लिंगदोह कमेटी की सिफारिश के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में दायर याचिका, 10 अप्रैल को होगी मामले में अगली सुनवाई 

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मूकनायक मीडिया ब्यूरो | 13 जनवरी 2024 | जयपुर – दिल्ली – जोधपुर : सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार (12 फरवरी) को लिंगदोह कमेटी की सिफारिश के खिलाफ दायर याचिका पर सुनवाई की। इस याचिका में मांग की गई है कि स्टूडेंट्स के एक से ज्यादा बार छात्र संघ चुनाव लड़ने पर लगी पाबंदी को हटाया जाए, क्योंकि यह मनमानी और छात्रों के साथ भेदभाव है।

लिंगदोह कमेटी की सिफारिश के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में दायर याचिका

लिंगदोह समिति की सिफारिश 6.5.6 के खिलाफ उत्तराखंड के रहने वाले नवीन प्रकाश नौटियाल और अन्य ने याचिका लगाई थी। जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस केवी विश्वनाथन ने केंद्र सरकार और यूनिवर्सिटी ग्रांट कमीशन (UGC) को नोटिस भेजकर जवाब मांगा है। अगली सुनवाई 10 अप्रैल को होगी। M101 2 300x150 लिंगदोह कमेटी की सिफारिश के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में दायर याचिका, 10 अप्रैल को होगी मामले में अगली सुनवाई 

क्या है लिंगदोह कमेटी की रिपोर्ट का नियम 6.5.6

सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद मानव संसाधन विकास मंत्रालय ने यूनिवर्सिटी, कॉलेज और दूसरे शैक्षणिक संस्थानों में होने वाले छात्र संघ चुनावों को लेकर लिंगदोह पैनल बनाया था। सिफारिशें देने के लिए पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त जेएम लिंगदोह को अध्यक्ष बनाया गया था। इस कमेटी ने 26 मई 2006 को अपनी रिपोर्ट सौंपी थी।

इसमें यह भी कहा गया है कि एक उम्मीदवार को पदाधिकारी पद के लिए चुनाव लड़ने का एक मौका मिलेगा, और कार्यकारी सदस्य के पद के लिए चुनाव लड़ने के दो अवसर मिलेंगे। पैनल के गठन के पीछे का उद्देश्य छात्र राजनीति से आपराधिकता और धनबल को दूर करना था। इसलिए रिपोर्ट में शामिल सिफारिशों को 22 सितंबर 2006 के बाद से होने वाले छात्र संघ चुनावों के लिए सभी कॉलेजों और विश्वविद्यालयों पर लागू कर दिया गया।

याचिकाकर्ता ने कहा- ये नियम मनमाना है

याचिकाकर्ता की ओर से पेश वकील प्रशांत भूषण ने कहा कि विशेष सिफारिश के बारे में कोई कारण नहीं बताया गया, न ही कोई चर्चा की गई। इस तरह का प्रावधान पूरी तरह से मनमाना और भेदभावपूर्ण है। याचिका में नियम 6.5.6 को गलत बताया गया, क्योंकि यह संविधान के अनुच्छेद 14 का उल्लंघन करता है। यह भी कहा गया कि सिफारिश दोहरी शर्तों को पूरा नहीं करती।

10 अप्रैल को होगी मामले में अगली सुनवाई 

शीर्ष अदालत लिंगदोह समिति की सिफारिश के खिलाफ उत्तराखंड निवासी नवीन प्रकाश नौटियाल और अन्य की याचिका पर सुनवाई कर रही थी। सिफ़ारिश में कहा गया है, ‘‘उम्मीदवार को पदाधिकारी पद पर चुनाव लड़ने का एक अवसर मिलेगा, और कार्यकारी सदस्य के पद के लिए चुनाव लड़ने के दो अवसर मिलेंगे।’’

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याचिकाकर्ता की ओर से पेश वकील प्रशांत भूषण ने कहा कि विशेष सिफारिश के बारे में कोई कारण नहीं बताया गया या चर्चा नहीं की गई। भूषण ने कहा कि इस तरह का प्रावधान पूरी तरह से ‘मनमाना और भेदभावपूर्ण’ है। समिति की सिफारिशों को शीर्ष अदालत ने स्वीकार कर लिया था और 22 सितंबर 2006 को निर्देश दिया था कि इन्हें छात्र संघ चुनावों के लिए सभी कॉलेजों तथा विश्वविद्यालयों द्वारा लागू किया जाएगा।

ये हैं लिंगदोह कमेटी की सिफारिशें जिससे बंधे हैं उम्मीदवार

  • स्नातक कर रहे 17 से 22 वर्ष के बीच की आयु के छात्र चुनाव लड़ सकते हैं।
  • 4 वर्षीय पाठ्यक्रम में 17 से 23 वर्ष और 5 वर्षीय पाठ्यक्रम में 17 से 24 वर्ष तक विद्यार्थी चुनाव में भाग ले सकते हैं।
  • स्नातकोत्तर छात्रों के लिए वैध तरीके से चुनाव लड़ने की अधिकतम आयु सीमा 26 वर्ष है।
  • शोधार्थियों के लिए वैध रूप से चुनाव लड़ने की अधिकतम आयु सीमा 28 वर्ष है।
  • छात्र संघ चुनाव के लिए उम्मीदवार के खाते में किसी भी परिस्थिति में कोई शैक्षणिक बकाया चुनाव लड़ने की वर्ष में नहीं होना चाहिए।
  • उम्मीदवार की उपस्थिति का न्यूनतम प्रतिशत विश्वविद्यालय की ओर से निर्धारित किया गया हो या 75% उपस्थिति।
  • उम्मीदवार के पास पदाधिकारी के पद के लिए चुनाव लड़ने का एक हो मौका होगा और कार्यकारी सदस्य के पद पर चुनाव लड़ने के लिए दो अवसर होंगे।
  • उम्मीदवारों का पूर्व में कोई आपराधिक रिकॉर्ड नहीं होना चाहिए।
  • उम्मीदवार अपने महाविद्यालय विश्वविद्यालय का नियमित और पूर्णकालिक विद्यार्थियों होना चाहिए।
  • एक प्रत्याशी अधिकतम ₹5000 ही खर्च कर सकेगा।
  • प्रिंटेड पोस्टर-बैनर या प्रचार सामग्री के प्रयोग की अनुमति नहीं होगी।

लिंगदोह कमेटी की सिफारिशों के बाद छात्र राजनीति का बदला चेहरा

M768 300x200 लिंगदोह कमेटी की सिफारिश के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में दायर याचिका, 10 अप्रैल को होगी मामले में अगली सुनवाई लिंगदोह कमेटी की सिफारिशों के बाद छात्र राजनीति का चेहरा बदल गया हैं। यही कारण है छात्रसंघ चुनावों पर रोक लगने से पहले छात्र राजनीति से निकले नेता विधायक मंत्री और सांसद तक बने। लेकिन अदालती आदेश के कारण सन् 2005-06 से सन् 2009-10 तक छात्रसंघ चुनाव पर रोक रहने के बाद दोबारा शुरू हुए छात्रसंघ चुनावों के बाद छात्र राजनीति की शक्ल भी बदल कर रह गई है।

यही कारण है कि 2009 से जब दोबारा चुनाव शुरू हुए तो लिंगदोह कमेटी की सिफारिशें लागू हुई। और इन सिफारिशों में छात्रनेता ऐसे उलझे की सिफारिशें लागू होने के बाद बाद छात्रसंघ चुनाव लड़ने वाले नेता विधायक भी नहीं बन सकें। लेकिन 2005-06 से पहले के छात्रसंघ चुनाव जीत कर निकले छात्रसंघ पदाधिकारियों ने प्रदेश ही नहीं बल्कि देश की राजनीति में सुनहरा अध्याय लिखा है।

देश के संसद से लेकर प्रदेश की विधानसभा तक राजस्थान के अलग अलग विश्वविद्यालयों व महाविद्यालयों से निकले छात्रसंघ अध्यक्ष व अन्य पदाधिकारियों का बोलबाला है। जिसमें छात्रसंघ की राजनीति से अपने करियर की शुरूआत करने वाले यह नेता अब केंद्र सरकार और राज्य सरकार में मंत्री जैसे अहम पदों पर हैं।

साल भर तक सिमटी राजनीति

लिंगदोह कमेटी के नियमों के कारण छात्रराजनीति अब सालभर तक सिमट कर रह गई है। अब अपेक्स बॉडी की किसी भी पद पर चुनाव लड़ने वाला प्रत्याशी नियमों के चलते दोबारा चुनाव नहीं लड़ सकता है। लेकिन 2005.06 से पहले छात्रनेता पांच से छह साल तक विश्वविद्यालय की राजनीति में सक्रिय रहते थे। क्योकि लिंगदोह कमेटी के नियम लागू होने से पहले चुनाव लड़ने की कोई उम्र सीमा तय नहीं थी।

साथ ही एक ही बार चुनाव लड़ने की बाध्यता भी नहीं थी। पहले अपेक्स के किसी भी पद पर चुनाव लड़ने के बाद किसी भी पद पर चुनाव लड़ सकते थे। साथ ही तीन से चार बार तक अध्यक्ष पद पर भी प्रत्याशी चुनाव लड़ता था। कई नेता तो ऐसे रहे है तो तीन बार अध्यक्ष का चुनाव हार कर चौथी बार में अध्यक्ष का बने। लेकिन अब हारने या जीतने के बाद छात्रराजनीति में आगे मौके नहीं मिलने के कारण छात्रनेता चुनाव परिणाम घोषित होने के साथ ही छात्र राजनीति से दूरी बना रहे है।

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