाव की विस्तार से चर्चा करते हुए “माई पिलग्रिमेज टू नॉन-वायलेंस” एक लेख लिखा था। यह लेख फ़ेलोशिप पत्रिका के 1 सितंबर 1958 के अंक में छपा। इस लेख में मार्टिन लूथर किंग ने महात्मा गाँधी के अतिरिक्त कार्ल मार्क्स, नित्शे और राईनहोल्ड नीबूर सरीखे विचारकों के चिंतन की गहराई से समीक्षा की। और विचारों की उपयोगिता की समीक्षा के इस क्रम में, अहिंसा और सत्याग्रह के रास्ते को सर्वाधिक योग्य रास्ता पाया। अपनी साफ़गोई के लिए जाने जाने वाले किंग ने लिखा है कि गाँधी को पढ़ने और जानने से पहले उन्हें लगता था कि यीशुमसीह के सिद्धांत महज व्यक्तिगत सम्बन्धों में ही कारगर साबित हो सकते हैं। किंग के अनुसार गाँधी वह पहले शख्स थे जिन्होंने यीशु के प्रेम के सिद्धांतों और मूल्यों को व्यक्तिगत सम्बन्धों के स्तर से उठाकर एक व्यापक पैमाने पर एक बड़ी ही प्रभावी और शक्तिशाली सामाजिक शक्ति में तब्दील कर दिया। और फिर किंग ने पाया कि सामाजिक सुधार के लिए वह जिस प्रभावी पद्धति की तलाश कर रहे थे, वह असल में, गाँधी की प्रेम और अहिंसा की पद्धति ही हो सकती है। गाँधीजी हम सब के बीच सदैव प्रासंगिक थे, हैं और रहेंगे। इसमें तनिक भी संदेह नहीं है और होना भी नहीं चाहिए। किन्तु, हमें फिर-से गाँधीजी के पदचिह्नों पर चलने के लिए संकलित होना होगा। तभी गाँधी-मार्ग पर चलने की सार्थकता है। किंतु क्या वर्तमान राजनितिक-सामाजिक नेतृत्व ईमानदारी से गाँधी की शिक्षाओं में विश्वास करते हैं? उनके मूल्यों का पालन करते हैं? भूल जाइए। उन्हें इतिहास के कूड़ेदान में डाल दिया गया है किंतु कल सुबह होते ही हमारे नेता बापू की समाधि पर पुष्पांजलि देने राजघाट पहुँच जाएँगे और एक याँत्रिक मुस्कान के साथ उनकी समाधि पर पुष्प अर्पित करेंगे। हालांकि अंदर से वे इसे समय की बर्बादी मानेंगे। मौन होकर अपना सिर झुकाएँगे, टीवी पर अपनी टिप्पणियाँ करेंगे कि वे गाँधी के आदर्शों का पालन करेंगे, उन्हें श्रद्धांजलि देकर वे अपना कर्त्तव्य पूरा समझेंगे और सुरक्षा काफिले के साथ अपनी गाड़ी में बैठ जाएँगे और यही लोकतंत्र का कारोबार है और कानून द्वारा शासित है। गाँधी जी ने कहा है कि ‘जिस सत्य का मैं दावा करता हूँ वह पर्वतों से भी पुराना है’ किंतु शायद उन्हें यह अहसास नहीं था कि पहाड़ों को ध्वस्त किया जा सकता है, सत्य को मिटाया जा सकता है और उसका एकमात्र लक्ष्य आजकल ‘पैसा पकड़ो – पद पाओ’ है अर्थात किसी भी कीमत पर सत्ता और पैसा। देश और लोकतंत्र जाए भाड़ में। आज लोग उनकी शिक्षाओं के साथ खिलवाड़ करने वालों का मुकाबला करने के लिए तैयार नहीं होते क्योंकि हमारी प्रवृत्ति अनैतिक और भ्रष्ट हो गयी है। साथ ही देश में गरीबी व्यापक पैमाने पर है। गाँधी जी के आदर्शों के लिए किसके पास समय है। लोग रोटी, कपड़ा और मकान के लिए संघर्ष कर रहे हैं। कुछेक को छोड़कर आज गाँधीवादी नेता कहाँ हैं? आज जनता का, जनता के लिए और जनता से नेता कहाँ हैं? किंतु सच्चाई यह भी है कि भारत की जनता गाँधी को भूलना नहीं चाहती है। आज संपूर्ण विश्व की जनता एक बेहतर विश्व के निर्माण के लिए उन्हें मार्गदर्शक के रूप में देखती है। कुल मिलाकर हमारे राजनेता महात्मा गाँधी की कसमें तो खाते हैं किंतु उनकी शिक्षाओं पर ध्यान नहीं देते हैं। इसकी बजाय वे सारे पाप करते हैं जिनसे गाँधी स्वयं घृणा करते थे और वे पाप हैं; सिद्धान्तों के बिना राजनीति, कार्य के बिना सम्पत्ति, नैतिकता के बिना व्यापार, चरित्र के बिना शिक्षा, चेतना के बिना आनंद, मानवता के बिना विज्ञान और बलिदान के बिना पूजा। अपनी आत्मकथा ‘माई एक्सपैरिमैंट विद ट्रुथ’ में गाँधी जी ने ठीक ही कहा है कि ‘मैं नहीं चाहता कि मेरे घर पर चारों तरफ से दीवारें बनी हों और मेरी खिड़की पर दरवाजे लगे हों। मैं हवा में चलना नहीं चाहता हूँ। मेरा धर्म बंधा नहीं है। आज मैं आपका नेता हूँ किंतु कल आप मुझे जेल में भी बंद कर सकते हैं क्योंकि यदि आप रामराज नहीं लाओगे तो मैं आपकी आलोचना करूँगा।’ हमने गाँधी जी को जेल में बंद नहीं किया अपितु उनकी हत्या की और दैनिक आधार पर ऐसा करते जा रहे हैं और यह है असत्य के साथ हमारा प्रयोग। टिप्पणियाँ एवं संदर्भ 1) गाँधी, एम. के. (2009): हिंद स्वराज, सर्वसेवा संघ प्रकाशन, वाराणसी 2) गुप्ता,दीपांकर (2009): गाँधी बिफोर हैबरमास, इकनॉमिक एँड पॉलिटिकल वीकली, मार्च 7. 3) प्रभु, आर.के. (1961): सम्पादक, डेमोक्रेसी रियल एँड डिसेप्टिव, नवजीवन पब्लीकेशन, अहमदाबाद 4) पारेख, भिक्खु (1995): गाँधीज पॉलिटिकल फिलासफी, अजंता, दिल्ली 5) पारेल, एँथॉनी (2007): हिंद स्वराज एँड अदर राइटिग्ंस, कैंब्रिज यूनिवर्सिटी प्रेस, नयी दिल्ली 6) नंदी, आशीष (1986): ‘फ्राम आउट साइड द एम्पोरिएम’, कंटेम्पररी क्राइसिस एँड गाँधी पुस्तक में संकलित लेख, सम्पादक रामाश्रय राय, डिस्कवरी पब्लिशिंग हाऊस, दिल्ली 7) निगम, आदित्य (2009): ‘गाँधी-द एँजेल ऑफ हिस्ट्री’ इकॅनामिक एँड पोलिटिकल वीकली, मार्च 14. 8) प्रभात खबर (दीपावली विशेषांक 2008), सम्पादक: हरिवंश और रविभूषण, रांची (झारखंड)। 9) दीपंकर गुप्ता, ‘गाँधी बिफोर हेबरमास: दि डेमोक्रेटिक कांसिक्वेंसिज ऑव अहिंसा’, ईपीडब्लयू, अंक 10, 7 मार्च, 2009, पृष्ठ 27-33 10) थामस पेन्थम, ‘थिन्किंग विद महात्मा गाँधी: बियोंड महात्मा गाँधी’, पॉलिटिकल थियरी, मार्च, 1985, पृष्ठ 165-188 11) आदित्य निगम, ‘गाँधी ‘दि एँजिल ऑव हिस्ट्री’: रीडिंग हिंद स्वराज टुडे’, ईपीडब्ल्यू, अंक 11, 14 मार्च, 2009, पृष्ठ 41-47 12) शम्भू प्रसाद, ‘टुवर्ड्स एन अंडरस्टैण्डिंग ऑव गाँधी जी व्यूज ऑन साइंस’, ईपीडब्ल्यू, अंक 39, 29 सितम्बर 2001, पृष्ठ 3721-3732 13) डेनिस डाल्टन, गाँधी: आइडियॉलॉजी एँड एथॉरिटी’, माडर्न एशियन स्टडीज, अंक 4, 1969, पृष्ठ 377-393 14) दीपंकर गुप्ता, ‘गाँधी बिफोर हेबरमास: दि डेमोक्रेटिक कांसिक्वेंसिज ऑव अहिंसा’, ईपीडब्ल्यू, अंक 10, 7 मार्च, 2009, पृष्ठ 27-33 8. भीखू पारेख, कोलोनियलिज्म, ट्रेडिशन एँड रिफॉर्म: एन एनालैसिस ऑव गाँधीज पॉलिटिकल डिस्कोर्स, सेज, नयी दिल्ली, 1989 15) रजनी कोठारी, भारत में राजनीति: कल और आज, वाणी, नयी दिल्ली 2005 10. शिव विश्वनाथन, ‘आज अगर गाँधी होते!’, समय चेतना, दिल्ली, अंक 5, अक्टूबर 1995, पृष्ठ 66-80 16) भारत में दलित प्रश्न और जाति-व्यवस्था (अम्बेडकर और गाँधी जी की दृष्टि में), भाषिकी, संपा. प्रोफेसर राम लखन मीना, राजस्थान केंद्रीय विश्वविद्यालय, राष्ट्रीय राजमार्ग-8, बांदर सिंदरी, अजमेर (राजस्थान)। 17) फिर – फिर पढ़े ‘हिंद-स्वराज’, प्रोफेसर राम लखन मीना, हिंदी बुनियाद, राजस्थान हिंदी ग्रंथ अकादमी, जयपुर।

Facebook
Twitter
LinkedIn
WhatsApp

डॉ अंबेडकर की बुलंद आवाज के दस्तावेज : मूकनायक मीडिया पर आपका स्वागत है। दलित, आदिवासी, पिछड़े और महिला के हक़-हकुक तथा सामाजिक न्याय और बहुजन अधिकारों से जुड़ी हर ख़बर पाने के लिए मूकनायक मीडिया के इन सभी links फेसबुक/ Twitter / यूट्यूब चैनलको click करके सब्सक्राइब कीजिए… बाबासाहब डॉ भीमराव अंबेडकर जी के “Payback to Society” के मंत्र के तहत मूकनायक मीडिया को साहसी पत्रकारिता जारी रखने के लिए PhonePay या Paytm 9999750166 पर यथाशक्ति आर्थिक सहयोग दीजिए…
उम्मीद है आप बिरसा अंबेडकर फुले फातिमा मिशन से अवश्य जुड़ेंगे !

बिरसा अंबेडकर फुले फातिमा मिशन के लिए सहयोग के लिए धन्यवाद्

Recent Post

Live Cricket Update

Rashifal

You May Like This