आरक्षण की 50% सीमा बढ़ाना राहुल गाँधी का मास्टर स्ट्रोक, मोदी की बेचैनी बढ़ी, बीपी मंडल के बाद राहुल गाँधी बहुजनों के आधुनिक मसीहा

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मूकनायक मीडिया ब्यूरो | 08 जनवरी 2024 | जयपुर – दिल्ली – अजमेर : जैसे-जैसे लोकसभा चुनाव की तारीख नजदीक आ रही है वैसे-वैसे सभी राजनीतिक दल अपने तरकश से मारक तीर निकाल रहे हैं। कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने भारत जोड़ो न्याय यात्रा के दौरान एक नया सियासी दांव चला है। उन्होंने कल कहा है कि अगर केंद्र में इंडिया गठबंधन की सरकार बनती है तो आरक्षण पर 50 प्रतिशत की सीमा को खत्म कर दिया जाएगा।

राहुल ने एक्स पर एक वीडियो पोस्ट कर लिखा कि आरक्षण पर जो 50% की लिमिट है, हम उसे उखाड़कर फेंक देंगे। ये कांग्रेस और INDIA की गारंटी है। पिछले साल कांग्रेस के अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे (Mallikarjun Kharge) ने भी कहा था कि अगर उनके गठबंधन की सरकार केंद्र में बनती है तो 50 प्रतिशत आरक्षण सीलिंग को खत्म कर दिया जाएगा।

आरक्षण की 50% सीमा बढ़ाना राहुल गाँधी का मास्टर स्ट्रोक

राहुल गांधी पिछले काफी वक्त से जाति जनगणना और ओबीसी आरक्षण के मुद्दे पर हमलावर हैं। लेकिन बीजेपी की सियासी गणित के कारण उनको सफलता नहीं मिल पा रही है। बीजेपी ओबीसी वोटरों को खुद से जोड़े रखने के लिए बड़ा अभियान चला रही है। अब राहुल ने भी ओबीसी वोट के लिए दांव चल दिया है।    M2 300x195 आरक्षण की 50% सीमा बढ़ाना राहुल गाँधी का मास्टर स्ट्रोक, मोदी की बेचैनी बढ़ी, बीपी मंडल के बाद राहुल गाँधी बहुजनों के आधुनिक मसीहा

लेकिन राम मंदिर प्राण प्रतिष्ठा के बाद बीजेपी ने जिस आक्रामक तरीके से ओबीसी वोटरों को साधने का प्रयास किया है उससे कांग्रेस के लिए राह उतनी आसान नहीं रहने वाली है। राहुल ने एक दांव चला तो जरूर है लेकिन आम चुनाव में इसका कांग्रेस को क्या फायदा होगा ये देखना रोचक होगा।

समझिए 50% आरक्षण सीमा क्या है?

1992 में इंदिरा साहनी जजमेंट जिसे मंडल जजमेंट भी कहा जाता है, उसमें आरक्षण की सीमा को लेकर फैसला दिया गया था। जजमेंट के मुताबिक सरकार 50 फीसदी से ज्यादा रिजर्वेशन नहीं दे सकती। सुप्रीम कोर्ट के 9 जजों की बेंच ने ऐतिहासिक फैसले में कहा था कि रिजर्वेशन की लिमिट 50 फीसदी की सीमा क्रॉस नहीं कर सकती। सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में कहा था कि संविधान के अनुच्छेद-16 (4) कहता है कि पिछड़ेपन का मतलब सामाजिक पिछड़ेपन से है।

शैक्षणिक और आर्थिक पिछड़ेपन, सामाजिक पिछड़ेपन के कारण हो सकते हैं लेकिन अनुच्छेद-16 (4) में सामाजिक पिछड़ेपन एक विषय है। अगर रिजर्वेशन में कोई सरकार 50 फीसदी की सीमा को पार करती है तो वह कानूनी जांच के दायरे में होगा और जो मौजूदा संवैधानिक व्यवस्था है उसमें टिक पाना मुश्किल है।

केंद्र और राज्य सरकारों ने बुधवार को अपने मतभेदों को दरकिनार करते हुए सर्वसम्मति से सुप्रीम कोर्ट को बताया कि अनुसूचित जाति समुदायों के आरक्षण के भीतर आरक्षण से जरूरतमंद और सबसे कमजोर समूहों को आरक्षण का बड़ा हिस्सा मिल सकेगा। साथ ही जो लोग अपनी सामाजिक स्थिति में सुधार कर चुके हैं उन्हें आरक्षण का बड़ा हिस्सा हासिल करने से रोका जा सकेगा। मामले में अटॉर्नी जनरल आर वेंकटरमणी, सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता, वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल और वरिष्ठ अधिवक्ताओं ने पैरवी की।

2004 के फैसले की समीक्षा M548 300x169 आरक्षण की 50% सीमा बढ़ाना राहुल गाँधी का मास्टर स्ट्रोक, मोदी की बेचैनी बढ़ी, बीपी मंडल के बाद राहुल गाँधी बहुजनों के आधुनिक मसीहा

मामले की सुनवाई के दौरान राज्यों ने सुप्रीम कोर्ट की पांच जजों की पीठ के ईवी चिन्नैया फैसले की समीक्षा की मांग की। बेंच ने साल 2004 में फैसला सुनाया था कि सभी अनुसूचित जाति समुदायों को बहिष्कार, भेदभाव और अपमान का सामना करना पड़ा।

शताब्दियों ने एक सजातीय वर्ग का प्रतिनिधित्व किया, जो उप-वर्गीकृत होने में असमर्थ था। सर्वसम्मति का प्रदर्शन न केवल पक्षपातपूर्ण झगड़ों की पृष्ठभूमि के कारण हुआ, बल्कि इसलिए भी कि, हाल तक, राजनीतिक वर्ग सभी अनुसूचित जातियों के समान न होने की वास्तविकता को स्वीकार करने से सतर्क दिखाई दे रहा था।

राज्यों को स्वतंत्रता की मांग

सीजेआई डीवाई चंद्रचूड़ और जस्टिस बीआर गवई, विक्रम नाथ, बेला एम त्रिवेदी, पंकज मिथल, मनोज मिश्रा और सतीश सी शर्मा की पीठ के समक्ष बहस करते हुए वेंकटरमणी ने कहा कि चिन्नैया फैसले में अनुसूचित जाति समुदायों के बीच गहरी असमानता को नजरअंदाज किया गया।

साथ ही गलती से उन्हें एक सजातीय समूह के रूप में माना गया। अटॉर्नी जनरल ने कहा कि एक बार जब केंद्र और संसद ने एक समुदाय को एससी सूची में शामिल कर लिया, तो राज्यों को समूहों के बीच कोटा को तर्कसंगत बनाकर इन समुदायों के बीच असमानता को समाप्त करने के लिए उपाय करने की स्वतंत्रता दी जानी चाहिए।

आरक्षण नीति घोषित करने की प्रतिबद्धता

M345 300x169 आरक्षण की 50% सीमा बढ़ाना राहुल गाँधी का मास्टर स्ट्रोक, मोदी की बेचैनी बढ़ी, बीपी मंडल के बाद राहुल गाँधी बहुजनों के आधुनिक मसीहाएससी समुदायों के उप-वर्गीकरण के लिए केंद्र सरकार के समर्थन पर अस्पष्टता की गुंजाइश को खत्म करते हुए, मेहता ने कहा कि केंद्र सैकड़ों वर्षों से भेदभाव से पीड़ित लोगों को समानता लाने के लिए सकारात्मक कार्रवाई के उपाय के रूप में पिछड़े वर्गों के लिए आरक्षण की घोषित नीति के लिए प्रतिबद्ध है।

उन्होंने कहा कि बड़ी श्रेणी में उनके सामाजिक और शैक्षणिक अभाव की गंभीरता के आधार पर कोटा लाभों के श्रेणीबद्ध वितरण के लिए एससी का उप-वर्गीकरण एक कम प्रभाव सुनिश्चित करेगा।

यह केंद्र और राज्यों को सामाजिक न्याय के उच्च संवैधानिक आदर्श को आगे बढ़ाने के लिए नीतियां बनाने के लिए उचित स्वतंत्र भूमिका प्रदान करेगा, जो अवसर की वास्तविक समानता हासिल करना चाहता है। मेहता ने कहा कि उप-वर्गीकरण का अभाव आरक्षित श्रेणी के भीतर असमानता को कायम रखता है।

इसके साथ ही और सरकारों को इस संबंध में एक उचित नीति तैयार करने से रोकता है। उन्होंने कहा कि राज्य केवल सरकारी उच्च शिक्षा संस्थानों में सीमित संख्या में सीटें और नौकरियों में पद आरक्षित कर सकता है।

सामाजिक समानता प्राप्त करने के उद्देश्य को प्राप्त करने के लिए आरक्षित सीटों और नौकरियों की सीमित संख्या को तर्कसंगत रूप से वितरित करना महत्वपूर्ण है।

मोदी की बेचैनी बढ़ी

सुप्रीम कोर्ट ने1992 में 9 जजों की संवैधानिक पीठ ने 6-3 के बहुमत से फैसला सुनाया था। उसने 27 फीसदी ओबीसी आरक्षण को कामय रखा था। सिर्फ अपवादों को छोड़ उसने आरक्षण की 50 फीसदी सीमा तय करने का फैसला सुनाया था। बाद में 1994 में संविधान में 76वां संशोधन हुआ था। इसके तहत तमिलनाडु में रिजर्वेशन की सीमा 50 फीसदी से ज्‍यादा कर दी गई थी। यह संशोधन संविधान की 9वीं अनुसूची में शामिल किया गया है।

सीजेआई के नेतृत्व वाली पीठ ने टिप्पणी की कि ‘सदियों से भेदभाव और बहिष्कार के मामले में इनमें से प्रत्येक समुदाय की पीड़ा की डिग्री में कोई एकरूपता नहीं है। यह टिप्पणी सिब्बल की दलीलों के अनुरूप थी।

सीनियर एडवोकेट शेखर नफाडे (तमिलनाडु), सिद्धार्थ लूथरा (तेलंगाना), केके वेणुगोपाल (आंध्र प्रदेश एससी समुदाय के लिए), एस मुरलीधर (आंध्र प्रदेश), अरुण भारद्वाज (हरियाणा), निधेश गुप्ता, सलमान खुर्शीद की राय में समानता राकेश खन्ना, डी एस नायडू और गोपाल शंकरनारायणन ने सात-जजों की पीठ को अपनी दलीलें पेश करने में मदद की, जिससे सुनवाई जल्द पूरी होने का संकेत मिला।

चंडीगढ़ प्रशासन के लिए, वकील कनु अग्रवाल ने केंद्र सरकार की तरफ से अनुसूचित जाति सूची में शामिल करने के लिए समुदायों की पहचान और अनुच्छेद 15 और 16 के माध्यम से परिणामी सकारात्मक कार्रवाई से संबंधित संवैधानिक प्रावधानों को रेखांकित करते हुए एक चार्ट प्रस्तुत किया।

उनका कहना था कि इसे उन्होंने राज्यों पर छोड़ दिया जाना चाहिए। गुरुवार को, SC उन लोगों के विरोधी विचारों को सुनेगा जिन्होंने SC समुदायों के उप-वर्गीकरण को चुनौती दी थी। इसके परिणामस्वरूप 2000 में आंध्र प्रदेश और 2006 में पंजाब की तरफ से कानूनों को रद्द कर दिया गया था।

बीपी मंडल के बाद राहुल गाँधी बहुजनों के आधुनिक मसीहा
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मूकनायक मीडिया से बातचीत में आजाद समाज पार्टी कांशीराम राजस्थान के पूर्व प्रदेशाध्यक्ष प्रोफ़ेसर राम लखन मीणा का कहना है कि सामाजिक न्याय को सही मायने में हाशिल करने के लिए जातीय जनगणना और आरक्षण की सीमा 50 फीसदी से बढ़ाना जरूरी है क्योंकि ईडब्लूएस आरक्षण के बाद सवर्णों का आरक्षण 60 फीसदी हो गया है। इसका प्रमुख कारण है जातिगत पूर्वाग्रहों से एससी एसटी ओबीसी ओपन केटेगरी के 50 फीसदी स्पेस पर जमी आइस को ब्रेक करना संभव नहीं रह गया था।

प्रोफ़ेसर मीणा ने यह भी कहा कि ऐसे में राहुल गांधी के ओबीसी आरक्षण की सीमा खत्म करने के बयान के पीछे कांग्रेस का राजनीतिक दांव माना जा रहा है। दरअसल, बीजेपी राम मंदिर के जरिए अपने कोर वोटरों के साथ-साथ ओबीसी वोटरों को भी लुभा रही है।

कांग्रेस को ये पता है कि इस पिच पर वह बीजेपी का मुकाबला नहीं कर पायेगी। अगर सही मायने में राहुल गाँधी के नेतृत्व में इंडिया गठबंधन ऐसा कर पाता है तो बीपी मंडल के बाद राहुल गाँधी बहुजनों के आधुनिक मसीहा बनाकर उभरेंगे।

साथ ही राहुल गांधी ने अपनी यात्रा के दौरान ओबीसी आरक्षण की सीमा खत्म करने का दांव चला है। राहुल ने एक्स पर जो वीडियो पोस्ट किया है उसमें कहा है कि संविधान में जो प्रावधान है उसे मुताबिक 50 फीसदी से अधिक आरक्षण नहीं दिया जा सकता है। लेकिन कांग्रेस और इंडिया गठबंधन इसे उखाड़ फेकेगी। उन्होंने साथ ही कहा कि आदिवासियों और दलितों के आरक्षण में कोई कटौती नहीं होगी।

राहुल के कैंपन से मिलेगी कांग्रेस को बढ़त

राहुल की भारत जोड़ो न्याय यात्रा के दौरान इस बयान के भी सियासी मायने निकाले जा रहे हैं। दरअसल, कांग्रेस का प्लान बीजेपी के ओबीसी वोट बैंक में सेंध लगाने की कोशिश है। पिछले दो लोकसभा चुनावों में बीजेपी को ओबीसी वोटरों का बड़ा समर्थन मिला था। देश में ओबीसी वोट बैंक काफी मजबूत और बड़ा है।

सभी दल चुनावी वैतरणी पार करने के लिए ओबीसी वोटरों पर फोकस करती है। पिछले तीन लोकसभा चुनावों में बीजेपी का ओबीसी वोट बैंक लगातार बढ़ता गया है। 2009 के आम चुनाव में भगवा दल को 22 फीसदी ओबीसी वोट मिले थे। 2014 के लोकसभा चुनाव में बीजेपी को 34 फीसदी ओबीसी वोट मिले।

वहीं 2019 के लोकसभा चुनाव में बीजेपी 44 प्रतिशत ओबीसी वोट हासिल कर लिए। जाहिर है अगर बीजेपी के साथ देश का करीब-करीब आधा ओबीसी वोटर इस मजबूती से जुड़े रहेंगे तो कांग्रेस के लिए 2024 के आम चुनाव में मुश्किल होगी। इसलिए राहुल के आरक्षण की सीमा खत्म करने के दांव को उसी से जोड़कर देखा जा रहा है।

पीएम मोदी के बयान का तोड़

जब कांग्रेस ने जाति जनगणना कराने की मांग शुरू की तो पीएम नरेंद्र मोदी ने इसकी काट के लिए कहा था कि उनके लिए तो केवल दो जातियां हैं अमीर और गरीब। पिछले साल हुए 5 राज्यों के विधानसभा चुनाव में भी बीजेपी और पीएम मोदी ने इसी तर्ज पर चुनाव प्रचार किया। बीजेपी ने 5 में से तीन राज्यों मध्य प्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ में चुनाव जीत लिया।

कांग्रेस के दांव की काट खोजते हुए पीएम मोदी ने तब चार स्तंभ का जिक्र किया था। महिला, किसान, गरीब और युवा। पीएम मोदी ने यूपी के बुलंदशहर के चुनाव प्रचार के दौरान भी इन चारों स्तंभ का जिक्र किया था। ऐसे में कांग्रेस के पास इसकी काट के लिए कोई चुनावी हथियार होना जरूरी हो गया था। माना जा रहा है कि राहुल ने जिस तरीके से ओबीसी आरक्षण की सीमा को खत्म करने की बात कही है वो पीएम मोदी के बयान का तोड़ है।

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