लालू-तेजस्वी जीती बाजी कैसे हारे? भाजपा की प्लानिंग समझ नहीं पाए, तीन पॉइंट में जानिए क्यों टूटे विधायक

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मूकनायक मीडिया ब्यूरो | 13 जनवरी 2024 | जयपुर – दिल्ली – पटना : ‘चेतन आनंद के पिता आनंद मोहन जेल से बाहर हैं। उनको ED का डर दिखाया गया। नीलम देवी को भी ED का डर दिखाया गया। प्रहलाद यादव बालू के बड़े कारोबारी हैं। उनको भी डर दिखाया गया।’ बिहार की राजनीति में 15 दिन तक खेला का खौफ रहा। प्रमुख दलों को अपने विधायकों पर ही शक होने लगा। कोई खुफिया निगरानी कराने में जुट गया तो किसी ने भोज के बहाने विधायकों को बुलाकर अपने बंगले पर रोक लिया। यहां तक कि सबसे अनुशासित पार्टी बीजेपी भी अपने विधायकों को पटना से दूर ले गई।

लालू-तेजस्वी जीती बाजी कैसे हारे ?

28 जनवरी की शाम NDA सरकार बनने के बाद तेजस्वी यादव ने सामने आकर खुला चैलेंज किया था, ‘खेला तो अब होगा…। पिक्चर अभी बाकी है…।’ ये उनकी पहली चूक थी, क्योंकि राजनीति में चिल्ला-चिल्लाकर कुछ नहीं किया जाता। नीतीश और भाजपा ने इसे गंभीरता से लिया और रणनीति बनानी शुरू कर दी। सबसे पहली चुनौती थी अपने-अपने विधायकों को सेफ करना।

खुलेआम चैलेंज देना और मांझी को मैनेज न कर पाना

इस पर काम शुरू करते, उसके पहले ही जीतन राम मांझी ने बयानबाजी शुरू कर दीं और दो मंत्री पद की मांग रखते हुए कह दिया कि महागठबंधन से CM की कुर्सी का ऑफर था, जिसे उन्होंने ठुकरा दिया। तब मांझी को लेकर कयास लगने शुरू हो गए कि वे लालू के साथ मिलकर खेला न कर दें। इससे NDA की चिंता तो बढ़ी, लेकिन उन्होंने इसे जाहिर नहीं होने दिया।

अब चूंकि फ्लोर टेस्ट में एक-एक सीट का महत्व था और मांझी के पास 4 विधायक थे। तेजस्वी इनमें कोई सेंधमारी करते, इसके पहले ही भाजपा ने मांझी को मैनेज कर लिया। यह तेजस्वी और लालू की दूसरी चूक थी। वे मांझी को अपने पाले में करने में नाकामयाब रहे। नीलम देवी उपचुनाव जीत कर विधानसभा पहुंची थीं, तब की यह तस्वीर है।

तेजस्वी अपने विधायकों को नहीं भांप पाए%name लालू तेजस्वी जीती बाजी कैसे हारे? भाजपा की प्लानिंग समझ नहीं पाए, तीन पॉइंट में जानिए क्यों टूटे विधायक 

खेला का चैलेंज करने के बाद राजद खेमे की नजर जदयू-भाजपा और हिंदुस्तानी अवाम मोर्चा (HAM) के नाराज विधायकों पर तो थी, लेकिन अपने विधायकों पर नहीं। जब जदयू और भाजपा की बाड़ेबंदी के दौरान कुछ विधायक गायब थे तो बहुतों को लगा कि गेम तेजस्वी के हाथ में है, क्योंकि वे (नीलम देवी को छोड़कर) सभी विधायकों को अपने आवास पर 40 घंटे से रोके हुए थे। अपने बेटे के साथ लालू यादव और राबड़ी देवी भी मोर्चा संभाले हुए थे।

ऐसा लगा कि सब कुछ प्लानिंग के अनुसार ही हो रहा है, लेकिन तेजस्वी चेतन आनंद, प्रहलाद यादव और नीलम देवी को भांप नहीं पाये। 11 फरवरी की देर रात पुलिस तेजस्वी के आवास पर पहुंची और चेतन आनंद को लेकर निकल आई। यहीं से गेम बदल गया, जिसका रिफलेक्शन अगले दिन फ्लोर टेस्ट में दिखा।

भाजपा की प्लानिंग समझ नहीं पाए

फ्लोर टेस्ट से पहले तेजस्वी के पीछे लालू यादव का दिमाग एक्टिव हो चुका था। वे अपने अनुभव और राजनीतिक सूझबूझ से तेजस्वी को गाइड कर रहे थे। 28 जनवरी से 11 फरवरी के बीच लालू की चालों का असर भी नजर आने लगा था। यही सब कुछ भाजपा को ज्यादा खल गया, क्योंकि अगर लालू-तेजस्वी की जोड़ी अपने मंसूबों में कामयाब हो जाती तो बिहार में उनकी स्थिति पहले से भी ज्यादा मजबूत हो जाती।

साथ ही देशभर में एक मैसेज यह भी जाता कि अगर लोकसभा चुनाव में भाजपा या नरेंद्र मोदी को रोकना है तो वो केवल लालू यादव ही कर सकते हैं। भाजपा ऐसा किसी भी कीमत पर नहीं होने देना चाहती थी। इसलिए फ्लोर टेस्ट को फुल प्रूफ बनाने की प्लानिंग तैयार हुई, जिसकी भनक तक लालू-तेजस्वी को नहीं लगी। भाजपा के शीर्ष नेतृत्व ने बिहार में ऐसा माहौल बने रहने दिया, जिससे लालू-तेजस्वी को यह लगता रहे कि वे ड्राइविंग सीट पर हैं, जबकि ऐसा था नहीं। तेजस्वी खेमे की हर जानकारी भाजपा के शीर्ष नेतृत्व को मिल रही थी। यही भाजपा की कार्यशैली भी है।

जो गेम चेंजर थे, उन्हें मैनेज नहीं कर पाए

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भाजपा और जदयू के कुछ विधायक गेम करने की फिराक में थे। इसकी पहली झलक 10 फरवरी को मंत्री श्रवण कुमार के घर आयोजित भोज में दिखी। अगले ही दिन विजय चौधरी के आवास पर विधानमंडल की बैठक में इसकी पुष्टि हो गई कि जदयू के विधायक एकजुट नहीं हैं। भाजपा भी अलर्ट थी ही, फ्लोर टेस्ट से दो दिन पहले अपने विधायकों को पटना से दूर गया ले गई। हालांकि, इस खेमे में भी कुछ विधायक पार्टी लाइन से भटके हुए थे।

मूकनायक मीडिया सूत्रों के अनुसार, यह बात भी सामने आई कि अगर तेजस्वी फ्लोर टेस्ट के पहले ठीकठाक नंबर जुटा लेते तो ये सभी नाराज विधायक भी पाला बदलकर तेजस्वी के साथ हो लेते। और अगर ऐसा हाे जाता तो सीन कुछ और ही होता, लेकिन तेजस्वी इन नाराज विधायकों को मैनेज करने में चूक गए।

स्पीकर के भरोसे खेला करने के अरमान भी ठंडे पड़ गए, जब राजद के ही 3 विधायक सत्ता पक्ष के खेमे में जा बैठे। इस तरह स्पीकर के विश्वास मत में NDA के पास 122+3 का आंकड़ा हो गया था। यानी अब तेजस्वी कुछ भी कर लेते तो खेला नहीं कर सकते थे। फिर जदयू और भाजपा के पांच विधायक विधानसभा पहुंच गए। नीतीश के पास बहुमत से 7 विधायक ज्यादा हो गए।

जानिए उन विधायकों को, जिन्होंने मझधार में छोड़ा

इस बीच राजद के 3 विधायक चेतन आनंद, नीलम देवी और प्रहलाद यादव सत्ता पक्ष की ओर बैठे नजर आए और सत्ता पक्ष के समर्थन में वोटिंग भी की। अब इन सभी विधायकों पर कार्रवाई की तलवार लटकने लगी हैं। इनकी सदस्यता पर खतरा है। आइए आगे जानते हैं इन तीनों विधायकों की राजनीतिक जमीन के बारे में।

बिहार में 12 फरवरी को NDA सरकार फ्लोर टेस्ट में पास हो गई। पक्ष में 129 वोट पड़े तो विपक्ष ने वॉकआउट कर दिया। सबसे इंट्रेस्टिंग यह था कि नीतीश कुमार सरकार भी बचा ले गए और राजद के 3 विधायक भी कम कर गए। जबकि फ्लोर टेस्ट से पहले तक भाजपा और जदयू के तीन-तीन विधायक गायब थे। लग रहा था कि खेला होकर रहेगा, लेकिन फ्लोर टेस्ट के दौरान हुआ एकदम उल्टा।

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अचानक से राजद की विधायक नीलम देवी, चेतन आनंद और प्रहलाद यादव NDA सरकार के खेमे में जा बैठे। ये सबको चौंकाने वाला सीन था, क्योंकि इसकी कल्पना किसी ने नहीं की थी। खासकर सूर्यगढ़ा के विधायक प्रहलाद यादव की, जो लालू परिवार के बेहद वफादार माने जाते हैं।

इसके बाद जैसे-जैसे फ्लोर टेस्ट की कार्यवाही आगे बढ़ी, वैसे-वैसे जदयू-भाजपा के गायब विधायक भी पहुंचने लगे और सत्ता पक्ष में जा बैठे। यहां तेजस्वी यादव केवल देखते रहे और NDA सरकार फ्लोर टेस्ट में पास हो गई। तेजस्वी ही नहीं, सबको लगा कि गेम उनके हाथों से निकल कैसे गया?

तीन पॉइंट में जानिए क्यों टूटे विधायक

  1. लोकसभा चुनाव में टिकट: सीनियर जर्नलिस्ट लव कुमार मिश्रा कहते हैं- दो महीने बाद ही लोकसभा चुनाव होना है। इसलिए सांसद बनने की लालसा रखने वाले विधायकों को लोकसभा टिकट का बड़ा ऑफर था। बाहुबली आनंद मोहन और अनंत सिंह की पत्नियों को यही ऑफर दिया गया।
  2. मंत्री बनने का ऑफर: मंत्री बनने की चाहत में विधायक पार्टी छोड़ने को तैयार थे। आरजेडी यही लालच दे रही थी। इनमें बीजेपी विधायक दरभंगा के अलीनगर मिश्रीलाल यादव और सीतामढ़ी के सुरसंड से जेडीयू विधायक दिलीप राय बड़ा नाम हैं। इस ट्रैप में जेडीयू विधायक बीमा भारती और संजीव कुमार का भी नाम था। हालांकि बाद में दोनों सत्ता पक्ष में आ गए।
  3. क्रिमिनल केस से राहत का वादा: सीनियर जर्नलिस्ट लव कुमार मिश्रा के मुताबिक यह सबसे बड़ा हथियार सत्ता पक्ष के लिए साबित हुआ। आरजेडी विधायक चेतन आनंद, नीलम देवी और प्रहलाद यादव इसी वजह से सत्ता पक्ष की तरफ आए। चेतन के पिता आनंद मोहन का मामला विचाराधीन है, जबकि नीलम देवी के पति अनंत सिंह जेल में हैं। प्रहलाद पर कई केस दर्ज हैं।

और लौट आए सत्ता पक्ष के लापता विधायक

सोमवार को विधानसभा की कार्यवाही शुरू हुई, उस समय जेडीयू-भाजपा के 3-3 विधायक और आरजेडी के 2 विधायक नहीं पहुंचे थे, लेकिन जैसे ही यह खबर सामने आई कि आरजेडी के विधायक चेतन आनंद, नीलम देवी और प्रहलाद यादव सत्ता पक्ष की तरफ हो गए हैं तो सत्ता पक्ष के लापता चार विधायक भी विधानसभा पहुंच गए। सिर्फ सुरसंड से जदयू विधायक दिलीप राय नहीं आए।

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